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  • इमरान खान की रिहाई के लिए बढ़ा लॉन्ग मार्च, शहबाज शरीफ ने बातचीत की पेशकश की

    इमरान खान की रिहाई के लिए बढ़ा लॉन्ग मार्च, शहबाज शरीफ ने बातचीत की पेशकश की

    नई दिल्ली ।पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की जेल से रिहाई की मांग को लेकर शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन लगातार आगे बढ़ रहा है। 4 अक्टूबर को खैबर पख्तूनख्वा के लक्की मरवत जिले से शुरू हुआ इमरान समर्थकों का लॉन्ग मार्च अब राजधानी इस्लामाबाद से करीब 180 किलोमीटर दूर रह गया है। खैबर पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी के नेतृत्व में मार्च आगे बढ़ रहा है। राजधानी की ओर बढ़ते प्रदर्शन के बीच प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इमरान समर्थकों से बातचीत की पेशकश की है।

    शहबाज शरीफ ने प्रदर्शनकारियों से लॉन्ग मार्च और धरना खत्म करने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन खत्म करने के बाद सरकार उनके साथ बैठकर बातचीत करने के लिए तैयार है। प्रधानमंत्री का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे एक दिन पहले ही सरकार ने इमरान समर्थकों के साथ बातचीत से इनकार कर दिया था। हालांकि, सरकार की ओर से बातचीत की पेशकश किए जाने के बाद भी प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

    इमरान खान के समर्थकों ने प्रधानमंत्री की बातचीत की पेशकश ठुकरा दी है। उनका कहना है कि वे इमरान खान की रिहाई की मांग से पीछे नहीं हटेंगे। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग पूर्व प्रधानमंत्री को जेल से रिहा करना है। उनका मार्च खैबर पख्तूनख्वा से आगे बढ़ते हुए राजधानी की ओर जा रहा है। इस बीच सरकार के सामने प्रदर्शन को नियंत्रित करने और राजधानी तक इसके पहुंचने से रोकने की चुनौती बनी हुई है।

    प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने प्रदर्शन को लेकर चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा कि इस तरह के आंदोलन से देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए किए जा रहे प्रयास प्रभावित हो सकते हैं। उनके मुताबिक सरकार पिछले ढाई साल से अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए काम कर रही है और इसमें बाधा डालने की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कानून अपना काम करेगा और लोगों की जान तथा संपत्ति की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है।

    राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर इमरान समर्थकों का मार्च पंजाब प्रांत तक पहुंचता है और उसे वहां अधिक जनसमर्थन मिलता है, तो शहबाज सरकार पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में प्रदर्शन को नियंत्रित करना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इमरान खान की राजनीतिक लोकप्रियता को देखते हुए उनके समर्थकों की बढ़ती संख्या पाकिस्तान की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर असर डाल सकती है।

    इस पूरे घटनाक्रम में सेना प्रमुख असीम मुनीर की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं हो रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इमरान खान के समर्थकों के आंदोलन के जरिए शहबाज शरीफ सरकार पर दबाव बन सकता है। उनके अनुसार, यदि सरकार प्रदर्शन को रोकने में कमजोर दिखाई देती है तो इससे प्रधानमंत्री की राजनीतिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। हालांकि, शहबाज शरीफ के सत्ता से हटने को लेकर किए जा रहे दावे फिलहाल राजनीतिक विश्लेषण और अटकलों पर आधारित हैं।

    फिलहाल इमरान खान के समर्थकों का लॉन्ग मार्च इस्लामाबाद की ओर बढ़ रहा है और सरकार ने बातचीत का रास्ता खोलने की कोशिश की है। दूसरी ओर प्रदर्शनकारी इमरान की रिहाई की मांग पर कायम हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में मार्च की दिशा, उसे मिलने वाला समर्थन और सरकार की प्रतिक्रिया पाकिस्तान के राजनीतिक घटनाक्रम के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

  • BRICS में ईरानी पत्रकार ने पाकिस्तान पर उठाए सवाल, बोले- पीएम मोदी की कूटनीति के आगे आसिम मुनीर की भूमिका कमजोर

    BRICS में ईरानी पत्रकार ने पाकिस्तान पर उठाए सवाल, बोले- पीएम मोदी की कूटनीति के आगे आसिम मुनीर की भूमिका कमजोर

    नई दिल्ली ।भारत की मेजबानी में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान पश्चिम एशिया के बदलते कूटनीतिक समीकरणों को लेकर भी चर्चा हुई। ईरान से आए पत्रकार बसीम लालेह ने पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि पश्चिम एशिया के संकट के बीच भारत संवाद और कूटनीति के स्तर पर अधिक प्रभावी भूमिका निभा रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की कूटनीतिक सक्रियता की सराहना की और पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख आसिम मुनीर पर भी टिप्पणी की।

    लालेह के मुताबिक, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के दौरान पाकिस्तान ने मध्यस्थता में अपनी भूमिका को प्रमुखता से पेश करने की कोशिश की, लेकिन वह इसमें सफल नहीं रहा। इसके विपरीत, भारत ने विभिन्न देशों के साथ सीधे संवाद के जरिए अपनी कूटनीतिक स्थिति मजबूत की है। उन्होंने कहा कि BRICS सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की ईरान और यूएई के नेताओं के साथ बातचीत इसका उदाहरण है।

    ईरानी पत्रकार ने बताया कि भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के बीच बातचीत हुई। इसके साथ ही अबू धाबी के क्राउन प्रिंस के साथ भी प्रधानमंत्री की चर्चा हुई। उनके अनुसार, इसके बाद यूएई और ईरान के बीच बातचीत का रास्ता बनना पश्चिम एशिया में भारत की कूटनीतिक भूमिका को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि होर्मुज और खाड़ी क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर भी संवाद के जरिए आगे बढ़ने की संभावना बन सकती है।

    आसिम मुनीर को लेकर लालेह ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि मुनीर कई मोर्चों पर असफल रहे हैं और भारत की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता के बाद पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की भूमिका कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने आसिम मुनीर की छुट्टी कर दी है। हालांकि, यह टिप्पणी राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव के संदर्भ में की गई थी।

    लालेह ने BRICS सम्मेलन की मेजबानी और प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति की भी प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि भारत ने मतभेदों को पीछे छोड़कर बातचीत और सहयोग पर जोर दिया है। उनके मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी संकट के समाधान के लिए संवाद महत्वपूर्ण है और भारत इस दिशा में उपयोगी भूमिका निभा सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अगले दो महीनों में क्षेत्र में चल रहे संघर्ष को लेकर सकारात्मक बदलाव दिखाई दे सकते हैं।

    पाकिस्तान की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए लालेह ने कहा कि पाकिस्तान खुद कई मामलों में दूसरे देशों पर निर्भर है। उनके अनुसार, इसी वजह से पाकिस्तान के लिए स्वतंत्र तरीके से विदेश नीति तय करना मुश्किल है। उन्होंने पाकिस्तान की कूटनीति को कमजोर बताते हुए कहा कि वह क्षेत्रीय शांति को लेकर कोई प्रभावी उदाहरण स्थापित नहीं कर पाया है।

    ईरानी पत्रकार ने पाकिस्तान पर आतंकवाद के मुद्दे को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जो देश आतंकवाद से जुड़े आरोपों का सामना करता रहा है, उसके लिए शांति की पहल का नेतृत्व करना मुश्किल होता है। उन्होंने पश्चिम एशिया में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए और कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को लगातार अधिक महत्व मिल रहा है।

    लालेह ने सऊदी अरब की सुरक्षा से जुड़े घटनाक्रम का भी जिक्र किया। उनके मुताबिक, सऊदी अरब पर हमले करने वालों के खिलाफ पाकिस्तान अपेक्षित भूमिका नहीं निभा पाया है। उन्होंने सऊदी क्राउन प्रिंस के साथ पाकिस्तान और तुर्की से जुड़े मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट का भी उल्लेख किया और कहा कि इस मामले में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    BRICS सम्मेलन के दौरान भारत की सक्रिय कूटनीति और पश्चिम एशिया में बदलते समीकरणों के बीच पाकिस्तान की भूमिका पर बहस तेज है। ईरानी पत्रकार बसीम लालेह की टिप्पणियों ने इस चर्चा को और बढ़ा दिया है। वहीं, भारत की ओर से विभिन्न देशों के साथ संवाद और सहयोग बढ़ाने की कोशिशों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नजर बनी हुई है।

  • आसिम मुनीर को मिली तीनों सेनाओं की कमान, नए कानून से पाकिस्तान में सेना प्रमुख की ताकत और सैन्य ढांचे में बड़ा बदलाव

    आसिम मुनीर को मिली तीनों सेनाओं की कमान, नए कानून से पाकिस्तान में सेना प्रमुख की ताकत और सैन्य ढांचे में बड़ा बदलाव

    नई दिल्ली । पाकिस्तान की संसद ने देश के इतिहास में पहली बार एक ही सैन्य अधिकारी को सेना, नौसेना और वायुसेना तीनों की कमान सौंपी है। इससे उन्हें अभूतपूर्व कानूनी ताकत मिली है। अगस्त के अंत में नेशनल असेंबली ने डिफेंस फोर्सेस ऑफ पाकिस्तान एक्ट, 2026 पारित कर चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेस (सीडीएफ) का नया पद बनाया। नए कानून के तहत फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को देश का पहला सीडीएफ नियुक्त किया गया। वह अपने मौजूदा सेना प्रमुख के पद के साथ नई जिम्मेदारी को भी संभालेंगे।

    1976 के बाद पाकिस्तानी सैन्य कमान में सबसे बड़ा बदलाव

    सीडीएफ के पद के साथ मुनीर पाकिस्तान में और ताकतवर बनकर उभरे हैं। 1976 के बाद से यह पाकिस्तानी सैन्य कमान में सबसे बड़ा ढांचागत बदलाव माना जा रहा है। इससे पहले 1976 में ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी का पद बनाया गया था, लेकिन उसके पास नौसेना या वायुसेना को संचालित करने की कोई औपचारिक कानूनी ताकत नहीं थी। पुराने पद का काम सिर्फ तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बिठाना था और उसका नौसेना या वायुसेना पर कोई अधिकार नहीं था। इसके उलट सीडीएफ के पास तीनों सेनाओं पर कानूनी ऑपरेशनल कमांड है। यह सीधे सरकार को रिपोर्ट करेगा और इसके पास ऐसे फैसले लागू करने की शक्ति है जो पुराने पद के पास कभी नहीं थी।

    परमाणु कमान पर सिर्फ सेना के पास

    नए नियमों के अनुसार, परमाणु बलों की कमान का पद अब कानूनी रूप से केवल सेना के पास होगा। विश्लेषक मजीद निजामी का कहना है कि इस बदलाव से नौसेना और वायुसेना के लिए वह भूमिका औपचारिक रूप से खत्म हो गई है।

    संशोधन पर तीखी बहस

    इस संशोधन पर पाकिस्तान के अंदर तीखी बहस छिड़ गई है। समर्थकों का तर्क है कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा और युद्धक तैयारियों में मजबूती आएगी। रावलपिंडी के सेवानिवृत्त जनरल नईम खालिद लोधी और सुप्रीम कोर्ट के वकील हाफिज अहसान अहमद खोखर जैसे समर्थकों का मानना है कि यह ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसी पश्चिमी प्रणालियों की तर्ज पर प्रधानमंत्री से लेकर जमीनी इकाइयों तक बेहतर समन्वय, साइबर-ड्रोन अभियानों में तेजी और संकट के समय त्वरित निर्णय लेने के लिए एक वैध कदम है। वहीं आलोचकों की चिंता है कि यह कदम देश के संविधान और नागरिक नियंत्रण के संतुलन को कमजोर करेगा तथा सेना के प्रभाव को और अधिक स्थायी बनाता है। अब्दुल मोइज जाफेरी और कर्नल इनाम रहीम जैसे आलोचकों का तर्क है कि इससे एक सेवा प्रमुख दूसरे के अधीन हो गया है और सीडीएफ को अब कैबिनेट की मंजूरी के बिना केवल एक पत्र के जरिये अधिकारियों को बर्खास्त करने की शक्ति मिल गई है।

  • PoK में प्रदर्शन, बलूचिस्तान पर भी उठे सवाल; बढ़ते असंतोष के बीच पाकिस्तान की आंतरिक चुनौतियां गहराईं

    PoK में प्रदर्शन, बलूचिस्तान पर भी उठे सवाल; बढ़ते असंतोष के बीच पाकिस्तान की आंतरिक चुनौतियां गहराईं

    नई दिल्ली । पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में जारी विरोध प्रदर्शनों और हिंसा की घटनाओं ने पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। क्षेत्र में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच बढ़ते तनाव के बीच कई लोगों की मौत और बड़ी संख्या में घायल होने के दावे सामने आए हैं। इन घटनाओं के बाद स्थानीय संगठनों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई का विरोध तेज कर दिया है, जबकि राजनीतिक स्तर पर भी सरकार और सेना की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

    क्षेत्र में सक्रिय जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) का कहना है कि बुनियादी सुविधाओं, महंगाई, बिजली संकट और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब व्यापक जन असंतोष का रूप ले चुका है। संगठन का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग किया गया, जिससे कई लोगों की जान गई। संगठन ने इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है।

    स्थानीय स्तर पर यह भी दावा किया जा रहा है कि कई स्थानों पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और अतिरिक्त बल तैनात किए गए हैं। इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध और आवाजाही पर नियंत्रण जैसे कदमों की भी चर्चा है। दूसरी ओर, पाकिस्तान सरकार की ओर से इन दावों पर अलग रुख सामने आया है और प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दे रहा है।

    राजनीतिक स्तर पर भी इन घटनाओं ने बहस को तेज कर दिया है। पाकिस्तान के कुछ नेताओं ने देश की मौजूदा परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी है कि यदि विभिन्न क्षेत्रों की शिकायतों का समाधान नहीं किया गया तो आंतरिक असंतोष और बढ़ सकता है। इन बयानों में बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों का भी उल्लेख किया गया, जहां पहले से सुरक्षा और राजनीतिक चुनौतियां बनी हुई हैं। हालांकि, यह राजनीतिक टिप्पणियां हैं और इन्हें आधिकारिक सरकारी आकलन नहीं माना जा सकता।

    इसी बीच, पाकिस्तान के रक्षा प्रतिष्ठान की नीतियों को लेकर भी विपक्षी नेताओं और कुछ विश्लेषकों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि केवल सुरक्षा उपायों से स्थिति सामान्य नहीं होगी और लोगों की सामाजिक तथा आर्थिक मांगों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है। वहीं सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है और किसी भी प्रकार की हिंसा को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    मानवाधिकार से जुड़े मुद्दे भी इस पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू बनकर सामने आए हैं। प्रदर्शनकारियों से जुड़े संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र जांच की मांग की है। वहीं मानवाधिकार संगठनों ने भी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और बल प्रयोग के आरोपों की निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर जोर दिया है। इन संगठनों का कहना है कि किसी भी विवादित स्थिति में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

    विश्लेषकों का मानना है कि PoK में जारी घटनाक्रम केवल स्थानीय प्रशासनिक चुनौती नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान के सामने मौजूद व्यापक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों को भी उजागर करता है। आने वाले दिनों में सरकार की रणनीति, राजनीतिक संवाद और सुरक्षा व्यवस्था की दिशा पर सभी की नजर रहेगी। फिलहाल विभिन्न पक्षों के दावों और आरोपों के बीच स्थिति संवेदनशील बनी हुई है और घटनाक्रम पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

  • पाकिस्‍तान को इजरायल की दो टूक; गाजा पट्टी में मुनीर के मंसूबों पर फेरा पानी

    पाकिस्‍तान को इजरायल की दो टूक; गाजा पट्टी में मुनीर के मंसूबों पर फेरा पानी

    नई दिल्‍ली। इजरायल ने दो टूक कहा है कि गाजा में अमेरिका के प्रस्तावित इंटरनेशनल स्टेबलाइज़ेशन फोर्स (ISF) में पाकिस्तानी सेना को एंट्री नहीं दी जाएगी। इसके साथ ही इजरायल ने कहा है कि हमास के साथ उसके संबंधों की वजह से उसकी गाजा में भागीदारी संदिग्ध है।
    भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने कहा कि इजरायल अमेरिका द्वारा प्रस्तावित किसी भी गाजा स्थिरीकरण बल में पाकिस्तानी सेना को शामिल करने का स्पष्ट रूप से विरोध करता है। उन्होंने कहा कि हमास और आतंकी संगठनों के रिश्तों के कारण पाकिस्तान पर भरोसा नहीं कर सकते।

    एक विशेष साक्षात्कार में अज़ार ने कहा कि हमास और पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों, खासकर लश्कर-ए-तैयबा, के बीच बढ़ते संपर्क को लेकर इज़रायल को गहरी चिंता है। इजरायल की तरफ से यह प्रतिक्रिया ऐसे वक्त में आई है, जब पाकिस्तान गाजा में इंटरनेशनल फोर्स में शामिल होने पर अमेरिका की प्रतिक्रिया का अभी इंतजार ही कर रहा है।

    बता दें कि ट्रंप के गाजा में शांति बहाली और सत्ता हस्तांतरण के फार्मूले के तहत वहां एक अंतरराष्ट्रीय स्तिरिकरण बल की तैनाती की जानी है, जिसमें कई देश शामिल होंगे। पाकिस्तान ने भी इस बल में शामिल होने की इच्छा जताई थी लेकिन इजरायल ने उसे खारिज कर दिया है।

    हमास के खात्मे के बिना कोई व्यवस्था संभव नहीं
    इजरायली राजदूत अज़ार ने स्पष्ट तौर पर कहा कि हमास को एक आतंकवादी संगठन के रूप में पूरी तरह खत्म किए बिना गाज़ा के भविष्य को लेकर कोई भी व्यवस्था संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में एक स्थिरीकरण बल (Stabilisation Force) का विचार तब तक निरर्थक है, जब तक हमास को पूरी तरह निष्क्रिय नहीं कर दिया जाता। यह पहली बार है जब इजरायल आधिकारिक तौर पर और खुले तौर पर पाकिस्तानी सेना की भूमिका के खिलाफ सामने आया है।

    यह आसिम मुनीर के लिए बड़ा झटका है, जो गाजा में अपनी सेना की तैनाती के बड़े ख्वाव देख रहे थे।
    पाक समेत कई देशों से अमेरिका ने किया था संपर्क
    हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ने गाज़ा में सुरक्षा और पुनर्निर्माण के लिए प्रस्तावित बल में योगदान देने को लेकर पाकिस्तान समेत कई देशों से संपर्क किया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अज़ार ने कहा, “कई देशों ने पहले ही साफ कर दिया है कि वे हमास से लड़ने के लिए अपने सैनिक नहीं भेजना चाहते। ऐसे में यह योजना व्यावहारिक नहीं लगती।” जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या इज़रायल गाज़ा में पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी को स्वीकार करेगा, तो उनका जवाब साफ था “नहीं।”
    “केवल उन्हीं के साथ काम करेंगे जो भरोसेमंद”
    पाकिस्तान की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए इज़रायली राजदूत ने कहा,“देश आमतौर पर उन्हीं के साथ सहयोग करते हैं जिनके साथ उनके भरोसेमंद राजनयिक संबंध हों। इस समय पाकिस्तान के साथ ऐसी स्थिति नहीं है।” इस बयान से इज़रायल की पाकिस्तान को लेकर गहरी अविश्वास की भावना साफ झलकती है।
    हमास–पाकिस्तान संपर्कों पर इजरायल की नजर
    राजदूत अज़ार के बयान ऐसे समय आए हैं जब हाल ही में यह बात सामने आई है कि हमास के वरिष्ठ कमांडर नाजी ज़हीर पिछले तीन वर्षों से लगातार पाकिस्तान की यात्राएं कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, नाजी ज़हीर ने लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों से कई बैठकें और मुलाकातें की थीं। ये बैठकें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK)में भी हुईं हैं। यह बात भी सामने आ चुकी है कि 7 अक्टूबर को इज़रायल पर हुए हमले के कुछ ही दिनों बाद ज़हीर पेशावर में मौजूद था।अज़ार ने पुष्टि की कि इज़रायली खुफिया एजेंसियां इन गतिविधियों पर करीबी नजर रखे हुए हैं।