दक्षिणी यूक्रेन के औद्योगिक शहर जापोरिजिया में स्कूल खुलने का दृश्य किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा नजर आता है। शहर युद्ध के मोर्चे से महज 15 किलोमीटर दूर है और लगातार ड्रोन व मिसाइल हमलों के बावजूद यहां बच्चों की पढ़ाई को जारी रखने के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। माता-पिता के लिए ये भूमिगत स्कूल डर के बीच सुरक्षा और बच्चों की शिक्षा दोनों का भरोसा बन गए हैं।
‘पाताल में गए बिना बच्चों को पढ़ाना मुश्किल’
39 वर्षीय किराना दुकानदार ऑलेक्सांद्र लागिन के दो बेटे भी जमीन के नीचे बने स्कूल में पढ़ते हैं। उनका कहना है कि ड्रोन और मिसाइल हमलों के दौर में बच्चों को सुरक्षित रखते हुए सामान्य तरीके से पढ़ाना बेहद मुश्किल हो गया है। जापोरिजिया ने इस चुनौती से निपटने के लिए भूमिगत स्कूलों का विकल्प अपनाया है।
दिलचस्प यह है कि युद्ध क्षेत्र के इतने करीब होने के बावजूद जापोरिजिया बच्चों को निर्बाध शिक्षा देने के मामले में राजधानी कीव से बेहतर तैयार नजर आता है।
कीव में सायरन बजते ही पढ़ाई बंद
कीव के स्कूलों में हवाई हमले का अलर्ट शिक्षा व्यवस्था को सीधे प्रभावित करता है। यहां एक स्कूल के दिन में औसतन 158 मिनट तक हवाई सायरन बजते रहते हैं। सायरन शुरू होते ही बच्चों को सामान्य बेसमेंट में ले जाया जाता है। वहां जगह सीमित होने के कारण पढ़ाई रुक जाती है और बच्चे अलर्ट खत्म होने का इंतजार करते हैं।
इसके उलट जापोरिजिया में यूरोपीय फंडिंग की मदद से 10 अत्याधुनिक भूमिगत स्कूल बनाए गए हैं। इन स्कूलों की खास डिजाइन के कारण हवाई हमले के सायरन के दौरान भी कक्षाएं जारी रखी जा सकती हैं।
बंकर में सुरक्षा के साथ पढ़ाई की पूरी व्यवस्था
भूमिगत स्कूलों को सिर्फ कंक्रीट की मोटी दीवारों से सुरक्षित नहीं बनाया गया है, बल्कि यहां सामान्य स्कूल जैसी सुविधाओं के साथ सुरक्षा की आधुनिक तकनीक भी इस्तेमाल की गई है।
इन स्कूलों में ऐसे अत्याधुनिक एयर डक्ट लगाए गए हैं, जो रेडिएशन और जहरीले धुएं को फिल्टर करने में सक्षम हैं। रूसी हमलों के दौरान बिजली का ग्रिड ठप होने की स्थिति में हेवी-ड्यूटी डीजल जनरेटर अपने आप चालू हो जाते हैं। बच्चों के लिए वेंटिलेशन पाइपों की व्यवस्था कंक्रीट की दीवारों के सहारे की गई है, जबकि इन्हीं सुरक्षित गलियारों और जगहों के बीच वे खेलते भी हैं।
छात्र बोले- सायरन से डर नहीं, खेल छूटने का अफसोस
8वीं कक्षा के छात्र डामिर का कहना है कि उसे भूमिगत स्कूल में पढ़ना अच्छा लगता है और यहां उसे डर नहीं लगता। हालांकि, फुटबॉल खेलते समय अगर सायरन बज जाए तो उसे खेल बीच में छोड़कर नीचे जाना पड़ता है और यही बात उसे खराब लगती है।
युद्ध के माहौल में पले-बढ़ रहे बच्चों के लिए अब सायरन, बंकर और हमले रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।
सैनिक पिता: अब मोर्चे पर कम चिंता होती है
8वीं कक्षा में पढ़ने वाले 13 वर्षीय डैनिलो के पिता दिमित्रो सिजीख युद्ध के मोर्चे पर तैनात हैं। बेटे के सुरक्षित भूमिगत स्कूल में पढ़ने से उन्हें भी राहत मिली है। उनका कहना है कि बेटे की सुरक्षा को लेकर भरोसा होने के कारण वे मोर्चे पर अपने कर्तव्य का निर्वहन अधिक निश्चिंत होकर कर पा रहे हैं।
युद्ध का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी
सुरक्षित स्कूलों के बावजूद युद्ध का मानसिक असर बच्चों की शिक्षा पर पड़ रहा है। कीव की रिसर्च संस्था ‘सीडोस’ की शिक्षा विश्लेषक टेटियाना झेरियोबकिना के मुताबिक युद्ध से पैदा हुआ मानसिक तनाव और लगातार बना डर परीक्षाओं में बच्चों के प्रदर्शन को प्रभावित कर रहा है। तनाव और भय के कारण उनके टेस्ट स्कोर में गिरावट देखने को मिल रही है।
जापोरिजिया के एक स्कूल की प्रिंसिपल हलीना वोल्कोवा गलियारे से गुजरते एक बच्चे को गले लगाते हुए कहती हैं कि वे मौजूदा हालात को भयावह या कयामत का मंजर कहकर नहीं देखते, क्योंकि यही अब उनकी जिंदगी की वास्तविकता बन चुकी है।
युद्ध ने यूक्रेन के बच्चों से सामान्य बचपन छीन लिया है, लेकिन इन भूमिगत स्कूलों में किताबें, ब्लैकबोर्ड और खेल के बीच उनकी पढ़ाई जारी है। जमीन के ऊपर युद्ध चल रहा है और जमीन के नीचे एक पूरी पीढ़ी अपने भविष्य की तैयारी कर रही है।





