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बैंक से कर्ज लिया फिर भी मुफ्त रजिस्ट्री का फायदा, मध्य प्रदेश सरकार की योजना पर क्यों मचा घमासान
भोपाल। मध्य प्रदेश में आबादी भूमि की मुफ्त रजिस्ट्री कराने की सरकार की महत्वाकांक्षी योजना सवालों के घेरे में आ गई है। प्रदेश के करीब 50 लाख लोगों को उनकी आबादी भूमि का मालिकाना हक दिलाने के लिए सरकार ने 3800 करोड़ रुपये खर्च करने की मंजूरी दी है। सरकार का तर्क है कि रजिस्ट्री होने से लोगों को अपनी संपत्ति के दस्तावेज मिलेंगे और बैंक से कर्ज लेने जैसी सुविधाओं का लाभ उठाना आसान होगा। लेकिन राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में सामने आए आंकड़े इस योजना की जरूरत और प्रक्रिया को लेकर नए सवाल खड़े कर रहे हैं। रिकॉर्ड के मुताबिक स्वामित्व योजना के तहत अधिकार अभिलेख प्राप्त करने वाले 2102 हितग्राही पहले ही बैंकों से कुल 175 करोड़ 57 लाख रुपये से अधिक का कर्ज ले चुके हैं। इनमें कुछ भूखंडों पर करीब 17 करोड़ रुपये तक का ऋण दर्ज है।इस जानकारी के सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि जब आबादी भूमि के अधिकार अभिलेख के आधार पर बैंक पहले ही कर्ज दे रहे हैं और संबंधित भूखंडों को बंधक भी बनाया जा चुका है तो अब मुफ्त रजिस्ट्री की व्यवस्था की जरूरत क्यों पड़ रही है। हालांकि सरकार की योजना का उद्देश्य केवल बैंक ऋण उपलब्ध कराना नहीं बल्कि लोगों को भूमि का विधिवत पंजीकृत मालिकाना हक दिलाना भी है। ऐसे में अधिकार अभिलेख और पंजीकृत स्वामित्व के बीच कानूनी अंतर को समझना जरूरी है। बैंक से कर्ज मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि मुफ्त रजिस्ट्री की प्रक्रिया अनावश्यक है। लेकिन पहले से ऋण प्राप्त कर चुके हितग्राहियों के मामलों में नियमों और प्रक्रिया की स्पष्टता को लेकर सवाल जरूर उठ रहे हैं।राजस्व विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार रतलाम जिले की जावरा तहसील के टोलखेड़ी निवासी संजय के भूखंड पर 16 करोड़ 89 लाख रुपये से अधिक का कर्ज दर्ज है। खरगोन जिले के धनोरा में लक्ष्मीबाई और अन्य संबंधित हितग्राहियों के भूखंड पर भी करीब 16 करोड़ 81 लाख रुपये का ऋण दर्ज बताया गया है। इसके अलावा विदिशा जिले के गूलरखेड़ी में आकाश कटारे के भूखंड पर 96 लाख रुपये और देवास जिले के डबलचौकी में सुरेश अग्रवाल के भूखंड पर 52.20 लाख रुपये का कर्ज दर्ज है। इंदौर उज्जैन नीमच रतलाम मंदसौर सीहोर और कई अन्य जिलों में भी आबादी भूमि पर लाखों रुपये के ऋण दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।दरअसल अप्रैल 2022 में तत्कालीन भू-अभिलेख आयुक्त की ओर से राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति को पत्र भेजा गया था। इसमें आबादी भूमि को बंधक रखने और बंधक हटाने की प्रक्रिया को कृषि भूमि के खसरे की तरह अपनाने की बात कही गई थी। पत्र के अनुसार कर्ज की अदायगी नहीं होने पर बैंक को संबंधित संपत्ति पर कार्रवाई करने का अधिकार मिल सकता है। इसी व्यवस्था के आधार पर पिछले कुछ वर्षों में बैंकों ने आबादी भूमि पर ऋण देने की प्रक्रिया अपनाई। ऐसे में पहले से बंधक संपत्तियों की रजिस्ट्री के दौरान कानूनी प्रक्रिया और बैंक के हितों की सुरक्षा महत्वपूर्ण मुद्दे बन गए हैं।दूसरी ओर मुफ्त रजिस्ट्री की प्रक्रिया पटवारियों के विरोध के कारण भी अटकी हुई है। विवाद की मुख्य वजह रजिस्ट्री प्रक्रिया में पटवारियों को निष्पादक यानी एक्जीक्यूटर की भूमिका देना और उनकी व्यक्तिगत आईडी तथा कानूनी जिम्मेदारी से जुड़े सवाल हैं। सरकार ने पटवारियों को कानूनी संरक्षण देने और 17 सितंबर के बाद की गई कार्रवाई को शून्य करने पर सहमति जताई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात के बाद पटवारी संघ ने सोमवार से स्वामित्व योजना का काम शुरू करने की घोषणा की है।सरकार ने इस योजना के तहत करीब 50 लाख लोगों की आबादी भूमि की मुफ्त रजिस्ट्री कराने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए 3800 करोड़ रुपये के खर्च को मंजूरी दी गई है और कई राजस्व तथा अन्य अधिकारियों को पंजीयन से जुड़े अधिकार दिए गए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पहले से अधिकार अभिलेख और बैंक ऋण वाले भूखंडों की रजिस्ट्री किस प्रक्रिया से होगी और योजना को कानूनी विवादों से बचाते हुए समय पर कैसे पूरा किया जाएगा। योजना का वास्तविक लाभ तभी सामने आएगा जब हितग्राहियों को स्पष्ट स्वामित्व मिलेगा और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से पूरी होगी। -

योजना में कटौती का असर, बैतूल में पात्र जोड़े वंचित, प्रशासन के सामने बढ़ी चुनौती
बैतूल । बैतूल मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री कन्यादान योजना में इस वर्ष की गई कटौती का असर अब जमीनी स्तर पर साफ नजर आने लगा है। जिले में सामूहिक विवाह कार्यक्रमों के लिए निर्धारित सीमित संख्या के चलते बड़ी संख्या में पात्र जोड़े योजना का लाभ लेने से वंचित हो रहे हैं, जिससे ग्रामीणों में नाराजगी और आक्रोश बढ़ता जा रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि आवेदन करने पहुंचे कई जोड़ों को निराश होकर वापस लौटना पड़ा, जिससे मौके पर हंगामे जैसी स्थिति भी देखने को मिली।प्रशासन ने इस वर्ष जिले में चार स्थानों पर सामूहिक विवाह कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है। प्रत्येक आयोजन में अधिकतम 200 जोड़ों को ही शामिल किए जाने की अनुमति दी गई है। इस प्रकार पूरे जिले में केवल 800 जोड़ों का ही विवाह इस योजना के तहत संपन्न हो सकेगा। जबकि पिछले वर्षों में यह संख्या कई गुना अधिक रही है और बड़ी संख्या में जरूरतमंद परिवारों को इसका लाभ मिलता रहा है।
योजना में इस कटौती के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष का माहौल बन गया है। कई परिवारों ने पहले से ही अपनी बेटियों के विवाह के लिए इस योजना पर भरोसा किया था, लेकिन सीमित संख्या के कारण वे अब खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। आवेदकों का कहना है कि वे सभी जरूरी पात्रता पूरी करते हैं, इसके बावजूद उन्हें केवल संख्या सीमा के कारण योजना से बाहर कर दिया गया है, जो उनके लिए बेहद निराशाजनक है।
मौके पर पहुंचे कई लोगों ने प्रशासन के इस फैसले पर सवाल उठाए और संख्या बढ़ाने की मांग की। उनका कहना है कि सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की मदद करना है, लेकिन संख्या सीमित कर देने से इसका लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है। कुछ स्थानों पर स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि प्रशासन को लोगों को समझाइश देकर शांत करना पड़ा।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि यह निर्णय शासन स्तर पर तय दिशा-निर्देशों के अनुसार लिया गया है और उन्हें उसी के तहत कार्यक्रम आयोजित करना है। उन्होंने आश्वासन दिया कि भविष्य में स्थिति की समीक्षा कर आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।
मुख्यमंत्री कन्यादान योजना लंबे समय से गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए एक महत्वपूर्ण सहारा रही है, जिसके तहत सामूहिक विवाह के माध्यम से आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। लेकिन इस वर्ष संख्या में की गई कटौती ने इस योजना की पहुंच को सीमित कर दिया है, जिससे इसकी प्रभावशीलता पर भी सवाल उठने लगे हैं।
फिलहाल बैतूल में यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है और ग्रामीणों की मांग है कि सरकार इस निर्णय पर पुनर्विचार करे, ताकि अधिक से अधिक पात्र जोड़ों को इस योजना का लाभ मिल सके और किसी को भी निराश होकर लौटना न पड़े।