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  • FCRA संशोधन विधेयक पर संसद में जेपीसी की मुहर, विपक्ष ने अल्पसंख्यकों और NGO को निशाना बनाने का लगाया आरोप

    FCRA संशोधन विधेयक पर संसद में जेपीसी की मुहर, विपक्ष ने अल्पसंख्यकों और NGO को निशाना बनाने का लगाया आरोप

    नई दिल्ली ।मानसून सत्र के दौरान विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम से जुड़े संशोधन विधेयक को लेकर संसद में सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद सामने आए हैं। लोकसभा ने विदेशी योगदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 को संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी के पास भेजने का प्रस्ताव ध्वनिमत से मंजूर कर लिया। प्रस्ताव गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने सदन में पेश किया।

    प्रस्तावित संयुक्त संसदीय समिति में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल होंगे। समिति को विधेयक के प्रावधानों की विस्तार से जांच करने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके साथ ही उसे शीतकालीन सत्र 2026 के पहले सप्ताह के आखिरी दिन तक अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपनी होगी।

    सरकार की ओर से विधेयक को जेपीसी में भेजे जाने के बाद अब इसके प्रावधानों पर विस्तृत विचार की प्रक्रिया शुरू होगी। समिति विभिन्न पक्षों से जुड़े मुद्दों और विधेयक के संभावित प्रभावों का अध्ययन कर सकती है। इसके बाद उसकी रिपोर्ट के आधार पर विधेयक को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया तय होगी।

    वहीं विपक्ष ने इस विधेयक की जरूरत और सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रस्तावित बदलावों का इस्तेमाल अल्पसंख्यक समुदायों और गैर सरकारी संगठनों पर दबाव बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। विपक्ष ने सरकार से विधेयक वापस लेने की मांग भी उठाई।

    समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और सांसद अखिलेश यादव ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि FCRA विधेयक लाने का उद्देश्य अल्पसंख्यकों को दबाना और सरकार के राजनीतिक हितों को साधना है। उन्होंने विधेयक की जरूरत और इसके पीछे बताई जा रही वजहों पर सवाल खड़े किए।

    समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने विधेयक को जेपीसी में भेजे जाने को सकारात्मक कदम बताया। उन्होंने कहा कि समिति के स्तर पर उन प्रावधानों पर चर्चा हो सकती है जिनका असर संस्थाओं और उनके जमीनी कामकाज पर पड़ सकता है। उन्होंने गैर सरकारी संगठनों के कामकाज और उनके सामने आने वाली चुनौतियों का मुद्दा भी उठाया।

    विपक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले NGO को कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जब वे सरकार की नीतियों के अनुरूप काम नहीं करते। विपक्ष का दावा है कि ऐसे संगठनों के लिए नियमों में बदलाव का प्रभाव महत्वपूर्ण हो सकता है।

    इस बीच कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और विदेश नीति को लेकर सरकार पर अलग मुद्दे पर हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि व्यापार समझौतों में देश और किसानों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा नहीं हो रही है और कुछ बड़े कारोबारी हितों को प्राथमिकता दी जा रही है।

    FCRA विधेयक को जेपीसी के पास भेजे जाने से अब इसके प्रावधानों की संसदीय जांच का रास्ता खुल गया है। समिति की रिपोर्ट आगामी शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के आखिरी दिन तक अपेक्षित है। इसके बाद विधेयक के भविष्य और सरकार की ओर से उठाए जाने वाले अगले कदम पर नजर रहेगी। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार के तर्क और विपक्ष की आपत्तियों के बीच समिति की समीक्षा अहम भूमिका निभाएगी।

  • बांग्लादेश में कानून-व्यवस्था पर आवामी लीग का हमला, यूनुस और बीएनपी सरकारों पर राज्य विफलता का आरोप

    बांग्लादेश में कानून-व्यवस्था पर आवामी लीग का हमला, यूनुस और बीएनपी सरकारों पर राज्य विफलता का आरोप


    नई दिल्ली । बांग्लादेश की प्रमुख विपक्षी पार्टी आवामी लीग ने देश की मौजूदा राजनीतिक और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए दावा किया है कि बीते दो वर्षों में देश धीरे-धीरे राज्य विफलता जैसी स्थिति की ओर बढ़ गया है। पार्टी का कहना है कि जुलाई 2024 के आंदोलन के बाद जिन सुधारों, लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक स्वतंत्रता और कानून के शासन की उम्मीद जताई गई थी, वे पूरी नहीं हो सकीं। इसके विपरीत देश में असुरक्षा, राजनीतिक टकराव और संस्थागत कमजोरी लगातार बढ़ती गई है।

    पार्टी ने आरोप लगाया कि अंतरिम प्रशासन से लेकर वर्तमान बीएनपी सरकार तक किसी भी शासन ने हालात को सामान्य बनाने में प्रभावी भूमिका नहीं निभाई। उसके अनुसार दोनों सरकारों ने कानून-व्यवस्था की चुनौतियों का समाधान करने के बजाय असाधारण प्रशासनिक शक्तियों को उचित ठहराने के लिए जनता के बीच फैली असुरक्षा का इस्तेमाल किया। आवामी लीग का कहना है कि इससे सामाजिक स्तर पर अव्यवस्था बढ़ी और स्थानीय स्तर पर आपराधिक समूहों तथा भीड़तंत्र को बढ़ावा मिला।

    आवामी लीग ने दावा किया कि सबसे अधिक असर धार्मिक अल्पसंख्यकों, महिलाओं और बच्चों पर पड़ा है। पार्टी के अनुसार कई इलाकों में अल्पसंख्यक समुदायों के घरों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों और धार्मिक स्थलों पर हमलों की घटनाएं सामने आई हैं। साथ ही संपत्तियों पर अवैध कब्जे, धमकियों और यौन हिंसा जैसी घटनाओं में भी वृद्धि हुई है। पार्टी का आरोप है कि पीड़ितों को पर्याप्त सुरक्षा और समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा है।

    पार्टी ने कहा कि वर्ष 2025 के दौरान सांप्रदायिक हिंसा, मौतों और धार्मिक स्थलों पर हमलों की अनेक घटनाएं दर्ज की गईं। इसके अलावा वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों में भी ऐसी घटनाओं के जारी रहने का दावा किया गया है। आवामी लीग का कहना है कि इन मामलों में प्रभावी कार्रवाई की कमी के कारण दोषियों का मनोबल बढ़ा है और प्रभावित समुदायों में भय का माहौल बना हुआ है।

    महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों को लेकर भी पार्टी ने चिंता जताई है। उसके अनुसार बलात्कार, यौन उत्पीड़न और बच्चों के खिलाफ हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है। पार्टी का दावा है कि कई मामलों में आरोपी पीड़ितों के परिचित, पड़ोसी, रिश्तेदार या शिक्षक रहे हैं। ऐसे मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति पर भी सवाल उठाए गए हैं।

    आवामी लीग ने यह भी आरोप लगाया कि राजनीतिक हिंसा, भीड़ द्वारा हत्याएं, पत्रकारों और शिक्षकों पर हमले तथा जमीन कब्जाने की घटनाएं एक समान पैटर्न को दर्शाती हैं। पार्टी के अनुसार इन मामलों में कमजोर जांच, राजनीतिक हस्तक्षेप और न्याय मिलने में देरी जैसी समस्याएं लगातार सामने आ रही हैं। उसका कहना है कि आम नागरिकों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ रही है और लोग शाम के बाद बाहर निकलने से भी परहेज करने लगे हैं।

    पार्टी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील करते हुए कहा कि बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए। उसका मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था, कानून के शासन और मानवाधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए संबंधित पक्षों को सरकार से जवाबदेही तय करने की अपेक्षा करनी चाहिए। वहीं, इन आरोपों पर सरकार की ओर से इस रिपोर्ट के समय तक कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।