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  • दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को हटाने के नोटिस पर विवाद, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केंद्र से की कार्रवाई वापस लेने की मांग

    दिल्ली की रेस कोर्स मस्जिद को हटाने के नोटिस पर विवाद, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केंद्र से की कार्रवाई वापस लेने की मांग


    नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली की ऐतिहासिक रेस कोर्स मस्जिद को हटाने के लिए जारी नोटिस के बाद विवाद गहरा गया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस कार्रवाई पर आपत्ति जताते हुए केंद्र सरकार से नोटिस तत्काल वापस लेने की मांग की है। बोर्ड का कहना है कि मस्जिद की ऐतिहासिक पहचान और कानूनी स्थिति से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं। उसने सरकार से धार्मिक स्थलों के मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचने की अपील भी की है।

    इस मामले में बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास ने बयान जारी कर नोटिस का विरोध किया। उनके अनुसार, संबंधित सरकारी एजेंसी लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस की ओर से मस्जिद को हटाने के लिए कार्रवाई की गई है। बोर्ड ने केंद्र सरकार से इस नोटिस को निरस्त कर वापस लेने की मांग की है। हालांकि, नोटिस जारी होने के पीछे सरकारी पक्ष की विस्तृत दलील और मस्जिद की जमीन को लेकर आधिकारिक स्थिति की पूरी जानकारी उपलब्ध विवरण में सामने नहीं आई है।

    डॉ. इलियास ने आरोप लगाया कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आने के बाद से दिल्ली की प्राचीन और ऐतिहासिक मस्जिदों को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि अलग-अलग आधारों पर इन धार्मिक स्थलों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। रेस कोर्स मस्जिद के मामले में भी सरकारी जमीन पर निर्माण होने का दावा किया जा रहा है। बोर्ड का कहना है कि मस्जिद के ऐतिहासिक अस्तित्व और कानूनी स्थिति के समर्थन में सरकारी रिकॉर्ड के कई दस्तावेज मौजूद हैं। ये आरोप बोर्ड के प्रवक्ता ने लगाए हैं; इनकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती।

    मस्जिद की ऐतिहासिक और धार्मिक अहमियत का उल्लेख करते हुए बोर्ड ने कहा कि यह केवल पूजा का प्राचीन स्थल नहीं है, बल्कि दिल्ली के इतिहास से भी जुड़ी हुई है। प्रवक्ता के अनुसार, नई दिल्ली नगरपालिका परिषद यानी एनडीएमसी ने मस्जिद को अपनी ऐतिहासिक इमारतों की सूची में शामिल किया है। इसके अतिरिक्त, मस्जिद का उल्लेख वक्फ से जुड़े रिकॉर्ड में भी होने का दावा किया गया है।

    बोर्ड के प्रवक्ता ने यह भी कहा कि रेस कोर्स मस्जिद को वर्ष 1977 में दिल्ली के राजपत्र में शामिल किया गया था। उनके मुताबिक, भारत सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की वेबसाइट पर भी मस्जिद को सूचीबद्ध किया गया है, जहां उसकी संपत्ति की पहचान से संबंधित जानकारी दर्ज है। इन रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बोर्ड ने मस्जिद के ऐतिहासिक दर्जे और उसके अस्तित्व से जुड़े पक्ष को महत्वपूर्ण बताया है।

    डॉ. इलियास के बयान के अनुसार, मस्जिद ब्रिटिश शासन के दौरान स्थापित की गई थी और इसे ऐतिहासिक स्मारक के रूप में संरक्षित घोषित किए जाने की बात भी कही गई है। उन्होंने यह भी बताया कि मस्जिद के इमाम को वक्फ बोर्ड की ओर से वेतन दिया जाता है। बोर्ड इन तथ्यों को मस्जिद की धार्मिक और प्रशासनिक पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण आधार के रूप में पेश कर रहा है।

    फिलहाल विवाद का केंद्र मस्जिद को हटाने के लिए जारी नोटिस और उसकी जमीन की कानूनी स्थिति है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप कर नोटिस वापस लेने की मांग की है। दूसरी ओर, मस्जिद की भूमि, सरकारी रिकॉर्ड और नोटिस के आधार को लेकर संबंधित विभागों की विस्तृत स्थिति सामने आने के बाद ही मामले के सभी पहलुओं का स्पष्ट आकलन किया जा सकेगा।

  • मलाइका अरोड़ा अबू धाबी की शेख जायद ग्रैंड मस्जिद पहुंचीं, काले बुर्के और जूते पहनने को लेकर सोशल मीडिया पर हुईं ट्रोल

    मलाइका अरोड़ा अबू धाबी की शेख जायद ग्रैंड मस्जिद पहुंचीं, काले बुर्के और जूते पहनने को लेकर सोशल मीडिया पर हुईं ट्रोल

    नई दिल्ली । अभिनेत्री मलाइका अरोड़ा का अबू धाबी की शेख जायद ग्रैंड मस्जिद में पहुंचने का वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया है। इस दौरान मलाइका काले रंग का बुर्का पहने नजर आईं। उनके इस पहनावे को देखकर कई सोशल मीडिया यूजर्स ने अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दीं। कुछ लोगों ने उनके कपड़ों पर टिप्पणी की, जबकि कुछ ने मस्जिद के अंदर जूते पहने होने को लेकर सवाल उठाए।

    मलाइका अपने ग्लैमरस अंदाज के लिए जानी जाती हैं, ऐसे में बुर्के में उनकी तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद इंटरनेट पर उनकी यात्रा को लेकर चर्चा शुरू हो गई। मस्जिद में उनके पहनावे से लेकर जूते पहनने तक, कई पहलुओं पर यूजर्स ने अपनी राय जाहिर की। इस पूरे मामले में सोशल मीडिया पर उनकी यात्रा और तस्वीरों को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

    मलाइका ने मस्जिद जाने के लिए काले रंग का बुर्का पहना था। तस्वीरों में उनके पैरों में जूते भी दिखाई दिए। इसी बात को लेकर कुछ यूजर्स ने आपत्ति जताई और मस्जिद में जूते पहनने पर सवाल उठाए। एक यूजर ने टिप्पणी की कि क्या उन्हें यह जानकारी नहीं है कि मस्जिद में जूते पहनकर नहीं जाते।

    मलाइका की तस्वीरों पर लोगों की नजर उनके पहनावे के साथ-साथ जूतों पर भी गई। इसके बाद सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर टिप्पणियां बढ़ने लगीं। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में मलाइका की ओर से इन प्रतिक्रियाओं पर कोई जवाब दिए जाने का उल्लेख नहीं है। उनकी यात्रा से जुड़ी तस्वीरें इंटरनेट पर साझा होने के बाद लोगों ने अपने-अपने नजरिये से इस पर प्रतिक्रिया दी।

    मलाइका के बुर्का पहनने को लेकर कुछ यूजर्स ने उनके धर्म के बारे में भी सवाल किया। एक यूजर ने टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या उन्होंने धर्म बदल लिया है। वहीं, एक अन्य यूजर ने लिखा कि वह पहली बार उन्हें पूरे कपड़ों में देख रहा है। कुछ लोगों ने उनके पहनावे पर हैरानी जताते हुए सवाल किया कि उन्होंने ऐसा क्या पहन लिया है। इन टिप्पणियों के बीच कई यूजर्स ने मलाइका के मस्जिद जाने के उद्देश्य पर भी सवाल उठाए। कुछ लोगों का दावा था कि उन्होंने प्रचार पाने के लिए बुर्का पहना और मस्जिद पहुंचीं। कुछ यूजर्स ने उनकी तुलना राखी सावंत से भी की।

    हालांकि, ये सभी प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया यूजर्स की टिप्पणियां हैं। उपलब्ध जानकारी में मलाइका की ओर से अपनी यात्रा के उद्देश्य को लेकर कोई आधिकारिक बयान सामने आने का उल्लेख नहीं है।

    शेख जायद ग्रैंड मस्जिद की इस यात्रा में मलाइका अकेली नहीं थीं। उनके साथ योग से जुड़े सर्वेश शशि भी नजर आए। दोनों की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर उनकी मौजूदगी को लेकर भी चर्चा हुई। मलाइका और सर्वेश की तस्वीरों ने इंटरनेट पर लोगों का ध्यान खींचा। हालांकि, दोनों के मस्जिद पहुंचने के पीछे के उद्देश्य या यात्रा से जुड़ी अन्य परिस्थितियों के बारे में कोई अतिरिक्त जानकारी सामने नहीं आई है।

    इस वजह से उनकी यात्रा को लेकर किए जा रहे दावों और टिप्पणियों को अलग-अलग रूप में देखा जा रहा है। तस्वीरों में मलाइका का काला बुर्का और पैरों में पहने जूते चर्चा के प्रमुख विषय बने रहे। इससे पहले अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा को भी बुर्का पहनने के कारण सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा था। मलाइका की तस्वीरों पर आई प्रतिक्रियाओं के बाद एक बार फिर किसी अभिनेत्री के धार्मिक स्थल पर जाने और वहां के पहनावे को लेकर ऑनलाइन बहस देखने को मिली।

  • सरकारी जमीन पर अवैध घोषित मस्जिद हटाई गई, सहारनपुर में पीएसी और आरआरएफ तैनाती के बीच प्रशासन ने कार्रवाई की

    सरकारी जमीन पर अवैध घोषित मस्जिद हटाई गई, सहारनपुर में पीएसी और आरआरएफ तैनाती के बीच प्रशासन ने कार्रवाई की


    नई दिल्ली । 
    उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में शनिवार सुबह कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को प्रशासन ने अदालत के आदेश के अनुपालन में ध्वस्त कर दिया। कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर और आसपास के संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बेहद कड़ी रखी गई। प्रशासन की ओर से पहले ही अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया था, ताकि कार्रवाई के दौरान कानून व्यवस्था की स्थिति बनी रहे।

    मस्जिद को लेकर विवाद सरकारी जमीन पर निर्माण किए जाने के आरोप से जुड़ा था। नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने 16 जुलाई 2026 को मामले की सुनवाई के बाद कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित इस निर्माण को अवैध घोषित किया था। अदालत ने संबंधित मामले में 6.41 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया था। इसके बाद मस्जिद पक्ष की ओर से आदेश के खिलाफ जिला जज की अदालत में अपील दाखिल की गई थी।

    मस्जिद कमेटी ने 20 जुलाई 2026 को जिला जज की अदालत का रुख किया था। वहां से भी उसे राहत नहीं मिली। इसके बाद प्रशासन के सामने अदालत के आदेश को लागू करने का रास्ता साफ हुआ। शनिवार को सुबह प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू की गई और मस्जिद का निर्माण हटा दिया गया।

    इस विवाद की शुरुआत 24 मार्च 2025 को हुई थी। बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी ने सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में सार्वजनिक परिसर में स्थित निर्माण को लेकर पीपी एक्ट के तहत याचिका दाखिल की थी। मामले की सुनवाई के दौरान निर्माण की वैधता और जमीन के स्वामित्व से जुड़े पहलुओं पर विचार किया गया। अदालत के आदेश के बाद यह मामला लगातार कानूनी प्रक्रिया में बना रहा।

    ध्वस्तीकरण से पहले सहारनपुर में सुरक्षा इंतजाम बढ़ा दिए गए थे। पांच कंपनी पीएसी और आरआरएफ के जवानों की तैनाती की गई। मिश्रित आबादी वाले इलाकों में पुलिस ने गश्त बढ़ाने के साथ फ्लैग मार्च भी किया। कलेक्ट्रेट परिसर के आसपास आने-जाने वालों पर निगरानी रखी गई, जबकि संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त बल को तैनात किया गया।

    इसी बीच कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन को उनके आवास पर रोके जाने की जानकारी सामने आई। बताया गया कि वह सहारनपुर जाने की तैयारी कर रही थीं। इसी दौरान पुलिस की टीम उनके आवास पर पहुंची और उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं दी गई। इसके बाद उन्हें घर में नजरबंद रखा गया। सांसद के सहारनपुर जाने के कार्यक्रम को लेकर प्रशासन और पुलिस की ओर से सुरक्षा संबंधी कदम उठाया गया।

    सहारनपुर मंडल के डीआईजी अभिषेक सिंह ने बताया कि ध्वस्तीकरण से पहले नोटिस और अपील सहित निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई। उन्होंने लोगों से शांति बनाए रखने और किसी भी प्रकार की अफवाह पर भरोसा नहीं करने की अपील की। साथ ही सोशल मीडिया पर भ्रामक या अफवाह फैलाने वाली सामग्री प्रसारित करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी दी।

    प्रशासन की कार्रवाई के बाद भी क्षेत्र में पुलिस बल की तैनाती जारी रखी गई है। अधिकारियों का कहना है कि संवेदनशील इलाकों में निगरानी बनाए रखी जा रही है। पूरे घटनाक्रम के दौरान प्रशासन ने कार्रवाई को न्यायिक आदेश के अनुपालन से जुड़ा बताया है, जबकि मामले को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।

  • मुस्लिम पक्ष का तर्क… भोजशाला राजस्व रिकॉर्ड में मस्जिद के रूप में दर्ज… मंदिर होने का कोई प्रमाण नहीं

    मुस्लिम पक्ष का तर्क… भोजशाला राजस्व रिकॉर्ड में मस्जिद के रूप में दर्ज… मंदिर होने का कोई प्रमाण नहीं


    इंदौर।
    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) में बुधवार को भोजशाला विवाद (Bhojshala controversy) पर सुनवाई हुई। इस दौरान मुस्लिम पक्ष ने अपनी बात रखते हुए दावा किया कि पुराने सरकारी कागजों यानी राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में यह जगह हमेशा से एक मस्जिद के रूप में दर्ज रही है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूद इतिहास के स्रोतों में ऐसा कोई साफ जिक्र नहीं मिलता कि राजा भोज ने यहां सरस्वती मंदिर बनवाया था। बता दें कि हिंदू समाज इस जगह को देवी सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर मानता है जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है। इस पूरी जगह की देखरेख ISI कर रहा है।

    खुद को सूफी संत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती के वंशज और सज्जादानशीन (किसी सूफी दरगाह, खानकाह या धार्मिक स्थल का आध्यात्मिक प्रमुख, गुरु या उत्तराधिकारी) बताने वाले काजी मोइनुद्दीन की ओर से उनके वकील नूर अहमद शेख ने इंदौर पीठ के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी के सामने विस्तृत दलीलें पेश कीं।

    मोइनुद्दीन ने भोजशाला मामले में ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ नामक संगठन और कुलदीप तिवारी एवं एक अन्य व्यक्ति की ओर से दायर दो जनहित याचिकाओं पर हस्तक्षेपकर्ता के रूप में सवाल उठाए हैं। इन याचिकाओं में कहा गया है कि भोजशाला सरस्वती मंदिर है। परिसर में केवल हिंदुओं को पूजा-पाठ का अधिकार दिया जाना चाहिए।


    मस्जिद के रूप में दर्ज है स्थान

    मोइनुद्दीन के वकील शेख ने अदालत में दावा किया कि मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती की वंशावली से जुड़े उनके मुवक्किल के पुरखों के पास विवादित परिसर की सनदें (अधिकार पत्र) ऐतिहासिक तौर पर रही हैं। सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में भी यह स्थान मस्जिद के रूप में दर्ज रहा है। भोजशाला परिसर में स्थित कमाल मौला मस्जिद के प्रबंधन से जुड़े लोगों का इस स्थान पर लंबे समय से ‘सतत और शांतिपूर्ण कब्जा’ रहा है।

    शेख ने मुस्लिम कानूनों का जिक्र करते हुए बताया कि यदि कोई धार्मिक संपत्ति हैए जैसे कि मस्जिद या उससे जुड़ी जमीन तो उसके देख-रेख करने वाले लोगों जैसे सज्जादानशीन और मुतवल्ली को खास हक मिलते हैं। इन पदों पर बैठे लोगों और उनके परिवार वालों को ना सिर्फ उस संपत्ति के कार्यों में दखल देने का अधिकार है वरन उसका इस्तेमाल करने का पूरा हक भी कानूनन उनके पास होता है।

    मुस्लिम पक्ष के वकील ने प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम 1904 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कानून में ‘संपत्ति के प्रभारी’ की शब्दावली का प्रयोग किया गया है जिससे स्पष्ट होता है कि जो व्यक्ति या पक्ष लंबे समय से किसी संपत्ति के प्रभार में है, उसे उस संपत्ति के संबंध में अधिकार प्राप्त होते हैं।


    सरस्वती मंदिर के अस्तित्व का स्पष्ट उल्लेख नहीं

    सुनवाई के दौरान धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के वकील तौसीफ वारसी ने दावा किया कि दोनों जनहित याचिकाओं में हिन्दू पक्षकारों की ओर से हाई कोर्ट के समक्ष ऐतिहासिक तथ्यों के संबंध में ‘भ्रामक प्रस्तुतीकरण’ किया गया है। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों में धार में परमार राजवंश के राजा भोज की ओर से स्थापित किसी सरस्वती मंदिर के अस्तित्व का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है।


    न्यायिक परीक्षण पर गंभीर सवाल

    धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के वकील तौसीफ वारसी ने यह भी कहा कि एएसआई ने भोजशाला विवाद को लेकर दायर मुकदमों में समय-समय पर अपने उत्तरों में परिवर्तन करते हुए तीन अलग-अलग रुख अपनाए हैं। ऐसी स्थिति न्यायिक परीक्षण को लेकर गंभीर सवाल उत्पन्न करती है।


    सर्वेक्षण प्रक्रिया पर जताई आपत्तियां

    वारसी ने एएसआई की ओर से भोजशाला परिसर के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने इसकी वीडियोग्राफी के तरीके के बारे में भी आपत्तियां जताईं। उनकी ओर से अदालत से अनुरोध किया कि इन आपत्तियों का परीक्षण किया जाए। भोजशाला मामले में सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी। हाई कोर्ट इस स्मारक के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर दायर 4 याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है।

  • दिल्ली की मस्जिद के पास बुलडोजर चला तो पाकिस्तान बोला-'भारत में निशाने पर मुस्लिम इमारतें'

    दिल्ली की मस्जिद के पास बुलडोजर चला तो पाकिस्तान बोला-'भारत में निशाने पर मुस्लिम इमारतें'

    इस्लामाबाद। पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत के मामले में नाक घुसाते हुए नई दिल्ली पर अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का आरोप लगाया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने दिल्ली के तुर्कमेनिस्तान गेट के पास स्थित फैज-ए-इलाही मस्जिद के आस-पास चलाए गए अतिक्रमण विरोधी अभियान पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे मुस्लिम विरासत के खिलाफ अभियान बताया। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि हमने दिल्ली की फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास चलाए गए अभियान पर नजर रखी है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह अतिक्रमण विरोधी अभियान के बहाने मस्जिदों को निशाना बनाने के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित अभियान का हिस्सा है।

    पाकिस्तान फैलाने लगा प्रोपेगैंडा
    पाकिस्तानी प्रवक्ता ने कहा कि हम फैज-ए-इलाही मस्जिद के आस-पास मौजूद प्रॉपर्टी को गिराए जाने से चिंतित हैं। उन्होंने कहा कि फैज-ए-इलाही मस्जिद सदियों पुरानी है और मुस्लिम सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रतिनिधित्व करती है। अंद्राबी ने पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा फैलाते हुए अतिक्रमण विरोधी अभियान को भारत में मुस्लिमों के खिलाफ RSS के बड़े अभियान का हिस्सा बता दिया। यही नहीं पाकिस्तानी प्रवक्ता ने संयुक्त राष्ट्र से भारत में अल्पसंख्यकों के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा की अपील कर डाली।

    क्या है पूरा मामला?
    दिल्ली के तुर्कमेनिस्तान गेट के पास स्थित सैयद फैज-ए-इलाही से सटे इलाके में अतिक्रमण के खिलाफ बुधवार सुबह तड़के अभियान चलाया गया था। यह अभियान दिल्ली नगर निगम (MCD) ने दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों के बाद चलाया था।

    पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा के उलट एमसीडी के एक अधिकारी ने बताया था कि अभियान के दौरान मस्जिद को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था।

    इस पूरी कार्रवाई के दौरान मस्जिद के पास इलाके में अवैध घोषित प्रॉपर्टी को ही ढहाया गया। दिल्ली पुलिस ने बताया था कि मस्जिद के पास की जमीन एमसीडी की है और उसने अभियान चलाने से पहले पुलिस को सूचना दी थी। वहीं, एमसीडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अभियान के दौरान 36,000 वर्ग फुट क्षेत्र से अतिक्रमण हटाया गया। इसमें एक मैरिज हॉल और औषधालय और दो मंजिला चहारदीवारी भी शामिल थी। अतिक्रमण विरोधी अभियान के दौरान कुछ उपद्रवियों ने पथराव करके अशांति फैलाने का प्रयास किया जिसके बाद पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा था।

  • BJP सांसद अरुण गोविल का बयान: मस्जिदों और मदरसों में CCTV लगाने की मांग

    BJP सांसद अरुण गोविल का बयान: मस्जिदों और मदरसों में CCTV लगाने की मांग


    नई दिल्ली। भाजपा सांसद अरुण गोविल ने लोकसभा के शून्यकाल में मस्जिदों और मदरसों में CCTV कैमरे लगाने की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि ये बड़े सार्वजनिक और सामुदायिक स्थल हैं, जहां सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। सांसद ने स्पष्ट किया कि यह प्रस्ताव किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिए है।

    देशभर में सुरक्षा व्यवस्था:
    गोविल ने बताया कि आज देशभर के मंदिर, चर्च, गुरुद्वारे, कॉलेज, अस्पताल, बाजार और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर CCTV कैमरे लगाए जा चुके हैं। ये कैमरे पारदर्शिता, सुरक्षा और अपराध नियंत्रण में प्रभावी साबित हुए हैं। लेकिन मस्जिदों और मदरसों में अब तक यह व्यवस्था लागू नहीं है, जबकि ये भी बड़े सार्वजनिक स्थल हैं।

    मक्का का उदाहरण:
    सांसद ने सऊदी अरब के मक्का और वहां के मदरसों का उदाहरण देते हुए कहा कि सुरक्षा कारणों से वहां CCTV कैमरे लगाए गए हैं। उन्होंने कहा, “अगर वहां सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा सकती है, तो भारत में समान सुरक्षा मानकों को लागू करने में क्यों हिचक होना चाहिए?”

    समान राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की अपील:
    अरुण गोविल ने केंद्र सरकार से अपील की कि देशभर में समान राष्ट्रीय सुरक्षा नीति बनाई जाए, जिसके तहत मस्जिदों और मदरसों में भी कैमरे अनिवार्य हों, जैसे मंदिरों, स्कूलों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर लगाए गए हैं। उनका मानना है कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र और मजबूत होगा।

    सुरक्षा पर चर्चा और प्रतिक्रिया:
    गोविल के इस बयान के बाद सुरक्षा मानकों पर चर्चा तेज हो गई है। कई लोग इसे समान सुरक्षा नीति की दिशा में जरूरी कदम मान रहे हैं, जबकि कुछ इसे विवादित भी बता रहे हैं। सांसद का कहना है कि सुरक्षा सबके लिए है और इससे किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह कदम स्पष्ट करता है कि संसद में सुरक्षा और पारदर्शिता पर गंभीर बहस हो रही है। सांसद यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सभी सार्वजनिक और सामुदायिक स्थल, चाहे किसी भी धर्म से संबंधित हों, सुरक्षा की दृष्टि से समान रूप से मजबूत और सुरक्षित हों।