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  • दिलीप कुमार जीते लेकिन अनारकली हार गई 1961 के अवॉर्ड्स में बीना राय ने रचा था इतिहास

    दिलीप कुमार जीते लेकिन अनारकली हार गई 1961 के अवॉर्ड्स में बीना राय ने रचा था इतिहास

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ किरदार ऐसे हैं जो समय की सीमाओं को पार कर अमर हो जाते हैं। ऐसा ही एक किरदार था मुगल ए आजम की अनारकली जिसे मधुबाला ने अपने अभिनय से जीवंत कर दिया था। आज भी जब भारतीय सिनेमा की महान अभिनेत्रियों का जिक्र होता है तो मधुबाला और उनका अनारकली का किरदार सबसे पहले याद किया जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस भूमिका ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई उसी किरदार के लिए वह फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतने से चूक गई थीं।

    साल 1960 हिंदी सिनेमा के लिए स्वर्णिम दौर माना जाता है। इसी वर्ष मुगल ए आजम चौदहवीं का चांद बरसात की रात और कई अन्य शानदार फिल्में रिलीज हुई थीं। इन फिल्मों ने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की बल्कि अभिनय संगीत और कहानी के स्तर पर भी नए मानक स्थापित किए। इनमें मुगल ए आजम सबसे बड़ी और चर्चित फिल्म बनकर उभरी। फिल्म की भव्यता कलाकारों के अभिनय और संगीत ने इसे भारतीय सिनेमा की कालजयी कृति बना दिया।

    फिल्म में सलीम के किरदार में दिलीप कुमार और अनारकली के रूप में मधुबाला की जोड़ी को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। खासतौर पर मधुबाला का अभिनय इतना प्रभावशाली था कि लोगों ने उन्हें अनारकली के रूप में हमेशा के लिए अपने दिलों में बसा लिया। यही कारण था कि 1961 के फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का प्रबल दावेदार माना जा रहा था।

    जब पुरस्कार समारोह का आयोजन हुआ तो मुगल ए आजम को कुल 11 नामांकन मिले। फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार अपने नाम किया और दिलीप कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता चुना गया। लेकिन सबसे बड़ा आश्चर्य उस समय हुआ जब सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के विजेता के नाम की घोषणा की गई। सभी को उम्मीद थी कि यह सम्मान मधुबाला को मिलेगा लेकिन पुरस्कार अभिनेत्री बीना राय के नाम रहा।

    बीना राय को यह सम्मान फिल्म घूंघट में उनके शानदार अभिनय के लिए दिया गया था। उस वर्ष सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री की दौड़ में मधुबाला के अलावा नूतन जैसी प्रतिभाशाली अभिनेत्री भी शामिल थीं लेकिन बीना राय ने सभी को पीछे छोड़ते हुए यह प्रतिष्ठित पुरस्कार अपने नाम कर लिया। यह परिणाम उस दौर में काफी चर्चा का विषय बना था क्योंकि अधिकांश लोग मधुबाला को ही विजेता मान रहे थे।

    बीना राय अपने समय की बेहद लोकप्रिय और सम्मानित अभिनेत्री थीं। उन्होंने कई यादगार फिल्मों में काम किया और अपनी सशक्त अदाकारी से दर्शकों का दिल जीता। वर्ष 1953 में आई फिल्म अनारकली में भी उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई थी और इस किरदार के लिए खूब सराहना बटोरी थी। बाद में ताज महल जैसी फिल्मों में भी उनका अभिनय चर्चा में रहा।

    बीना राय का संबंध कपूर खानदान से भी जुड़ा हुआ था। उन्होंने अभिनेता प्रेमनाथ से विवाह किया था। प्रेमनाथ की बहन कृष्णा राज कपूर थीं जो महान अभिनेता और फिल्मकार राज कपूर की पत्नी थीं। इस रिश्ते से बीना राय कपूर परिवार का हिस्सा बन गई थीं। यही कारण है कि उनका नाम हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित फिल्मी परिवारों से भी जुड़ा रहा।

    1961 का फिल्मफेयर अवॉर्ड समारोह कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुआ। इस समारोह ने यह संदेश दिया कि पुरस्कार केवल लोकप्रियता के आधार पर नहीं बल्कि कलाकारों के अभिनय और काम की गुणवत्ता के आधार पर दिए जाते हैं। यही वजह है कि उस वर्ष मधुबाला जैसी दिग्गज अभिनेत्री भी पुरस्कार से चूक गईं और बीना राय ने अपने शानदार अभिनय के दम पर इतिहास रच दिया।

  • 50 गुना फीस की डिमांड और फिर पलटी बाजी: जब ‘मुगल-ए-आज़म’ के गाने में आया ट्विस्ट

    50 गुना फीस की डिमांड और फिर पलटी बाजी: जब ‘मुगल-ए-आज़म’ के गाने में आया ट्विस्ट


    नई दिल्ली।  भारतीय सिनेमा की सबसे भव्य और ऐतिहासिक फिल्मों में गिनी जाने वाली Mughal-e-Azam सिर्फ अपनी कहानी और भव्य सेट्स के लिए ही नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपी दिलचस्प कहानियों के लिए भी मशहूर है। इस फिल्म के एक खास गाने को लेकर जो घटनाक्रम हुआ, वह आज भी फिल्म इतिहास में एक प्रेरणादायक किस्सा माना जाता है।

    कहा जाता है कि जब फिल्म में तानसेन की तरह एक शास्त्रीय संगीत आधारित गीत को सलीम और अनारकली पर फिल्माया जाना था, तब सवाल उठा कि इस गाने को आखिर गाएगा कौन। संगीत निर्देशक नौशाद और निर्देशक के. आसिफ ने तय किया कि अगर अतीत में तानसेन ने यह परंपरा निभाई थी, तो आज के दौर में उनकी आत्मा को जीवंत करने के लिए सबसे उपयुक्त आवाज उस्ताद Ustad Bade Ghulam Ali Khan की होगी।

    लेकिन जब टीम उस्ताद साहब के पास पहुंची, तो उन्होंने गाने से साफ इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उन्होंने पहले कभी फिल्मी गाना नहीं गाया और न ही आगे गाने का इरादा है। उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

    इसके बाद भी के. आसिफ हार नहीं माने। उन्होंने लगातार उस्ताद साहब को मनाने की कोशिश की। इस बीच उस्ताद बड़े गुलाम अली खान ने एक तरह से मजाक या परीक्षा लेते हुए ऐसी फीस मांगी, जो उस समय के हिसाब से सामान्य गायक की फीस से लगभग 50 गुना ज्यादा थी—यानी करीब 25 हजार रुपये, जबकि उस दौर में गायक 400-500 रुपये लेते थे।

    उम्मीद के विपरीत, के. आसिफ ने इस मांग को तुरंत स्वीकार कर लिया और कहा कि “आप अनमोल हैं, कीमत की बात ही नहीं है।” यह सुनकर उस्ताद साहब भी हैरान रह गए और धीरे-धीरे सहमत हो गए।

    हालांकि कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जब रिकॉर्डिंग की बात आई, तो उस्ताद साहब ने शर्त रख दी कि वह गाना तभी गाएंगे जब उन्हें पूरा सीन दिखाया जाएगा, जिस पर यह गीत फिल्माया जाना है। उस समय सीन पूरी तरह तैयार भी नहीं था।

    के. आसिफ ने तुरंत व्यवस्था की और Mughal-e-Azam के सलीम और अनारकली वाले रोमांटिक दृश्य को विशेष रूप से शूट करवाया। दिलीप कुमार और मधुबाला के बीच फिल्माए गए इस दृश्य को एडिट कर तुरंत उस्ताद साहब को दिखाया गया।

    सीन देखने के बाद उस्ताद साहब प्रभावित हुए और उन्होंने गाना रिकॉर्ड करने के लिए हामी भर दी। इतना ही नहीं, उन्होंने इस गाने को तीन बार रिकॉर्ड किया ताकि सबसे बेहतरीन वर्जन चुना जा सके।

    इस पूरी प्रक्रिया ने साबित किया कि Mughal-e-Azam सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उस दौर की कलात्मक पराकाष्ठा थी, जिसमें संगीत, अभिनय और निर्देशन तीनों का अद्भुत संगम देखने को मिला।

    फिल्म के निर्माण में भी भव्यता का कोई मुकाबला नहीं था। देशभर से कारीगर, ज्वेलरी डिजाइनर, टेलर और कलाकार बुलाए गए थे। विशाल युद्ध दृश्यों के लिए हजारों घोड़े, ऊंट और सैनिकों का इस्तेमाल किया गया, जिससे यह फिल्म भारतीय सिनेमा की सबसे महंगी और भव्य परियोजनाओं में से एक बन गई।

    आज भी जब यह किस्सा दोहराया जाता है, तो यह साफ हो जाता है कि जुनून, सम्मान और कला के प्रति समर्पण ही किसी रचना को अमर बनाता है।