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  • जब लता मंगेशकर ने दिया नितिन मुकेश को पहला बड़ा मंच, पिता के निधन के बाद मिला ऐसा मौका जिसने बना दिया सफल पार्श्वगायक

    जब लता मंगेशकर ने दिया नितिन मुकेश को पहला बड़ा मंच, पिता के निधन के बाद मिला ऐसा मौका जिसने बना दिया सफल पार्श्वगायक

    नई दिल्ली । भारतीय फिल्म संगीत के इतिहास में कई ऐसे कलाकार हुए हैं जिनकी सफलता के पीछे संघर्ष, प्रतिभा और सही समय पर मिला एक अवसर अहम भूमिका निभाता है। प्रसिद्ध पार्श्वगायक नितिन मुकेश की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। महान गायक मुकेश के निधन के बाद जब पूरा परिवार गहरे शोक में था, उसी कठिन दौर में स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने उन्हें ऐसा अवसर दिया जिसने उनके संगीत करियर की दिशा ही बदल दी।

    नितिन मुकेश का जन्म 27 जून 1950 को हुआ था। संगीत उन्हें विरासत में मिला था और बचपन से ही उन्होंने अपने पिता मुकेश से गायन की बारीकियां सीखीं। वह शुरुआत से ही संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहते थे, लेकिन उन्हें सबसे बड़ा अवसर उस समय मिला जब उनके पिता का अचानक निधन हो गया।

    मुकेश के निधन से भारतीय संगीत जगत में गहरा शून्य पैदा हो गया था। उस समय लता मंगेशकर के साथ उनके कई अंतरराष्ट्रीय संगीत कार्यक्रम पहले से तय थे। शुरुआती दौर में इन कार्यक्रमों को रद्द करने पर विचार किया गया, लेकिन बाद में लता मंगेशकर ने एक अलग फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि इन कार्यक्रमों को जारी रखा जाएगा और मंच पर मुकेश की जगह उनके बेटे नितिन मुकेश को अवसर दिया जाएगा।

    बताया जाता है कि कार्यक्रमों के दौरान लता मंगेशकर ने दर्शकों को संबोधित करते हुए कहा कि मुकेश अब उनके बीच नहीं रहे, इसलिए वह उनके बेटे के साथ इस संगीत यात्रा को आगे बढ़ा रही हैं। यह पल नितिन मुकेश के लिए बेहद भावुक होने के साथ-साथ उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित हुआ। अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुति देने का यह अवसर उन्हें व्यापक पहचान दिलाने में निर्णायक साबित हुआ।

    इसके बाद नितिन मुकेश ने देश और विदेश के अनेक संगीत कार्यक्रमों में अपनी गायकी से श्रोताओं का दिल जीता। धीरे-धीरे उन्होंने हिंदी फिल्म संगीत में भी अपनी अलग पहचान बनाई। विशेष रूप से 1980 और 1990 के दशक में उन्होंने कई लोकप्रिय गीत गाए, जिन्हें आज भी संगीत प्रेमी पसंद करते हैं। उनकी आवाज ने उन्हें फिल्म उद्योग के स्थापित पार्श्वगायकों की श्रेणी में पहुंचा दिया।

    अपने करियर के दौरान नितिन मुकेश ने कई प्रतिष्ठित संगीतकारों के साथ काम किया। उन्होंने आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, बप्पी लाहिड़ी, खय्याम और आनंद-मिलिंद जैसे दिग्गज संगीतकारों की धुनों को अपनी आवाज दी। इसके अलावा उन्होंने लता मंगेशकर, आशा भोसले और अलका याज्ञनिक जैसी शीर्ष गायिकाओं के साथ भी कई यादगार युगल गीत रिकॉर्ड किए।

    नितिन मुकेश का संगीत सफर इस बात का उदाहरण माना जाता है कि कठिन परिस्थितियों में मिला एक भरोसा और सही मार्गदर्शन किसी कलाकार के भविष्य को नई दिशा दे सकता है। पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने अपनी मेहनत, समर्पण और प्रतिभा के दम पर भारतीय संगीत जगत में एक सम्मानजनक और स्थायी पहचान स्थापित की।

  • तीन बार रिजेक्ट हुआ था बॉलीवुड का ये मशहूर गीत, आज भी बारिश में गूंजता है हर दिल में

    तीन बार रिजेक्ट हुआ था बॉलीवुड का ये मशहूर गीत, आज भी बारिश में गूंजता है हर दिल में

    नई दिल्ली ।  हिंदी फिल्मों में कई अमर गीत बने हैं। अमर गीतों की लिस्ट में एक ऐसा भी गाना है जिसे एक नहीं बल्कि तीन बार रिजेक्ट किया गया। सेंसर बोर्ड ने गाने के कुछ बोल पर आपत्ति जताई जिसके बाद उस गाने को फिल्म में लाना मुश्किल हो गया। लेकिन अंत में जब वही गाना सालों बाद किसी दूसरी फिल्म में सुनाई दिया तो वो गाना हमेशा के लिए अमर हो गया। आज भी बारिश के गानों में एक उस गाने की गिनती भी की जाती है।

    सेंसर बोर्ड ने रिजेक्ट किया गाना

    ये 50 का दशक था। उस दौर में मम्यूजिक कंपोजर कल्याण जी आनंदजी की नई जोड़ी थी जो फिल्म मदारी के लिए गाने बना रही थी। फिल्म रिलीज के लिए तैयार थी। जब इस फिल्म को सर्टिफिकेट के लिए सेंसर बोर्ड के पास भेजा गया तो गाने के कुछ बोल को लेकर उसे रिजेक्ट कर दिया गया। बोर्ड की तरफ से गाने के बोल में बदलाव करने की बात कही गई। लेकिन गाना तो पहले ही शूट हो चुका था। और रिलीज डेट भी करीब थी। ऐसे में मेकर्स ने रिस्क नहीं लिया और गाने को ही फिल्म से हटा दिया। लेकिन कल्याणजी आनंदजी जानते थे कि इस गाने में वो बात है जो ऑडियंस को खुश कर सकती है। उन्होंने वो गाना अपनी आने वाली फिल्मों में इस्तेमाल करने के बारे में सोचा।

    दूसरी फिल्म से रिजेक्ट हुआ गाना

    इसके बाद 1959 में कल्याणजी आनंदजी को फिल्म घर घर की बात में गाने देने का मौका मिला। लेकिन इस फिल्म में भी वो अपना रिजेक्ट हुआ गाना इस्तेमाल नहीं कर पाए, क्योंकि फिल्म की सिचुएशन वैसी नहीं थी। इसके बाद 1960 में दिल भी तेरा हम भी तेरे रिलीज हुई। फिल्म के हीरो थे धर्मेंद्र। फिल्म का गाना कल्यानजी आनंदजी बना रहे थे। उन्होंने अपना वही गीत डायरेक्टर अर्जुन हिंगोरानी को सुनाया। लेकिन उन्हें ये गाना पसंद नहीं आया। ऊपर गाना सेंसर बोर्ड ने रिजेक्ट किया था। तो डायरेक्टर रिस्क नहीं लेना चाहते थे। अब तक ये गाना दो फिल्मों से रिजेक्ट हो चुका था। लेकिन म्यूजिक कंपोजर की जोड़ी को अपने गाने पर यकीन था।

    राज कपूर की फिल्म में मिला मौका

    1960 में एक फिल्म आई छलिया। इस फिल्म में राज कपूर और नूतन लीड रोल में थे। फिल्म की कहानी भारत-पाकिस्तान के बीच हुए बंटवारे पर बेस्ड थी। इस फिल्म में कल्यानजी आनंदजी को म्यूजिक देने का मौका मिला। मनमोहन देसाई की ये पहली डायरेक्टोरियल फिल्म थी। इस फिल्म के लिए उन्हें एक बारिश सॉन्ग की जरूरत थी। उन्होंने ये बात जब म्यूजिक कंपोजर की जोड़ी कल्यानजी और आनंदजी को बताई तो उन्होंने फटाक से अपना रिजेक्टेड गाना उन्हें सुना दिया। मनमोहन देसाई को गाना बहुत पसंद आया। क्योंकि सेंसर बोर्ड को गाने के कुछ बोल से आपत्ति थी तो गीतकार कमाल जलालाबादी को फिर से उस गाने के बोल बदलने के लिए बुलाया गया। मुखड़ा वैसा ही रखा लेकिन अंतरे में बदलाव किया गया। इस गाने को आवाज देने वाले मुकेश को फिर से बुलाया गया और गाना अंतरा फिर से रिकॉर्ड किया गया।
    आज अमर है ये गीत
    गाने के नए वर्जन पर राज कपूर और नूतन ने खूब डांस करते हुए शूट किया। लेकिन जब फिल्म सेंसर बोर्ड के पास पहुंची तो गाना फिर से अटक गया। सेंसर बोर्ड ने फिर से अंतरे के बोल पर आपत्ति जताई। गीतकार कमाल जलालाबादी को फिर से बुलाया गया। गाने के बोल फिर से बदले गए। और जिस गाने को लेकर सभी को इतनी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था वो था ‘डम डम डिगा डिगा, मौसम भीगा भीगा’ । इस गाने के अंतरे के पहले बोल थे ‘देखो लुटारा आज लुट गया हाय अल्लाह’ की जगह ‘देखो रे आज कोई लुट गया’ और ‘भोला भाला छुप के डाका डाला जाने तू कैसा मेहमान है’ की जगह ‘सनम हम माना गरीब हैं नसीब खोटा ही सही सही बंदा छोटा सही दिल खजाना है प्यार का हाय अल्लाह’। ये गाना जब बनकर फिल्म में सुना गया तो अमर हो गया। आज भी ये गीत अमर है।