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  • स्मार्टफोन खरीदने की सोच बदल रही एआई फीचर्स बने सबसे बड़ा फैसला 68 फीसदी उपभोक्ता दे रहे प्राथमिकता

    स्मार्टफोन खरीदने की सोच बदल रही एआई फीचर्स बने सबसे बड़ा फैसला 68 फीसदी उपभोक्ता दे रहे प्राथमिकता


    नई दिल्ली । मध्य पूर्व में एक बार फिर बढ़ते भू राजनीतिक तनाव के बीच भारत के लिए राहत की खबर यह है कि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के मामले में पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में खड़ा है। ईरान और अमेरिका के बीच फिर से बढ़े सैन्य तनाव तथा होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की घोषणा के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ गई है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने समय रहते आवश्यक तैयारियां कर ली हैं। इसी कारण संभावित आपूर्ति संकट का असर फिलहाल सीमित रहने की उम्मीद है।

    हाल के घटनाक्रम में अमेरिका की ओर से सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान ने 11 जुलाई को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट को फिर से बंद करने का ऐलान किया। इसके बाद इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई। यह समुद्री रास्ता दुनिया के बड़े हिस्से में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति का प्रमुख माध्यम है इसलिए इसके प्रभावित होने का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर तुरंत दिखाई देने लगा।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो सितंबर और अक्टूबर के दौरान कच्चे तेल की आपूर्ति लागत बढ़ सकती है। हालांकि भारत ने पहले से ही अगस्त तक के लिए कच्चे तेल और एलपीजी के आयात की व्यवस्था सुरक्षित कर ली है। यही वजह है कि निकट भविष्य में देश के भीतर ईंधन की उपलब्धता को लेकर किसी बड़े संकट की आशंका नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में कुछ चुनौतियां जरूर सामने आ सकती हैं लेकिन उन्हें भी प्रभावी तरीके से संभाला जा सकता है।

    मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। ब्रेंट क्रूड करीब पांच प्रतिशत की बढ़त के साथ 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी लगभग पांच प्रतिशत बढ़कर 75 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि यदि तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतें 80 से 85 डॉलर प्रति बैरल के बीच पहुंच सकती हैं।

    हालांकि इस बार वैश्विक बाजार में एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि गैर ओपेक देशों ने अपना उत्पादन पहले ही बढ़ा दिया है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति का दबाव कुछ हद तक कम हुआ है और संभावित कमी की भरपाई करने की क्षमता भी बनी हुई है। यही कारण है कि कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका के बावजूद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर स्थिति पहले जैसी गंभीर नहीं मानी जा रही।

    भारत सरकार भी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर लगातार सतर्क बनी हुई है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि देश के पास लगभग 60 दिनों के लिए कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है जबकि एलपीजी का करीब 45 दिनों का स्टॉक सुरक्षित रखा गया है। इसके अलावा वैकल्पिक आयात स्रोतों और रणनीतिक भंडारण की व्यवस्था भी लगातार मजबूत की जा रही है ताकि किसी भी आपात स्थिति में आम लोगों और उद्योगों पर असर कम से कम पड़े।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने रणनीतिक भंडारण क्षमता बढ़ाने और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने पर जो काम किया है उसका फायदा अब दिखाई दे रहा है। यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबा भी खिंचता है तो भारत के पास स्थिति से निपटने के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत तैयारी मौजूद है। यही कारण है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद देश की ऊर्जा सुरक्षा फिलहाल सुरक्षित मानी जा रही है।