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  • गरबा में रील, लाइक और व्यूज के लिए शामिल न हों मुस्लिम युवा, मुस्लिम त्योहार कमेटी ने की संयम बरतने की अपील

    गरबा में रील, लाइक और व्यूज के लिए शामिल न हों मुस्लिम युवा, मुस्लिम त्योहार कमेटी ने की संयम बरतने की अपील

    मध्य प्रदेश।  में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होने जा रही है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व के दौरान माता की आराधना-पूजा, व्रत और गरबा समेत कई धार्मिक आयोजन होते हैं। इसी को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम त्योहार कमेटी ने मुस्लिम विद्यार्थियों और युवाओं से जिम्मेदार और संयमित व्यवहार करने की अपील की है। कमेटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शमशुल हसन ने युवाओं से कहा है कि वे केवल सोशल मीडिया पर रील, लाइक और व्यूज हासिल करने के लिए किसी धार्मिक आयोजन में अनावश्यक रूप से शामिल होने से बचें। कमेटी का कहना है कि किसी व्यक्ति का गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार कई बार सिर्फ उसकी व्यक्तिगत गलती तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका असर परिवार और समाज पर भी पड़ सकता है।

    कमेटी ने मुस्लिम युवाओं से गरबा आयोजनों से दूरी बनाए रखने की अपील की है। साथ ही युवाओं से शांति, संयम, धार्मिक मर्यादा और कानून का पालन करने को कहा गया है। इस संबंध में मुस्लिम त्योहार कमेटी ने शासन-प्रशासन को पत्र भेजकर आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध भी किया है। कमेटी ने मांग की है कि 11 अक्टूबर से पहले यह संदेश विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, तकनीकी एवं चिकित्सा संस्थानों और छात्रावासों तक पहुंचाया जाए, ताकि विद्यार्थियों और युवाओं को समय रहते जागरूक किया जा सके। कमेटी ने कहा है कि युवा सभी धर्मों की आस्था और परंपराओं का सम्मान करें तथा स्थानीय नियमों और कानूनों का पालन करें।

    कमेटी ने युवाओं को ऐसे किसी विवाद, टकराव, उकसावे या अनुचित प्रतिक्रिया से दूर रहने की सलाह दी है, जिससे सामाजिक माहौल प्रभावित हो सकता है। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए खास तौर पर रील बनाने, लाइक और व्यूज हासिल करने या सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी दिखाने के लिए किसी धार्मिक आयोजन में अनावश्यक रूप से शामिल नहीं होने की अपील की गई है। कमेटी का कहना है कि सोशल मीडिया पर कुछ मिनटों की लोकप्रियता के लिए ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए, जिससे बाद में विवाद पैदा हो या परिवार और समाज को परेशानी का सामना करना पड़े।

    शमशुल हसन ने कहा कि जब एक समुदाय की ओर से यह संकेत दिया जा रहा है कि मुस्लिम समाज के लोग उनके धार्मिक आयोजनों से दूरी बनाएं, तो इसे विवाद का विषय नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने मध्य प्रदेश के सामाजिक संगठनों, उलेमाओं और काजियों से आगे आने और मुस्लिम समाज के नौजवानों, बच्चों और बच्चियों से गरबा सहित दूसरे धार्मिक आयोजनों से दूरी बनाए रखने की अपील करने को कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि कमेटी का उद्देश्य किसी धार्मिक आयोजन का विरोध करना नहीं है। उनका कहना है कि किसी धार्मिक आयोजन में अनावश्यक रूप से शामिल होकर ऐसा कोई काम नहीं किया जाना चाहिए, जिससे विवाद की स्थिति बने या समाज में तनाव पैदा हो।

    उन्होंने देश और प्रदेश के युवाओं, बच्चों और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स से भी अपील की कि वे सिर्फ रील, लाइक और व्यूज के लिए किसी धार्मिक आयोजन में शामिल न हों। साथ ही ऐसी कोई रील या वीडियो वायरल न करने को कहा, जिससे किसी की धार्मिक भावनाएं आहत हों या विवाद की स्थिति पैदा हो। कमेटी की ओर से प्रदेश, जिला और स्थानीय स्तर के पदाधिकारियों से अपने-अपने क्षेत्रों में उलेमाओं और सामाजिक संगठनों से संपर्क करने तथा मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को जागरूक करने को कहा जाएगा। कमेटी जिला प्रशासन से भी संपर्क करेगी और अमन व शांति बनाए रखने का संदेश देगी। कमेटी ने कहा कि सामाजिक सौहार्द बनाए रखने के लिए वह उलेमाओं, सामाजिक संगठनों और प्रशासन के साथ मिलकर सकारात्मक भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

    कमेटी ने स्पष्ट किया है कि उसकी अपील किसी धर्म, धार्मिक आयोजन या गरबा कार्यक्रम के विरोध में नहीं है। इसका उद्देश्य मुस्लिम युवाओं को जिम्मेदार व्यवहार, धार्मिक मर्यादा, कानून के पालन और सामाजिक सद्भाव के प्रति जागरूक करना है। कमेटी ने कहा है कि धार्मिक आयोजनों के दौरान सभी समुदायों को एक-दूसरे की आस्था और परंपराओं का सम्मान करना चाहिए और किसी भी तरह के विवाद से बचना चाहिए।

  • CM विजय धर्मांतरण कर मुस्लिम बने लोगों को आरक्षण दिलाने के पक्ष में, सुप्रीम कोर्ट पहुंची तमिलनाडु सरकार

    CM विजय धर्मांतरण कर मुस्लिम बने लोगों को आरक्षण दिलाने के पक्ष में, सुप्रीम कोर्ट पहुंची तमिलनाडु सरकार


    नई दिल्‍ली । अभिनेता से नेता बने विजय थलपति धर्मांतरण कराकर मुस्लिम बने लोगों को भी आरक्षण दिला के पक्ष में हैं। यही वजह है कि तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की है, जिसमें कहा गया था कि धर्मांतरण के बाद इस्लाम अपनाने वाला कोई भी व्यक्ति पिछड़ा वर्ग मुस्लिम के दर्जे का दावा नहीं कर सकता है। हाईकोर्ट ने इस संबंध में राज्य सरकार द्वारा जारी साल 2024 के एक आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

    तमिलनाडु की सरकार के सचिव की ओर से दायर इस अपील में मूल याचिकाकर्ता समीर अहमद एन, जिला कलेक्टर, राजस्व मंडल अधिकारी और तहसीलदार को प्रतिवादी बनाया गया है। इन प्रतिवादियों ने शीर्ष अदालत में पहले ही कैविएट दाखिल कर रखी है।

    क्या है पूरा मामला?
    यह कानूनी विवाद साल 2022 में थूथुकुडी जिले के एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ था। हिंदू माता-पिता के घर जन्मे इस व्यक्ति ने इस्लाम धर्म अपना लिया था और अपना नाम बदलकर समीर अहमद एन रख लिया था। साल 2015 में जारी एक प्रमाण पत्र में पुष्टि की गई थी कि याचिकाकर्ता ने इस्लाम स्वीकार कर लिया है।

    इसके बाद याचिकाकर्ता ने कयातुर के तहसीलदार के समक्ष आवेदन देकर मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाण पत्र जारी करने की मांग की। उनका दावा है कि वह इसी उप-जाति की प्रथाओं का पालन करते हैं। हालांकि, तहसीलदार ने इस आवेदन को खारिज कर दिया। बाद में हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

    क्या था सरकार का 2024 का आदेश?
    इस मामले के लंबित रहने के दौरान ही तमिलनाडु सरकार ने साल 2024 में एक सरकारी आदेश जारी किया था। इस आदेश में कहा गया कि यदि पिछड़ा वर्ग, अत्यंत पिछड़ा वर्ग, विमुक्‍त जनजातियों या अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस्लाम अपनाता है तो उसे आरक्षण का लाभ देने के लिए पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) यानी BC (Muslim) के रूप में माना जाना चाहिए।

    मद्रास हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणी
    मद्रास हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के इस तर्क और आदेश को खारिज कर दिया था। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया कि जब कोई हिंदू व्यक्ति इस्लाम में परिवर्तित होता है तो वह अपनी पिछली हिंदू जाति या उप-जाति के लाभों को आगे नहीं ले जा सकता है। इस्लाम में किसी व्यक्ति की स्थिति इस बात से तय नहीं होती कि धर्मांतरण से पहले वह किस जाति का हिस्सा था। कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “ईसाई मिशनरियों और इस्लामी प्रचारकों का हमेशा से यह रुख रहा है कि उनके धर्म हिंदू धर्म के विपरीत सामाजिक समानता प्रदान करते हैं।”

    हाईकोर्ट ने आगे कहा, “धर्मांतरण कराने के लिए ऐसा स्टैंड लेने के बाद अब यह दावा करना पूरी तरह से कपटपूर्ण है कि इस्लाम में भी जातिगत पदानुक्रम मौजूद है। हमारी नजर में कुछ संप्रदायों को पिछड़ा और शेष को अगड़ा के रूप में वर्गीकृत करना कुरान के आदेशों के विपरीत है। इस्लाम एक समतावादी समाज की स्थापना करना चाहता है, जहां ईश्वर की नजर में हर कोई समान है और वहां कोई सामाजिक पदानुक्रम नहीं है।”

    हाईकोर्ट के इसी फैसले के बाद अब तमिलनाडु सरकार ने देश की सर्वोच्च अदालत का रुख किया है, जहां इस बात पर अंतिम फैसला होना है कि क्या धर्मांतरित मुस्लिमों को पिछड़ी जाति के तहत आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए या नहीं।

  • पैसा मंदिर का और 50 में 42 मुस्लिम छात्र! मंजूरी रद्द होने के बाद MBBS कर रहे छात्रों का क्या होगा? समझिए विवाद

    पैसा मंदिर का और 50 में 42 मुस्लिम छात्र! मंजूरी रद्द होने के बाद MBBS कर रहे छात्रों का क्या होगा? समझिए विवाद

    नई दिल्ली। नेशनल मेडिकल कमीशन ने जम्मू-कश्मीर के कटरा में स्थित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस को MBBS कोर्स चलाने की अनुमति को रद्द कर देन का फैसला लिया है.

    यह फैसला 2 जनवरी 2026 को हुए अचानक निरीक्षण के बाद लिया गया है. जांच में कॉलेज के शिक्षा देने की व्यवस्था, बुनियादी ढांचा, मरीजों की संख्या और क्लिनिकल सुविधाओं में कई गंभीर कमियां पाई गई हैं. मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड ने इसे न्यूनतम मानकों पर खरा नहीं पाया है. जिसके कारण से NMC अध्यक्ष की मंजूरी लेकर उस कॉलेज की अनुमति रद्द कर दी गई है.

    50 छात्रों में से 42 छात्र मुस्लिम
    ये विवाद तब उभरा जब कॉलेज में 50 छात्रों में से 42 कश्मीरी मुस्लिम छात्रों का प्रवेश हुआ था. भाजपा और कुछ हिंदू संगठन इसे लेकर नाराज हुए और सवाल उठाया कि मंदिर ट्रस्ट के फंड से चलने वाले इस कॉलेज में मुस्लिम छात्रों को प्राथमिकता क्यों मिली है. मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला ने कहा कि दाखिले पूरी तरह NEET और मेरिट के आधार पर हुए और धर्म के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया है. उन्होंने यह भी साफ किया कि यदि कोई संस्था अल्पसंख्यक दर्जा लेना चाहती थी तो उसी समय आवेदन करना चाहिए था.

    MARB ने शिकायतों को जांचने के लिए 2 जनवरी 2026 को अचानक निरीक्षण किया. निरीक्षण में पता चला कि शिक्षण फैकल्टी में 39 फीसदी की कमी थी, ट्यूटर, डेमॉन्स्ट्रेटर और सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों की संख्या 65 फीसदी कम थी. मरीजों की संख्या और क्लिनिकल सेवाएं भी तय मानकों से बहुत कम थीं. OPD में 400 मरीजों की जगह केवल 182 मरीज आए, बेड ऑक्यूपेंसी 80 फीसदी की जगह 45 फीसदी रही और ICU में केवल आधे बेड भरे थे. प्रसव की संख्या हर महीने 25 थी, जबकि यह MARB के अनुसार गंभीर रूप से अपर्याप्त थी.

    हिंदू मुस्लिम नहीं, कॉलेज में थी कमी
    मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला ने कहा कि छात्रों का भविष्य सुरक्षित रहना चाहिए और उन्हें अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में समायोजित किया जाएगा. उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि शिक्षा और प्रवेश प्रक्रिया में सांप्रदायिक राजनीति की कोशिशें हुई हैं, लेकिन NMC और MARB ने साफ किया कि फैसले का आधार केवल कॉलेज की कमियां और नियमों का उल्लंघन था. छात्रों के अच्छाई के लिए उन्हें दूसरे कॉलेजों में बचे हुए सीटों पर भेजा जाएगा.

    इस पूरे विवाद से साफ संदेश गया कि मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और संचालन में नियमों का पालन अनिवार्य है. छात्रों का भविष्य किसी भी राजनीतिक या सामाजिक दबाव, या धर्म के आधार पर प्रभावित नहीं होना चाहिए. NMC और MARB का यह कदम स्वास्थ्य शिक्षा में गुणवत्ता, समानता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में जरूरी माना जा रहा है.