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  • भोपाल में रिहायशी प्लॉट पर कमर्शियल गतिविधियों पर सख्ती, 7 दिन में दस्तावेज नहीं मिले तो होगी कार्रवाई

    भोपाल में रिहायशी प्लॉट पर कमर्शियल गतिविधियों पर सख्ती, 7 दिन में दस्तावेज नहीं मिले तो होगी कार्रवाई


    भोपाल । भोपाल के रिहायशी इलाकों में आवासीय भूखंडों पर संचालित हो रही व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत के इस आदेश के बाद ऐसे लोगों और प्रतिष्ठानों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं जो आवासीय जमीन का इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों के लिए कर रहे हैं। कोर्ट ने संबंधित पक्षकारों को निर्देश दिया है कि यदि उनके पास आवासीय भूखंड पर किसी तरह की व्यावसायिक गतिविधि संचालित करने की वैध अनुमति है तो उसके दस्तावेज सात दिन के भीतर भोपाल नगर निगम के सामने पेश करने होंगे। इसके बाद नगर निगम दस्तावेजों की जांच करेगा और यदि अनुमति वैध नहीं पाई जाती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सकेगी।

    हाईकोर्ट का यह निर्देश ऐसे समय आया है जब रिहायशी इलाकों में आवासीय उपयोग के लिए निर्धारित जमीन पर होटल मॉल और दूसरे व्यावसायिक प्रतिष्ठान संचालित किए जाने को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय रहवासियों की ओर से लंबे समय से शिकायतें सामने आती रही हैं कि इस तरह की गतिविधियों से उनके इलाकों की व्यवस्था प्रभावित होती है। खासकर ट्रैफिक और पार्किंग की समस्या के साथ शोर और सुरक्षा से जुड़ी परेशानियां बढ़ने की बात कही जाती रही है।

    अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि तय समय सीमा में वैध अनुमति से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए तो नगर निगम सुप्रीम कोर्ट के राजेंद्र कुमार बड़जात्या मामले में वर्ष 2024 में दिए गए फैसले के अनुरूप कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह आदेश जारी किया है। इससे अब नगर निगम के लिए भी आगे की कार्रवाई को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट हो गई है।

    इस मामले में याचिकाकर्ता विवेक त्रिपाठी ने हाईकोर्ट के आदेश का स्वागत किया है। उनका कहना है कि रिहायशी क्षेत्रों को व्यावसायिक गतिविधियों के अनियंत्रित विस्तार से बचाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है। उनके अनुसार अब नगर निगम के सामने न्यायिक निर्देश मौजूद हैं जिसके आधार पर संबंधित प्रतिष्ठानों की अनुमति की जांच की जा सकती है।

    रिहायशी इलाकों में रहने वाले लोगों को भी इस आदेश से उम्मीद जगी है। रहवासी लवनीश भाटी का कहना है कि कई इलाकों में लंबे समय से ट्रैफिक पार्किंग और दूसरी समस्याएं बनी हुई हैं। शिकायतों के बावजूद अपेक्षित समाधान नहीं मिलने से लोगों में नाराजगी रही है। अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद उन्हें उम्मीद है कि नगर निगम जमीन पर प्रभावी कार्रवाई करेगा।

    संयुक्त रहवासी संघर्ष समिति ने भी अदालत के आदेश का स्वागत किया है। समिति ने नगर निगम से मांग की है कि रिहायशी इलाकों में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की अनुमति की जांच की जाए। जिन प्रतिष्ठानों के पास वैध अनुमति नहीं है उनके खिलाफ नियमों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार कार्रवाई की जाए। फिलहाल आने वाले सात दिनों में संबंधित पक्षों को अपने दस्तावेज नगर निगम के सामने प्रस्तुत करने होंगे। इसके बाद दस्तावेजों की जांच और उनकी वैधता के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।

  • NHAI सड़क की खुलेगी पोल! हाईकोर्ट के निर्देश पर JCB से लिए गए सैंपलों की होगी जांच

    NHAI सड़क की खुलेगी पोल! हाईकोर्ट के निर्देश पर JCB से लिए गए सैंपलों की होगी जांच


    ग्वालियर । ग्वालियर में लगातार खराब हो रही सड़कों को लेकर उठ रहे सवाल अब नेशनल हाईवे तक पहुंच गए हैं। शहर में एक साल के भीतर 12 से ज्यादा सड़कें धंसने और कई मार्गों की निर्माण गुणवत्ता पर सवाल उठने के बाद हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित विशेष जांच टीम ने आगरा मुंबई हाईवे के एक हिस्से की गहन जांच शुरू की। गुरुवार को टीम की मौजूदगी में मेहरा टोल प्लाजा और सिकरौदा चौराहे के बीच सड़क को जेसीबी की मदद से खुदवाया गया। सड़क की ऊपरी सतह हटाने के बाद अलग अलग परतों से डामर गिट्टी और बेस मटेरियल के नमूने लिए गए हैं।

    इन नमूनों को अब प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए भेजा जाएगा। जांच में यह पता लगाने की कोशिश होगी कि सड़क निर्माण में निर्धारित मानकों के मुताबिक सामग्री का इस्तेमाल हुआ था या नहीं। इसके साथ ही डामर की मात्रा गिट्टी की गुणवत्ता सड़क की अलग अलग परतों की मजबूती और कॉम्पैक्शन जैसे तकनीकी पहलुओं की भी जांच की जाएगी। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि सड़क निर्माण में कहीं गुणवत्ता से समझौता तो नहीं किया गया।

    हाईकोर्ट के निर्देश पर नेशनल हाईवे की सड़क को मौके पर खुदवाकर उसकी वास्तविक स्थिति जांचने की यह कार्रवाई इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि इससे सरकारी दस्तावेजों में दर्ज तकनीकी जानकारी का जमीन पर हुए निर्माण से मिलान किया जा सकेगा। जांच टीम की निगरानी में सड़क की परतें हटाई गईं और जरूरी स्थानों से सैंपल लिए गए। इससे केवल कागजी रिकॉर्ड के आधार पर गुणवत्ता का आकलन करने के बजाय वास्तविक निर्माण की स्थिति सामने आने की उम्मीद है।

    मामला शहर की खराब सड़कों को लेकर दायर जनहित याचिका से जुड़ा है। वरिष्ठ अधिवक्ता अवधेश सिंह तोमर ने सड़कों के बार बार धंसने गड्ढों और निर्माण गुणवत्ता को लेकर याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विभागीय रिपोर्टों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय स्वतंत्र जांच कराने के निर्देश दिए थे। इसके बाद वकीलों और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करते हुए चार सदस्यीय विशेष टीम बनाई गई।

    यह टीम इससे पहले ग्वालियर की कई प्रमुख सड़कों का निरीक्षण कर चुकी है। विक्की फैक्ट्री से झांसी रोड चेतकपुरी से सिंधिया महल गेट और चेतकपुरी से एजी ऑफिस पुल मार्ग समेत कई हिस्सों में सड़क की स्थिति डामर की मोटाई और क्षति का परीक्षण किया गया। 19 अगस्त को गुढ़ी गुढ़ा का नाका और बेटी बचाओ चौराहे के आसपास से भी कोर सैंपल लिए गए थे।

    जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए सैंपलिंग की लोकेशन पहले से सार्वजनिक नहीं की जा रही है। सड़क का चयन सैंपल लेने से कुछ समय पहले किया जाता है ताकि संबंधित निर्माण एजेंसी को पहले से तैयारी करने का अवसर न मिले। टीम इससे पहले लेजर कैमरों और आधुनिक उपकरणों की मदद से सड़कों की हाईटेक स्कैनिंग भी कर चुकी है। इससे सड़क की सतह समतलीकरण और डामर की स्थिति का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया गया।

    अब नेशनल हाईवे से लिए गए सैंपलों की जांच पीडब्ल्यूडी की केंद्रीय परीक्षण प्रयोगशाला ग्वालियर में की जाएगी। रिपोर्ट सामने आने के बाद हाईकोर्ट के समक्ष तथ्य रखे जाएंगे। इसके बाद सड़क निर्माण की गुणवत्ता और यदि कोई तकनीकी अनियमितता सामने आती है तो उसकी जिम्मेदारी को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।

  • 18 महीने बाद जेल से बाहर आए RTO के पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा, कोर्ट ने 10 लाख के मुचलके पर दी जमानत

    18 महीने बाद जेल से बाहर आए RTO के पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा, कोर्ट ने 10 लाख के मुचलके पर दी जमानत


    भोपाल। आरटीओ के पूर्व आरक्षक सौरभ शर्मा को आखिरकार करीब 18 महीने बाद जेल से राहत मिल गई। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट से नियमित जमानत मिलने के बाद बुधवार रात करीब 10:20 बजे उन्हें भोपाल सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया। फरवरी 2025 से न्यायिक हिरासत में बंद सौरभ शर्मा की रिहाई की औपचारिकताएं पूरी होने के बाद जेल के बाहर परिजन और समर्थकों ने उनका स्वागत किया। लंबे समय से चर्चाओं में रहे इस बहुचर्चित मामले में हाईकोर्ट का यह फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ ने सौरभ शर्मा की नियमित जमानत याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें 10 लाख रुपए के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत मिलने का अर्थ आरोपों से बरी होना नहीं है। कोर्ट ने सौरभ शर्मा को ट्रायल कोर्ट की प्रत्येक सुनवाई में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। इसके अलावा बिना न्यायालय की अनुमति के देश छोड़ने पर रोक लगाई गई है। साथ ही उन्हें किसी भी गवाह को प्रभावित करने, साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने या जांच को प्रभावित करने जैसी किसी भी गतिविधि से दूर रहने की सख्त हिदायत दी गई है।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और संबंधित एजेंसियां चार्जशीट दाखिल कर चुकी हैं। ट्रायल की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, लेकिन गवाहों और दस्तावेजों की संख्या काफी अधिक होने के कारण मुकदमे के जल्द समाप्त होने की संभावना कम है। ऐसे में किसी आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना न्यायोचित नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने उन्हें नियमित जमानत देने का निर्णय लिया।

    सौरभ शर्मा का नाम दिसंबर 2024 में उस समय पूरे देश में चर्चा का विषय बना था, जब लोकायुक्त, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और आयकर विभाग ने उनके ठिकानों पर संयुक्त कार्रवाई की थी। जांच के दौरान भोपाल के मेंडोरी क्षेत्र में खड़ी एक इनोवा कार से करीब 11 करोड़ रुपए नकद और 52 किलोग्राम सोना बरामद किया गया था। जांच एजेंसियों ने इस कार और बरामद संपत्ति का संबंध सौरभ शर्मा से जोड़ा था। इसके बाद उनकी और उनके सहयोगियों की कथित अघोषित संपत्तियों को लेकर कई बड़े खुलासे सामने आए थे।

    हालांकि जांच के दौरान सौरभ शर्मा लगातार इस बात से इनकार करते रहे कि मेंडोरी से बरामद नकदी और सोना उनका है। उन्होंने पूछताछ में इन संपत्तियों पर अपना स्वामित्व स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि आयकर विभाग और अन्य जांच एजेंसियों के सामने अब भी यह चुनौती बनी हुई है कि बरामद कैश और सोने के वास्तविक मालिक की पहचान कर अपनी जांच को अंतिम रूप दिया जाए।

    फिलहाल हाईकोर्ट से मिली जमानत के बाद सौरभ शर्मा को अस्थायी राहत जरूर मिल गई है, लेकिन उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी। अब इस बहुचर्चित मामले की निगाहें ट्रायल कोर्ट की आगामी सुनवाई और जांच एजेंसियों की अंतिम रिपोर्ट पर टिकी रहेंगी।

  • हाईकोर्ट में 31 अस्पतालों की सुनवाई ने पकड़ा नया मोड़, गलत जांच रिपोर्ट और अवैध संचालन के आरोपों से बढ़ी मुश्किलें

    हाईकोर्ट में 31 अस्पतालों की सुनवाई ने पकड़ा नया मोड़, गलत जांच रिपोर्ट और अवैध संचालन के आरोपों से बढ़ी मुश्किलें


    इंदौर । इंदौर के 31 अस्पतालों की वैधता और स्वास्थ्य संबंधी नियमों के पालन को लेकर दायर जनहित याचिका में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में गुरुवार को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। पिछली सुनवाई के दौरान कोर्ट के निर्देश के अनुसार याचिकाकर्ता एडवोकेट चर्चित शास्त्री ने अपना रिजाइंडर यानी प्रत्युत्तर अदालत में पेश किया जिसमें सीएमएचओ डॉ माधव हासानी पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि अदालत के समक्ष प्रस्तुत की गई जांच रिपोर्ट वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाती और इससे नियमों का उल्लंघन करने वाले अस्पतालों को बचाने का प्रयास किया गया है।

    रिजाइंडर में कहा गया है कि सीएमएचओ की ओर से कोर्ट में दी गई रिपोर्ट भ्रामक है और उसमें वास्तविक स्थिति को पूरी तरह सामने नहीं रखा गया। याचिकाकर्ता का दावा है कि गलत तथ्यों के आधार पर अदालत को गुमराह करने की कोशिश की गई ताकि बिना नियमों का पालन करने वाले अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई प्रभावित हो सके।

    याचिकाकर्ता ने अपने प्रत्युत्तर के साथ कई ऐसे दस्तावेज भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जिनके बारे में दावा किया गया कि वे कूटरचित हैं। इसके अलावा कुछ अस्पतालों के ऐसे रिकॉर्ड भी पेश किए गए जिनके संबंध में कहा गया कि वे आवश्यक वैधानिक अनुमति और पंजीयन के बिना संचालित हो रहे हैं जबकि आधिकारिक दस्तावेजों में अलग स्थिति दिखाई गई है। याचिका में यह भी कहा गया कि ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है ताकि स्वास्थ्य सेवाओं में नियमों का पालन सुनिश्चित किया जा सके।

    इससे पहले हुई सुनवाई में भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए गए थे। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया था कि जिन 31 अस्पतालों के संबंध में मामला लंबित है उनके स्थान पर 34 संस्थानों की जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। साथ ही विनायक पैथोलॉजी लैब और लेडी हलीमा हॉस्पिटल को सील किए जाने से जुड़े कथित फर्जी आदेश भी रिकॉर्ड पर रखने का आरोप लगाया गया था। इसके अलावा कुछ अस्पतालों की ओर से नगर निगम के कथित फर्जी शपथ पत्रों के आधार पर भवन अनुमति से जुड़े दस्तावेज पेश किए जाने का दावा भी किया गया।

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने यह भी कहा था कि जनहित याचिका दायर करने के बाद उन पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है और हमले की कोशिशें भी हुई हैं। इस पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता की सुरक्षा सुनिश्चित करना शासन की जिम्मेदारी है और उन्हें आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।

    अब ताजा सुनवाई में पेश किए गए रिजाइंडर और उससे जुड़े दस्तावेजों के आधार पर अदालत आगे की कार्रवाई करेगी। कोर्ट यह जांच करेगी कि प्रस्तुत रिपोर्ट और रिकॉर्ड में कितनी सच्चाई है तथा यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन या गलत जानकारी दी गई है तो उसके लिए क्या कार्रवाई की जानी चाहिए। इस मामले का फैसला इंदौर के स्वास्थ्य तंत्र और निजी अस्पतालों की जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे भविष्य में अस्पतालों के संचालन और नियामकीय व्यवस्था पर भी व्यापक असर पड़ सकता है।

  • हाईकोर्ट पहुंचे आरक्षक सौरभ शर्मा बोले, सुनवाई का मौका दिए बिना हुई कार्रवाई

    हाईकोर्ट पहुंचे आरक्षक सौरभ शर्मा बोले, सुनवाई का मौका दिए बिना हुई कार्रवाई


    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के चर्चित सौरभ शर्मा मामले में एक नया कानूनी मोड़ सामने आया है। आय से अधिक संपत्ति और कथित मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े आरोपों के बीच आरटीओ आरक्षक सौरभ शर्मा ने अब प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी है। इस कदम के बाद प्रदेश के सबसे चर्चित मामलों में शामिल इस प्रकरण की कानूनी लड़ाई और दिलचस्प हो गई है।

    हाईकोर्ट में दायर याचिका में सौरभ शर्मा ने प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई की वैधानिकता पर सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि जांच और कानूनी प्रक्रिया के दौरान उन्हें अपना पक्ष रखने का समुचित अवसर नहीं दिया गया। याचिका में कहा गया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 233(1) के तहत किसी भी शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिया जाना आवश्यक है।

    याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया है कि जांच एजेंसी ने इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया और बिना पक्ष सुने ही आगे की कार्रवाई शुरू कर दी। उनका कहना है कि यह निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांत और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के विपरीत है। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से राहत की मांग की है।

    सौरभ शर्मा ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले का भी उल्लेख किया है। मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा गया है कि किसी भी आरोपी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए। याचिका के अनुसार इस मामले में उन्हें ऐसा अवसर नहीं दिया गया, जिससे उनके अधिकार प्रभावित हुए हैं।

    गौरतलब है कि सौरभ शर्मा का नाम उस समय सुर्खियों में आया था जब उनके और उनसे जुड़े ठिकानों पर हुई कार्रवाई के दौरान कथित तौर पर करोड़ों रुपये की संपत्ति और नकदी से जुड़े दस्तावेज सामने आए थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने भी जांच शुरू की थी और कथित मनी लॉन्ड्रिंग के पहलुओं की पड़ताल की जा रही है।

    यह मामला लंबे समय से प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। जांच एजेंसियों की कार्रवाई और उससे जुड़े खुलासों ने इसे हाई प्रोफाइल बना दिया है। अब सौरभ शर्मा द्वारा हाईकोर्ट का रुख किए जाने के बाद इस मामले की कानूनी दिशा पर सबकी नजरें टिक गई हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत में होने वाली सुनवाई से यह स्पष्ट हो सकेगा कि जांच एजेंसियों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया कानूनी मानकों के अनुरूप थी या नहीं। फिलहाल हाईकोर्ट में दायर याचिका के बाद इस बहुचर्चित मामले में नए कानूनी तर्क और बहसें सामने आने की संभावना बढ़ गई है।

    आने वाले दिनों में अदालत का रुख और सुनवाई के दौरान पेश किए जाने वाले पक्ष इस पूरे मामले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। तब तक यह प्रकरण प्रदेश के सबसे चर्चित कानूनी और प्रशासनिक मामलों में बना रहेगा।

  • अयोध्या के बाद MP की अयोध्या में भी मचा था ,हड़कंप रामराजा मंदिर से गायब हुए थे कैश और आभूषण

    अयोध्या के बाद MP की अयोध्या में भी मचा था ,हड़कंप रामराजा मंदिर से गायब हुए थे कैश और आभूषण


    नई दिल्ली । अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी को लेकर देशभर में चल रही चर्चाओं के बीच मध्य प्रदेश का एक पुराना मामला फिर सुर्खियों में आ गया है। यह मामला बुंदेलखंड की अयोध्या कहे जाने वाले ओरछा स्थित रामराजा सरकार मंदिर से जुड़ा है जहां वर्ष 2017 में चंदे की राशि और आभूषणों में कथित गड़बड़ी का मामला सामने आया था। उस समय इस घटना ने प्रदेशभर में हलचल मचा दी थी और मंदिर प्रबंधन पर कई गंभीर सवाल खड़े हुए थे।

    ओरछा का रामराजा सरकार मंदिर मध्य प्रदेश के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। यहां भगवान श्रीराम को राजा के रूप में पूजा जाता है और देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में मंदिर के चढ़ावे और संपत्तियों में कथित अनियमितता की खबर सामने आने के बाद लोगों की धार्मिक भावनाएं भी आहत हुई थीं।

    मामला उस समय का है जब निवाड़ी जिला अस्तित्व में नहीं आया था और ओरछा अविभाजित टीकमगढ़ जिले का हिस्सा था। आरोप लगाए गए कि मंदिर के खातों दान राशि आभूषणों नगद बही खातों स्टॉक रजिस्टर तथा मंदिर की चल और अचल संपत्तियों के प्रबंधन में वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। जांच के दौरान यह भी कहा गया कि मंदिर से नकदी और कुछ आभूषण गायब पाए गए थे।

    इस मामले में मंदिर के तत्कालीन लिपिक मुन्नालाल तिवारी को आरोपी बनाया गया और उनके खिलाफ धोखाधड़ी सहित विभिन्न धाराओं में प्रकरण दर्ज किया गया। हालांकि जांच लंबे समय तक चलती रही लेकिन कथित चंदा चोरी कांड का कोई स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं आ सका। यही कारण रहा कि यह मामला वर्षों तक कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उलझा रहा।

    बाद में मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच प्रक्रिया में हुई देरी पर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि किसी भी नागरिक के सिर पर आपराधिक मुकदमे की तलवार अनिश्चितकाल तक नहीं लटकाई जा सकती। केवल प्रशासनिक कठिनाइयों अधिकारियों के तबादलों सेवानिवृत्ति या दस्तावेज जुटाने में लगने वाला समय जांच को वर्षों तक लंबित रखने का आधार नहीं बन सकता।

    हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अत्यधिक देरी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों को प्राप्त त्वरित और निष्पक्ष न्याय के अधिकार का उल्लंघन है। इसी आधार पर अदालत ने दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया। यह फैसला उस समय काफी चर्चित रहा था क्योंकि अदालत ने जांच एजेंसियों और प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए थे।

    हालांकि राज्य सरकार ने इस फैसले से असहमति जताई थी और बाद में एकलपीठ के निर्णय के खिलाफ अपील करने की तैयारी भी शुरू की थी। ऐसे में यह मामला पूरी तरह समाप्त नहीं माना गया और कानूनी स्तर पर इसकी चर्चा जारी रही।

    अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर उठे ताजा विवाद के बीच ओरछा का यह पुराना मामला एक बार फिर चर्चा में है। दोनों घटनाएं यह सवाल जरूर खड़ा करती हैं कि देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर मिलने वाले चढ़ावे और संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करना कितना आवश्यक है।

  • भोजशाला की पहचान अब स्पष्ट': हाईकोर्ट की बड़ी मुहर, हिंदुओं की आस्था की हुई जीत

    भोजशाला की पहचान अब स्पष्ट': हाईकोर्ट की बड़ी मुहर, हिंदुओं की आस्था की हुई जीत


    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के चर्चित धार भोजशाला विवाद मामले में शुक्रवार को बड़ा फैसला सामने आया। Madhya Pradesh High Court की इंदौर बेंच ने अपने फैसले में भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर माना और हिंदुओं को वहां पूजा करने का अधिकार दिए जाने की बात कही। अदालत ने कहा कि यह स्थान परमार वंश के राजा भोज के समय संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र और देवी सरस्वती का मंदिर था।

    कोर्ट ने कहा कि पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) की रिपोर्ट और वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है। अदालत ने यह भी माना कि पुरातत्व एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है और उसके निष्कर्षों पर भरोसा किया जा सकता है।

    कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
    हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कई अहम बातें कहीं भोजशाला परिसर एक संरक्षित स्मारक है, यह मूल रूप से हिंदू मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र था, हिंदुओं को पूजा का अधिकार है, ASI परिसर का संरक्षण और प्रबंधन जारी रखेगा, सरकार संस्कृत शिक्षा की व्यवस्था पर भी विचार करे ,श्रद्धालुओं के लिए जरूरी सुविधाएं और सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, अदालत ने कहा कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाली संरचनाओं का संरक्षण करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है।

    नमाज की अनुमति वाला आदेश रद्द
    हाईकोर्ट ने वर्ष 2003 में ASI द्वारा दिए गए उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें मुस्लिम पक्ष को भोजशाला परिसर में नमाज की अनुमति दी गई थी। हालांकि अदालत ने मुस्लिम पक्ष को यह छूट दी है कि वे नमाज के लिए धार जिले में अलग जमीन उपलब्ध कराने को लेकर सरकार से संपर्क कर सकते हैं।

    ASI सर्वे और वैज्ञानिक अध्ययन पर भरोसा
    कोर्ट ने साफ कहा कि ASI सर्वे और वैज्ञानिक अध्ययन में मिले तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जज ने सुनवाई के दौरान सभी वकीलों का आभार जताते हुए कहा कि अदालत ने सभी तथ्यों, ASI एक्ट और संविधान के तहत मिले मौलिक अधिकारों को ध्यान में रखकर फैसला दिया है।

    लंबे समय से चल रहा था विवाद
    धार भोजशाला मामला लंबे समय से विवाद और कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा रहा है। हिंदू पक्ष लगातार इसे देवी सरस्वती का मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र बताता रहा, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद मानता था। अब हाईकोर्ट के इस फैसले को इस मामले में एक बड़ा और अहम निर्णय माना जा रहा है। प्रशासन ने फैसले के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है।

  • भोजशाला विवाद पर MP हाईकोर्ट की टिप्पणी चर्चा में, नमाज की अनुमति संबंधी मांग खारिज

    भोजशाला विवाद पर MP हाईकोर्ट की टिप्पणी चर्चा में, नमाज की अनुमति संबंधी मांग खारिज


    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के भोजशाला को लेकर दशकों से चला आ रहा विवाद अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। इंदौर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने हालिया फैसले में भोजशाला को देवी वाग्देवी यानी मां सरस्वती का मंदिर माना है। अदालत ने अपने निर्णय में ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातात्विक साक्ष्यों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की वैज्ञानिक रिपोर्ट को अहम आधार बनाया। फैसले के बाद जहां हिंदू संगठनों में उत्साह का माहौल है, वहीं मुस्लिम पक्ष ने इस पर आपत्ति जताई है।

    करीब 30 वर्षों से भोजशाला विवाद धार्मिक और राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ था। हिंदू पक्ष का दावा रहा कि यह स्थल परमार राजा भोज द्वारा स्थापित मां वाग्देवी का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। दूसरी ओर मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा। प्रशासन ने वर्षों तक संतुलन बनाए रखने के लिए मंगलवार को हिंदू पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम नमाज की व्यवस्था लागू की थी।

    विवाद ने नया मोड़ तब लिया जब वर्ष 2024 में हाईकोर्ट के आदेश पर ASI ने भोजशाला परिसर का 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वे किया। सर्वे के दौरान मिली तस्वीरों और अवशेषों ने पूरे मामले को नई दिशा दे दी। रिपोर्ट में प्राचीन मंदिर स्थापत्य शैली, देवी-देवताओं की आकृतियों वाले स्तंभ, संस्कृत शिलालेख, कमल और हाथी जैसे हिंदू प्रतीक चिन्हों का उल्लेख किया गया। कई स्तंभों पर टूटी मूर्तियों और नक्काशी के प्रमाण भी मिले, जिन्हें हिंदू पक्ष मंदिर के साक्ष्य के रूप में पेश कर रहा है।

    हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐतिहासिक साहित्य और पुरातात्विक रिपोर्ट यह दर्शाती है कि विवादित स्थल का संबंध भोजशाला और देवी सरस्वती की आराधना से रहा है। अदालत ने यह भी माना कि यहां हिंदू पूजा की परंपरा पूरी तरह कभी समाप्त नहीं हुई। कोर्ट ने ASI को परिसर का प्रशासन जारी रखने और केंद्र सरकार को प्रबंधन संबंधी निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।

    फैसले के बाद धार में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। संवेदनशील इलाकों में पुलिस और RAF की तैनाती की गई तथा भोजशाला परिसर के बाहर बैरिकेडिंग की गई। हिंदू संगठनों ने फैसले का स्वागत करते हुए इसे “ऐतिहासिक न्याय” बताया, जबकि मुस्लिम पक्ष ने कहा कि वे कानूनी विकल्पों पर विचार करेंगे।

    यह फैसला केवल एक धार्मिक स्थल का मामला नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और पुरातात्विक साक्ष्यों के बीच लंबे समय से चल रही बहस का महत्वपूर्ण अध्याय बन गया है।

  • मंडला में स्वास्थ्य सिस्टम की पोल खुली, हाईकोर्ट में पहुंचा मामला-प्रसूति वार्ड में फर्श पर लेटती महिलाएं

    मंडला में स्वास्थ्य सिस्टम की पोल खुली, हाईकोर्ट में पहुंचा मामला-प्रसूति वार्ड में फर्श पर लेटती महिलाएं


    नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के Jabalpur स्थित हाईकोर्ट में मंडला जिला अस्पताल की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसने पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि आदिवासी बहुल जिले में चिकित्सा सुविधाएं बेहद कमजोर हैं और मरीजों को बुनियादी इलाज तक नहीं मिल पा रहा है।
    याचिकाकर्ता के अनुसार मंडला जिले की आबादी करीब 10 लाख है, जिसमें अधिकांश लोग ग्रामीण और आदिवासी समुदाय से आते हैं, लेकिन जिला अस्पताल में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। 42 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 17 डॉक्टर ही वर्तमान में तैनात हैं।
    याचिका में यह भी बताया गया है कि कई अहम विशेषज्ञ पद वर्षों से खाली पड़े हैं। कार्डियोलॉजिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट, गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, यूरोलॉजिस्ट और रेडियोलॉजिस्ट जैसे विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुपस्थिति के कारण गंभीर मरीजों को इलाज के लिए जबलपुर या नागपुर रेफर करना पड़ता है। रेडियोलॉजिस्ट न होने से सोनोग्राफी जैसी महत्वपूर्ण सेवाएं भी बाधित हैं, जिससे मरीजों को निजी केंद्रों पर महंगे परीक्षण कराने पड़ते हैं।
    सबसे चिंताजनक स्थिति प्रसूति वार्ड की बताई गई है, जहां बिस्तरों की कमी के कारण गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को फर्श पर लेटने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इसे याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन बताया गया है।
    मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश Sanjeev Sachdeva और न्यायमूर्ति विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार, स्वास्थ्य विभाग और मंडला सीएमएचओ को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब देने का आदेश दिया है। अगली सुनवाई जून में होगी।
    याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि स्थिति सुधारने के लिए कई बार प्रदर्शन और ज्ञापन दिए गए, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
    कोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई है कि प्रसूति वार्ड में तत्काल अतिरिक्त बिस्तरों की व्यवस्था की जाए, विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति समयबद्ध तरीके से हो और स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए। फिलहाल यह मामला न सिर्फ मंडला की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है, बल्कि पूरे राज्य की ग्रामीण स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति को भी उजागर कर रहा है।

  • MP हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: प्रमुख सचिव समेत 3 अधिकारियों पर 25-25 हजार का जमानती वारंट

    MP हाईकोर्ट का बड़ा आदेश: प्रमुख सचिव समेत 3 अधिकारियों पर 25-25 हजार का जमानती वारंट


    नई दिल्ली ।  मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने अवमानना मामले में सख्त रुख अपनाते हुए प्रमुख सचिव सहित तीन अधिकारियों के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया है। मामला रीवा जिला उद्योग केंद्र में पदोन्नति से जुड़ा है, जहां कोर्ट के पहले आदेश के बावजूद पालन नहीं किया गया था।

    मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम सुनवाई में आदेश की अवमानना को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार के प्रमुख सचिव सहित तीन वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ 25-25 हजार रुपये के जमानती वारंट जारी कर दिए हैं। यह कार्रवाई उस मामले में की गई है, जिसमें कोर्ट के पहले आदेश के बावजूद पदोन्नति से जुड़े निर्देशों का पालन नहीं किया गया था।

    यह पूरा मामला रीवा जिला उद्योग केंद्र से जुड़ा है, जहां पदस्थ असिस्टेंट मैनेजर जयप्रकाश तिवारी की पदोन्नति पर निर्णय लंबित था। याचिकाकर्ता का कहना था कि वे मैनेजर पद पर पदोन्नति के लिए पूरी तरह पात्र हैं, लेकिन विभागीय स्तर पर लगातार टालमटोल की जा रही थी।

    कोर्ट के पहले आदेश के बावजूद नहीं हुआ पालन

    इस मामले में हाईकोर्ट ने 4 नवंबर 2024 को स्पष्ट आदेश जारी करते हुए संबंधित विभाग को 90 दिनों के भीतर पदोन्नति पर निर्णय लेने के निर्देश दिए थे। लेकिन तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी आदेश का पालन नहीं किया गया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका दायर की।

    तीन वरिष्ठ अधिकारी बने पक्षकार

    इस अवमानना याचिका में एमएसएमई विभाग के प्रमुख सचिव राघवेन्द्र सिंह, आयुक्त दिलीप कुमार सिंह और जिला उद्योग केंद्र रीवा के जनरल मैनेजर राहुल दुबे को पक्षकार बनाया गया था। अदालत में यह भी सामने आया कि तीनों अधिकारियों को नोटिस विधिवत रूप से तामील कर दिए गए थे, इसके बावजूद वे सुनवाई के दौरान उपस्थित नहीं हुए।

    कोर्ट की नाराजगी और कड़ा रुख

    सुनवाई के दौरान जस्टिस विशाल मिश्रा की सिंगल बेंच ने अधिकारियों की अनुपस्थिति पर नाराजगी जताई और इसे कोर्ट के आदेश की गंभीर अवमानना माना। इसके बाद अदालत ने भोपाल और रीवा के पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिए कि वे संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जारी वारंट को तामील कराएं।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायालय के आदेशों की अनदेखी को किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा। इसी के साथ तीनों अधिकारियों के खिलाफ 25-25 हजार रुपये के जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया गया।

    अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद

    मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद निर्धारित की गई है। इस दौरान अदालत यह भी तय करेगी कि आगे की कार्रवाई क्या होगी। यह मामला एक बार फिर प्रशासनिक लापरवाही और न्यायालय के आदेशों के अनुपालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।