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  • अहोई अष्टमी आज, संतान की लंबी उम्र के लिए माताएं रखेंगी व्रत, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, तारों के दर्शन और व्रत कथा

    अहोई अष्टमी आज, संतान की लंबी उम्र के लिए माताएं रखेंगी व्रत, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, तारों के दर्शन और व्रत कथा

    नई दिल्ली ।अहोई अष्टमी का व्रत आज 1 नवंबर 2026, रविवार को रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में इस पर्व का विशेष धार्मिक महत्व है। यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, तरक्की और सुखी जीवन की कामना के लिए करती हैं। इस दिन महिलाएं सुबह से निर्जला या अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता की विधि-विधान से पूजा करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि सच्चे मन से अहोई माता की आराधना करने और व्रत कथा सुनने से संतान पर देवी की कृपा बनी रहती है।

    करवा चौथ के बाद आने वाला यह त्योहार उत्तर भारत में विशेष रूप से मनाया जाता है। इसे अहोई आठे के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। इस दिन शाम को पूजा करने के बाद तारों को अर्घ्य देने की परंपरा है। कुछ परिवारों में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की भी मान्यता है।

    पंचांग के अनुसार, इस वर्ष अष्टमी तिथि 1 नवंबर को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 2 नवंबर को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि और शाम की पूजा परंपरा को ध्यान में रखते हुए व्रत 1 नवंबर को रखा जा रहा है। पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 36 मिनट से 6 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। तारों के दर्शन का समय शाम करीब 6 बजे बताया गया है, जबकि चंद्रोदय रात करीब 11 बजकर 40 मिनट पर होगा। ये समय दिल्ली के पंचांग के अनुसार हैं। अलग-अलग शहरों में सूर्यास्त और चंद्रोदय के समय में अंतर हो सकता है।

    अहोई अष्टमी के दिन पूजा के लिए अहोई माता का चित्र या पोस्टर, रोली, अक्षत, हल्दी, फूल, माला, दीपक, घी, अगरबत्ती, जल से भरा कलश, दूध, फल और मिठाई की व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा हलवा, पूरी, पुए, गेहूं और सरई की सात सींकें भी पूजा सामग्री में शामिल की जाती हैं। पूजा के लिए चौकी और लाल कपड़े का इस्तेमाल किया जाता है।

    व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करके संतान की खुशहाली के लिए व्रत का संकल्प लेती हैं। शाम को पूजा स्थल की सफाई करके चौकी पर लाल कपड़ा बिछाया जाता है और अहोई माता का चित्र स्थापित किया जाता है। कुछ घरों में दीवार पर भी माता का चित्र बनाने की परंपरा है। इसके बाद माता को रोली, अक्षत, हल्दी, फूल और माला अर्पित की जाती है। दीपक जलाकर धूप-अगरबत्ती दिखाई जाती है और फल-मिठाई का भोग लगाया जाता है।

    पूजा के दौरान अहोई अष्टमी की व्रत कथा पढ़ी या सुनी जाती है। इसके बाद माता की आरती करके संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है। शाम को तारे दिखाई देने पर उन्हें जल से अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत का पारण किया जाता है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता को मां पार्वती का स्वरूप माना जाता है। उन्हें संतान की रक्षा और परिवार की खुशहाली करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। पहले यह व्रत मुख्य रूप से पुत्र की लंबी उम्र के लिए रखा जाता था, लेकिन अब माताएं बेटे और बेटी दोनों के अच्छे स्वास्थ्य और सुखद भविष्य की कामना से यह व्रत करती हैं। इस पर्व का संबंध मथुरा के राधा कुंड से भी माना जाता है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले कई दंपति इस दिन राधा कुंड में स्नान और पूजा करते हैं।

    अहोई अष्टमी की प्रचलित कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात बेटे, सात बहुएं और एक बेटी थी। दीपावली से पहले घर की साफ-सफाई के लिए उसकी बहुएं और बेटी जंगल में मिट्टी लेने गईं। मिट्टी खोदते समय साहूकार की बेटी की कुदाल से अनजाने में एक सेह के बच्चे की मृत्यु हो गई। अपने बच्चे को खोने से दुखी सेह ने साहूकार की बेटी को श्राप देने का निश्चय किया। छोटी बहू ने अपनी ननद को बचाने के लिए श्राप स्वयं लेने की बात कही। इसके बाद उसे संतान से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

    कथा के अनुसार, छोटी बहू ने एक पंडित की सलाह पर गौ माता की सेवा शुरू की। उसकी श्रद्धा और भक्ति से प्रसन्न होकर गौ माता ने उसकी सहायता की। बाद में सेह भी उसकी भक्ति से प्रसन्न हुई और उसने श्राप वापस ले लिया। इसके बाद छोटी बहू के जीवन में खुशियां लौट आईं। मान्यता है कि इसी घटना के बाद संतान की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए अहोई माता का व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई।

  • दशहरा 2026 आज, विजयादशमी पर जानें पर्व का महत्व, शुभ मुहूर्त और अपनों को बधाई देने के खास संदेश

    दशहरा 2026 आज, विजयादशमी पर जानें पर्व का महत्व, शुभ मुहूर्त और अपनों को बधाई देने के खास संदेश

    नई दिल्ली । दशहरा और विजयादशमी का पर्व मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जा रहा है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर देशभर में लोग भगवान श्रीराम की पूजा-अर्चना करते हैं और रावण दहन के माध्यम से बुराइयों के अंत का संदेश देते हैं। दशहरा केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा पर्व नहीं है, बल्कि यह सत्य, साहस, सदाचार और सकारात्मक सोच के साथ जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है।

    विजयादशमी के अवसर पर परिवार, दोस्तों और प्रियजनों को शुभकामनाएं देने की परंपरा भी खास महत्व रखती है। लोग इस दिन संदेशों, प्रेरणादायक विचारों और सामाजिक माध्यमों पर साझा किए जाने वाले स्टेटस के जरिए एक-दूसरे को पर्व की बधाई देते हैं। शुभकामना संदेशों में सुख, शांति, समृद्धि, सफलता और खुशहाली की कामना प्रमुख रूप से शामिल रहती है।

    दशहरा हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इसी दिन भगवान श्रीराम ने लंका के राजा रावण का वध किया था। इस घटना को अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में याद किया जाता है। वहीं, कुछ परंपराओं में विजयादशमी को देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी जोड़कर देखा जाता है। इस तरह यह पर्व अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं के माध्यम से शक्ति, धर्म और सत्य की स्थापना का संदेश देता है।

    दशहरे पर रावण दहन की परंपरा इस पर्व का प्रमुख आकर्षण है। रावण के दस सिरों को प्रतीकात्मक रूप से मनुष्य के भीतर मौजूद नकारात्मक प्रवृत्तियों से जोड़ा जाता है। इनमें अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, घृणा, भय और वासना जैसी बुराइयां शामिल हैं। रावण दहन के जरिए लोगों को यह संदेश दिया जाता है कि जीवन में केवल बाहरी बुराइयों का विरोध करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपनी गलत आदतों और नकारात्मक विचारों को दूर करने का प्रयास भी जरूरी है।

    20 अक्टूबर को दशहरा पूजा के लिए बताए गए प्रमुख शुभ समय में विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक निर्धारित बताया गया है। वहीं, प्रदोष काल शाम 5 बजकर 47 मिनट से शुरू होगा। इसी समय को ध्यान में रखते हुए रावण दहन शाम 5 बजकर 47 मिनट के बाद करने का उल्लेख है। हालांकि, पूजा और अन्य धार्मिक कार्यों के लिए स्थानीय पंचांग तथा क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार समय की पुष्टि करना उचित माना जाता है।

    दशहरे पर भेजे जाने वाले शुभकामना संदेशों में भगवान श्रीराम की कृपा, परिवार की खुशहाली और जीवन में सफलता की कामना की जाती है। लोग अपने प्रियजनों को संदेश भेजकर उनके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बने रहने की प्रार्थना करते हैं। कुछ संदेश जीवन की चुनौतियों का सामना करने, कठिन परिस्थितियों में साहस बनाए रखने और सत्य का साथ देने की प्रेरणा देते हैं।

    प्रेरणादायक विचारों में यह संदेश प्रमुख है कि बुराई चाहे कितनी भी प्रभावशाली क्यों न दिखाई दे, अंततः अच्छाई का महत्व बना रहता है। विजयादशमी लोगों को अपने व्यवहार में प्रेम, सद्भाव और सकारात्मकता अपनाने की सीख भी देती है। इस अवसर पर अहंकार और नफरत छोड़कर आपसी सम्मान तथा विश्वास को मजबूत करने का संकल्प लिया जा सकता है।

    WhatsApp स्टेटस के जरिए भी लोग दशहरा की शुभकामनाएं साझा करते हैं। जय श्रीराम, सत्य की जीत और असत्य के अंत जैसे संदेश इस अवसर पर विशेष रूप से प्रासंगिक रहते हैं। इन संदेशों का उद्देश्य पर्व की भावना को अपनों तक पहुंचाना और जीवन में अच्छे विचारों को अपनाने के लिए प्रेरित करना है।

    दशहरा 2026 का पर्व धार्मिक आस्था के साथ आत्ममंथन का अवसर भी प्रदान करता है। भगवान श्रीराम की विजय और रावण दहन की परंपरा लोगों को याद दिलाती है कि सत्य, संयम और सदाचार का रास्ता जीवन में महत्वपूर्ण है। विजयादशमी पर एक-दूसरे को शुभकामनाएं देने के साथ अपनी बुराइयों को दूर करने और सकारात्मक बदलाव की शुरुआत करने का संकल्प इस त्योहार के संदेश को सार्थक बना सकता है।

  • दशहरा 2026 कब मनाया जाएगा, 20 या 21 अक्टूबर? जानें विजयादशमी की सही तारीख, दिल्ली में पूजा का शुभ मुहूर्त और रावण दहन का समय

    दशहरा 2026 कब मनाया जाएगा, 20 या 21 अक्टूबर? जानें विजयादशमी की सही तारीख, दिल्ली में पूजा का शुभ मुहूर्त और रावण दहन का समय


    नई दिल्ली ।
    दशहरा यानी विजयादशमी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है। साल 2026 में दशहरे की तारीख को लेकर लोगों के बीच असमंजस बना हुआ है। कुछ लोग 20 अक्टूबर को त्योहार मनाने की तैयारी कर रहे हैं, जबकि कुछ स्थानों पर 21 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। इसकी वजह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि का दो दिनों तक रहना है। उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में दशहरा 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा, जबकि पश्चिम बंगाल में स्थानीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार 21 अक्टूबर को विजयादशमी का उत्सव होगा।

    हिंदू पंचांग के अनुसार, नई दिल्ली में दशमी तिथि 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर शुरू होगी और 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट पर समाप्त होगी। इसी वजह से अलग-अलग क्षेत्रों में त्योहार मनाने की तारीख में अंतर देखने को मिल रहा है। दिल्ली और उत्तर भारत के कई हिस्सों में 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। वहीं, पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की परंपराओं के अनुसार 21 अक्टूबर को मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाएगा। इस अवसर पर सिंदूर खेला जैसी पारंपरिक रस्में भी निभाई जाती हैं।

    विजयादशमी 2026 का शुभ मुहूर्त
    दशहरे के दिन विजय मुहूर्त में पूजा करना शुभ माना जाता है। इस दौरान लोग अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार भगवान श्रीराम, मां दुर्गा और शस्त्रों की पूजा करते हैं। नई दिल्ली में 20 अक्टूबर को विजय मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में पूजा और अन्य शुभ कार्य किए जा सकते हैं।

    वहीं, अपराह्न पूजा का समय दोपहर 1 बजकर 19 मिनट से 3 बजकर 37 मिनट तक बताया गया है। अलग-अलग शहरों में सूर्योदय, सूर्यास्त और स्थानीय पंचांग के आधार पर मुहूर्त में अंतर हो सकता है। इसलिए पूजा करने से पहले अपने क्षेत्र के पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।

    दशहरे पर रावण दहन कब होगा?
    उत्तर भारत में दशहरे के अवसर पर 20 अक्टूबर की शाम को रामलीला के समापन के बाद रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाएगा। इस परंपरा को बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। आमतौर पर रावण दहन सूर्यास्त के बाद किया जाता है, लेकिन इसके लिए पूरे देश में एक समान समय निर्धारित नहीं है।

    अलग-अलग शहरों में रामलीला समितियां और स्थानीय आयोजक अपने कार्यक्रम के अनुसार रावण दहन का समय तय करते हैं। ऐसे में आयोजन में शामिल होने वाले लोगों को अपने शहर की रामलीला या संबंधित समिति से समय की जानकारी लेनी चाहिए।

    क्यों मनाया जाता है दशहरा?

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विजयादशमी के दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था और माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया था। इसी विजय की स्मृति में दशहरे पर रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है। यह पर्व लोगों को सत्य, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

    दशहरे का संबंध मां दुर्गा और महिषासुर के युद्ध से भी है। मान्यता है कि मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर उसके अत्याचारों से संसार को मुक्ति दिलाई थी। इसी कारण विजयादशमी को शक्ति, साहस और अन्याय पर विजय का प्रतीक भी माना जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इस पर्व को स्थानीय रीति-रिवाजों और धार्मिक परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है।

    शस्त्र पूजन और शमी पूजा का महत्व

    दशहरे पर शस्त्र पूजन और शमी वृक्ष की पूजा करने की परंपरा भी प्रचलित है। कई जगहों पर लोग अपने वाहनों, औजारों, मशीनों और कामकाज में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की पूजा करते हैं। व्यापारी वर्ग इस दिन बही-खातों और कारोबार से जुड़ी वस्तुओं का पूजन करता है।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, विजयादशमी पर शुभ कार्यों की शुरुआत करना सफलता और समृद्धि की कामना से जुड़ा है। हालांकि, पूजा की विधि, मुहूर्त और त्योहार मनाने के तरीके अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित परंपराओं के अनुसार बदल सकते हैं। इसलिए दशहरे की तैयारी करते समय स्थानीय पंचांग और क्षेत्रीय रीति-रिवाजों का ध्यान रखना चाहिए।

  • शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू, पहले दिन घटस्थापना के लिए जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और जरूरी सामग्री

    शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू, पहले दिन घटस्थापना के लिए जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और जरूरी सामग्री

    नई दिल्ली ।शारदीय नवरात्रि का पर्व 11 अक्टूबर, रविवार से शुरू होगा। नौ दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक उत्सव में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान घर में सुख-समृद्धि, शांति और खुशहाली की कामना की जाती है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना या कलश स्थापना के साथ पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों की शुरुआत होती है। इस दिन विधि-विधान से कलश स्थापित करने की परंपरा है।

    घटस्थापना के लिए सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालु इन समयावधियों को ध्यान में रखकर पूजा की तैयारी कर सकते हैं। कलश स्थापना नवरात्रि की शुरुआत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। इसके बाद भक्त मां दुर्गा की आराधना करते हुए नौ दिनों तक पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

    कलश स्थापना से पहले पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री एकत्र कर लेनी चाहिए। इसके लिए चौड़े मुंह वाला मिट्टी का पात्र, साफ मिट्टी, जौ, कलश, गंगाजल, शुद्ध पानी, सिक्का, सुपारी, साबुत चावल यानी अक्षत, दूर्वा, रोली और कलावा की जरूरत होती है। इसके साथ ही आम या अशोक के पांच अथवा सात पत्ते और पानी वाला नारियल भी रखना चाहिए। पूजा के लिए लाल कपड़ा या चुनरी, फूल, फल, पान, इलायची, लौंग, घी का दीपक, मिठाई और बताशे भी उपयोगी सामग्री हैं।

    नवरात्रि के पहले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं। इस चौकी पर मां दुर्गा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। फिर पूजा स्थल पर गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें। इसके बाद माता रानी को फूल, चुनरी और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें। पूजा शुरू करने से पहले सभी आवश्यक सामग्री व्यवस्थित रखना सुविधाजनक होता है।

    घटस्थापना की प्रक्रिया में सबसे पहले मिट्टी के पात्र में साफ मिट्टी डालकर जौ बोए जाते हैं। इसके ऊपर मिट्टी की हल्की परत डालें और थोड़ा पानी छिड़कें। इसके बाद इस पात्र को पूजा स्थल पर रख दें। नवरात्रि के नौ दिनों तक जौ में थोड़ा-थोड़ा पानी डालते रहना चाहिए, ताकि उनमें अंकुर निकल सकें। धार्मिक परंपरा में जौ बोने को समृद्धि और अच्छी फसल के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसे नई शुरुआत और खुशहाली से भी जोड़ा जाता है।

    इसके बाद कलश पर कलावा बांधें और उसमें गंगाजल तथा साफ पानी भरें। कलश में साबुत सुपारी, सिक्का, अक्षत और हल्दी की गांठ जैसी शुभ वस्तुएं रखी जा सकती हैं। फिर कलश के मुख पर आम या अशोक के पांच अथवा सात पत्ते सजाएं और उसके ऊपर नारियल स्थापित करें। तैयार कलश को जौ वाले पात्र के पास रखें। इसके बाद मां दुर्गा के सामने घी का दीपक जलाएं और धूप, फूल, फल तथा मिठाई अर्पित करें। अंत में मां दुर्गा के मंत्रों का जाप कर आरती करें।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में बोए गए जौ का अच्छी तरह अंकुरित होना शुभ संकेत माना जाता है। जौ को समृद्धि और अच्छी फसल से जोड़ने की परंपरा के चलते घटस्थापना के दौरान इन्हें विशेष महत्व दिया जाता है। इस प्रकार कलश स्थापना, जौ बोने और मां दुर्गा की पूजा के साथ नवरात्रि के नौ दिवसीय पर्व का आरंभ होता है।

  • सावन के अंतिम सोमवार पर नाग पंचमी का दुर्लभ संयोग, 17 अगस्त को इस शुभ मुहूर्त में होगी पूजा

    सावन के अंतिम सोमवार पर नाग पंचमी का दुर्लभ संयोग, 17 अगस्त को इस शुभ मुहूर्त में होगी पूजा

    नई दिल्ली : सनातन परंपरा में सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का विशेष महत्व माना गया है। इस वर्ष नाग पंचमी का पावन पर्व 17 अगस्त को बेहद शुभ संयोग में मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार पंचमी तिथि का प्रारंभ 16 अगस्त की शाम से हो रहा है, लेकिन शास्त्रों में उदयातिथि की मान्यता के कारण यह पर्व 17 अगस्त को ही देशभर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा।

    धार्मिक विद्वानों के अनुसार इस बार नाग पंचमी पर सावन सोमवार का विशेष संयोग बन रहा है, जिससे इस दिन का आध्यात्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार नाग देवता भगवान शिव के अत्यंत प्रिय हैं और उनके गले का आभूषण हैं। यही कारण है कि इस दिन शिवजी के साथ-साथ नाग देव की उपासना करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और साधक को भय से मुक्ति मिलती है।

    इस साल पूजन के लिए सुबह का समय अत्यंत फलदायी बताया गया है। 17 अगस्त की सुबह 5 बजकर 51 मिनट से 8 बजकर 29 मिनट तक पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त रहेगा। इस अवधि में श्रद्धालु शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर स्थापित नाग देव का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, रोली, अक्षत और पुष्प अर्पित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सकते हैं।

    धार्मिक ग्रंथों और भविष्य पुराण में नाग पंचमी के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इस तिथि पर नाग लोक में विशेष उत्सव मनाया जाता है, इसलिए पृथ्वी लोक पर भी नाग देव की पूजा का विधान है। महाभारतकालीन राजा जनमेजय के नाग यज्ञ और आस्तिक मुनि द्वारा नागों की रक्षा की कथा भी इस पर्व से गहराई से जुड़ी हुई है, जो जीवों के प्रति दया और संरक्षण का संदेश देती है।

    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिनकी कुंडली में कालसर्प दोष या राहु-केतु से जुड़े कष्ट होते हैं, उनके लिए इस दिन पूजा-पाठ और दान करना विशेष लाभप्रद माना जाता है। उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में, जिनमें मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य शामिल हैं, घर के मुख्य द्वार पर गोबर से नाग देव की आकृति बनाकर पूजन करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि धार्मिक आस्था के साथ-साथ व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना भी आवश्यक है। कई स्थानों पर जीवित सर्पों को दूध पिलाने का प्रयास किया जाता है, जो वैज्ञानिक रूप से अनुचित है। इसलिए श्रद्धालुओं को सलाह दी जाती है कि वे किसी जीव को कष्ट दिए बिना केवल मंदिर में स्थापित प्रतिमा या चित्र की ही शास्त्रीय विधि से पूजा करें।

  • रक्षाबंधन 2026 पर नहीं रहेगा भद्रा का साया, जानिए राखी बांधने का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

    रक्षाबंधन 2026 पर नहीं रहेगा भद्रा का साया, जानिए राखी बांधने का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

    नई दिल्ली । रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक माना जाता है। सावन मास की पूर्णिमा पर मनाए जाने वाले इस त्योहार में बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधकर उनकी सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करती हैं। वहीं भाई भी बहन की सुरक्षा और हर परिस्थिति में साथ देने का संकल्प लेते हैं। वर्ष 2026 में रक्षाबंधन की तारीख और राखी बांधने के शुभ समय को लेकर लोगों के बीच विशेष उत्सुकता बनी हुई है।

    ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस वर्ष श्रावण पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त 2026 को सुबह 9 बजकर 8 मिनट से शुरू होगी और 28 अगस्त की सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगी। उदयकाल में पूर्णिमा तिथि होने के कारण रक्षाबंधन का त्योहार 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। ऐसे में बहनों को 28 अगस्त को ही भाई की कलाई पर राखी बांधनी चाहिए।

    रक्षाबंधन 2026 की सबसे खास बात यह है कि इस बार राखी बांधने के समय भद्रा का प्रभाव नहीं रहेगा। धार्मिक मान्यताओं में भद्रा काल को शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता है और इसी वजह से रक्षाबंधन पर राखी बांधने के समय भद्रा की स्थिति का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस बार भद्रा 28 अगस्त को सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाएगी।

    राखी बांधने के लिए इस वर्ष सुबह 5 बजकर 57 मिनट से सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक का समय शुभ बताया गया है। इस अवधि में बहनें भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांध सकती हैं। इस शुभ मुहूर्त की कुल अवधि 3 घंटे 51 मिनट रहेगी। भद्रा समाप्त होने के कारण इस अवधि में राखी बांधने को लेकर कोई भद्रा बाधा नहीं बताई गई है।

    हालांकि, रक्षाबंधन के दिन राहुकाल का भी ध्यान रखना जरूरी होगा। 28 अगस्त को राहुकाल सुबह 10 बजकर 46 मिनट से दोपहर 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगा। इसलिए शुभ कार्य करने वाले परिवार इस अवधि में राखी बांधने से बच सकते हैं। राखी बांधने की योजना बनाते समय शुभ मुहूर्त और राहुकाल दोनों को ध्यान में रखना बेहतर रहेगा।

    रक्षाबंधन की पूजा के लिए राखी की थाली को भी विधि-विधान से तैयार किया जाता है। थाली में राखी के साथ रोली, अक्षत यानी चावल, दीपक और मिठाई रखी जाती है। सबसे पहले भाई को आसन पर बैठाकर उनके मस्तक पर रोली से तिलक लगाया जाता है और अक्षत अर्पित किए जाते हैं।

    इसके बाद भाई की आरती उतारकर उनकी दाईं कलाई पर राखी बांधी जाती है। राखी बांधने के बाद भाई को मिठाई खिलाई जाती है। बहन अपने भाई की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करती है। भाई भी बहन को उपहार देकर उसके प्रति अपने स्नेह और जिम्मेदारी का भाव प्रकट करता है।

    इस तरह वर्ष 2026 में रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त को मनाया जाएगा। सुबह 5 बजकर 57 मिनट से 9 बजकर 48 मिनट तक राखी बांधने का शुभ समय रहेगा और इस दौरान भद्रा का प्रभाव नहीं होगा। परिवार शुभ मुहूर्त को ध्यान में रखकर भाई-बहन के इस खास पर्व को विधि-विधान और उल्लास के साथ मना सकते हैं।

  • हरियाली तीज 2026 की तिथि को लेकर दूर हुआ भ्रम, 15 अगस्त को रखा जाएगा व्रत और होगी शिव-पार्वती की पूजा

    हरियाली तीज 2026 की तिथि को लेकर दूर हुआ भ्रम, 15 अगस्त को रखा जाएगा व्रत और होगी शिव-पार्वती की पूजा

    नई दिल्ली । सावन मास के प्रमुख पर्वों में शामिल हरियाली तीज वर्ष 2026 में 15 अगस्त, शनिवार को मनाई जाएगी। इस पर्व को लेकर तृतीया तिथि दो दिनों में पड़ने के कारण कई लोगों के मन में भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। हालांकि हिंदू पंचांग के अनुसार उदया तिथि के आधार पर 15 अगस्त को ही हरियाली तीज का व्रत और पूजा करना शास्त्रसम्मत माना गया है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करेंगी, जबकि अविवाहित कन्याएं योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं।

    पंचांग के अनुसार सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 14 अगस्त 2026 को शाम 6 बजकर 46 मिनट पर आरंभ होगी और 15 अगस्त 2026 को शाम 5 बजकर 28 मिनट पर समाप्त होगी। चूंकि 15 अगस्त को सूर्योदय के समय तृतीया तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए उदया तिथि के नियम के अनुसार इसी दिन हरियाली तीज का पर्व मनाया जाएगा। सनातन परंपरा में अधिकांश व्रत और त्योहार सूर्योदय के समय प्रभावी तिथि के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं, इसलिए इस वर्ष भी 15 अगस्त की तिथि को अंतिम मान्यता प्राप्त है।

    हरियाली तीज के दिन कई शुभ योग और पूजा के अनुकूल मुहूर्त भी बन रहे हैं। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 50 मिनट से 5 बजकर 35 मिनट तक रहेगा, जिसे पूजा और साधना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 17 मिनट से 1 बजकर 8 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 51 मिनट से 3 बजकर 42 मिनट तक, गोधूलि मुहूर्त शाम 7 बजकर 6 मिनट से 7 बजकर 29 मिनट तक तथा अमृत काल रात 8 बजकर 18 मिनट से 9 बजकर 53 मिनट तक रहेगा। इन शुभ समयों में भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करना विशेष फलदायी माना गया है।

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हरियाली तीज का व्रत अत्यंत कठिन और पुण्यदायी माना जाता है। व्रत रखने वाली महिलाएं प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ एवं पारंपरिक वस्त्र धारण करती हैं। सामान्यतः हरे और लाल रंग को इस पर्व के लिए शुभ माना जाता है, जबकि काले, सफेद और भूरे रंग के वस्त्र पहनने से बचने की परंपरा है। पूजा के दौरान शिव-पार्वती का विधिवत पूजन, सुहाग सामग्री का अर्पण, कथा श्रवण और व्रत का संकल्प किया जाता है। कई परंपराओं में निर्जला व्रत का भी विधान बताया गया है और निर्धारित समय से पहले व्रत का पारण नहीं किया जाता।

    हरियाली तीज केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, पारिवारिक परंपराओं और सामाजिक संबंधों का भी महत्वपूर्ण पर्व है। इस अवसर पर विवाहित महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं, झूला झूलती हैं और सावन के पारंपरिक गीत गाकर उत्सव मनाती हैं। कई क्षेत्रों में मायके से विवाहित बेटियों के लिए सिंधारा भेजने की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसे स्नेह, सम्मान और पारिवारिक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है।

    धार्मिक मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप किया था और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया। इसी कारण हरियाली तीज का व्रत वैवाहिक सुख, प्रेम, समृद्धि और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धा, नियम और विधि-विधान के साथ किया गया यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है तथा सावन मास के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में इसकी विशेष धार्मिक मान्यता है।

  • रक्षाबंधन 2026 की तिथि को लेकर दूर हुआ भ्रम, 28 अगस्त को शुभ मुहूर्त में मनाया जाएगा भाई-बहन का पावन पर्व

    रक्षाबंधन 2026 की तिथि को लेकर दूर हुआ भ्रम, 28 अगस्त को शुभ मुहूर्त में मनाया जाएगा भाई-बहन का पावन पर्व

    नई दिल्ली । भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और आजीवन सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक रक्षाबंधन का पर्व वर्ष 2026 में 28 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा। सावन पूर्णिमा पर मनाए जाने वाले इस महत्वपूर्ण सनातन पर्व को लेकर इस बार तिथि और भद्रा काल के कारण लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बनी हुई थी। हालांकि पंचांग के अनुसार उदया तिथि के आधार पर 28 अगस्त को ही रक्षाबंधन मनाना शास्त्रसम्मत और शुभ माना गया है। यही कारण है कि ज्योतिषाचार्य और धर्माचार्य भी इसी दिन पर्व मनाने की सलाह दे रहे हैं।

    हिंदू पंचांग के अनुसार सावन पूर्णिमा तिथि का आरंभ 27 अगस्त को सुबह 9 बजकर 9 मिनट पर होगा और इसका समापन 28 अगस्त को सुबह 9 बजकर 49 मिनट पर होगा। चूंकि 28 अगस्त को सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए धार्मिक परंपरा के अनुसार इसी दिन रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा। सनातन धर्म में अधिकांश प्रमुख पर्व उदया तिथि के आधार पर निर्धारित किए जाते हैं, इसलिए इस वर्ष भी 28 अगस्त को ही मान्यता दी गई है।

    रक्षाबंधन पर शुभ मुहूर्त में राखी बांधने का विशेष महत्व माना जाता है। पंचांग के अनुसार बहनें 28 अगस्त को सुबह 5 बजकर 57 मिनट से सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांध सकती हैं। यह अवधि अत्यंत शुभ मानी गई है। इस दौरान पूजा-अर्चना, तिलक, आरती और रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा का पालन करना मंगलकारी माना जाता है। जो लोग किसी कारणवश इस समय में राखी नहीं बांध पाते, उनके लिए अभिजीत मुहूर्त भी उपलब्ध रहेगा। अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 56 मिनट से दोपहर 12 बजकर 48 मिनट तक रहेगा, जिसे भी शुभ कार्यों के लिए अनुकूल माना जाता है।

    रक्षाबंधन पर भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है, क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा के दौरान रक्षा सूत्र बांधना उचित नहीं माना जाता। वर्ष 2026 में 27 अगस्त को सुबह 9 बजकर 8 मिनट से रात 9 बजकर 32 मिनट तक भद्रा का प्रभाव रहेगा। यही कारण है कि इस दिन राखी बांधने से बचने की सलाह दी जाती है। राहत की बात यह है कि 28 अगस्त को भद्रा का प्रभाव समाप्त हो चुका होगा, जिससे पूरे विधि-विधान और शुभ मुहूर्त में रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा सकेगा।

    रक्षाबंधन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में पारिवारिक मूल्यों, विश्वास और स्नेह का भी प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनके सुख, समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती हैं। बदले में भाई अपनी बहनों की हर परिस्थिति में रक्षा करने और जीवनभर साथ निभाने का संकल्प लेते हैं। यही भावनात्मक रिश्ता इस पर्व को भारतीय समाज में विशेष महत्व प्रदान करता है।

    रक्षाबंधन से जुड़ी कई धार्मिक और ऐतिहासिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध प्रसंग महाभारत काल का माना जाता है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की उंगली घायल होने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। द्रौपदी के इस स्नेह और समर्पण से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उनकी रक्षा का वचन दिया और बाद में संकट की घड़ी में उस वचन को निभाया। यही प्रसंग भाई-बहन के अटूट विश्वास, प्रेम और सुरक्षा के भाव का प्रतीक माना जाता है। इसी संदेश के साथ रक्षाबंधन का पर्व आज भी पूरे देश में श्रद्धा, उल्लास और पारिवारिक एकता के वातावरण में मनाया जाता है।

  • आज का पंचांग और होलिका दहन: राहुकाल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक आयोजन

    आज का पंचांग और होलिका दहन: राहुकाल, शुभ मुहूर्त और धार्मिक आयोजन

     
    नई दिल्ली :आज 3 मार्च 2026 मंगलवार को फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि है और पूरे देश में होलिका दहन का पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि आज शाम 5:07 बजे तक रहेगी और इसके बाद प्रतिपदा तिथि प्रारंभ होगी। सूर्योदय आज प्रातः 6:44 बजे होगा और सूर्यास्त सायं 6:22 बजे होगा।

    चंद्रमा आज सिंह राशि में मघा नक्षत्र में विराजमान हैं और यह नक्षत्र प्रातः 7:31 बजे तक रहेगा। मघा नक्षत्र के देवता पितृ माने गए हैं, इसलिए आज का दिन पूर्वजों के स्मरण, आशीर्वाद और आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत फलदायी है। ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि इस दिन की पूजा और धार्मिक अनुष्ठान विशेष फलदायक होते हैं। चंद्रोदय सायं 6:21 बजे होगा और चंद्रास्त नहीं होगा, जिससे पूर्णिमा की रात विशेष महत्व रखती है।

    ग्रहों की स्थिति पर नजर डालें तो सूर्य, मंगल, बुध और राहु कुंभ राशि में स्थित हैं। गुरु बृहस्पति मिथुन राशि में, जबकि शुक्र और शनि मीन राशि में विराजमान हैं और केतु सिंह राशि में हैं। इन ग्रहों की स्थिति सामाजिक सक्रियता और धार्मिक आयोजनों को बल देने वाली मानी जाती है।

    आज का योग ‘सुकर्मा’ है, जो प्रातः 10:25 बजे तक रहेगा। यह योग नए कार्यों की शुरुआत और प्रतिष्ठा में वृद्धि के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। करण बव आज सायं 5:07 बजे तक रहेगा और इसके बाद अगले दिन प्रातः 4:54 बजे तक अन्य करण प्रभावी रहेगा।

    शुभ मुहूर्त की बात करें तो अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:10 बजे से 12:56 बजे तक है। इस दौरान महत्वपूर्ण निर्णय लेना, पूजा-अर्चना करना और नए कार्य की शुरुआत करना लाभकारी माना जाता है। अमृत काल 4 मार्च की प्रातः 1:13 बजे से 2:49 बजे तक रहेगा।

    अशुभ समय में राहुकाल दोपहर 3:28 बजे से 4:55 बजे तक रहेगा, इस दौरान किसी भी महत्वपूर्ण कार्य से बचना चाहिए। गुलिकाल दोपहर 12:33 बजे से 2:00 बजे तक है और यमगण्ड प्रातः 9:39 बजे से 11:06 बजे तक रहेगा। धार्मिक विशेषज्ञों का कहना है कि राहुकाल के समय किसी भी निर्णय या पूजा से बचना चाहिए और शुभ मुहूर्त का ही पालन करना चाहिए।

    देशभर में होलिका दहन की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। पूर्णिमा तिथि पर विधिपूर्वक पूजा-अर्चना और रात्रि में होलिका दहन का आयोजन किया जाएगा। धार्मिक आस्थावानों को सलाह दी गई है कि इस दिन दान-पुण्य करें, पारिवारिक एकता बनाए रखें और आध्यात्मिक साधना में समय दें।

    पूर्णिमा और मघा नक्षत्र का यह संयोजन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी है। यह दिन न केवल धार्मिक अनुष्ठानों के लिए उपयुक्त है बल्कि सामाजिक और पारिवारिक मेल-जोल के लिए भी महत्वपूर्ण है। पंचांग के जानकारों के अनुसार इस दिन पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करने से मनोकामना पूरी होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

    आज का दिन आध्यात्मिक जागरूकता और धार्मिक गतिविधियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। राहुकाल में सतर्क रहने और शुभ मुहूर्त का लाभ उठाने से सभी कार्य सफल और फलदायी होंगे। होलिका दहन के साथ यह पूर्णिमा तिथि जीवन में अच्छाई और समृद्धि का संदेश लेकर आती है।

  • 5 जनवरी का पंचांग भद्राकाल रहेगाआडल योग नहीं लगेगाजानें शुभ-अशुभ मुहूर्त

    5 जनवरी का पंचांग भद्राकाल रहेगाआडल योग नहीं लगेगाजानें शुभ-अशुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली । 5 जनवरी2026 का पंचांग अनुसारइस दिन कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि रहेगी और यह दिन सोमवार को पड़ेगा। सोमवार को भद्राकाल का साया रहेगाजो रात 8 बजकर 53 मिनट से लेकर अगले दिन 7 बजकर 15 मिनट तक रहेगा। इस समय किसी भी शुभ कार्य को करने से बचना चाहिएक्योंकि भद्राकाल में किया गया शुभ काम भी अशुभ परिणाम दे सकता है। द्वितीया तिथि सुबह 9 बजकर 56 मिनट तक रहेगीइसके बाद तृतीया तिथि का आगमन होगा। आइए जानते हैं आज के शुभ और अशुभ मुहूर्त के बारे में।
    शुभ मुहूर्त

    अभिजित मुहूर्त दोपहर 1206 से 1247 तक, गोधूलि मुहूर्त शाम 536 से 603 तक, अमृत काल मुहूर्त शाम 729 से 858 तक, विजय मुहूर्त दोपहर 210 से 252 तक, ब्रह्म मुहूर्त सुबह 526 से 620 तक।
    अशुभ मुहूर्त

    राहुकाल सुबह 833 से 951 तक, गुलिक काल दोपहर 145 से 302 तक, यमगण्ड काल सुबह 1109 से 1227 तक, दुर्मुहूर्त दोपहर 1247 से 129 तक।
    विशेष जानकारी
    5 जनवरी को आडल योग नहीं लगेगाजो कि एक शुभ योग माना जाता है। सूर्योदय और सूर्यास्त, सूर्योदय सुबह 715, सूर्यास्त शाम 538,।
    चन्द्रोदय

    चन्द्रोदय शाम 749 चन्द्रोदय की अवधि 6 जनवरी की सुबह 856 तक। 
    दिशाशूल

    रविवार के दिन दिशा शूल पूर्व दिशा में रहेगा। इसका मतलब है कि सोमवार को यदि आप यात्रा पर जाने का सोच रहे हैं तो पूर्व दिशा की यात्रा से बचें। यह दिशा वर्जित मानी जाती है। यदि यात्रा जरूरी होतो दही-जीरा खाकर और दर्पण देखकर यात्रा पर निकलने से नकारात्मक प्रभाव कम हो सकते हैं।इस दिन पंचांग में दी गई जानकारी को ध्यान में रखकर अपने कार्यों की योजना बनाना शुभ रहेगा।