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  • MP: भोजशाला मामले में HC बोला- ASI सर्वे की वीडियोग्राफी पर मुस्लिम पक्ष 3 दिन में दर्ज कराएं आपत्तियां

    MP: भोजशाला मामले में HC बोला- ASI सर्वे की वीडियोग्राफी पर मुस्लिम पक्ष 3 दिन में दर्ज कराएं आपत्तियां


    इंदौर
    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) की इंदौर पीठ (Indore Bench) ने धार के विवादित भोजशाला परिसर (Disputed Bhojshala complex) के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की वीडियोग्राफी पर मुस्लिम पक्ष को 3 दिन के भीतर अपनी लिखित आपत्तियां दर्ज करने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष के वकील ने तकनीकी समस्याओं के कारण वीडियोग्राफी नहीं देख पाने की बात कही। इसके बाद अदालत ने आईटी विभाग को तुरंत एक्सेस देने और वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद (Salman Khurshid) के साथ इसे साझा करने का आदेश दिया। उधर, एएसआई ने स्पष्ट किया कि 1904 से यह स्मारक उनके संरक्षण में है। एएसआई ने दो-टूक कहा कि 1935 के ‘मस्जिद’ घोषित करने वाले दावे की अब कोई कानूनी मान्यता नहीं है।

    भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है। धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के वकील तौसीफ वारसी ने जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी के सामने तकनीकी समस्याओं का हवाला दिया।

    तौसीफ वारसी ने कहा कि उन्हें इस परिसर में एएसआई के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के दौरान की गई वीडियोग्राफी तक पहुंच नहीं मिल सकी है। उधर, एएसआई के एक वकील ने कहा कि अदालत के निर्देशानुसार इस वीडियोग्राफी को गूगल ड्राइव पर उपलब्ध कराया गया था। मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के वकील को उसका एक्सेस भी दे दिया गया था।

    खंडपीठ ने दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद वारसी को वीडियोग्राफी देखने की सुविधा उपलब्ध कराए जाने के निर्देश दिए और इसके लिए हाई कोर्ट के आईटी अनुभाग को जरूरी व्यवस्था करने के लिए कहा। अदालत ने यह भी कहा कि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद के ई-मेल पते पर अतिरिक्त पहुंच उपलब्ध कराते हुए उनसे वीडियोग्राफी जल्द से जल्द साझा की जाए।


    पेश कीं दलीलें

    खंडपीठ ने निर्देश दिया कि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी इस वीडियोग्राफी पर 7 मई तक अपनी लिखित आपत्तियां प्रस्तुत करे। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुनील कुमार जैन ने ASI की ओर से धार के विवादित परिसर के संरक्षण के इतिहास के बारे में दलीलें पेश कीं।


    मुस्लिम पक्ष का दावा- मस्जिद घोषित था स्मारक

    अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुनील कुमार जैन ने कहा कि यह परिसर साल 1904 से एक संरक्षित स्मारक है। यह एएसआई के नियामकीय नियंत्रण में रहा है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में मुस्लिम पक्ष के एक याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि 1935 में तत्कालीन धार रियासत के दरबार ने 11वीं सदी के इस स्मारक को मस्जिद घोषित किया था।


    5 मई को भी जारी रहेंगी दलीलें

    अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सुनील कुमार जैन ने मुस्लिम पक्ष के दावे को काटते हुए कहा कि यह ऐलान ASI संरक्षित स्मारकों से जुड़े प्रावधानों के कारण निष्प्रभावी हो चुका है। इसे कोई कानूनी मान्यता हासिल नहीं है। सुनील कुमार जैन की दलीलें 5 मई को भी जारी रहेंगी। अदालत ने भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर दायर 4 याचिकाओं और एक रिट अपील पर 6 अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है।

  • भोजशाला केस में मुस्लिम पक्ष की नई दलील… कहा- खिलजी के हमले में मंदिर तोड़ने के सबूत नहीं

    भोजशाला केस में मुस्लिम पक्ष की नई दलील… कहा- खिलजी के हमले में मंदिर तोड़ने के सबूत नहीं


    इंदौर।
    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (Madhya Pradesh High Court) में गुरुवार को मुस्लिम पक्ष (Muslim side) ने दलील दी कि भोजशाला परिसर (Bhojshala Complex) में सरस्वती मंदिर (Saraswati Temple) होने और अलाउद्दीन खिलजी की फौज के हमले में इसे गिरा कर मस्जिद बनाने का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है। याचिकाकर्ता ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ ने हाई कोर्ट में दावा किया है कि भोजशाला परमार राजवंश के राजा भोज की ओर से साल 1034 में स्थापित सरस्वती मंदिर है। इसे मालवा क्षेत्र पर अलाउद्दीन खिलजी की फौज के हमले के दौरान 1305 में ढहाया गया था।

    संगठन ने यह दावा भी किया है कि विवादित परिसर में मस्जिद बनाने के लिए मंदिर के अवशेषों का पुनः उपयोग किया गया था। सुनवाई के दौरान धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के वकील तौसीफ वारसी ने इंदौर पीठ के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी के समक्ष विस्तृत दलीलें पेश कीं।

    वारसी ने विभिन्न इतिहासकारों और अभिलेखीय स्रोतों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि 14वीं सदी की शुरुआत में अलाउद्दीन खिलजी की फौज के हमले के दौरान धार में किसी सरस्वती मंदिर को तोड़े जाने का कोई भी दस्तावेजी सबूत मौजूद नहीं है।


    खिलजी की जीत दर्ज लेकिन मंदिर तोड़ने का जिक्र नहीं

    मुस्लिम पक्ष के वकील ने वीडी महाजन, आरसी मजूमदार और अन्य देशी-विदेशी इतिहासकारों की पुस्तकों का हवाला देते हुए कहा कि खिलजी की फौज द्वारा 1305 के दौरान मालवा में जीत हासिल करना इतिहास में दर्ज है, लेकिन इनमें से कोई भी स्रोत इस सैन्य अभियान के दौरान किसी मंदिर को तोड़े जाने या किसी इमारत को मस्जिद में बदले जाने का उल्लेख नहीं करता।


    ब्रिटिश म्यूजियम में देवी अम्बिका की मूर्ति

    इतिहासकारों के अनुसार, 1305 में मालवा पर आक्रमण का नेतृत्व खिलजी के सेनापति और प्रशासक ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी ने किया था। वारसी ने 2003 में ब्रिटिश उच्चायोग की ओर से मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री को भेजे कथित पत्र का हवाला दिया। उन्होंने दावा किया कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी जिस मूर्ति को हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ता भोजशाला की वाग्देवी (देवी सरस्वती) की प्रतिमा बता रहे हैं, वह जैन समुदाय की देवी अम्बिका की मूर्ति है।


    ASI के अलग-अलग जवाब

    वारसी ने ASI की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा करते हुए यह भी कहा कि इस विभाग ने भोजशाला की धार्मिक प्रकृति को लेकर अलग-अलग मामलों में अलग-अलग जवाब दिए हैं। मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की 2019 में दायर जनहित याचिका पर एएसआई का जवाब, ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ और कुलदीप तिवारी की 2022 में अलग-अलग पेश दो जनहित याचिकाओं पर दिए गए जवाब से अलग है।


    अब ASI की वीडियोग्राफी पर अलग-अलग दलीलें

    हाई कोर्ट ने मामले में अगली सुनवाई के लिए 4 मई की तारीख तय की है। इस दिन मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी की ओर से भोजशाला परिसर में एएसआई की वीडियोग्राफी के संबंध में दलीलें रखी जाएंगी। हाईकोर्ट इस स्मारक के धार्मिक स्वरूप को लेकर दायर चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर 6 अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है। भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह विवादित परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है।

  • मुस्लिम पक्ष का तर्क… भोजशाला राजस्व रिकॉर्ड में मस्जिद के रूप में दर्ज… मंदिर होने का कोई प्रमाण नहीं

    मुस्लिम पक्ष का तर्क… भोजशाला राजस्व रिकॉर्ड में मस्जिद के रूप में दर्ज… मंदिर होने का कोई प्रमाण नहीं


    इंदौर।
    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट (Madhya Pradesh High Court) में बुधवार को भोजशाला विवाद (Bhojshala controversy) पर सुनवाई हुई। इस दौरान मुस्लिम पक्ष ने अपनी बात रखते हुए दावा किया कि पुराने सरकारी कागजों यानी राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में यह जगह हमेशा से एक मस्जिद के रूप में दर्ज रही है। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूद इतिहास के स्रोतों में ऐसा कोई साफ जिक्र नहीं मिलता कि राजा भोज ने यहां सरस्वती मंदिर बनवाया था। बता दें कि हिंदू समाज इस जगह को देवी सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर मानता है जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है। इस पूरी जगह की देखरेख ISI कर रहा है।

    खुद को सूफी संत मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती के वंशज और सज्जादानशीन (किसी सूफी दरगाह, खानकाह या धार्मिक स्थल का आध्यात्मिक प्रमुख, गुरु या उत्तराधिकारी) बताने वाले काजी मोइनुद्दीन की ओर से उनके वकील नूर अहमद शेख ने इंदौर पीठ के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी के सामने विस्तृत दलीलें पेश कीं।

    मोइनुद्दीन ने भोजशाला मामले में ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ नामक संगठन और कुलदीप तिवारी एवं एक अन्य व्यक्ति की ओर से दायर दो जनहित याचिकाओं पर हस्तक्षेपकर्ता के रूप में सवाल उठाए हैं। इन याचिकाओं में कहा गया है कि भोजशाला सरस्वती मंदिर है। परिसर में केवल हिंदुओं को पूजा-पाठ का अधिकार दिया जाना चाहिए।


    मस्जिद के रूप में दर्ज है स्थान

    मोइनुद्दीन के वकील शेख ने अदालत में दावा किया कि मौलाना कमालुद्दीन चिश्ती की वंशावली से जुड़े उनके मुवक्किल के पुरखों के पास विवादित परिसर की सनदें (अधिकार पत्र) ऐतिहासिक तौर पर रही हैं। सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में भी यह स्थान मस्जिद के रूप में दर्ज रहा है। भोजशाला परिसर में स्थित कमाल मौला मस्जिद के प्रबंधन से जुड़े लोगों का इस स्थान पर लंबे समय से ‘सतत और शांतिपूर्ण कब्जा’ रहा है।

    शेख ने मुस्लिम कानूनों का जिक्र करते हुए बताया कि यदि कोई धार्मिक संपत्ति हैए जैसे कि मस्जिद या उससे जुड़ी जमीन तो उसके देख-रेख करने वाले लोगों जैसे सज्जादानशीन और मुतवल्ली को खास हक मिलते हैं। इन पदों पर बैठे लोगों और उनके परिवार वालों को ना सिर्फ उस संपत्ति के कार्यों में दखल देने का अधिकार है वरन उसका इस्तेमाल करने का पूरा हक भी कानूनन उनके पास होता है।

    मुस्लिम पक्ष के वकील ने प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम 1904 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कानून में ‘संपत्ति के प्रभारी’ की शब्दावली का प्रयोग किया गया है जिससे स्पष्ट होता है कि जो व्यक्ति या पक्ष लंबे समय से किसी संपत्ति के प्रभार में है, उसे उस संपत्ति के संबंध में अधिकार प्राप्त होते हैं।


    सरस्वती मंदिर के अस्तित्व का स्पष्ट उल्लेख नहीं

    सुनवाई के दौरान धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के वकील तौसीफ वारसी ने दावा किया कि दोनों जनहित याचिकाओं में हिन्दू पक्षकारों की ओर से हाई कोर्ट के समक्ष ऐतिहासिक तथ्यों के संबंध में ‘भ्रामक प्रस्तुतीकरण’ किया गया है। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों में धार में परमार राजवंश के राजा भोज की ओर से स्थापित किसी सरस्वती मंदिर के अस्तित्व का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है।


    न्यायिक परीक्षण पर गंभीर सवाल

    धार की मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के वकील तौसीफ वारसी ने यह भी कहा कि एएसआई ने भोजशाला विवाद को लेकर दायर मुकदमों में समय-समय पर अपने उत्तरों में परिवर्तन करते हुए तीन अलग-अलग रुख अपनाए हैं। ऐसी स्थिति न्यायिक परीक्षण को लेकर गंभीर सवाल उत्पन्न करती है।


    सर्वेक्षण प्रक्रिया पर जताई आपत्तियां

    वारसी ने एएसआई की ओर से भोजशाला परिसर के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने इसकी वीडियोग्राफी के तरीके के बारे में भी आपत्तियां जताईं। उनकी ओर से अदालत से अनुरोध किया कि इन आपत्तियों का परीक्षण किया जाए। भोजशाला मामले में सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी। हाई कोर्ट इस स्मारक के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर दायर 4 याचिकाओं और एक रिट अपील पर छह अप्रैल से नियमित सुनवाई कर रहा है।

  • धार भोजशाला विवाद: वकीलों की हड़ताल के चलते टली सुनवाई, अब 18 फरवरी को पेश होगी ASI की सर्वे रिपोर्ट

    धार भोजशाला विवाद: वकीलों की हड़ताल के चलते टली सुनवाई, अब 18 फरवरी को पेश होगी ASI की सर्वे रिपोर्ट


    इंदौर/धार। मध्य प्रदेश की सुप्रसिद्ध और ऐतिहासिक धार भोजशाला मामले में चल रही कानूनी प्रक्रिया एक बार फिर ठंडे बस्ते में जाती नजर आ रही है। जिला अदालत में आज होने वाली बहुचर्चित सुनवाई को वकीलों की काम से विमुक्ति हड़ताल के चलते स्थगित कर दिया गया है। अब इस संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई 18 फरवरी को निर्धारित की गई है। उल्लेखनीय है कि शिवपुरी में हुए एक वकील के हत्याकांड के विरोध में प्रदेश भर के वकील न्यायिक कार्यों से दूर हैं जिसका सीधा असर भोजशाला केस पर पड़ा है।

    सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के पालन में आज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ASI को अपनी विस्तृत सर्वे रिपोर्ट अदालत के पटल पर रखनी थी। इस रिपोर्ट में भोजशाला परिसर के भीतर किए गए वैज्ञानिक सर्वे खुदाई के दौरान मिले साक्ष्य डिजिटल फोटोग्राफी और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों को शामिल किया गया है। हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों को उम्मीद थी कि आज रिपोर्ट पेश होने के बाद स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी लेकिन अब यह सस्पेंस 18 फरवरी तक बना रहेगा।

    मुस्लिम पक्ष के गंभीर आरोप और हिंदू पक्ष की मांग

    जैसे-जैसे सुनवाई की तारीखें बदल रही हैं दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज होता जा रहा है। मुस्लिम पक्ष मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी ने एएसआई के सर्वे की निष्पक्षता पर ही सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। उनका आरोप है कि सर्वे के दौरान कुछ पत्थर की मूर्तियां पिछले रास्ते से गुपचुप तरीके से परिसर के अंदर लाकर रखी गईं और बाद में उन्हें सर्वे रिपोर्ट का हिस्सा बना लिया गया। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की कोशिश है।

    दूसरी ओर हिंदू पक्ष महाराजा भोज उत्सव समिति अपने दावों पर अडिग है। हिंदू पक्ष की ओर से कोर्ट में यह मांग प्रमुखता से उठाई गई है कि भोजशाला वाग्देवी मां सरस्वती का मंदिर है इसलिए वहां हिंदुओं को 24 घंटे पूजा-अर्चना करने की अनुमति दी जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने परिसर में होने वाली नमाज को पूरी तरह से बंद करने की भी मांग की है। हिंदू पक्ष का तर्क है कि सर्वे में मिले अवशेषों से यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि यह एक प्राचीन मंदिर है।

    क्या है भोजशाला का महत्व?

    धार की भोजशाला सदियों से सांप्रदायिक सद्भाव और विवाद दोनों का केंद्र रही है। वर्तमान व्यवस्था के अनुसार यहां मंगलवार को हिंदू पूजा करते हैं और शुक्रवार को मुस्लिम नमाज अदा करते हैं। एएसआई का वैज्ञानिक सर्वे इसी गुत्थी को सुलझाने के लिए किया गया है कि क्या इस इमारत का मूल स्वरूप मंदिर था। अब सबकी निगाहें 18 फरवरी पर टिकी हैं जब कोर्ट के रिकॉर्ड पर एएसआई के साक्ष्य आएंगे और इस ऐतिहासिक विवाद की दिशा तय होगी।