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  • 50 लाख संपत्तियों की फ्री रजिस्ट्री का महाअभियान किसे मिलेगा लाभ और किन मामलों में अटक सकती है रजिस्ट्री

    50 लाख संपत्तियों की फ्री रजिस्ट्री का महाअभियान किसे मिलेगा लाभ और किन मामलों में अटक सकती है रजिस्ट्री


    भोपाल। मध्य प्रदेश में गांवों में वर्षों से अपने घर और आबादी की जमीन पर रह रहे लाखों परिवारों के लिए 17 सितंबर से एक बड़ा अभियान शुरू हो रहा है। स्वामित्व योजना के तहत प्रदेश में 50 लाख से ज्यादा चयनित संपत्तियों की मुफ्त रजिस्ट्री कराई जाएगी। सरकार का लक्ष्य है कि जिन लोगों के नाम स्वामित्व योजना के रिकॉर्ड में पहले से दर्ज हैं उन्हें अब संपत्ति का पंजीकृत कानूनी दस्तावेज उपलब्ध कराया जाए। सरकार के अनुसार इस प्रक्रिया में हितग्राहियों से स्टांप ड्यूटी और पंजीयन शुल्क नहीं लिया जाएगा।

    इस योजना को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि स्वामित्व योजना में प्रॉपर्टी कार्ड और रजिस्ट्री एक जैसी चीज नहीं हैं। ग्रामीण आबादी की जमीन का सर्वे कर तैयार किए गए अधिकार अभिलेख में संपत्ति पर संबंधित व्यक्ति के अधिकार का रिकॉर्ड दर्ज होता है। अब सरकार इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए चयनित संपत्तियों का पंजीयन कराने जा रही है। यानी पहले से तैयार रिकॉर्ड को पंजीकृत दस्तावेज का रूप दिया जाएगा।

    सरकार ने इसके लिए अलग से बड़े पैमाने पर प्रशासनिक व्यवस्था की है। पंचायत स्तर पर शिविर लगाए जाने की योजना है ताकि लोगों को रजिस्ट्री कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। पंजीयन प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कुछ अधिकारियों को उप-पंजीयक की शक्तियां भी दी गई हैं। सरकार का लक्ष्य इस अभियान के दौरान बड़ी संख्या में संपत्तियों का पंजीयन कम समय में पूरा करना है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक अभियान एक महीने तक चलाया जाएगा और पंजीयन के बाद दस्तावेज डिजिटल माध्यम से भी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।

    इसका फायदा हर व्यक्ति को अपने आप नहीं मिलेगा। अभियान में वही संपत्तियां शामिल हैं जिनके अधिकार अभिलेख स्वामित्व योजना के तहत पहले से तैयार और मंजूर हैं। इसका मतलब यह है कि अगर किसी व्यक्ति का नाम अभी स्वामित्व योजना के तैयार रिकॉर्ड में शामिल नहीं है तो केवल इस अभियान के दौरान आवेदन करके तुरंत मुफ्त रजिस्ट्री कराने की सुविधा नहीं होगी। पहले उसका रिकॉर्ड योजना की प्रक्रिया के तहत तैयार होना जरूरी होगा।

    रजिस्ट्री होने के बाद संपत्ति के मालिक के पास उसका पंजीकृत दस्तावेज होगा। इससे संपत्ति से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड को और मजबूत आधार मिल सकता है। सरकार का कहना है कि पंजीकृत दस्तावेज के आधार पर पात्रता और बैंक की अन्य शर्तें पूरी होने पर संपत्ति के बदले ऋण लेने में भी मदद मिल सकती है। इसके अलावा संपत्ति को कारोबार या स्वरोजगार के लिए इस्तेमाल करने के रास्ते भी आसान हो सकते हैं।

    हालांकि जमीन विवादित होने पर स्थिति अलग हो सकती है। सिर्फ रजिस्ट्री हो जाने से किसी पुराने मालिकाना विवाद का अपने आप अंत नहीं माना जा सकता। यदि किसी संपत्ति पर किसी दूसरे व्यक्ति का दावा है या मामला राजस्व अथवा सिविल कोर्ट में चल रहा है तो उसका कानूनी निपटारा अलग प्रक्रिया से ही होगा। इसलिए रजिस्ट्री को हर तरह के भूमि विवाद का अंतिम समाधान मानना सही नहीं होगा।

    इस अभियान के बीच पटवारियों की आपत्ति भी सामने आई है। पटवारी संघों की चिंता अतिरिक्त जिम्मेदारी और रिकॉर्ड में भविष्य में सामने आने वाली किसी गलती की जवाबदेही को लेकर बताई गई है। उनका सवाल है कि यदि खसरे नक्शे या सर्वे रिकॉर्ड में कोई त्रुटि निकलती है और उसके आधार पर विवाद खड़ा होता है तो जिम्मेदारी किसकी होगी। कुछ पटवारी संगठनों ने इस तरह की जिम्मेदारी के साथ अधिकार भी स्पष्ट करने की मांग की है।

    यह मुद्दा सरकार के स्तर पर भी उठा है। रिपोर्टों के मुताबिक मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अधिकारियों को पटवारियों की आशंकाएं दूर करने के निर्देश दिए हैं। सरकार की ओर से यह कहा गया है कि रजिस्ट्री का काम शासन स्तर से कराया जा रहा है और प्रक्रिया को लेकर अनावश्यक चिंता की जरूरत नहीं है।

    यानी स्वामित्व योजना के तहत शुरू हो रहा यह अभियान उन ग्रामीण परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी संपत्ति पहले से योजना के रिकॉर्ड में दर्ज है। लेकिन किसी नए दावे या पुराने विवाद को केवल मुफ्त रजिस्ट्री के जरिए खत्म नहीं किया जाएगा। ऐसे मामलों में संबंधित राजस्व या न्यायिक प्रक्रिया ही लागू होगी। अब अभियान शुरू होने के साथ यह देखना अहम होगा कि चयनित 50 लाख से ज्यादा संपत्तियों का पंजीयन तय समय में किस तरह पूरा होता है।

  • अब तेजी से होगी 50 लाख हितग्राहियों की रजिस्ट्री एक अधिकारी को रोज 40 रजिस्ट्री का लक्ष्य

    अब तेजी से होगी 50 लाख हितग्राहियों की रजिस्ट्री एक अधिकारी को रोज 40 रजिस्ट्री का लक्ष्य


    भोपाल। मध्य प्रदेश में आबादी की जमीन और मकान पर मालिकाना हक पाने का इंतजार कर रहे लाखों लोगों के लिए बड़ी राहत की खबर है। स्वामित्व योजना के तहत प्रदेश में 50 लाख से ज्यादा हितग्राहियों को जमीन और आवास का कानूनी मालिकाना हक दिलाने की प्रक्रिया 17 सितंबर से शुरू होने जा रही है। खास बात यह है कि हितग्राहियों को रजिस्ट्री के लिए कोई शुल्क नहीं देना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से मुफ्त रजिस्ट्री का अभियान शुरू किया जाएगा। सरकार ने इस काम को तेजी से पूरा करने के लिए अब रजिस्ट्री कराने वाले अधिकारियों की संख्या भी बढ़ा दी है।

    स्वामित्व योजना के तहत पहले करीब 48.80 लाख हितग्राहियों का चयन किया गया था लेकिन अब यह संख्या 50 लाख से अधिक हो गई है। प्रदेश सरकार ने करीब तीन महीने पहले ही इन हितग्राहियों को मुफ्त रजिस्ट्री की सुविधा देने के फैसले को मंजूरी दी थी। अब इसके क्रियान्वयन की तैयारी पूरी कर ली गई है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में लंबे समय से आबादी की जमीन पर रह रहे लोगों को उनके घर और जमीन का वैध मालिकाना हक उपलब्ध कराना है।

    रजिस्ट्री की प्रक्रिया को तेज करने के लिए सरकार ने राजस्व निरीक्षक और प्रभारी राजस्व निरीक्षक के साथ पंचायत समन्वय अधिकारी तथा सहायक विकास विस्तार अधिकारी को भी सब रजिस्ट्रार के अधिकार दे दिए हैं। नए नोटिफिकेशन के मुताबिक राजस्व निरीक्षक और प्रभारी राजस्व निरीक्षक को रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1908 की धारा 6 के तहत उप पंजीयक की शक्तियां दी गई हैं। वे अपने निर्धारित जिले और क्षेत्र में स्वामित्व योजना के पात्र हितग्राहियों की आबादी भूमि की मुफ्त रजिस्ट्री कर सकेंगे।

    इसी तरह पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के पंचायत समन्वय अधिकारी और सहायक विकास विस्तार अधिकारी को उनके पदस्थ जिले के जनपद क्षेत्र में उप पंजीयक के रूप में रजिस्ट्री करने का अधिकार दिया गया है। इससे अलग अलग क्षेत्रों में एक साथ रजिस्ट्री का काम शुरू किया जा सकेगा और लोगों को रजिस्ट्री के लिए लंबी प्रक्रिया या इंतजार से राहत मिलने की उम्मीद है।

    सरकार ने रजिस्ट्री की रफ्तार बढ़ाने के लिए अधिकारियों के सामने लक्ष्य भी तय किया है। अधिकार प्राप्त प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी को रोजाना कम से कम 40 रजिस्ट्री करने का लक्ष्य दिया गया है। रजिस्ट्रीकर्ता के रूप में संबंधित क्षेत्र के हल्का पटवारी का नाम दर्ज रहेगा। इससे बड़ी संख्या में हितग्राहियों की रजिस्ट्री कम समय में पूरी करने की योजना है।

    इससे पहले प्रदेश के सभी तहसीलदारों को भी स्वामित्व योजना के तहत मुफ्त रजिस्ट्री के लिए सब रजिस्ट्रार के अधिकार दिए जा चुके हैं। अब राजस्व और पंचायत विभाग के अन्य अधिकारियों को अधिकार मिलने से रजिस्ट्री कराने वाले अधिकारियों का दायरा और बढ़ गया है।

    हालांकि योजना के इस प्रावधान को लेकर पटवारियों में नाराजगी भी है। प्रदेश के पटवारी इस बात का विरोध कर रहे हैं कि रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी के तौर पर उनका नाम दर्ज किया जा रहा है। उनका कहना है कि भविष्य में रजिस्ट्री से संबंधित कोई कानूनी विवाद सामने आता है तो उनके बचाव की स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। ऐसे में उन्हें अनावश्यक कानूनी प्रक्रिया में उलझना पड़ सकता है। सरकार के सामने अब एक ओर जहां लाखों लोगों को जल्द मालिकाना हक देने की चुनौती है वहीं दूसरी ओर रजिस्ट्री प्रक्रिया से जुड़े कर्मचारियों की आशंकाओं का समाधान करना भी अहम होगा।

  • हेडलाइन विकल्प 3: MP में मुफ्त रजिस्ट्री की तैयारी के बीच पटवारियों ने उठाए सवाल ड्रोन सर्वे से लेकर कब्जे तक विवाद हुआ तो फंसेंगे कर्मचारी

    हेडलाइन विकल्प 3: MP में मुफ्त रजिस्ट्री की तैयारी के बीच पटवारियों ने उठाए सवाल ड्रोन सर्वे से लेकर कब्जे तक विवाद हुआ तो फंसेंगे कर्मचारी


    भोपाल। मध्य प्रदेश में आबादी भूमि पर लंबे समय से काबिज लाखों परिवारों को स्वामित्व का अधिकार देने की सरकार की तैयारी के बीच पटवारी संवर्ग ने प्रक्रिया को लेकर आपत्ति जताई है। स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन 2026 योजना के तहत प्रदेश के 48 लाख से ज्यादा परिवारों की मुफ्त रजिस्ट्री कराने की तैयारी है। लेकिन योजना लागू होने से पहले पटवारियों ने रजिस्ट्री दस्तावेज में उन्हें निष्पादक के तौर पर शामिल किए जाने पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पटवारियों का कहना है कि यदि भविष्य में जमीन के स्वामित्व कब्जे या सीमांकन को लेकर विवाद सामने आता है तो व्यक्तिगत कानूनी जिम्मेदारी कर्मचारी पर डालना उचित नहीं होगा।

    पटवारी संवर्ग का तर्क है कि आबादी भूमि का मामला केवल खसरा और नक्शे तक सीमित नहीं है। कई मामलों में वास्तविक कब्जे के साथ वारिसों का दावा सह स्वामित्व चतुर्सीमा पुराने दस्तावेज और न्यायालय में चल रहे विवाद जैसे पहलू भी सामने आ सकते हैं। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति ने भविष्य में जारी किए गए स्वामित्व अभिलेख को चुनौती दी तो दस्तावेज में निष्पादक के तौर पर दर्ज पटवारी भी कानूनी प्रक्रिया में उलझ सकता है। यही वजह है कि पटवारी इस भूमिका को लेकर स्पष्ट व्यवस्था की मांग कर रहे हैं।

    स्वामित्व योजना में ड्रोन सर्वे की भी अहम भूमिका रही है। गांवों के आबादी क्षेत्रों का ड्रोन सर्वे कर नक्शे और आकृतियां तैयार की गईं। इसके बाद इन अभिलेखों को जमीन की वास्तविक स्थिति से मिलाने का काम स्थानीय स्तर पर किया गया। पटवारियों का कहना है कि उन्होंने गांवों में जाकर चूना डालने से लेकर मकानों और कब्जे की स्थिति दर्ज करने तक कई स्तर पर काम किया। पड़ोसियों के बीच सीमा विवाद होने पर मौके की रिपोर्ट तैयार करना और पुराने राजस्व रिकॉर्ड से नए ड्रोन नक्शे का मिलान करना भी प्रक्रिया का हिस्सा रहा।

    पटवारियों के मुताबिक ड्रोन सर्वे के बाद तैयार नक्शों में कई जगह विसंगतियां सामने आईं। इन्हें सुधारने और अधिकार अभिलेख तैयार कराने में भी पटवारियों ने भूमिका निभाई। अब उनका सवाल है कि यदि मूल सर्वे में कोई गलती रह गई और उसी आधार पर भविष्य में किसी परिवार के स्वामित्व पर विवाद खड़ा हुआ तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी। उनका कहना है कि सहायक और सत्यापनकर्ता की भूमिका निभाने वाले कर्मचारी को रजिस्ट्री का निष्पादक बनाना अलग तरह की कानूनी जिम्मेदारी पैदा कर सकता है।

    पटवारी संवर्ग ने पंजीयन से पहले गांवों में अधिकार अभिलेखों का सार्वजनिक सत्यापन कराने की मांग रखी है। इसके लिए मुनादी कराने के साथ सार्वजनिक सूचना जारी करने और शिविर लगाने का सुझाव दिया गया है। पटवारियों का कहना है कि ग्रामीणों को उनके नाम और संपत्ति से जुड़े अभिलेख देखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को आपत्ति है तो उसे सुधार या दावा पेश करने का समय दिया जाए। आपत्तियों के निराकरण के बाद ही अंतिम रजिस्ट्री की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जानी चाहिए।

    पटवारियों का यह भी कहना है कि दस्तावेज में निष्पादक के रूप में मध्य प्रदेश शासन की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। उनका सुझाव है कि जरूरत के अनुसार ग्राम पंचायत को भी प्रक्रिया में अधिकृत किया जा सकता है जबकि पटवारी को राजस्व रिकॉर्ड और मौके के सत्यापन तक सीमित रखा जाए। उनके अनुसार योजना को जमीन पर उतारने में वे पूरा सहयोग करेंगे लेकिन ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती जिसमें सरकारी प्रक्रिया की भविष्य की व्यक्तिगत कानूनी जिम्मेदारी कर्मचारी पर आ जाए।

    योजना से जुड़े प्रावधानों के मुताबिक निष्पादक या अधिकृत अधिकारी के रूप में तहसीलदार और राजस्व अनुविभागीय अधिकारी की भूमिका तय है। अधिकार अभिलेख पर अंतिम हस्ताक्षर भी तहसीलदार द्वारा किए जाते हैं। वहीं ड्रोन सर्वे और नक्शे तैयार करने की प्रक्रिया में सर्वे ऑफ इंडिया और पंचायत विभाग की भूमिका बताई गई है। पटवारी मौके की स्थिति कब्जे सीमाओं और पुराने राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर रिपोर्ट उपलब्ध करा सकता है।

    पटवारी संवर्ग का कहना है कि उनके पास न्यायिक शक्तियां नहीं हैं। इसलिए स्वामित्व विवादों पर अंतिम निर्णय लेने वाली भूमिका उन्हें देना नियमों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। अब सरकार के सामने चुनौती यह है कि योजना का लाभ लाखों परिवारों तक पहुंचाने के साथ कर्मचारियों की कानूनी जवाबदेही को लेकर उठ रही चिंताओं का भी समाधान किया जाए।