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  • हेडलाइन विकल्प 3: MP में मुफ्त रजिस्ट्री की तैयारी के बीच पटवारियों ने उठाए सवाल ड्रोन सर्वे से लेकर कब्जे तक विवाद हुआ तो फंसेंगे कर्मचारी

    हेडलाइन विकल्प 3: MP में मुफ्त रजिस्ट्री की तैयारी के बीच पटवारियों ने उठाए सवाल ड्रोन सर्वे से लेकर कब्जे तक विवाद हुआ तो फंसेंगे कर्मचारी


    भोपाल। मध्य प्रदेश में आबादी भूमि पर लंबे समय से काबिज लाखों परिवारों को स्वामित्व का अधिकार देने की सरकार की तैयारी के बीच पटवारी संवर्ग ने प्रक्रिया को लेकर आपत्ति जताई है। स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन 2026 योजना के तहत प्रदेश के 48 लाख से ज्यादा परिवारों की मुफ्त रजिस्ट्री कराने की तैयारी है। लेकिन योजना लागू होने से पहले पटवारियों ने रजिस्ट्री दस्तावेज में उन्हें निष्पादक के तौर पर शामिल किए जाने पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पटवारियों का कहना है कि यदि भविष्य में जमीन के स्वामित्व कब्जे या सीमांकन को लेकर विवाद सामने आता है तो व्यक्तिगत कानूनी जिम्मेदारी कर्मचारी पर डालना उचित नहीं होगा।

    पटवारी संवर्ग का तर्क है कि आबादी भूमि का मामला केवल खसरा और नक्शे तक सीमित नहीं है। कई मामलों में वास्तविक कब्जे के साथ वारिसों का दावा सह स्वामित्व चतुर्सीमा पुराने दस्तावेज और न्यायालय में चल रहे विवाद जैसे पहलू भी सामने आ सकते हैं। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति ने भविष्य में जारी किए गए स्वामित्व अभिलेख को चुनौती दी तो दस्तावेज में निष्पादक के तौर पर दर्ज पटवारी भी कानूनी प्रक्रिया में उलझ सकता है। यही वजह है कि पटवारी इस भूमिका को लेकर स्पष्ट व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।

    स्वामित्व योजना में ड्रोन सर्वे की भी अहम भूमिका रही है। गांवों के आबादी क्षेत्रों का ड्रोन सर्वे कर नक्शे और आकृतियां तैयार की गईं। इसके बाद इन अभिलेखों को जमीन की वास्तविक स्थिति से मिलाने का काम स्थानीय स्तर पर किया गया। पटवारियों का कहना है कि उन्होंने गांवों में जाकर चूना डालने से लेकर मकानों और कब्जे की स्थिति दर्ज करने तक कई स्तर पर काम किया। पड़ोसियों के बीच सीमा विवाद होने पर मौके की रिपोर्ट तैयार करना और पुराने राजस्व रिकॉर्ड से नए ड्रोन नक्शे का मिलान करना भी प्रक्रिया का हिस्सा रहा।

    पटवारियों के मुताबिक ड्रोन सर्वे के बाद तैयार नक्शों में कई जगह विसंगतियां सामने आईं। इन्हें सुधारने और अधिकार अभिलेख तैयार कराने में भी पटवारियों ने भूमिका निभाई। अब उनका सवाल है कि यदि मूल सर्वे में कोई गलती रह गई और उसी आधार पर भविष्य में किसी परिवार के स्वामित्व पर विवाद खड़ा हुआ तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी। उनका कहना है कि सहायक और सत्यापनकर्ता की भूमिका निभाने वाले कर्मचारी को रजिस्ट्री का निष्पादक बनाना अलग तरह की कानूनी जिम्मेदारी पैदा कर सकता है।

    पटवारी संवर्ग ने पंजीयन से पहले गांवों में अधिकार अभिलेखों का सार्वजनिक सत्यापन कराने की मांग रखी है। इसके लिए मुनादी कराने के साथ सार्वजनिक सूचना जारी करने और शिविर लगाने का सुझाव दिया गया है। पटवारियों का कहना है कि ग्रामीणों को उनके नाम और संपत्ति से जुड़े अभिलेख देखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को आपत्ति है तो उसे सुधार या दावा पेश करने का समय दिया जाए। आपत्तियों के निराकरण के बाद ही अंतिम रजिस्ट्री की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जानी चाहिए।

    पटवारियों का यह भी कहना है कि दस्तावेज में निष्पादक के रूप में मध्य प्रदेश शासन की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। उनका सुझाव है कि जरूरत के अनुसार ग्राम पंचायत को भी प्रक्रिया में अधिकृत किया जा सकता है जबकि पटवारी को राजस्व रिकॉर्ड और मौके के सत्यापन तक सीमित रखा जाए। उनके अनुसार योजना को जमीन पर उतारने में वे पूरा सहयोग करेंगे लेकिन ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती जिसमें सरकारी प्रक्रिया की भविष्य की व्यक्तिगत कानूनी जिम्मेदारी कर्मचारी पर आ जाए।

    योजना से जुड़े प्रावधानों के मुताबिक निष्पादक या अधिकृत अधिकारी के रूप में तहसीलदार और राजस्व अनुविभागीय अधिकारी की भूमिका तय है। अधिकार अभिलेख पर अंतिम हस्ताक्षर भी तहसीलदार द्वारा किए जाते हैं। वहीं ड्रोन सर्वे और नक्शे तैयार करने की प्रक्रिया में सर्वे ऑफ इंडिया और पंचायत विभाग की भूमिका बताई गई है। पटवारी मौके की स्थिति कब्जे सीमाओं और पुराने राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर रिपोर्ट उपलब्ध करा सकता है।

    पटवारी संवर्ग का कहना है कि उनके पास न्यायिक शक्तियां नहीं हैं। इसलिए स्वामित्व विवादों पर अंतिम निर्णय लेने वाली भूमिका उन्हें देना नियमों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। अब सरकार के सामने चुनौती यह है कि योजना का लाभ लाखों परिवारों तक पहुंचाने के साथ कर्मचारियों की कानूनी जवाबदेही को लेकर उठ रही चिंताओं का भी समाधान किया जाए।

  • पटवारियों की मांगों पर सरकार झुकी, आंदोलन स्थगित; 2026 में विभागीय परीक्षा, FIR से पहले होगी जांच

    पटवारियों की मांगों पर सरकार झुकी, आंदोलन स्थगित; 2026 में विभागीय परीक्षा, FIR से पहले होगी जांच

    भोपाल। मध्यप्रदेश में अपनी विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे पटवारियों ने शासन की ओर से मिले आश्वासन के बाद फिलहाल अपनी हड़ताल स्थगित कर दी है। राजस्व विभाग की ओर से पटवारियों की प्रमुख मांगों पर कार्रवाई शुरू किए जाने के बाद मध्यप्रदेश पटवारी संघ ने राज्य स्तरीय बैठक में आंदोलन को रोकने का फैसला लिया। शासन ने पटवारियों की पदोन्नति से जुड़ी विभागीय नायब तहसीलदार परीक्षा कराने के साथ ही लंबित भुगतान जल्द जारी करने और शिकायतों के मामलों में सीधे कार्रवाई के बजाय पहले प्रारंभिक जांच करने के निर्देश दिए हैं। इससे लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे पटवारियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।

    पटवारियों की पदोन्नति से जुड़ी विभागीय परीक्षा को लेकर भी स्थिति स्पष्ट हो गई है। कर्मचारी चयन मंडल ESB की ओर से वर्ष 2026 में होने वाली विभागीय नायब तहसीलदार परीक्षा की प्रक्रिया तय की गई है। इससे विभाग में काम कर रहे पात्र पटवारियों के लिए पदोन्नति का रास्ता खुल सकेगा। संघ की ओर से लंबे समय से विभागीय परीक्षा कराने की मांग उठाई जा रही थी। शासन की ओर से इस दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने को आंदोलन स्थगित करने के प्रमुख कारणों में माना जा रहा है।

    पटवारियों के खिलाफ शिकायतों और FIR को लेकर भी राजस्व विभाग ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अब किसी पटवारी के खिलाफ शिकायत मिलने पर सीधे कानूनी कार्रवाई करने के बजाय पहले प्रारंभिक जांच की जाएगी। जांच में यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों के तथ्य सही पाए जाते हैं तभी आगे की कार्रवाई की जाएगी। विभाग ने स्पष्ट किया है कि बिना तथ्यों की पुष्टि किए किसी कर्मचारी के खिलाफ सीधे कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। इस फैसले को पटवारियों की लंबे समय से चली आ रही मांगों में एक महत्वपूर्ण राहत माना जा रहा है।
    पटवारियों के खिलाफ शिकायतों और FIR को लेकर भी राजस्व विभाग ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अब किसी पटवारी के खिलाफ शिकायत मिलने पर सीधे कानूनी कार्रवाई करने के बजाय पहले प्रारंभिक जांच की जाएगी। जांच में यदि शिकायत में लगाए गए आरोपों के तथ्य सही पाए जाते हैं तभी आगे की कार्रवाई की जाएगी। विभाग ने स्पष्ट किया है कि बिना तथ्यों की पुष्टि किए किसी कर्मचारी के खिलाफ सीधे कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। इस फैसले को पटवारियों की लंबे समय से चली आ रही मांगों में एक महत्वपूर्ण राहत माना जा रहा है।

    इसके अलावा पटवारियों और राजस्व विभाग के मैदानी कर्मचारियों के लंबित भुगतान को लेकर भी सरकार ने कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं। प्रमुख सचिव राजस्व डॉ. ई. रमेश कुमार ने सभी जिला कलेक्टरों को संबंधित विभागों से समन्वय कर लंबित भुगतान जल्द कराने को कहा है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग और किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग से समन्वय कर अलग अलग योजनाओं में किए गए कार्यों के भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।

    लंबित भुगतान में स्वामित्व योजना से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्य भी शामिल हैं। आबादी भूमि के सर्वे से लेकर अधिकार अभिलेख तैयार करने प्रारंभिक और अंतिम प्रकाशन दावा आपत्ति प्रक्रिया प्रिंटिंग और स्टेशनरी जैसे कामों के लिए लंबित राशि का भुगतान कराया जाना है। इसके अलावा 11वीं कृषि संगणना 2020-21 और छठी लघु सिंचाई गणना 2017-18 से जुड़े कार्यों के लिए भारत सरकार द्वारा निर्धारित मानदेय का भुगतान भी संबंधित गाइडलाइन के अनुसार कराने के निर्देश दिए गए हैं।

    पटवारियों के स्थानांतरण से जुड़े लंबित मामलों का भी प्राथमिकता के आधार पर निराकरण करने का आश्वासन दिया गया है। शासन ने अन्य मांगों पर भी निर्धारित समय सीमा में निर्णय लेने की बात कही है। सरकार की ओर से मांगों पर कार्रवाई शुरू होने के बाद पटवारी संघ ने आंदोलन को फिलहाल स्थगित कर दिया है। अब पटवारियों की नजर शासन की ओर से किए गए आश्वासनों को जमीन पर लागू किए जाने पर रहेगी। यदि तय समय सीमा में मांगों पर कार्रवाई होती है तो इससे प्रदेश के हजारों पटवारियों को राहत मिल सकती है और राजस्व विभाग से जुड़ी सेवाओं पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ने की उम्मीद है।