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  • मूंग खरीदी पर सियासत और सिस्टम दोनों सवालों के घेरे में सरकार को हजारों करोड़ की चपत किसानों की मांग अब भी अधूरी

    मूंग खरीदी पर सियासत और सिस्टम दोनों सवालों के घेरे में सरकार को हजारों करोड़ की चपत किसानों की मांग अब भी अधूरी


    मध्य प्रदेश । मध्य प्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर किसानों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। प्रदेश के कई जिलों से किसान समर्थन मूल्य पर पूरी मूंग खरीदे जाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। नर्मदापुरम के सेठानी घाट से बड़ी संख्या में किसान पैदल मार्च करते हुए भोपाल पहुंचे और मुख्यमंत्री निवास तक अपनी आवाज पहुंचाई। किसानों का कहना है कि उनकी पूरी उपज की सरकारी खरीदी सुनिश्चित की जाए ताकि उन्हें बाजार में कम कीमत पर फसल बेचने के लिए मजबूर न होना पड़े।

    किसानों के बढ़ते दबाव के बीच राज्य सरकार ने मूंग खरीदी का दायरा बढ़ाने की बात कही लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा आर्थिक तथ्य भी सामने आया है। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार पिछले तीन वर्षों में लक्ष्य से अधिक मूंग खरीदी के कारण सरकार को लगभग 3346 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। यानी हर वर्ष औसतन 1115 करोड़ रुपए का अतिरिक्त वित्तीय बोझ राज्य सरकार पर पड़ा है। इस नुकसान में खरीदी परिवहन भंडारण और बाद में बाजार में बिक्री के दौरान होने वाला घाटा शामिल है।

    मध्य प्रदेश सरकार का कहना है कि वह केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए खरीदी कोटे से अधिक मात्रा में मूंग खरीदती रही है जिससे आर्थिक दबाव लगातार बढ़ा है। इसी कारण राज्य सरकार ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को कई बार पत्र लिखकर प्रदेश के लिए खरीदी का कोटा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत करने की मांग की है। सरकार का तर्क है कि जिन राज्यों में मूंग की सरकारी खरीदी बहुत कम होती है वहां का अप्रयुक्त कोटा मध्य प्रदेश को दिया जाना चाहिए ताकि किसानों को राहत मिल सके और कुल राष्ट्रीय सीमा भी प्रभावित न हो।

    हालांकि केंद्र सरकार ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश को पहले से मिले कोटे का भी पूरा उपयोग नहीं हो पाया है। केंद्र के अनुसार 16 जुलाई तक निर्धारित कोटे का केवल दो प्रतिशत ही खरीदा गया था। ऐसे में पहले उपलब्ध लक्ष्य के अनुरूप खरीदी पूरी करने के बाद ही अतिरिक्त कोटे पर विचार किया जा सकता है। इसी मुद्दे को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच लगातार पत्राचार जारी है।

    आंकड़ों पर नजर डालें तो मध्य प्रदेश देश का सबसे बड़ा मूंग खरीदी करने वाला राज्य है। वर्ष 2023-24 में प्रदेश के लिए 2.76 लाख मीट्रिक टन खरीदी की स्वीकृति मिली और पूरी मात्रा खरीदी गई। वर्ष 2024-25 में 3.31 लाख मीट्रिक टन के लक्ष्य के मुकाबले 2.90 लाख मीट्रिक टन खरीदी हुई जबकि वर्ष 2025-26 में 3.51 लाख मीट्रिक टन की स्वीकृति के बावजूद 4.20 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी गई जो निर्धारित लक्ष्य से काफी अधिक रही।

    दूसरी ओर राजस्थान महाराष्ट्र कर्नाटक हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में स्वीकृति मिलने के बावजूद वास्तविक खरीदी काफी कम रही। कई राज्यों में उत्पादन की तुलना में सरकारी खरीदी तीन प्रतिशत से भी कम रही जबकि मध्य प्रदेश में हर वर्ष कुल उत्पादन का लगभग 20 से 22 प्रतिशत हिस्सा समर्थन मूल्य पर खरीदा जाता है। यही वजह है कि प्रदेश पर अतिरिक्त आर्थिक भार भी अधिक पड़ रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर खरीदी नीति में संतुलित बदलाव करें तथा वास्तविक उत्पादन के आधार पर कोटा तय किया जाए तो किसानों को भी राहत मिलेगी और सरकार पर अनावश्यक वित्तीय बोझ भी कम होगा। फिलहाल मूंग खरीदी का मुद्दा किसानों सरकार और केंद्र के बीच सबसे बड़ी कृषि चुनौती बनकर सामने आया है।

  • भोपाल में तीसरे दिन गरमाया किसान आंदोलन: पुलिस से टकराव, बैरिकेडिंग पर चढ़े प्रदर्शनकारी, सरकार और विपक्ष आमने-सामने

    भोपाल में तीसरे दिन गरमाया किसान आंदोलन: पुलिस से टकराव, बैरिकेडिंग पर चढ़े प्रदर्शनकारी, सरकार और विपक्ष आमने-सामने


    भोपाल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में किसानों का आंदोलन लगातार तीसरे दिन भी तेज बना रहा। मूंग की सरकारी खरीदी, ई-टोकन व्यवस्था में सुधार, न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी और अन्य मांगों को लेकर बड़ी संख्या में किसान मुख्यमंत्री निवास की ओर बढ़ने के लिए जुटे। हालांकि पुलिस ने एम्प्री के पास वीर सावरकर सेतु पर भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच उन्हें रोक दिया। प्रशासन ने बसों की चार परतों वाली बैरिकेडिंग कर प्रदर्शनकारियों का रास्ता बंद कर दिया, लेकिन कुछ किसान बैरिकेड पर चढ़ गए और बाद में बसों पर भी चढ़कर विरोध जताया। पुलिस ने समझाइश देकर उन्हें नीचे उतारा जिसके बाद किसान वहीं धरने पर बैठ गए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते रहे।

    प्रदर्शन के दौरान कई किसानों ने अर्धनग्न होकर विरोध दर्ज कराया और अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बनाया। कुछ प्रदर्शनकारी सड़क पर लेट गए तो कई किसानों ने सरकार की सद्बुद्धि के लिए हवन और यज्ञ किया। आंदोलन स्थल पर किसानों ने सड़क किनारे ही दाल-बाटी बनाकर भोजन किया। रातभर आंदोलन में डटे रहने के बाद कई किसान वहीं खुले आसमान के नीचे आराम करते भी नजर आए। आंदोलन में युवाओं की भागीदारी भी देखने को मिली और बड़ी संख्या में Gen Z युवाओं ने किसानों के समर्थन में प्रदर्शन में हिस्सा लिया।

    किसानों का कहना है कि लगातार बढ़ती लागत और महंगाई के बावजूद उन्हें उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। उनका आरोप है कि मूंग खरीदी की मौजूदा व्यवस्था और ई-टोकन प्रणाली के कारण बड़ी संख्या में किसान अपनी उपज बेचने से वंचित रह जाते हैं। प्रदर्शनकारी सरकार से इन समस्याओं का स्थायी समाधान और एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग कर रहे हैं।

    आंदोलन को देखते हुए प्रशासन ने राजधानी के कई प्रमुख मार्गों पर बैरिकेडिंग कर यातायात रोक दिया। इसका असर होशंगाबाद रोड, नर्मदापुरम रोड और आसपास के इलाकों में देखने को मिला जहां लंबा ट्रैफिक जाम लग गया और आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। स्थिति को देखते हुए भोपाल कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने नर्मदापुरम रोड स्थित सभी सरकारी और निजी स्कूलों में अवकाश घोषित कर दिया ताकि विद्यार्थियों और अभिभावकों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।

    इस बीच मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि सरकार किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए पूरी तरह गंभीर है। उन्होंने बताया कि किसानों से संवाद के लिए मंत्रियों की एक समिति बनाई गई है जो आंदोलनकारियों से बातचीत कर उनकी मांगों पर चर्चा करेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार सकारात्मक सुझावों का स्वागत करती है लेकिन यह भी जरूरी है कि आंदोलन के कारण आम जनता को अनावश्यक परेशानी न हो।

    वहीं नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि हजारों किसान अपनी जायज मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें रोकने में लगी हुई है। उन्होंने किसानों की मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय लेने की मांग की।

    राजधानी में जारी यह आंदोलन अब केवल किसानों की मांगों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि प्रदेश की राजनीति का भी प्रमुख मुद्दा बन गया है। अब सभी की नजर सरकार और किसान नेताओं के बीच होने वाली संभावित बातचीत पर टिकी है, जिससे इस गतिरोध का समाधान निकलने की उम्मीद की जा रही है।