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  • भारत का बड़ा प्रोजेक्ट और चीन को पोर्ट का काम: मालदीव की डबल गेम से बढ़ी हलचल, मुइज्जू की रणनीति ने चौंकाया

    भारत का बड़ा प्रोजेक्ट और चीन को पोर्ट का काम: मालदीव की डबल गेम से बढ़ी हलचल, मुइज्जू की रणनीति ने चौंकाया


    नई दिल्ली। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू हाल के दिनों में भारत के साथ रिश्तों को लेकर सकारात्मक संकेत देते नजर आए हैं लेकिन इसी बीच थिलाफुशी पोर्ट प्रोजेक्ट में चीन की बड़ी भूमिका ने एक बार फिर दोनों देशों के बीच मालदीव की रणनीति को चर्चा में ला दिया है। कुछ समय पहले ही मुइज्जू ने भारत की मदद से तैयार हो रहे थिलामाले ब्रिज को भारत और मालदीव के मजबूत रिश्तों का प्रतीक बताया था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भारत सरकार के सहयोग के लिए आभार जताया था। लेकिन दूसरी तरफ मालदीव ने थिलाफुशी पोर्ट के पहले चरण का काम चीन की कंपनी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी यानी CHEC को सौंप दिया है।

    थिलाफुशी कोई सामान्य इलाका नहीं है। राजधानी माले के पश्चिम में स्थित यह कृत्रिम द्वीप आने वाले समय में मालदीव के सबसे अहम कारोबारी और औद्योगिक केंद्रों में शामिल होने वाला है। सरकार माले के मौजूदा कमर्शियल पोर्ट पर बढ़ते दबाव और ट्रैफिक को कम करने के लिए बंदरगाह की गतिविधियों को थिलाफुशी ले जाने की योजना पर काम कर रही है। मालदीव सरकार के मुताबिक यहां आधुनिक वेयरहाउस कोल्ड स्टोरेज और माल ढुलाई से जुड़ी सुविधाओं के साथ एक बड़ा कमर्शियल पोर्ट विकसित किया जा रहा है।

    योजना के पहले चरण में पोर्ट क्षेत्र को करीब 5 हेक्टेयर से बढ़ाकर 20 हेक्टेयर तक करने की बात है। इसमें 650 मीटर लंबी क्वे वॉल 125 मीटर का रोडसाइड जेट्टी बॉन्डेड वेयरहाउस और एक्स रे सुविधा जैसी व्यवस्थाएं शामिल होंगी। आधुनिक ऑटोमेटेड सिस्टम के जरिए माल की क्लीयरेंस प्रक्रिया को मौजूदा कई दिनों से घटाकर करीब 48 घंटे तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। यानी यह प्रोजेक्ट मालदीव की व्यापारिक व्यवस्था और सप्लाई चेन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस थिलाफुशी इलाके में चीन की कंपनी पोर्ट से जुड़ा काम करेगी वही इलाका भारत के ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट यानी GMCP का भी अहम हिस्सा है। भारत की ओर से करीब 400 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन और 100 मिलियन डॉलर की ग्रांट से तैयार हो रहे इस प्रोजेक्ट के जरिए माले को विलिमाले गुल्हिफाल्हु और थिलाफुशी से जोड़ा जा रहा है। इस परियोजना का उद्देश्य केवल आवाजाही आसान करना नहीं बल्कि मालदीव की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना भी है।

    यानी एक ही रणनीतिक क्षेत्र में भारत और चीन दोनों की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं मौजूद हैं। यही वजह है कि थिलाफुशी पोर्ट को लेकर चर्चा केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। हिंद महासागर में मालदीव की भौगोलिक स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है और किसी भी बड़े बंदरगाह प्रोजेक्ट में विदेशी कंपनी की भूमिका स्वाभाविक रूप से रणनीतिक सवाल खड़े करती है। हालांकि चीनी कंपनी को ठेका मिलने का मतलब यह अपने आप नहीं है कि यह बंदरगाह सैन्य इस्तेमाल के लिए होगा। लेकिन रणनीतिक विश्लेषकों की चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि चीन को मालदीव के अहम समुद्री बुनियादी ढांचे में कितनी बड़ी भूमिका मिलती है।

    मुइज्जू की राजनीति को देखें तो तस्वीर और दिलचस्प हो जाती है। वह 2023 में इंडिया आउट अभियान के जरिए सत्ता में आए थे और उनके कार्यकाल की शुरुआत में मालदीव को चीन के करीब जाता हुआ देखा गया था। लेकिन आर्थिक दबाव और वित्तीय जरूरतों के बीच भारत के साथ रिश्तों में फिर सुधार हुआ। अब मुइज्जू भारत की परियोजनाओं की तारीफ कर रहे हैं और साथ ही चीन के साथ बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट आगे बढ़ा रहे हैं।

    ऐसे में इसे केवल भारत की अनदेखी या चीन के सामने पूरी तरह झुकाव कहना शायद जल्दबाजी होगी। ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि मालदीव दोनों बड़े देशों से अपने हित साधने की कोशिश कर रहा है। भारत उसे वित्तीय सहयोग कनेक्टिविटी और विकास परियोजनाओं में मदद दे रहा है जबकि चीन बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्माण प्रोजेक्ट में सक्रिय है। थिलाफुशी पोर्ट का फैसला यही बताता है कि माले फिलहाल भारत और चीन के बीच किसी एक पक्ष को चुनने के बजाय दोनों के साथ संबंध बनाए रखने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।

  • मोहम्मद मुइज्जू की यात्रा से पहले मालदीव की सैन्य विमान देने की तैयारी में पाकिस्तान?

    मोहम्मद मुइज्जू की यात्रा से पहले मालदीव की सैन्य विमान देने की तैयारी में पाकिस्तान?


    नई दिल्ली।
    मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की अक्टूबर में प्रस्तावित पाकिस्तान यात्रा से पहले दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को लेकर पाकिस्तान की तैयारियों का एक कथित गोपनीय दस्तावेज सामने आया है। दस्तावेज के मुताबिक, पाकिस्तान मालदीव को अपने इस्तेमाल किए हुए सैन्य विमान देने के प्रस्ताव पर काम कर रहा है। इसके अलावा मालदीव की वायुसेना के लिए बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षण, तकनीकी और वित्तीय सहायता देने की योजना भी प्रस्तावित है।

    दस्तावेज में इस पूरे प्रयास को दोनों देशों के बीच रक्षा संबंध मजबूत करने की दिशा में उठाए जाने वाले कदम के तौर पर बताया गया है। हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों ने इसके रणनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल उठाए हैं।

    13 अगस्त की चिट्ठी में क्या है?

    दावे के मुताबिक, 13 अगस्त 2026 को पाकिस्तान स्थित मालदीव के उच्चायोग ने रावलपिंडी स्थित पाकिस्तान रक्षा मंत्रालय को एक गोपनीय पत्र भेजा। इस पत्र की जानकारी पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, सेना मुख्यालय और वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाई गई।

    दस्तावेज के अनुसार, 20 से 22 अक्टूबर के बीच मालदीव के साथ एक बड़ी सैन्य डील को लेकर तैयारियां की जा रही हैं। पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर समेत संबंधित विभाग इस प्रस्ताव को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में बताए गए हैं।

    पत्र में यह सुझाव भी दिया गया है कि यदि दोनों पक्षों के बीच सहमति बनती है तो मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा के दौरान समझौता ज्ञापन यानी MoU पर हस्ताक्षर की घोषणा की जा सकती है।

    सैन्य विमान के साथ ट्रेनिंग और तकनीकी मदद का प्रस्ताव

    गोपनीय दस्तावेज में केवल सैन्य विमान उपलब्ध कराने की बात ही नहीं है। प्रस्ताव में मालदीव की वायुसेना के लिए बुनियादी ढांचा विकसित करने, प्रशिक्षण उपलब्ध कराने और तकनीकी सहायता देने का भी उल्लेख है।

    इसके साथ वित्तीय सहयोग की संभावना भी बताई गई है। यानी पाकिस्तान का प्रस्ताव केवल सैन्य उपकरण उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि मालदीव के रक्षा ढांचे में अपनी भूमिका बढ़ाने की दिशा में भी देखा जा रहा है।

    रक्षा विशेषज्ञ ने भारत की सुरक्षा से जोड़ा मामला

    रक्षा मामलों के जानकार कर्नल सीबी भगत का कहना है कि भारत और मालदीव के बीच पहले से अच्छे संबंध हैं। उनके मुताबिक, ऐसे में पाकिस्तान की ओर से मालदीव के साथ सैन्य उपकरणों की डील की कोशिश को केवल सामान्य रक्षा सहयोग के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    उनका मानना है कि हिंद महासागर में भारत के बेहद करीब स्थित मालदीव की वायुसेना में पाकिस्तानी सैन्य विमानों की मौजूदगी क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को प्रभावित कर सकती है। भगत के अनुसार, इसके पीछे भारत के लिए रणनीतिक चुनौती पैदा करने की कोशिश हो सकती है।

    पाकिस्तान खुद चीन पर कितना निर्भर?

    पाकिस्तान के रक्षा क्षेत्र की अपनी सीमाएं भी इस प्रस्ताव के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। रक्षा उत्पादन के मामले में पाकिस्तान का सैन्य औद्योगिक ढांचा सीमित है और वह अपने प्रमुख हथियारों की जरूरत के लिए चीन पर काफी निर्भर है।

    दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2021 से 2025 के बीच पाकिस्तान के प्रमुख हथियारों के आयात में चीन की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत रही।

    ऐसे में मालदीव को सैन्य उपकरण उपलब्ध कराने की पाकिस्तान की कोशिश को क्षेत्रीय रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, इस प्रस्ताव का वास्तविक स्वरूप और दोनों देशों के बीच अंतिम समझौता होने की स्थिति आगे की बातचीत पर निर्भर करेगी।

    मुइज्जू की अक्टूबर यात्रा पर नजर

    मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की अक्टूबर में प्रस्तावित पाकिस्तान यात्रा इस पूरे घटनाक्रम के लिहाज से अहम मानी जा रही है। यदि रक्षा सहयोग को लेकर सहमति बनती है, तो यात्रा के दौरान किसी समझौते या MoU की घोषणा की संभावना जताई गई है।

    फिलहाल सामने आए दस्तावेज में प्रस्तावित रक्षा सहयोग की जानकारी है। इसे अंतिम सैन्य समझौता मानने से पहले दोनों देशों की आधिकारिक पुष्टि और आगे की कार्रवाई का इंतजार करना होगा।