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  • PoK में प्रदर्शन, बलूचिस्तान पर भी उठे सवाल; बढ़ते असंतोष के बीच पाकिस्तान की आंतरिक चुनौतियां गहराईं

    PoK में प्रदर्शन, बलूचिस्तान पर भी उठे सवाल; बढ़ते असंतोष के बीच पाकिस्तान की आंतरिक चुनौतियां गहराईं

    नई दिल्ली । पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में जारी विरोध प्रदर्शनों और हिंसा की घटनाओं ने पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। क्षेत्र में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच बढ़ते तनाव के बीच कई लोगों की मौत और बड़ी संख्या में घायल होने के दावे सामने आए हैं। इन घटनाओं के बाद स्थानीय संगठनों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई का विरोध तेज कर दिया है, जबकि राजनीतिक स्तर पर भी सरकार और सेना की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

    क्षेत्र में सक्रिय जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) का कहना है कि बुनियादी सुविधाओं, महंगाई, बिजली संकट और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब व्यापक जन असंतोष का रूप ले चुका है। संगठन का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया, जिससे कई लोगों की जान गई। संगठन ने इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है।

    स्थानीय स्तर पर यह भी दावा किया जा रहा है कि कई स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और अतिरिक्त बल तैनात किए गए हैं। इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध और आवाजाही पर नियंत्रण जैसे कदमों की भी चर्चा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान सरकार की ओर से इन दावों पर अलग रुख सामने आया है और प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दे रहा है।

    राजनीतिक स्तर पर भी इन घटनाओं ने बहस को तेज कर दिया है। पाकिस्तान के कुछ नेताओं ने देश की मौजूदा परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी है कि यदि विभिन्न क्षेत्रों की शिकायतों का समाधान नहीं किया गया तो आंतरिक असंतोष और बढ़ सकता है। इन बयानों में बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों का भी उल्लेख किया गया, जहां पहले से सुरक्षा और राजनीतिक चुनौतियां बनी हुई हैं। हालांकि, यह राजनीतिक टिप्पणियां हैं और इन्हें आधिकारिक सरकारी आकलन नहीं माना जा सकता।

    इसी बीच, पाकिस्तान के रक्षा प्रतिष्ठान की नीतियों को लेकर भी विपक्षी नेताओं और कुछ विश्लेषकों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि केवल सुरक्षा उपायों से स्थिति सामान्य नहीं होगी और लोगों की सामाजिक तथा आर्थिक मांगों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। वहीं सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है और किसी भी प्रकार की हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू बनकर सामने आए हैं। प्रदर्शनकारियों से जुड़े संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र जांच की मांग की है। वहीं मानवाधिकार संगठनों ने भी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और बल प्रयोग के आरोपों की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया है। इन संगठनों का कहना है कि किसी भी विवादित स्थिति में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

    विश्लेषकों का मानना है कि PoK में जारी घटनाक्रम केवल स्थानीय प्रशासनिक चुनौती नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान के सामने मौजूद व्यापक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों को भी उजागर करता है। आने वाले दिनों में सरकार की रणनीति, राजनीतिक संवाद और सुरक्षा व्यवस्था की दिशा पर सभी की नजर रहेगी। फिलहाल विभिन्न पक्षों के दावों और आरोपों के बीच स्थिति संवेदनशील बनी हुई है और घटनाक्रम पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

  • पाकिस्‍तान को इजरायल की दो टूक; गाजा पट्टी में मुनीर के मंसूबों पर फेरा पानी

    पाकिस्‍तान को इजरायल की दो टूक; गाजा पट्टी में मुनीर के मंसूबों पर फेरा पानी

    नई दिल्‍ली। इजरायल ने दो टूक कहा है कि गाजा में अमेरिका के प्रस्तावित इंटरनेशनल स्टेबलाइज़ेशन फोर्स (ISF) में पाकिस्तानी सेना को एंट्री नहीं दी जाएगी। इसके साथ ही इजरायल ने कहा है कि हमास के साथ उसके संबंधों की वजह से उसकी गाजा में भागीदारी संदिग्ध है।
    भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने कहा कि इजरायल अमेरिका द्वारा प्रस्तावित किसी भी गाजा स्थिरीकरण बल में पाकिस्तानी सेना को शामिल करने का स्पष्ट रूप से विरोध करता है। उन्होंने कहा कि हमास और आतंकी संगठनों के रिश्तों के कारण पाकिस्तान पर भरोसा नहीं कर सकते।

    एक विशेष साक्षात्कार में अज़ार ने कहा कि हमास और पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों, खासकर लश्कर-ए-तैयबा, के बीच बढ़ते संपर्क को लेकर इज़रायल को गहरी चिंता है। इजरायल की तरफ से यह प्रतिक्रिया ऐसे वक्त में आई है, जब पाकिस्तान गाजा में इंटरनेशनल फोर्स में शामिल होने पर अमेरिका की प्रतिक्रिया का अभी इंतजार ही कर रहा है।

    बता दें कि ट्रंप के गाजा में शांति बहाली और सत्ता हस्तांतरण के फार्मूले के तहत वहां एक अंतरराष्ट्रीय स्तिरिकरण बल की तैनाती की जानी है, जिसमें कई देश शामिल होंगे। पाकिस्तान ने भी इस बल में शामिल होने की इच्छा जताई थी लेकिन इजरायल ने उसे खारिज कर दिया है।

    हमास के खात्मे के बिना कोई व्यवस्था संभव नहीं
    इजरायली राजदूत अज़ार ने स्पष्ट तौर पर कहा कि हमास को एक आतंकवादी संगठन के रूप में पूरी तरह खत्म किए बिना गाज़ा के भविष्य को लेकर कोई भी व्यवस्था संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में एक स्थिरीकरण बल (Stabilisation Force) का विचार तब तक निरर्थक है, जब तक हमास को पूरी तरह निष्क्रिय नहीं कर दिया जाता। यह पहली बार है जब इजरायल आधिकारिक तौर पर और खुले तौर पर पाकिस्तानी सेना की भूमिका के खिलाफ सामने आया है।

    यह आसिम मुनीर के लिए बड़ा झटका है, जो गाजा में अपनी सेना की तैनाती के बड़े ख्वाव देख रहे थे।
    पाक समेत कई देशों से अमेरिका ने किया था संपर्क
    हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ने गाज़ा में सुरक्षा और पुनर्निर्माण के लिए प्रस्तावित बल में योगदान देने को लेकर पाकिस्तान समेत कई देशों से संपर्क किया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अज़ार ने कहा, “कई देशों ने पहले ही साफ कर दिया है कि वे हमास से लड़ने के लिए अपने सैनिक नहीं भेजना चाहते। ऐसे में यह योजना व्यावहारिक नहीं लगती।” जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या इज़रायल गाज़ा में पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी को स्वीकार करेगा, तो उनका जवाब साफ था “नहीं।”
    “केवल उन्हीं के साथ काम करेंगे जो भरोसेमंद”
    पाकिस्तान की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए इज़रायली राजदूत ने कहा,“देश आमतौर पर उन्हीं के साथ सहयोग करते हैं जिनके साथ उनके भरोसेमंद राजनयिक संबंध हों। इस समय पाकिस्तान के साथ ऐसी स्थिति नहीं है।” इस बयान से इज़रायल की पाकिस्तान को लेकर गहरी अविश्वास की भावना साफ झलकती है।
    हमास–पाकिस्तान संपर्कों पर इजरायल की नजर
    राजदूत अज़ार के बयान ऐसे समय आए हैं जब हाल ही में यह बात सामने आई है कि हमास के वरिष्ठ कमांडर नाजी ज़हीर पिछले तीन वर्षों से लगातार पाकिस्तान की यात्राएं कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, नाजी ज़हीर ने लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों से कई बैठकें और मुलाकातें की थीं। ये बैठकें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK)में भी हुईं हैं। यह बात भी सामने आ चुकी है कि 7 अक्टूबर को इज़रायल पर हुए हमले के कुछ ही दिनों बाद ज़हीर पेशावर में मौजूद था।अज़ार ने पुष्टि की कि इज़रायली खुफिया एजेंसियां इन गतिविधियों पर करीबी नजर रखे हुए हैं।