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  • मोहन सरकार में अफसरों की कुर्सियों पर बड़ा बदलाव, चार महीने में 22 जिलों के कलेक्टर बदले, पुलिस महकमे में भी व्यापक फेरबदल

    मोहन सरकार में अफसरों की कुर्सियों पर बड़ा बदलाव, चार महीने में 22 जिलों के कलेक्टर बदले, पुलिस महकमे में भी व्यापक फेरबदल


    भोपाल । मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार ने पिछले 120 दिनों के दौरान प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था में बड़े बदलाव किए हैं। जुलाई से अक्टूबर के बीच प्रदेश के 22 जिलों में कलेक्टरों की पदस्थापना बदली गई जबकि 12 जिलों में पुलिस अधीक्षकों को भी नई जिम्मेदारियां सौंपी गईं। इन फेरबदलों के बीच जहरीली शराब से हुई मौतें किसान आंदोलन मुआवजे को लेकर विरोध और प्रशासनिक स्तर पर सामने आए विवाद चर्चा में रहे हैं। हालांकि सभी तबादलों को किसी एक घटना से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा क्योंकि प्रत्येक नियुक्ति के पीछे अलग प्रशासनिक परिस्थितियां भी हो सकती हैं।

    नए मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने 23 जुलाई को कार्यभार संभाला था। इसके बाद प्रदेश में कलेक्टरों की पदस्थापना में लगातार बदलाव देखने को मिले। कुछ जिलों में गंभीर घटनाओं के बाद अधिकारियों को हटाया गया तो कुछ स्थानों पर प्रशासनिक जरूरतों के आधार पर नई नियुक्तियां की गईं। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार ने कई अधिकारियों को एक जिम्मेदारी से हटाकर दूसरी जगह महत्वपूर्ण पदों पर भी तैनात किया है।

    जहरीली शराब से मौतों के मामलों के बाद सागर और देवास में प्रशासनिक बदलाव विशेष रूप से चर्चा में रहे। सागर जिले की बंडा तहसील में सितंबर के दौरान जहरीली शराब पीने से 30 से अधिक लोगों की मौत होने की खबर सामने आई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री ने न्यायिक जांच आयोग गठित किया था और स्वयं भी सागर पहुंचे थे। घटना के समय कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को तत्काल नहीं हटाया गया था लेकिन 27 अक्टूबर को जारी तबादला आदेश में कलेक्टर प्रतिभा पाल और एसपी अनुराग सुजानिया को नई जिम्मेदारियां दे दी गईं। सागर में दिलीप कुमार यादव को कलेक्टर और संजीव कुमार सिन्हा को एसपी बनाया गया।

    देवास जिले में भी जहरीली शराब से मौतों के बाद प्रशासनिक बदलाव किए गए। यहां कलेक्टर ऋतुराज और एसपी पुनीत गहलोत को हटाया गया। देवास की नई कलेक्टर नेहा मीना को बनाया गया जो इससे पहले सिवनी जिले की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। सिवनी में अंजू अरुण कुमार को कलेक्टर नियुक्त किया गया जबकि देवास के एसपी पद पर बालाघाट के तत्कालीन एसपी आदित्य मिश्रा को भेजा गया। इन बदलावों के बाद दोनों जिलों में प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर नई जिम्मेदारियां तय की गईं।

    कलेक्टरों के फेरबदल का एक बड़ा दौर 13 अक्टूबर को देखने को मिला था। उस दिन जारी आदेश में पन्ना मऊगंज जबलपुर नर्मदापुरम हरदा सिंगरौली बालाघाट शाजापुर बुरहानपुर भिंड और रायसेन सहित 11 जिलों के कलेक्टर बदले गए थे। इससे पहले और बाद में भी कई जिलों में अधिकारियों की नई पदस्थापना की गई। इन बदलावों के जरिए अलग-अलग जिलों में प्रशासनिक जिम्मेदारियों का पुनर्वितरण किया गया।

    पुलिस विभाग में भी जुलाई से अक्टूबर के बीच लगातार फेरबदल हुए। शाजापुर शहडोल टीकमगढ़ और श्योपुर सहित कई जिलों में एसपी बदले गए। 27 अक्टूबर के आदेश में सागर और देवास के पुलिस अधीक्षकों की पदस्थापना बदली गई जबकि 28 अक्टूबर को नर्मदापुरम अलीराजपुर पन्ना बैतूल और हरदा में नई नियुक्तियां की गईं। इस तरह पुलिस महकमे में भी बड़े स्तर पर अधिकारियों की जिम्मेदारियां बदली गईं।

    इन तबादलों का एक अहम पहलू यह है कि कुछ अधिकारियों को विवादों या गंभीर घटनाओं के बाद फील्ड पोस्टिंग से हटाया गया लेकिन बाद में उन्हें दूसरी जगह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी मिली। कुमार सत्यम दिलीप कुमार यादव और रोहित सिसोनिया के मामले इसी संदर्भ में चर्चा में रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि अधिकारियों को हटाने के बाद सरकार ने कुछ मामलों में उन्हें दोबारा महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां सौंपीं।

    कुल मिलाकर मध्य प्रदेश में पिछले चार महीनों के दौरान हुए प्रशासनिक और पुलिस फेरबदल ने सरकारी व्यवस्था में व्यापक बदलाव की तस्वीर पेश की है। जहरीली शराब से मौतें किसान आंदोलन और मुआवजे से जुड़े विवाद इस अवधि में चर्चा के प्रमुख विषय रहे। अब इन बदलावों के बाद संबंधित जिलों में प्रशासनिक कामकाज कानून व्यवस्था और जनसमस्याओं के समाधान पर कितना असर पड़ता है यह आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगा।

  • MP में रबी सीजन से पहले बिजली कटौती ने बढ़ाई मुश्किलें, ग्रिडों का घेराव और चक्काजाम, ऊर्जा मंत्री ने दिए 10 घंटे बिजली के निर्देश

    MP में रबी सीजन से पहले बिजली कटौती ने बढ़ाई मुश्किलें, ग्रिडों का घेराव और चक्काजाम, ऊर्जा मंत्री ने दिए 10 घंटे बिजली के निर्देश


    भोपाल । मध्य प्रदेश में अघोषित बिजली कटौती का मुद्दा अब गांवों से निकलकर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में पहुंच गया है। किसानों और ग्रामीणों की नाराजगी लगातार बढ़ रही है। पिछले एक सप्ताह के दौरान मंदसौर राजगढ़ सीहोर बड़वानी धार झाबुआ खंडवा आगर मालवा नर्मदापुरम और बुरहानपुर समेत 10 से ज्यादा जिलों में बिजली कटौती के खिलाफ प्रदर्शन हो चुके हैं। कहीं किसानों ने बिजली ग्रिडों का घेराव किया तो कहीं चक्काजाम लगाकर अधिकारियों के सामने अपनी समस्याएं रखीं। कई स्थानों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी विरोध प्रदर्शन करते हुए बिजली आपूर्ति नियमित करने की मांग उठाई है। खास बात यह है कि बिजली संकट को लेकर अब भाजपा के मंत्री और विधायक भी परेशान नजर आ रहे हैं और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से समस्या का समाधान कराने की गुहार लगा रहे हैं।
    ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली कटौती का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ रहा है। रबी सीजन की तैयारियों के बीच सिंचाई के लिए बिजली की जरूरत बढ़ने लगी है। किसानों का कहना है कि समय पर बिजली नहीं मिलने से खेतों में सिंचाई प्रभावित हो रही है और फसलों को नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ रही है। ग्रामीण इलाकों में रात के समय बिजली गुल होने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। कुछ स्थानों पर दो से आठ घंटे तक बिजली कटौती होने की बात कही जा रही है। इससे खेती के साथ घरेलू कामकाज और आम जनजीवन भी प्रभावित हो रहा है।
    मंदसौर जिले में बिजली कटौती के विरोध में कई जगह प्रदर्शन हुए। गरोठ सुवासरा बालागुड़ा और शामगढ़ में किसानों ने बिजली ग्रिडों का घेराव किया। गरोठ-भोपाल रोड पर करीब तीन घंटे तक चक्काजाम रहा। मंदसौर विधायक विपिन जैन के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बिजली विभाग के कार्यालय का घेराव किया। इस दौरान विधायक और अधीक्षण यंत्री के बीच तीखी बहस भी हुई। प्रदर्शनकारियों ने बिजली आपूर्ति में सुधार की मांग करते हुए कहा कि किसानों और ग्रामीणों की समस्याओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
    राजगढ़ जिले में भी बिजली कटौती को लेकर नाराजगी देखने को मिली। करेड़ी गांव और ढाबला जोड़ पर पूर्व विधायक बापू सिंह तंवर ने ग्रामीणों के साथ चक्काजाम किया। उन्होंने अधिकारियों से बिजली कटौती की शिकायत की और समस्या दूर नहीं होने पर बड़े आंदोलन की चेतावनी दी। नवरात्रि के दौरान आरती के समय बिजली कटने को लेकर भी सवाल उठाए गए। सीहोर जिले के बिलकिसगंज में ग्रामीणों ने विद्युत केंद्र का घेराव किया जबकि बड़वानी में किसानों ने कार्यकारी यंत्री कार्यालय पहुंचकर विरोध जताया। धार जिले के मनावर में विधायक डॉ. हीरालाल अलावा ने कलेक्टर को पत्र लिखकर बिजली समस्या की ओर ध्यान दिलाया।
    आगर मालवा में ग्रामीणों ने चक्काजाम किया तो झाबुआ और खंडवा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने रैलियां निकालकर विरोध दर्ज कराया। नर्मदापुरम जिले के पिपरिया में ज्ञापन सौंपा गया जबकि बुरहानपुर में किसानों ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर बिजली कटौती का मुद्दा उठाया। लगातार सामने आ रही शिकायतों के कारण मामला कैबिनेट बैठक तक पहुंच गया। उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार और उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा समेत कई मंत्रियों ने अपने क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति की समस्याएं बताईं। इसके बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अगली कैबिनेट बैठक में चर्चा कर समाधान निकालने का आश्वासन दिया।
    ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ने अधिकारियों को रबी सीजन में किसानों को प्रतिदिन 10 घंटे बिजली उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने प्रमुख सचिव और बिजली उत्पादन ट्रांसमिशन तथा पावर मैनेजमेंट से जुड़ी कंपनियों के अधिकारियों को आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कहा है। ऊर्जा मंत्री के मुताबिक प्रदेश में बिजली की मांग में अचानक तेजी आई है। 11 अक्टूबर को मांग करीब 16 हजार मेगावाट तक पहुंच गई थी जबकि पिछले साल इसी तारीख को यह लगभग 11 हजार मेगावाट थी। यानी एक साल में मांग में करीब 38 से 40 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई।
    सरकार के सामने अब बढ़ती मांग के बीच बिजली उत्पादन और आपूर्ति का संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। अधिकारियों को उत्पादन बढ़ाने कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित करने और स्थानीय स्तर पर आ रही बाधाओं को दूर करने के निर्देश दिए गए हैं। भारतीय किसान संघ ने भी दशहरे तक बिजली समस्या का समाधान करने का अल्टीमेटम दिया है। रबी की बुवाई का समय नजदीक होने के कारण आने वाले दिनों में बिजली की जरूरत और बढ़ने की संभावना है। ऐसे में किसानों और ग्रामीणों की नजर सरकार के आश्वासन तथा ऊर्जा विभाग के निर्देशों के असर पर टिकी है। अब देखना होगा कि प्रदेश में बिजली कटौती पर रोक लगाने और गांवों में नियमित आपूर्ति बहाल करने के लिए सरकार कितनी जल्दी प्रभावी कदम उठाती है।

  • वित्तीय संकट का हवाला देकर डिप्टी सीएम की नई कारों पर रोक, दूसरी ओर सीएम और मंत्रियों के लिए खरीदी गईं गाड़ियां

    वित्तीय संकट का हवाला देकर डिप्टी सीएम की नई कारों पर रोक, दूसरी ओर सीएम और मंत्रियों के लिए खरीदी गईं गाड़ियां

    भोपाल । मध्य प्रदेश की मोहन सरकार में सरकारी वाहनों की खरीद को लेकर नया मामला सामने आया है। सरकार ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सहित मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के लिए नई गाड़ियां खरीदी हैं, लेकिन दोनों उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा और राजेंद्र शुक्ल को नई कार देने के प्रस्ताव वित्त विभाग ने लौटा दिए हैं। विभाग ने वित्तीय संकट का हवाला देते हुए दोनों डिप्टी सीएम को मौजूदा सरकारी वाहनों की मरम्मत कराकर इस्तेमाल करने की सलाह दी है। इस फैसले के बाद सरकारी खर्चों पर नियंत्रण के निर्देशों और नई गाड़ियों की खरीद को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
    जानकारी के अनुसार दोनों उपमुख्यमंत्रियों के सरकारी वाहन निर्धारित किलोमीटर की सीमा पार कर चुके हैं। नियमानुसार सरकारी वाहन के एक लाख दस हजार किलोमीटर चलने के बाद उसे बदलने का प्रावधान है। दोनों डिप्टी सीएम की गाड़ियां इस सीमा से अधिक चल चुकी हैं। इसके बाद गृह विभाग के माध्यम से नई कार खरीदने के प्रस्ताव वित्त विभाग को भेजे गए थे। हालांकि वित्त विभाग ने इन प्रस्तावों को मंजूरी देने के बजाय वापस कर दिया और पुरानी गाड़ियों की मरम्मत कराकर चलाने के निर्देश दिए।
    दूसरी ओर चालू वित्तीय वर्ष में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के लिए नई इलेक्ट्रिक कार खरीदी गई है। इसके अलावा पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल और लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह के लिए इनोवा क्रिस्टा खरीदी गई। गृह सचिव कृष्णा वेणी के लिए भी नई इनोवा क्रिस्टा की व्यवस्था की गई है। इस तरह मुख्यमंत्री मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारी के लिए नई गाड़ियों की खरीद हुई है, जबकि दोनों डिप्टी सीएम के प्रस्तावों को वित्तीय कारणों से मंजूरी नहीं मिल सकी। इसी अंतर को लेकर सरकारी वाहन खरीद की नीति और प्राथमिकताओं पर चर्चा हो रही है।
    गौरतलब है कि प्रदेश सरकार ने करीब तीन महीने पहले वित्तीय स्थिति को देखते हुए सरकारी खर्चों में कटौती करने के निर्देश जारी किए थे। अधिकारियों के विदेश दौरे महंगे होटलों में बैठकें और अन्य गैरजरूरी खर्चों पर नियंत्रण रखने को कहा गया था। सामान्य प्रशासन विभाग ने विभागों को यथासंभव वर्चुअल बैठकें आयोजित करने और जिलों के अधिकारियों को अनावश्यक रूप से भोपाल नहीं बुलाने के निर्देश भी दिए थे। मंत्रियों के काफिले में वाहनों की संख्या कम करने की बात कही गई थी। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी अपने काफिले में गाड़ियों की संख्या घटाकर सात रखने का निर्णय लिया था। इसके बावजूद नई गाड़ियों की खरीद जारी रहने से खर्चों पर नियंत्रण के निर्देशों को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
    वाहनों की खरीद का पिछला रिकॉर्ड भी इस मामले को महत्वपूर्ण बनाता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2024-25 में प्रदेश में सबसे ज्यादा 27 कारें खरीदी गई थीं। चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 में अब तक चार नई कारों की खरीद हुई है। इनमें मुख्यमंत्री की इलेक्ट्रिक कार और तीन इनोवा क्रिस्टा शामिल हैं। वहीं दोनों उपमुख्यमंत्रियों के लिए नई कार खरीदने के प्रस्ताव मंजूर नहीं किए गए हैं।
    वित्त विभाग ने आगामी शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने वाले दूसरे अनुपूरक बजट को लेकर भी विभागों को निर्देश दिए हैं। प्रस्ताव 22 अक्टूबर तक ऑनलाइन भेजने को कहा गया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि ऐसे नए मदों के प्रस्ताव शामिल नहीं किए जा सकेंगे जिनसे राज्य के वित्तीय संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ पड़े। वाहन खरीद के प्रस्तावों को भी अनुपूरक बजट में शामिल नहीं करने के निर्देश दिए गए हैं। इससे नई गाड़ियों की खरीद के लिए अतिरिक्त बजट उपलब्ध कराने की संभावना सीमित होती दिखाई दे रही है।
    इस बीच महाराष्ट्र सरकार ने वीवीआईपी और राज्य अतिथियों की सुरक्षा तथा परिवहन व्यवस्था के लिए 12.68 करोड़ रुपये की 44 नई गाड़ियां खरीदने को मंजूरी दी है। इनमें 4.08 करोड़ रुपये की बुलेटप्रूफ टोयोटा लैंड क्रूजर 300 भी शामिल है। मध्य प्रदेश में डिप्टी सीएम की कारों के प्रस्ताव खारिज होने और महाराष्ट्र में महंगी गाड़ियों की खरीद की मंजूरी के बीच सरकारी वाहन खर्च का मुद्दा चर्चा में है। फिलहाल मध्य प्रदेश में दोनों उपमुख्यमंत्रियों को पुरानी गाड़ियों से ही काम चलाना होगा और नई कारों को लेकर आगे का फैसला वित्तीय मंजूरी पर निर्भर करेगा।
  • सरकार-इंटर्न डॉक्टरों के बीच सुलह, 21,500 रुपये स्टाइपेंड के बाद खत्म हुआ आंदोलन

    सरकार-इंटर्न डॉक्टरों के बीच सुलह, 21,500 रुपये स्टाइपेंड के बाद खत्म हुआ आंदोलन


    भोपाल । मध्य प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पिछले कई दिनों से चल रहा MBBS इंटर्न डॉक्टरों का आंदोलन आखिरकार समाप्त हो गया है। स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर सड़क पर उतरे इंटर्न डॉक्टरों और राज्य सरकार के बीच लंबे समय से चल रहा गतिरोध मंगलवार को बातचीत के बाद खत्म हो गया। मंत्रालय में हुई अहम बैठक के दौरान सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच 21,500 रुपये मासिक स्टाइपेंड पर सहमति बन गई। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से चर्चा के बाद निकले इस समाधान को इंटर्न डॉक्टरों की बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। हड़ताल समाप्त होने के साथ ही अब प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में प्रभावित हुई स्वास्थ्य सेवाओं के सामान्य होने की उम्मीद भी बढ़ गई है।

    स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे इंटर्न डॉक्टरों के प्रतिनिधिमंडल की उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल के साथ मंत्रालय में अहम बैठक हुई। इस बैठक में जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन यानी JUDA और मेडिकल टीचर्स एसोसिएशन यानी MTA के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे। करीब डेढ़ घंटे तक चली इस बैठक में इंटर्न डॉक्टरों की मांगों पर विस्तार से चर्चा की गई। बातचीत के दौरान सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच स्टाइपेंड की राशि को लेकर सहमति बन गई और आखिरकार 21,500 रुपये मासिक स्टाइपेंड तय किया गया। इसके बाद आंदोलन समाप्त करने का फैसला लिया गया।

    बताया जा रहा है कि सरकार की ओर से शुरुआत में इंटर्न डॉक्टरों को 18,500 रुपये मासिक स्टाइपेंड देने का प्रस्ताव दिया गया था लेकिन आंदोलन कर रहे छात्र इस प्रस्ताव से संतुष्ट नहीं हुए। उनका कहना था कि बढ़ती महंगाई और अस्पतालों में लंबे समय तक काम करने की जिम्मेदारी को देखते हुए यह राशि पर्याप्त नहीं है। इंटर्न डॉक्टर अपनी मांग पर अड़े रहे जिसके बाद सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच लगातार बातचीत हुई। अंततः सरकार ने अपने प्रस्ताव में संशोधन करते हुए स्टाइपेंड की राशि बढ़ाकर 21,500 रुपये कर दी और इसी पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बन गई।

    इस पूरे विवाद को सुलझाने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से भी चर्चा की गई जिसके बाद समाधान का रास्ता निकला। सरकार के इस फैसले के बाद आंदोलन कर रहे इंटर्न डॉक्टरों ने राहत की सांस ली। JUDA और MTA के प्रतिनिधियों ने भी बैठक के बाद सकारात्मक बातचीत पर संतोष जताया और कहा कि लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध का समाधान बातचीत के जरिए निकलना महत्वपूर्ण है। प्रतिनिधिमंडल ने उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल का भी आभार व्यक्त किया।

    बैठक में केवल स्टाइपेंड का मुद्दा ही नहीं बल्कि आंदोलन के दौरान छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर भी चर्चा की गई। उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने प्रतिनिधिमंडल को बताया कि प्रारंभिक जांच के आधार पर दो पुलिसकर्मियों को लाइन अटैच कर दिया गया है। पूरे मामले की जांच के लिए अलग से टीम भी गठित की गई है और जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। सरकार ने प्रदर्शन के दौरान घायल हुए छात्रों के समुचित इलाज का भरोसा भी दिया है।

    दरअसल स्टाइपेंड बढ़ाने की मांग को लेकर प्रदेश के कई सरकारी मेडिकल कॉलेजों के MBBS इंटर्न डॉक्टरों ने काम बंद कर दिया था। आंदोलन के कारण कई अस्पतालों की स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ने लगा था। हालात उस समय ज्यादा तनावपूर्ण हो गए जब गांधी मेडिकल कॉलेज के इंटर्न डॉक्टर मुख्यमंत्री निवास की ओर मार्च करने निकले और पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बैरिकेडिंग की। छात्रों के आगे बढ़ने पर वाटर कैनन का इस्तेमाल किया गया जिसके बाद डॉक्टरों और छात्रों की नाराजगी और बढ़ गई थी।

    अब 21,500 रुपये स्टाइपेंड पर सहमति बनने और पुलिस कार्रवाई की जांच के आश्वासन के बाद आंदोलन समाप्त हो गया है। यह फैसला न केवल इंटर्न डॉक्टरों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है बल्कि सरकार के लिए भी एक बड़ी चुनौती का समाधान साबित हुआ है। आने वाले दिनों में इंटर्न डॉक्टरों के ड्यूटी पर लौटने के साथ प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं के पूरी तरह सामान्य होने की उम्मीद है।

  • मुख्यमंत्री कार्यालय में अब हर दिन तय रहेंगे अधिकारी, मंत्रालय और समत्व के लिए जारी हुआ साप्ताहिक रोस्टर

    मुख्यमंत्री कार्यालय में अब हर दिन तय रहेंगे अधिकारी, मंत्रालय और समत्व के लिए जारी हुआ साप्ताहिक रोस्टर


    भोपाल। मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में अब सप्ताह के सातों दिन अधिकारियों की मौजूदगी और जिम्मेदारियां तय रहेंगी। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से अधिकारियों का साप्ताहिक रोस्टर जारी किया गया है। इसके तहत सोमवार से रविवार तक अलग-अलग अधिकारियों को मंत्रालय और समत्व में जिम्मेदारी सौंपी गई है। अधिकारियों को मुख्यमंत्री के निर्धारित कार्यक्रमों बैठकों और मुलाकातों से जुड़े कार्यों में समन्वय की जिम्मेदारी निभानी होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों को व्यवस्थित तरीके से संचालित करने के साथ आम नागरिकों से होने वाली मुलाकातों के दौरान भी प्रशासनिक समन्वय सुनिश्चित करना है।

    जारी रोस्टर के अनुसार सोमवार को मंत्रालय में डॉ. सुदाम खाड़े और अरविंद दुबे की ड्यूटी रहेगी। वहीं समत्व में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और सुधीर कोचर जिम्मेदारी संभालेंगे। मंगलवार को मंत्रालय में डॉ. सुदाम खाड़े और अरुण परमार मौजूद रहेंगे जबकि समत्व में डॉ. इलेया राजा टी और आदित्य शर्मा को जिम्मेदारी दी गई है। इस तरह सप्ताह की शुरुआत से ही मुख्यमंत्री के सरकारी कार्यक्रमों और निवास कार्यालय से जुड़े कार्यों के लिए अधिकारियों की मौजूदगी सुनिश्चित की गई है।

    बुधवार को मंत्रालय में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और सुधीर कोचर की ड्यूटी तय की गई है। इसी दिन समत्व में डॉ. सुदाम खाड़े और अरविंद दुबे जिम्मेदारी संभालेंगे। गुरुवार को मंत्रालय में डॉ. इलेया राजा टी और आदित्य शर्मा मौजूद रहेंगे जबकि समत्व में डॉ. सुदाम खाड़े और अरविंद दुबे की ड्यूटी रहेगी। शुक्रवार को मंत्रालय में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और अरुण परमार जिम्मेदारी संभालेंगे। वहीं समत्व में कुमार पुरुषोत्तम और अरुण परमार को तैनात किया गया है।

    शनिवार और रविवार के लिए भी रोस्टर में अलग व्यवस्था की गई है। शनिवार को मंत्रालय में किसी अधिकारी की निर्धारित ड्यूटी नहीं रखी गई है जबकि समत्व में डॉ. इलेया राजा टी और आदित्य शर्मा जिम्मेदारी संभालेंगे। रविवार को भी मंत्रालय में कोई अधिकारी निर्धारित नहीं है। इस दिन समत्व में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और सुधीर कोचर जिम्मेदारी संभालेंगे। इससे स्पष्ट है कि सप्ताहांत में मुख्यमंत्री निवास कार्यालय यानी समत्व पर प्रशासनिक समन्वय की व्यवस्था जारी रहेगी।

    रोस्टर में अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल कार्यालय में मौजूद रहने तक सीमित नहीं है। उन्हें मुख्यमंत्री से संबंधित महत्वपूर्ण बैठकों चर्चाओं और कार्यक्रमों में उपस्थित रहकर आवश्यक समन्वय करना होगा। मुख्यमंत्री कार्यालय की कार्यप्रणाली में विभिन्न विभागों और अधिकारियों के बीच तालमेल बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में दिन के हिसाब से जिम्मेदारी तय होने से कार्यक्रमों की तैयारी और उनसे जुड़े प्रशासनिक कार्यों को समय पर पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि रोस्टर में शामिल कोई अधिकारी किसी कारण से अनुपस्थित रहता है तो संबंधित लिंक अधिकारी उसकी जिम्मेदारी संभालेगा। यानी अधिकारी की अनुपस्थिति की स्थिति में भी कामकाज प्रभावित न हो इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था रखी गई है। यह व्यवस्था मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों के दौरान प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    इस साप्ताहिक रोस्टर के जरिए मुख्यमंत्री कार्यालय में कामकाज को अधिक व्यवस्थित करने और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। खास तौर पर मुख्यमंत्री की बैठकों और आम नागरिकों से मुलाकातों के दौरान अधिकारियों की उपलब्धता सुनिश्चित होने से समन्वय बेहतर होने की उम्मीद है। मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से पहले भी विभागीय समीक्षा और जनहित से जुड़े मामलों पर समयबद्ध कार्रवाई पर जोर दिया जाता रहा है।

  • देशभक्ति या लापरवाही? नर्मदा की तेज धार में बिना लाइफ जैकेट नाव पर निकले विधायक, वीडियो चर्चा में

    देशभक्ति या लापरवाही? नर्मदा की तेज धार में बिना लाइफ जैकेट नाव पर निकले विधायक, वीडियो चर्चा में


    इंदौर। मध्य प्रदेश में स्वतंत्रता दिवस से पहले तिरंगा यात्राओं और राजनीतिक गतिविधियों के बीच कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिन्होंने नेताओं और अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रतलाम में तिरंगा यात्रा के दौरान महापौर कलेक्टर और दूसरे जनप्रतिनिधि तथा अधिकारी हाथों में तिरंगा लेकर करीब डेढ़ किलोमीटर तक पैदल चले। देशभक्ति के इस आयोजन में लोगों की मौजूदगी भी रही लेकिन चर्चा उस समय शुरू हुई जब पैदल चल रहे नेताओं और अधिकारियों के पीछे उनके खाली सरकारी वाहन भी चलते नजर आए। इन वाहनों में ड्राइवर के अलावा कोई सवार नहीं था। ऐसे में सवाल उठने लगा कि जब संबंधित अधिकारी और जनप्रतिनिधि पैदल यात्रा में शामिल थे तो उनके खाली वाहनों को साथ चलाने की क्या जरूरत थी। इससे पेट्रोल और डीजल की खपत को लेकर भी सवाल उठे। यह मामला इसलिए भी चर्चा में आया क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से समय समय पर ईंधन बचाने और ऊर्जा की खपत कम करने की अपील की जाती रही है।

    दूसरी तस्वीर महेश्वर से सामने आई जहां तिरंगा यात्रा के दौरान भाजपा विधायक राजकुमार मेव और टीआई समेत कई नेता तथा अधिकारी नाव में सवार दिखाई दिए। मामला इसलिए ज्यादा गंभीर माना गया क्योंकि इस दौरान नर्मदा नदी उफान पर थी और बारिश के मौसम में नदी का बहाव सामान्य दिनों की तुलना में काफी तेज रहता है। इसके बावजूद नाव में बैठे लोगों ने कथित तौर पर लाइफ जैकेट नहीं पहनी थी। इस दृश्य के सामने आने के बाद सुरक्षा व्यवस्था और नियमों के पालन को लेकर सवाल खड़े हुए। आम लोगों को नदी और जलाशयों के आसपास सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है लेकिन जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की ओर से ही सुरक्षा उपकरणों की अनदेखी का आरोप लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि पूरे घटनाक्रम में संबंधित प्रशासन की ओर से सुरक्षा व्यवस्था को लेकर क्या निर्देश थे यह अलग जांच का विषय हो सकता है।

    इधर मध्य प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के संभावित उज्जैन दौरे को लेकर भी बयानबाजी शुरू हो गई है। राहुल गांधी सितंबर में मध्य प्रदेश के उज्जैन आने वाले हैं ऐसी चर्चा के बीच प्रदेश सरकार के मंत्री विश्वास सारंग ने उन्हें पहले झारखंड के रांची जाने की सलाह दी है। सारंग ने दिल्ली में हुए प्रदर्शन में राहुल गांधी की मौजूदगी का जिक्र करते हुए सवाल उठाया कि रांची में प्रदर्शन कर रहे छात्र छात्राओं के खिलाफ कार्रवाई के दौरान वे वहां क्यों नहीं पहुंचे। इसी बयान के दौरान मंत्री ने राहुल गांधी को रांची जाने का ऑफर दिया और यहां तक कहा कि वे उनकी दिल्ली से रांची की टिकट भी करा देंगे। हालांकि राहुल गांधी के मध्य प्रदेश दौरे की अंतिम तारीख अभी तय नहीं हुई है। ऐसे में मंत्री का टिकट वाला बयान फिलहाल राजनीतिक तंज के तौर पर ही देखा जा रहा है।

    राजनीतिक बयानबाजी के बीच मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की ई-अटेंडेंस भी परेशानी का कारण बनी। स्वतंत्रता दिवस से दो दिन पहले बड़ी संख्या में शिक्षक स्कूलों में ड्यूटी पूरी करने के बाद आउट-पंच लगाने के लिए परेशान होते रहे। ई-अटेंडेंस पोर्टल में तकनीकी समस्या के कारण शिक्षक समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कर पा रहे थे। शिक्षकों की चिंता इस बात को लेकर थी कि अगर आउट-पंच नहीं हुआ तो उनकी उपस्थिति प्रभावित हो सकती है और वेतन कटौती का खतरा पैदा हो सकता है। नियमों के अनुसार शिक्षकों को स्कूल के निर्धारित दायरे में रहकर ही ई-अटेंडेंस प्रक्रिया पूरी करनी होती है।

    देर शाम तकनीकी समस्या दूर होने के बाद विभाग की ओर से शिक्षकों को राहत दी गई और उन्हें जहां वे मौजूद थे वहीं से अटेंडेंस लगाने की अनुमति दी गई। हालांकि शिक्षकों के लिए ई-अटेंडेंस की तकनीकी दिक्कत कोई नई समस्या नहीं है। प्रदेश के कई ग्रामीण और दूरदराज इलाकों में नेटवर्क की परेशानी के कारण भी शिक्षकों को बार बार मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सवाल केवल तकनीकी व्यवस्था का नहीं बल्कि ऐसी प्रणाली तैयार करने का है जो कर्मचारियों के लिए सुविधा बने परेशानी नहीं।

    कुल मिलाकर स्वतंत्रता दिवस से पहले मध्य प्रदेश में सामने आए इन घटनाक्रमों ने राजनीति प्रशासन और सरकारी व्यवस्था से जुड़े कई सवालों को एक साथ चर्चा में ला दिया है। कहीं ईंधन बचाने की जरूरत पर सवाल है तो कहीं नदी में सुरक्षा नियमों के पालन को लेकर चिंता है। वहीं राजनीतिक बयानबाजी और ई-अटेंडेंस की तकनीकी समस्या ने भी अलग बहस छेड़ दी है।

  • मध्य प्रदेश बना पहला राज्य जहां वक्फ बोर्ड में शामिल हुए 2 हिंदू सदस्य, जानिए किन्हें मिली जिम्मेदारी?

    मध्य प्रदेश बना पहला राज्य जहां वक्फ बोर्ड में शामिल हुए 2 हिंदू सदस्य, जानिए किन्हें मिली जिम्मेदारी?


    भोपाल। मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम-2025 के तहत राज्य वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इस नए गठन में दो हिंदू सदस्यों को भी शामिल किया गया है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जहां वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम यानी हिंदू प्रतिनिधियों को जगह दी गई है। इस संबंध में आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना भी जारी कर दी गई है।

    बोर्ड में दो हिंदू सदस्य शामिल
    अधिकारियों के अनुसार, राज्य सरकार ने रविवार को 10 सदस्यीय मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड का पुनर्गठन किया। इसमें मनोज मालपानी और अनिमेश भार्गव को हिंदू सदस्य के रूप में शामिल किया गया है। बोर्ड का अध्यक्ष सनवर पटेल को नियुक्त किया गया है। नए प्रावधानों के तहत गठित यह वक्फ बोर्ड देश का पहला राज्य स्तरीय बोर्ड बन गया है जिसमें हिंदू सदस्यों को औपचारिक रूप से शामिल किया गया है।

    अधिनियम के तहत हुआ पुनर्गठन
    यह पुनर्गठन वक्फ अधिनियम-1995 (संशोधित 2025) की धारा 13(1) में दिए गए प्रावधानों के तहत किया गया है। सरकार ने धारा 14 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए यह नई संरचना लागू की है।

    क्या होता है वक्फ बोर्ड?
    वक्फ बोर्ड एक वैधानिक संस्था है, जो राज्य में मौजूद वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और संरक्षण का कार्य करती है। इसका मुख्य उद्देश्य इन संपत्तियों का रिकॉर्ड तैयार करना, उनकी निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि उनका उपयोग धार्मिक, शैक्षणिक और सामाजिक कल्याण के कार्यों में हो। साथ ही यह संस्था वक्फ संपत्तियों को अवैध कब्जों से बचाने का भी काम करती है।

    शिवपुरी में रक्षा क्षेत्र को बढ़ावा
    इसी बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव ने शिवपुरी में एक रक्षा निर्माण इकाई का शिलान्यास भी किया। उन्होंने कहा कि अब मध्य प्रदेश में बनी मिसाइलें दुश्मनों को जवाब देने में सक्षम होंगी। यह परियोजना अडाणी समूह की सहायक कंपनी अडाणी डिफेंस एंड एयरोस्पेस द्वारा विकसित की जा रही है। करीब 2,500 करोड़ रुपये की लागत वाली इस यूनिट से लगभग 5,000 लोगों को रोजगार मिलने की उम्मीद है। इस अवसर पर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उपस्थित रहे।

  • खर्च पर लगाम! अब दिल्ली जाने से पहले लेनी होगी परमिशन, MP सरकार का बड़ा फैसला

    खर्च पर लगाम! अब दिल्ली जाने से पहले लेनी होगी परमिशन, MP सरकार का बड़ा फैसला


    मध्यप्रदेश । मध्य प्रदेश सरकार ने सरकारी खर्चों पर नियंत्रण लगाने और संसाधनों के अधिक प्रभावी उपयोग को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा जारी आदेशों के अनुसार अब प्रदेश के आईएएस, आईपीएस और सचिव स्तर के अधिकारियों को सरकारी खर्च पर दिल्ली, गुजरात, अन्य राज्यों या विदेश यात्रा करने से पहले मुख्य सचिव की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। वहीं अन्य अधिकारियों को राज्य से बाहर की शासकीय यात्रा के लिए अपने विभागीय सचिव से मंजूरी लेनी होगी।

    सरकार का मानना है कि अनावश्यक यात्राओं और प्रशासनिक खर्चों में कटौती कर राज्य के वित्तीय संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। इसी उद्देश्य से सभी विभागों, संभागायुक्तों, कलेक्टरों और विभागाध्यक्षों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।

    ऑनलाइन बैठकों को मिलेगा बढ़ावा
    सरकार ने स्पष्ट किया है कि विभागीय बैठकों, कार्यशालाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सेमिनारों को अधिकतम डिजिटल माध्यमों के जरिए आयोजित किया जाए। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए हैं ताकि अधिकारियों की अनावश्यक यात्रा कम हो और समय व धन दोनों की बचत हो सके। इसके अलावा अधिकारियों और कर्मचारियों को कार्यालय आने-जाने के लिए सार्वजनिक परिवहन, बस सेवा और इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा। इससे ईंधन की बचत के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा।

    ऊर्जा बचत पर सरकार का विशेष फोकस
    राज्य सरकार ने सभी सरकारी कार्यालयों में ऊर्जा संरक्षण को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए हैं। कार्यालयों में ऊर्जा ऑडिट कराने, बिजली खपत की निगरानी करने तथा शाम 7 बजे के बाद अनावश्यक रूप से चल रहे पंखे, लाइट, कंप्यूटर, प्रिंटर और अन्य उपकरण बंद रखने को कहा गया है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत रूफटॉप सोलर सिस्टम को बढ़ावा देने और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में काम करने पर जोर दिया गया है।

    प्राकृतिक खेती और हरित विकास को प्रोत्साहन
    कृषि विभाग को प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने के निर्देश दिए गए हैं। वहीं निर्माण एजेंसियों को फ्लाई ऐश, प्लास्टिक वेस्ट बिटुमिन और अन्य पर्यावरण अनुकूल सामग्री का अधिक उपयोग करने के लिए कहा गया है। सरकार का लक्ष्य विकास कार्यों को पर्यावरण संरक्षण के साथ जोड़ना है।

    PNG और LPG कनेक्शनों की होगी जांच
    सरकार ने पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) नेटवर्क के विस्तार में सहयोग बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही उज्ज्वला योजना और सामान्य एलपीजी कनेक्शनों में डुप्लीकेट तथा अपात्र लाभार्थियों की पहचान कर कार्रवाई करने का अभियान भी चलाया जाएगा।

    फूड ऑयल के कम उपयोग पर चलेगा अभियान
    लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग को खाद्य तेल के अत्यधिक उपयोग से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान के प्रति लोगों को जागरूक करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके लिए व्यवहार परिवर्तन आधारित अभियान चलाए जाएंगे, जिससे लोगों में स्वस्थ खानपान की आदत विकसित हो सके।

    90 दिन का जन-जागरूकता अभियान
    जनसंपर्क विभाग को ऊर्जा संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को लेकर 90 दिनों का व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं पर्यटन विभाग को “देखो अपना देश” और “सबसे पहले मध्यप्रदेश” जैसे अभियानों को बढ़ावा देने के निर्देश दिए गए हैं।

    सरकार ने सभी विभागों को इन निर्देशों के पालन की मासिक रिपोर्ट सामान्य प्रशासन विभाग को भेजने के लिए भी कहा है। सरकार का दावा है कि इन कदमों से न केवल सरकारी खर्च में कमी आएगी बल्कि ऊर्जा संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलेगी।

  • MP में तबादलों की बाढ़: 16 दिन में 17 हजार से ज्यादा ट्रांसफर, एक दिन की छूट में ही ढाई हजार आदेश जारी

    MP में तबादलों की बाढ़: 16 दिन में 17 हजार से ज्यादा ट्रांसफर, एक दिन की छूट में ही ढाई हजार आदेश जारी


    मध्यप्रदेश । मध्य प्रदेश में तबादलों का सीजन इस बार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार द्वारा तबादलों पर लगी रोक में दी गई छूट के बाद प्रदेशभर में बड़े पैमाने पर प्रशासनिक फेरबदल हुआ है। महज 16 दिनों की अवधि में 17 हजार से अधिक अधिकारी और कर्मचारियों के तबादले किए गए हैं। खास बात यह है कि 15 जून को तबादला अवधि समाप्त होने के बाद मंत्रियों की मांग पर सरकार ने एक दिन की अतिरिक्त छूट दी और इसी एक दिन में करीब ढाई हजार तबादला आदेश जारी कर दिए गए।

    सरकारी सूत्रों के अनुसार, 16 जून की रात 12 बजे तक मिली विशेष अनुमति के दौरान विभागों ने तेजी से लंबित प्रस्तावों को मंजूरी देते हुए स्थानांतरण आदेश जारी किए। इन तबादलों में राज्य स्तर और जिला स्तर दोनों श्रेणियों के अधिकारी-कर्मचारी शामिल हैं। अभी स्कूल शिक्षा विभाग के तबादले पूरी तरह नहीं हुए हैं क्योंकि वहां ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया जारी है। ऐसे में कुल तबादलों की संख्या और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

    तबादलों की इस व्यापक प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण विभाग शामिल रहे। आबकारी, जेल, वन, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, वाणिज्यिक कर, पंजीयन एवं मुद्रांक, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा, नगरीय विकास एवं आवास, जल संसाधन, लोक निर्माण, पर्यावरण, राजस्व, जनजातीय कार्य, महिला एवं बाल विकास, आयुष, कृषि, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, कौशल विकास और सहकारिता विभागों में बड़ी संख्या में अधिकारियों और कर्मचारियों का स्थानांतरण किया गया।

    विभागवार आंकड़ों पर नजर डालें तो पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में सबसे ज्यादा लगभग 1100 तबादले हुए हैं। इसके अलावा लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग में 1700, जनजातीय कार्य विभाग में 1200, नगरीय विकास एवं आवास विभाग में 900, राजस्व विभाग में 400, लोक निर्माण विभाग में 500 तथा वन विभाग में करीब 200 स्थानांतरण किए गए हैं। वहीं सामान्य प्रशासन विभाग, परिवहन, आबकारी, वाणिज्यिक कर और जल संसाधन विभागों में भी बड़ी संख्या में तबादले हुए हैं।

    हालांकि सामान्य प्रशासन विभाग तबादला नीति जारी करता है, लेकिन विभागवार कुल तबादलों का केंद्रीकृत रिकॉर्ड नहीं रखा जाता। इसलिए विभिन्न विभागों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर ही तबादलों की संख्या का अनुमान लगाया जा रहा है। अधिकारियों का मानना है कि जिला स्तर पर हुए हजारों तबादलों को जोड़ने पर यह आंकड़ा और भी बड़ा हो सकता है।

    तबादलों की इस बड़ी कवायद को सरकार प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में उठा गया कदम बता रही है। वहीं विपक्ष और कर्मचारी संगठनों की ओर से इसे राजनीतिक और प्रशासनिक संतुलन साधने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि इतने बड़े स्तर पर हुए फेरबदल का सरकारी कामकाज और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन पर क्या प्रभाव पड़ता है।

    स्कूल शिक्षा विभाग सहित कुछ विभागों में अभी स्थानांतरण प्रक्रिया जारी है, इसलिए आने वाले दिनों में तबादलों की संख्या में और वृद्धि होने की संभावना बनी हुई है।

  • MP में कॉन्ट्रैक्ट कर्मियों की बल्ले-बल्ले….. मोहन यादव सरकार ने बढ़ाया वेतन

    MP में कॉन्ट्रैक्ट कर्मियों की बल्ले-बल्ले….. मोहन यादव सरकार ने बढ़ाया वेतन


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश सरकार (Madhya Pradesh Government) ने कॉन्ट्रैक्ट (Contract.) पर काम करने वाले लगभग 1.25 लाख कर्मचारियों अधिकारियों को सौगात दी है। मोहन यादव सरकार (Mohan Yadav Govt) ने इन कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों अधिकारियों के सालाना वेतन में 4.46 फीसदी की बढ़ोतरी को मंजूरी दी है। कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों अधिकारियों (Contract Employees and Officers) की सेलरी में यह बढ़ोतरी 1 अप्रैल 2026 से लागू होगी। फैसला राज्य की 2023 की कॉन्ट्रैक्ट एम्प्लॉयमेंट पॉलिसी के तहत कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स के आधार पर लिया गया है।


    1.25 लाख कर्मचारियों को फायदा

    मध्य प्रदेश के वित्त विभाग के अनुसार, मोहन यादव सरकार ने सोमवार को कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के वेतन में 4.46 फीसदी की सालाना बढ़ोतरी को मंजूरी दी। यह बढ़ोतरी इसी साल 1 अप्रैल से लागू कर दी जाएगी। इससे लगभग 1.25 लाख कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों अधिकारियों को फायदा होगा। यह बढ़ोतरी राज्य की कॉन्ट्रैक्ट एम्प्लॉयमेंट पॉलिसी के तहत की गई है। इस नीति को 22 जुलाई 2023 को अमल में लाया गया था।


    कितनी होगी बढ़ोतरी?

    बता दें कि कॉन्ट्रैक्ट एम्प्लॉयमेंट पॉलिसी में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स के आधार पर सालाना वेतनमान में बदलाव का प्रावधान किया गया है। मध्य प्रदेश सरकार के इस फैसले पर एमपी कॉन्ट्रैक्टुअल ऑफिसर्स एंड एम्प्लॉइज एसोसिएशन के अध्यक्ष रमेश राठौर ने सराहनीय बताया। उन्होंने कहा कि इस बदलाव से कर्मचारियों के वेतन में पे स्केल के आधार पर लगभग 1,000 रुपये से 2,500 रुपये प्रति माह की बढ़ोतरी हो जाएगी।


    एक जैसे कॉन्ट्रैक्ट पदों के लिए समान वेतन

    मध्य प्रदेश के वित्त विभाग की ओर से जारी आदेश के अनुसार, इस बार कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की सेलरी में पिछली बार से अधिक बढ़ोतरी की गई है। इस साल 1 अप्रैल से सालाना बढ़ोतरी की दर 4.46 प्रतिशत तय की गई है जबकि पिछले साल यह 2.94 फीसदी थी। बता दें कि 2023 की पॉलिसी से पहले अलग-अलग विभागों में एक जैसे कॉन्ट्रैक्ट पदों के लिए अलग-अलग वेतन मिलता था। इस पॉलिसी से अलग-अलग विभागों में एक जैसे कॉन्ट्रैक्ट पदों के लिए समान वेतन तय है।


    कर्मचारी संघ ने की है यह मांग

    बता दें कि नई नीति के तहत कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों का वेतन चपरासी पद के लिए 21,800 रुपये से लेकर असिस्टेंट इंजीनियर और असिस्टेंट मैनेजर के लिए 70,000 रुपये प्रति माह तक रखा गया है। कर्मचारी संघ की मांग है कि जिन विभागों में 2023 की पॉलिसी लागू नहीं हुई है वे भी कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को बढ़ी हुई सेलरी जारी करें।