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  • युवा भारत पर मोहन भागवत का फोकस, जेनरेशन Z के साथ शिक्षा और नेतृत्व पर करेंगे खुला संवाद

    युवा भारत पर मोहन भागवत का फोकस, जेनरेशन Z के साथ शिक्षा और नेतृत्व पर करेंगे खुला संवाद


    नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत आज मुंबई में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में जेन-जी और जेन-अल्फा पीढ़ी के दो हजार से अधिक विद्यार्थियों से सीधा संवाद करेंगे। यह कार्यक्रम नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस यानी आईआईएमयूएन की 15वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित किया जा रहा है। इसमें देश के सौ से अधिक शहरों से आए 11 से 19 वर्ष आयु वर्ग के छात्र शामिल हो रहे हैं। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी के विचारों को समझना नेतृत्व क्षमता को बढ़ावा देना और शिक्षा तथा समाज से जुड़े विषयों पर खुला संवाद स्थापित करना है।

    यह कार्यक्रम ऐसे समय आयोजित हो रहा है जब हाल के महीनों में देश में शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर व्यापक बहस देखने को मिली। छात्र आंदोलनों और परीक्षा प्रणाली से जुड़े मुद्दों के बाद युवाओं के साथ यह संवाद काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इस मंच पर नई पीढ़ी की अपेक्षाओं चुनौतियों और भविष्य की दिशा पर खुलकर चर्चा होगी।

    मोहन भागवत इससे पहले भी कई बार युवाओं से संवाद के महत्व पर जोर दे चुके हैं। उन्होंने हाल ही में कहा था कि आज की नई पीढ़ी सवाल पूछती है और उसे आदेश देने के बजाय बातचीत के माध्यम से समझना चाहिए। उनके अनुसार बदलते समय में संवाद ही सबसे प्रभावी माध्यम है जिसके जरिए समाज और युवा एक-दूसरे को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि किसी पर अपनी बात थोपने के बजाय विचारों का आदान प्रदान होना चाहिए ताकि सकारात्मक परिवर्तन संभव हो सके।

    कार्यक्रम के आयोजक आईआईएमयूएन के संस्थापक ऋषभ शाह के अनुसार यह मंच पिछले 15 वर्षों से छात्रों के बीच नेतृत्व संवाद और बहस की संस्कृति को बढ़ावा देने का कार्य कर रहा है। संगठन भारत के 108 शहरों और 15 देशों में अपनी गतिविधियां संचालित करता है तथा अब तक करोड़ों छात्रों तक पहुंच बना चुका है। ऋषभ शाह ने बताया कि मोहन भागवत इससे पहले भी दो बार इस मंच पर छात्रों से संवाद कर चुके हैं और इस बार का निमंत्रण कई महीने पहले भेजा गया था जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया।

    कार्यक्रम में शामिल छात्र विभिन्न सामाजिक शैक्षणिक और राष्ट्रीय विषयों पर अपनी जिज्ञासाएं भी रख सकते हैं। आयोजन का उद्देश्य युवाओं को केवल सुनना नहीं बल्कि उन्हें अपनी बात रखने का अवसर देना भी है। आयोजकों का कहना है कि नेतृत्व तभी विकसित होता है जब युवाओं को खुलकर सोचने और अपनी राय व्यक्त करने का मंच मिले।

    इस कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई है। भाजपा नेताओं ने इसे वर्षों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा बताया है और कहा है कि संघ लंबे समय से युवाओं के बीच संवाद और व्यक्तित्व निर्माण के कार्यक्रम आयोजित करता रहा है। वहीं आयोजन में कुछ अन्य सार्वजनिक हस्तियों की मौजूदगी को लेकर भी चर्चा हुई लेकिन आयोजकों ने स्पष्ट किया कि यह किसी राजनीतिक दल का कार्यक्रम नहीं बल्कि छात्रों के लिए आयोजित एक स्वतंत्र मंच है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते दौर में युवाओं से सीधे संवाद की पहल समाज और संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण है। शिक्षा तकनीक रोजगार और सामाजिक मूल्यों जैसे विषयों पर खुली बातचीत नई पीढ़ी के आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता को मजबूत करने में मदद करती है। ऐसे आयोजनों से युवाओं को अपनी सोच साझा करने का अवसर मिलता है और समाज को उनकी अपेक्षाओं को समझने का नया दृष्टिकोण भी प्राप्त होता है।

  • मोहन भागवत बनाम राज ठाकरे: 'भाषा की राजनीति' पर छिड़ी नई जंग, मनसे प्रमुख ने फिल्म हस्तियों की मौजूदगी को बताया 'दहसत की भीड़'

    मोहन भागवत बनाम राज ठाकरे: 'भाषा की राजनीति' पर छिड़ी नई जंग, मनसे प्रमुख ने फिल्म हस्तियों की मौजूदगी को बताया 'दहसत की भीड़'


    मुंबई/नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में मुंबई में आयोजित भव्य समारोह अब एक बड़े सियासी विवाद में तब्दील हो गया है। इस कार्यक्रम में सलमान खान, अक्षय कुमार, रवीना टंडन और करण जौहर जैसी दिग्गज फिल्मी हस्तियों की मौजूदगी ने जितनी सुर्खियां बटोरी थीं, उससे कहीं ज्यादा चर्चा अब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे के तीखे बयानों की हो रही है। राज ठाकरे ने सोशल मीडिया पर सीधा हमला करते हुए दावा किया है कि मंच पर बैठे सितारे किसी वैचारिक प्रेम के कारण नहीं, बल्कि सत्ता की दहशत के कारण वहां जुटे थे।

    राज ठाकरे ने तंज कसते हुए कहा कि समारोह में शामिल लोग मोदी सरकार के डर से वहां मौजूद थे। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में लिखा कि अगर यह डर नहीं होता, तो कोई भी इतने उबाऊ और बोरिंग भाषण सुनने के लिए अपना समय खराब नहीं करता। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ प्रमुख मोहन भागवत को यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए कि यह भीड़ उनके प्रति स्नेह या सम्मान के कारण उमड़ी थी। उनके अनुसार, यह केंद्र की सत्ता का रसूख था जिसने बॉलीवुड को कतार में खड़ा कर दिया।

    हमले का दूसरा बड़ा मोर्चा ‘भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता’ पर था। दरअसल, मोहन भागवत ने अपने संबोधन में भाषा के नाम पर आंदोलन करने को एक ‘बीमारी’ करार दिया था। इस पर पलटवार करते हुए राज ठाकरे ने कहा कि भारत में राज्यों का गठन ही भाषाई आधार पर हुआ है। कर्नाटक, तमिलनाडु, बंगाल और गुजरात जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अपनी भाषा और संस्कृति से प्रेम करना अगर बीमारी है, तो यह पूरे देश में फैली है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब बाहरी लोग किसी प्रदेश में आकर वहां की संस्कृति का अनादर करते हैं, तब स्थानीय लोगों का आक्रोश स्वाभाविक है, इसे बीमारी कहना वास्तविकता को नकारना है।

    राज ठाकरे ने तीखा सवाल पूछते हुए कहा कि जब गुजरात में यूपी-बिहार के लोगों को निकाला गया था, तब भाईचारे का संदेश देने वाले ये लोग कहां थे? उन्होंने मराठी समाज की सहनशीलता को कमजोरी समझने की चेतावनी देते हुए कहा कि संघ को गैर-राजनीतिक होने का दावा छोड़कर परोक्ष राजनीति बंद करनी चाहिए। अंत में उन्होंने चुनौती दी कि यदि संघ सच में सद्भाव चाहता है, तो उसे पहले केंद्र द्वारा थोपी जा रही हिंदी पर खुलकर अपना स्टैंड साफ करना चाहिए।