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  • Karnataka में राज्यसभा चुनाव के लिए मुसलमानों से मांग एक सीट…. बढ़ी कांग्रेस की टेंशन

    Karnataka में राज्यसभा चुनाव के लिए मुसलमानों से मांग एक सीट…. बढ़ी कांग्रेस की टेंशन


    नई दिल्ली।
    कर्नाटक (Karnataka) में आगामी राज्यसभा चुनाव (Rajya Sabha elections) को लेकर सियासी सरगर्मी तेज हो गई है। राज्य के मुस्लिम संगठनों (Muslim Organizations) के एक प्रमुख महासंघ ने सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी (Ruling Congress party) के सामने एक बड़ी मांग रख दी है। फेडरेशन ऑफ स्टेट मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशन्स ने मंगलवार को कांग्रेस नेतृत्व से पुरजोर मांग की है कि वह कर्नाटक की चार राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनाव में कम से कम एक सीट मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवार को आवंटित करे।

    कर्नाटक से राज्यसभा की चार सीटों के लिए आगामी 18 जून को मतदान होना है। राज्य विधानसभा में विधायकों की मौजूदा संख्या के बल पर यह साफ है कि इन चार में से 3 सीटों पर कांग्रेस की जीत तय है, जबकि 1 सीट भाजपा के नेतृत्व वाले राजग के खाते में जाने की पूरी संभावना है।

    यह चुनाव उन चार मौजूदा सांसदों का कार्यकाल 25 जून को समाप्त होने के कारण हो रहा है, जो रिटायर हो रहे हैं। इनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस नेता एचडी देवेगौड़ा, भाजपा से इरण कडाडी और नारायण कोरा गप्पा शामिल हैं।

    मुस्लिम महासंघ ने अपने बयान में कहा है, “चूंकि कांग्रेस पार्टी आसानी से तीन सीटें जीतने की स्थिति में है, इसलिए हमारी पुरजोर मांग है कि इन जीतने वाली सीटों में से कम से कम एक सीट मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधि को दी जाए।” संगठन ने इस संबंध में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और केपीसीसी अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से इस मामले में व्यक्तिगत रूप से रुचि लेने का आग्रह किया है।


    मुस्लिम संगठन ने जताई चिंता

    मुस्लिम संगठन ने राज्य से संसद में समुदाय के लगातार घटते प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर चिंता जताई है। आंकड़ों का हवाला देते हुए महासंघ ने कहा कि कर्नाटक से राज्यसभा के कुल 12 मौजूदा सदस्यों में से केवल एक सदस्य मुस्लिम समुदाय से है। अतीत में कर्नाटक से कांग्रेस के टिकट पर कम से कम दो मुस्लिम लोकसभा सांसद चुनकर दिल्ली जाते थे, लेकिन वर्तमान में राज्य से एक भी मुस्लिम लोकसभा सांसद नहीं है।

    कांग्रेस द्वारा मुस्लिम उम्मीदवारों को दिए जाने वाले लोकसभा टिकटों की संख्या भी घटकर अब सिर्फ एक रह गई है। महासंघ के अनुसार, “इन परिस्थितियों के कारण संसद में राज्य के मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है।”


    किस बात की दिलाई याद

    महासंघ ने कांग्रेस नेतृत्व को याद दिलाया कि कर्नाटक में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत से सत्ता में लाने में मुस्लिम समुदाय ने बेहद निर्णायक भूमिका निभाई थी। समुदाय ने एकजुट होकर और एकमुश्त तरीके से कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। किसी भी अन्य समुदाय की तुलना में मुस्लिमों ने सबसे अधिक अनुपात में कांग्रेस को वोट दिया, जो पार्टी की जीत का एक मुख्य आधार बना।

    महासंघ ने असंतोष जताते हुए कहा, “इतने भारी समर्थन के बावजूद राज्य कैबिनेट, नौकरशाही, प्रमुख सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और बोर्ड-निगमों में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व उनकी आबादी और उनके द्वारा दिए गए समर्थन के मुकाबले बेहद कम है।” बयान में यह भी कहा गया कि समुदाय के भीतर अब यह धारणा घर करने लगी है कि कांग्रेस उन निर्वाचन क्षेत्रों में भी मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारने से हिचकती है, जहां जीत की संभावना सबसे ज्यादा होती है।


    राहुल गांधी के विचारों का दिया हवाला

    संगठन ने उम्मीद जताई है कि आगामी राज्यसभा चुनावों में इस कमी को दूर कर कांग्रेस नेतृत्व एक सकारात्मक संदेश दे सकता है। उन्होंने हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा दिए गए निर्देशों का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, राहुल गांधी ने पार्टी की अल्पसंख्यक शाखा को निर्देश दिए थे कि संगठन के भीतर मुस्लिम समुदाय की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को बढ़ाया जाए।

    फेडरेशन ने कहा कि कर्नाटक की सत्ता पर काबिज कांग्रेस को अपने शीर्ष नेतृत्व की इसी सोच और विचारधारा को मजबूत करते हुए राज्यसभा की एक सीट मुस्लिम उम्मीदवार को देनी चाहिए। अब देखना यह होगा कि दिल्ली और बेंगलुरु में बैठा कांग्रेस का आलाकमान इस मांग पर क्या फैसला लेता है।

  • पश्चिम बंगाल में Exit Poll से BJP में उत्साह….. दलितों के साथ मुसलमानों का वोट भी मिला

    पश्चिम बंगाल में Exit Poll से BJP में उत्साह….. दलितों के साथ मुसलमानों का वोट भी मिला


    कोलकाता।
    ज्यादातर एग्जिट पोल्स (Exit Polls) में इस बार पश्चिम बंगाल (West Bengal) में भाजपा (BJP) की जीत का अनुमान लगाया गया है। गुरुवार को सामने आए टुडेज चाणक्य के एग्जिट पोल (Todays Chanakya Exit Poll) में भाजपा को बंपर जीत मिलती दिख रही। बीजेपी को 192 तो टीएमसी (TMC) को 100 सीटें मिल सकती हैं। दोनों के बीच 10 फीसदी वोट शेयर का अंतर रह सकता है। सर्वे में दावा किया गया है कि इस बार भाजपा को पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का भी वोट मिल रहा, जबकि 67 फीसदी दलित भी भाजपा पर भरोसा जता रहे।

    टुडेज चाणक्य एग्जिट पोल के अनुसार, भाजपा को आठ फीसदी मुस्लिम वोट मिल रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस को 71 फीसदी वोट मुस्लिमों का मिल सकता है। 67 फीसदी दलित वोट भाजपा को, जबकि 22 फीसदी टीएमसी को मिलने का अनुमान है। 61 फीसदी ओबीसी वोट भाजपा के खाते में जा सकते हैं, जबकि 27 फीसदी वोट टीएमसी को मिल सकता है। 53 फीसदी एसटी वोट भाजपा को और 40 फीसदी टीएमसी को मिल सकता है। वहीं, इसमें तीन फीसदी प्लस माइनस मार्जिन दिया गया है।

    भाजपा 48 फीसदी वोटों के साथ इस बार राज्य में 192 सीटें जीत सकती है। इसमें मार्जिन 11 सीटों का दिया गया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका लगा सकता है। ममता बनर्जी की पार्टी महज 100 सीटों पर सिमट सकती है। उसे 38 फीसदी वोट मिलने का अनुमान है। वहीं, 14 फीसदी वोट अन्य के खाते में जा सकते हैं, जोकि सीटों में कन्वर्ट होकर दो होंगे। इसमें भी मार्जिन दो का रखा गया है।


    ममता ने उठाए एग्जिट पोल पर सवाल

    ममता बनर्जी ने विभिन्न एग्जिट पोल्स पर सवाल उठाते हुए टीएमसी की बड़ी जीत का दावा किया। बनर्जी ने भरोसा जताया कि चार मई को बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजे घोषित होने के बाद TMC ही सरकार बनाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी गिनती के दौरान किसी भी तरह का खेल नहीं होने देगी। बनर्जी ने एक वीडियो संदेश में कहा, “एग्जिट पोल भाजपा के दफ्तर से आए हैं। ये आंकड़े मनगढ़ंत हैं, जिनका मकसद TMC कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराना है।”

    ज्यादातर बंगाल एग्जिट पोल्स में भाजपा की जीत का अनुमान है। मैट्रिज के अनुसार, टीएमसी को 125-140 सीटें मिल सकती हैं, जबकि भाजपा 146-161 सीटें जीत सकती है। इसके अलावा, पी मार्क्यू के अनुसार, भाजपा को 150-175 सीटें, टीएमसी को 118-138 सीटें मिल सकती हैं। पोल डायरी के अनुसार, भाजपा 142-171 और टीएमसी 99-127 सीटें जीत सकती है। वहीं, पीपुल्स पल्स एग्जिट पोल ने बताया है कि टीएमसी की जीत होगी और उसे 177-187 सीटें मिल सकती हैं। भाजपा को 95-110 सीटें मिलेंगी।

  • घाटी से सौहार्द्रपूर्ण तस्वीर… 36 साल बाद इस मंदिर में हुई रामनवमी पूजा, हिन्दुओं का साथ मुस्लिमों ने भी बढ़-चढ़कर लिया भाग

    घाटी से सौहार्द्रपूर्ण तस्वीर… 36 साल बाद इस मंदिर में हुई रामनवमी पूजा, हिन्दुओं का साथ मुस्लिमों ने भी बढ़-चढ़कर लिया भाग


    श्रीनगर।
    देश भर के कई हिस्सों में जहां रामनवमी (Ram Navami) के मौके पर सांप्रदायिक दंगे और हिंसा की खबरें आती हैं, वहीं कश्मीर घाटी (Kashmir Valley) से एक सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण तस्वीर सामने आई है, जहां दशकों बाद साम्प्रदायिक एकता (Communal Unity) की मिसाल देखने को मिली। यहां के रघुनाथ मंदिर (Raghunath Temple) में 36 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद पहली बार राम नवमी पूजा का आयोजन किया गया, जिसमें हिंदू श्रद्धालुओं के साथ-साथ स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। ऐसे में श्रीनगर के हब्बा कदल इलाके में स्थित रघुनाथ मंदिर गुरुवार को फिर से जीवंत हो उठा। करीब तीन दशक बाद यह मंदिर खुला है।

    हालांकि, इस मंदिर में नवीनीकरण और जीर्णोद्धार का काम अभी भी चल रहा है, फिर भी मंदिर प्रबंधन समिति ने रामनवमी के अवसर पर पूजा का आयोजन किया। प्रबंधन समिति के महासचिव सुनील कुमार ने कहा, “इस मंदिर में 36 साल में पहली बार रामनवमी पूजा आयोजित की जा रही है। हममें से कुछ लोग जम्मू से आए हैं, लेकिन देश और विदेश में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने दान देकर जीर्णोद्धार के कामों में सहयोग दिया है।” उन्होंने बताया कि मंदिर में चल रहे काम के कारण “मूर्ति स्थापना” (मूर्ति की स्थापना) नहीं हो पाई।


    कश्मीरी पंडितों का वापसी का समर्थन करें मुसलमान
    घाटी में कश्मीरी पंडित प्रवासियों की संभावित वापसी के बारे में कुमार ने कहा कि कश्मीरी मुस्लिम समुदाय के सहयोग के बिना ऐसी वापसी संभव नहीं होगी। उन्होंने जोर देकर कहा, “सरकार को हमें फिर से बसाने में एक साल भी नहीं लगेगा, लेकिन कश्मीरी मुसलमानों को हमारी वापसी का समर्थन करना होगा।”

    पर्यटक और सुरक्षा बलों के जवान भी शरीक
    स्थानीय मुस्लिम गुलाम हसन भी समारोह में शामिल होने के लिए मंदिर में मौजूद थे। उन्होंने कहा, “कश्मीरी पंडित और मुस्लिम भाई हैं। हम दशकों से एक साथ रहते आए हैं।” रामनवमी मनाने के लिए शहर के विभिन्न मंदिरों में, जिनमें शंकराचार्य मंदिर भी शामिल है, विशेष प्रार्थनाएं आयोजित की गईं। पर्यटक और सुरक्षा बल भी इन उत्सवों में स्थानीय हिंदू आबादी के साथ शामिल हुए।

  • मुम्बई में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेश-म्यांमार से आए हजारों मुसलमान…

    मुम्बई में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेश-म्यांमार से आए हजारों मुसलमान…


    मुंबई।
    हाल के दिनों में भारत (India) में घुसपैठियों (Intruders) का मुद्दा काफी गर्म है। असम (Assam ) से लेकर पश्चिम बंगाल (West Bengal) और अन्य सीमावर्ती राज्यों में यही चर्चा में है। एसआईआर (ASI) के जरिए वोटर लिस्ट (Voter list) में सुधार करके घुसपैठियों को बाहर निकालने की कवायद चल रही है। इस बीच मुंबई से एक चौंकाने वाली रिपोर्ट आई है। इसके मुताबिक मुंबई में बड़ी संख्या में मुसलमान (Muslim) बांग्लादेश और म्यांमार (Bangladesh and Myanmar) से अवैध रूप से लोग आकर बसे हुए हैं। सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि इन लोगों ने यहां आने के बाद वोटर कार्ड और आधार कार्ड जैसे वैध भारतीय पहचान पत्र बनवा लिए हैं। जिस प्रक्रिया के जरिए इन अवैध प्रवासियों को मुंबई में बसाया जा रहा है, उसे ‘मलवानी पैटर्न’ कहा जाता है।


    कुल 61 इलाके

    रिपोर्ट में बताया गया है कि मुंबई में कुल ऐसे 61 इलाके चिह्नित किए गए हैं, जहां पर अवैध प्रवासी मिले हैं। इस रिपोर्ट के कुल कुल सात हजार से अधिक लोगों से इंटरव्यू किए गए। रिपोर्ट में बताया गया है कि इंटरव्यू में यह सामने आया कि इसमें से 3014 लोगों ने बिना वीजा-पासपोर्ट के ही भारत में एंट्री की। इसमें भी 96 फीसदी लोग मुसलमान हैं जो बांग्लादेश और म्यांमार से भारत में आए हुए हैं। इस रिसर्च को अंजाम देने वाले एक प्रोफेसर ने बताया कि गरीब लोग बांग्लादेश छोड़ देते हैं। वह भारत में आते हैं और यहां आकर जाली दस्तावेज बनवा लेते हैं। यहां पर वो वोटर बन जाते हैं और नगर निकाय, विधानसभा और लोकसभा चुनावों में वोट डालने लगते हैं। ‘ग्रे रेलिजियस नेटवर्क’ के चलते इनकी संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है।


    एजेंटों की कारगुजारी

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अवैध प्रवासियों के पास नकली दस्तावेज आता कहां से है। इसमें बताया गया है कि शहर के अलग-अलग हिस्सों में एजेंट्स हैं। यह लोग सात हजार से लेकर 30 हजार रुपए तक में सभी पहचान पत्र मुहैया करा देते हैं। रिसर्च में शामिल प्रोफेसर ने बताया कि अवैध रूप से भारत आने वाला स्थानीय एजेंट से मिलता है। इसके बाद एजेंट एक तय कीमत पर उन्हें वोटर कार्ड से लेकर आधार और पैन कार्ड तक मुहैया कराता है। उन्होंने कहा कि यह सिस्टम पिछले 12-13 साल से काम कर रहा है। इससे अवैध प्रवासियों के लिए भारत में बसना आसान हो जाता है। एक बार वोटर कार्ड मिल जाने के बाद इनके लिए चीजें काफी आसान हो जाता है।


    स्थानीय नेताओं की कारगुजारी

    रिपोर्ट में यह भी बताया कि मुंबई में छह विधानसभा क्षेत्रों, एक लोकसभा सीट और 56 म्यूनिसिपल वार्डों में इन अवैध वोटरों का असर है। इसके मुताबिक जितने लोगों का सर्वे किया गया, उनमें से 73 फीसदी लोगों के पास वोटर कार्ड मौजूद था। अवैध प्रवासियों को बसाने के लिए किसी दलदली इलाके में एक अवैध बस्ती बसाई जाती है। इसके बाद बिना डोम के मस्जिद बनाई जाती है। स्थानीय प्रभावशाली नेता इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाते हैं। इसके बाद नकली दस्तावेज तैयार किए जाते हैं। फिर स्थानीय वोटर लिस्ट में बदलाव कर दिया जाता है। फिर उनके फंडिंग का इंतजाम किया जाता है।