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  • बच्चों की मौत के बाद बालाघाट में बढ़ी चिंता: सरकारी दावों पर सवाल, इलाज के बाद फिर बीमार पड़ रहे मासूम

    बच्चों की मौत के बाद बालाघाट में बढ़ी चिंता: सरकारी दावों पर सवाल, इलाज के बाद फिर बीमार पड़ रहे मासूम


    भोपाल । मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के आदिवासी इलाकों में पिछले ढाई महीने से बच्चों की लगातार हो रही मौतों ने पूरे प्रदेश को चिंता में डाल दिया है। जून के आखिरी सप्ताह से बैहर और बिरसा ब्लॉक के कई बैगा और गोंड बहुल गांवों में बच्चों के बीमार पड़ने का सिलसिला शुरू हुआ था जो अब तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। सबसे बड़ा सवाल मौतों की संख्या को लेकर है। शुरुआत में प्रशासन की ओर से केवल 8 बच्चों की मौत की बात सामने आई लेकिन गांवों में पहुंची जमीनी पड़ताल और स्थानीय लोगों के दावों के बाद यह आंकड़ा लगातार बढ़ता गया। अलग अलग रिपोर्टों में अब 30 से ज्यादा बच्चों की मौत की बात सामने आ रही है जबकि प्रशासन की ओर से अभी तक मौतों का कोई स्पष्ट और आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है।

    सोनगुड्डा बोंदारी कुंडेकसा कोरका गठिया मछूलदा और मातला जैसे गांवों से बच्चों के बीमार होने और मौत की खबरें सामने आईं। ग्रामीणों का आरोप है कि कई मौतें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज तक नहीं हुईं। अडोरी पंचायत के सरपंच ने तो अपनी पंचायत में ही 9 बच्चों की मौत का दावा किया है। दूसरी ओर सरकार की मेडिकल स्क्रीनिंग में बीमारी की गंभीर स्थिति सामने आई है। केंद्रीय टीम ने इलाके में 32433 लोगों की जांच की जिसमें 7711 बच्चे गंभीर कुपोषित पाए गए। इनमें 518 बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती करना पड़ा। वहीं 13406 बच्चे डायरिया से पीड़ित मिले जबकि 274 बच्चों में गंभीर निमोनिया के लक्षण पाए गए। जुलाई से अब तक 431 बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया जिनमें से 379 बच्चों को उपचार के बाद छुट्टी दी जा चुकी है जबकि 52 बच्चे अब भी इलाजरत हैं।

    इन मौतों के पीछे किसी एक बीमारी को जिम्मेदार नहीं माना जा रहा है। कई बच्चों में मलेरिया डायरिया खसरा और चर्म रोग जैसी समस्याएं सामने आईं लेकिन लगभग सभी मामलों में कुपोषण एक बड़ी साझा समस्या बनकर उभरा। यही कुपोषण बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर रहा है और सामान्य दिखने वाली बीमारियों को भी गंभीर बना रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों का शरीर संक्रमण से मुकाबला नहीं कर पाता। जिंक विटामिन ए और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों की कमी के कारण डायरिया और निमोनिया जैसी बीमारियां भी उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।

    बालाघाट पहले से ही मलेरिया के लिहाज से संवेदनशील जिला रहा है। पिछले वर्ष प्रदेश में दर्ज 2126 मलेरिया मामलों में 685 मामले अकेले बालाघाट से सामने आए थे। इस वर्ष जुलाई तक प्रदेश में मिले 583 मामलों में भी 174 मामले बालाघाट के थे। इसके साथ ही बैगा समुदाय की बस्तियां जंगल और दुर्गम क्षेत्रों में होने के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। साफ पानी की कमी और लंबे समय तक पोषण आहार नहीं मिलने की समस्या ने हालात को और गंभीर किया है।

    सबसे चिंता की बात यह है कि इलाज के बाद घर लौटने वाले कुछ बच्चे दोबारा बीमार होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पताल में इलाज कर देना पर्याप्त नहीं है बल्कि बच्चों के पोषण और गांव के स्वास्थ्य वातावरण पर भी लगातार निगरानी जरूरी है। डायरिया होने पर तत्काल ओआरएस देना जिंक की खुराक पूरी करना और बच्चे की हालत बिगड़ने पर बिना देरी स्वास्थ्य केंद्र ले जाना जरूरी बताया गया है।

    मामले में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठे हैं। गलत आंकड़े बताए जाने के आरोपों के बाद तत्कालीन सीएमएचओ को हटाया गया। एक बच्चे की मौत के बाद बिना पोस्टमार्टम अंतिम संस्कार कराए जाने के ग्रामीण आरोपों ने भी विवाद बढ़ाया। अस्पतालों में फोटो और मीडिया कवरेज पर रोक लगाने का आदेश जारी होने और कुछ ही घंटों में वापस लिए जाने से भी पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हुए।

    सरकार ने स्थिति संभालने के लिए कई कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रभावित बैगा गांव पहुंचे और मृत बच्चों के परिवारों से मुलाकात कर आर्थिक सहायता की घोषणा की। जिला अस्पताल के बच्चों के वार्ड की क्षमता बढ़ाई गई है। छह मोबाइल मेडिकल यूनिट तैनात की गई हैं और निगरानी का दायरा बढ़ाया गया है। गांवों में सफाई अभियान और कीटनाशक छिड़काव भी कराया गया है।

    इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल अभी भी वहीं खड़ा है कि आखिर इन बच्चों की मौतों की वास्तविक संख्या कितनी है और बीमारी की जड़ क्या है। कुपोषण मलेरिया संक्रमण दूषित पानी और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था सभी एक साथ जिम्मेदार हैं या इसके पीछे कोई और कारण भी है यह स्पष्ट होना बाकी है। ऐसे में जरूरी है कि मौतों के आंकड़ों को पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक किया जाए और हर प्रभावित गांव की स्वतंत्र जांच कराई जाए। क्योंकि बालाघाट की इन आदिवासी बस्तियों में सवाल सिर्फ बीमार बच्चों का नहीं बल्कि उन परिवारों के भरोसे का भी है जो अपने बच्चों को बचाने के लिए अब भी जवाब का इंतजार कर रहे हैं।

  • आयुष्मान क्लेम में बड़ा खेल सामने आया, कहीं ओवर डायग्नोसिस तो कहीं टेलीफोन पर इलाज; भोपाल के 3 अस्पतालों पर कार्रवाई

    आयुष्मान क्लेम में बड़ा खेल सामने आया, कहीं ओवर डायग्नोसिस तो कहीं टेलीफोन पर इलाज; भोपाल के 3 अस्पतालों पर कार्रवाई


    भोपाल। भोपाल में आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज में कथित गड़बड़ी का बड़ा मामला सामने आया है। आयुष्मान योजना की टीम ने शहर के तीन निजी अस्पतालों में औचक निरीक्षण कर कई अनियमितताएं पकड़ी हैं। जांच के बाद तीनों अस्पतालों को तत्काल प्रभाव से आयुष्मान योजना से निलंबित कर दिया गया है। साथ ही अस्पताल प्रबंधन को कारण बताओ नोटिस जारी कर 10 दिन के भीतर जवाब देने के निर्देश दिए गए हैं। अब इन अस्पतालों में पहले इलाज करा चुके मरीजों के रिकॉर्ड और आयुष्मान क्लेम की भी जांच की जाएगी।

    आयुष्मान भारत के अधिकारियों और विभागीय टीम ने यश्वी मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल सूर्यांश मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल और मारुति मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल का औचक निरीक्षण किया था। जांच के दौरान सबसे गंभीर मामला मरीजों को दूसरे जिलों से बड़ी संख्या में भोपाल बुलाकर भर्ती करने का सामने आया। यश्वी अस्पताल के रिकॉर्ड की जांच में पता चला कि सिंगरौली और दूसरे जिलों के गांवों से मरीजों को एक साथ बड़ी संख्या में भोपाल लाया गया था। उन्हें मुफ्त इलाज का भरोसा देकर अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच टीम ने 30 मरीजों के रिकॉर्ड खंगाले जिनमें करीब 20 मरीज दूसरे जिलों के पाए गए।

    आयुष्मान योजना के अधिकारियों ने माना कि मामले की पूरी तस्वीर पुराने रिकॉर्ड की जांच के बाद ही साफ होगी। इसी वजह से तीनों अस्पतालों के पहले के आयुष्मान क्लेम का डेस्क ऑडिट कराने के निर्देश दिए गए हैं। पुराने मरीजों से भी संपर्क कर यह पता लगाया जाएगा कि उन्हें किस बीमारी के लिए भर्ती किया गया था उनका वास्तविक इलाज क्या हुआ और अस्पताल में कितने दिन रखा गया। मरीजों के बयान और अस्पताल के दस्तावेजों का मिलान किया जाएगा।

    जांच के दौरान एक मरीज के मामले ने भी सवाल खड़े किए। ब्रजनारायण नाम के मरीज को पेट में दर्द की शिकायत थी। अस्पताल की फाइल में उन्हें गंभीर संक्रमण ब्लड प्रेशर गिरने और अंगों पर असर जैसी स्थिति बताते हुए 8 से 11 अगस्त तक आईसीयू में भर्ती दिखाया गया। लेकिन 11 अगस्त की सुबह 9 बजकर 15 मिनट पर उन्हें अस्पताल के बाहर देखा गया। बाद में रात 9 बजकर 36 मिनट पर वह आईसीयू वार्ड में दूसरे मरीजों के साथ बातचीत करते नजर आए। इस मामले ने आईसीयू में भर्ती दिखाकर किए गए क्लेम की वास्तविकता पर सवाल खड़े किए हैं।

    मारुति मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल की जांच में भी आईसीयू में भर्ती मरीजों के मामलों में ओवर डायग्नोसिस की आशंका सामने आई। जांच टीम को वहां मरीजों का इलाज करते हुए BAMS डॉक्टर भी मिले। अधिकारियों ने ऐसे मामलों के रिकॉर्ड की जांच करने और यह पता लगाने के निर्देश दिए हैं कि मरीजों को जिस गंभीर स्थिति में भर्ती दिखाया गया था वह चिकित्सकीय रूप से वास्तव में सही थी या नहीं।

    सूर्यांश मल्टी स्पेशियलिटी हॉस्पिटल की जांच में भी गंभीर अनियमितता सामने आई। रिकॉर्ड में जिन डॉक्टरों के नाम मरीजों के इलाज से जुड़े थे वे मौके पर मरीजों का इलाज करते नहीं मिले। जांच के दौरान टेलीफोन पर इलाज किए जाने की बात भी सामने आई। अब अस्पताल के रिकॉर्ड में दर्ज डॉक्टरों की भूमिका और मरीजों के इलाज से जुड़े दस्तावेजों की विस्तृत जांच की जाएगी।

    आयुष्मान योजना के सीईओ अरविंद कुमार शाह के मुताबिक तीनों अस्पतालों में तत्काल प्रभाव से नए आयुष्मान मरीजों की भर्ती पर रोक लगा दी गई है। पुराने मरीजों के क्लेम का भी ऑडिट किया जाएगा। अस्पतालों से जवाब मिलने और जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।

    इस कार्रवाई के बाद आयुष्मान योजना से जुड़े दूसरे अस्पतालों पर भी जांच की नजर रहेगी। अधिकारियों का कहना है कि यदि कहीं मरीजों को अनावश्यक रूप से भर्ती करने फर्जी या बढ़े हुए क्लेम लगाने अथवा इलाज की स्थिति को गलत तरीके से दर्ज करने जैसी गड़बड़ी मिलती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल तीन अस्पतालों पर हुई कार्रवाई ने आयुष्मान योजना के नाम पर होने वाले संभावित फर्जीवाड़े को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।