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  • PoK चुनाव पर पाकिस्तान में बढ़ा सियासी घमासान, PML-N ने बहुमत का दावा किया तो बिलावल ने उठाए गंभीर सवाल

    PoK चुनाव पर पाकिस्तान में बढ़ा सियासी घमासान, PML-N ने बहुमत का दावा किया तो बिलावल ने उठाए गंभीर सवाल

    नई दिल्ली । पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में विधानसभा चुनाव के दूसरे चरण के बाद राजनीतिक विवाद और गहरा गया है। मतगणना पूरी होने से पहले ही पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) ने साधारण बहुमत हासिल कर सरकार बनाने का दावा कर दिया है। दूसरी ओर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए बड़े पैमाने पर धांधली के आरोप लगाए हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर शिकायतों की अनदेखी करने का आरोप लगाया और विवादित सीटों पर दोबारा मतदान कराने की मांग की है।

    प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सलाहकार राणा सनाउल्ला ने दावा किया कि 45 सदस्यीय विधानसभा में उनकी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आवश्यक समर्थन मिल चुका है। उनके अनुसार दूसरे चरण में पीएमएल-एन ने 13 सीटों पर जीत दर्ज की है और मुजफ्फराबाद क्षेत्र की सात सीटों में से चार पर सफलता हासिल की है। उन्होंने कहा कि पार्टी कुल 23 सीटों तक पहुंच गई है, जिससे उसे साधारण बहुमत प्राप्त हो गया है। वहीं पीपीपी के हिस्से में मुजफ्फराबाद की तीन सीटें आने का दावा किया गया।

    इन दावों के बीच बिलावल भुट्टो जरदारी ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चुनाव के दूसरे चरण में व्यापक स्तर पर अनियमितताएं हुई हैं। उनका आरोप है कि उनकी पार्टी ने चुनाव आयोग के समक्ष कई शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन उन पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। उन्होंने कहा कि यदि चुनाव आयोग समय रहते शिकायतों पर कार्रवाई करता तो उसकी विश्वसनीयता बनी रहती। बिलावल ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी चुनाव परिणामों का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करेगी और जिन निर्वाचन क्षेत्रों में धांधली के आरोप हैं वहां पुनर्मतदान की मांग करेगी।

    चुनाव प्रक्रिया के दौरान कई इलाकों में तनावपूर्ण स्थिति भी देखने को मिली। मतदान केंद्रों तक चुनाव कर्मियों को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच पहुंचाया गया। सुरक्षा के लिए स्थानीय पुलिस के साथ पंजाब और सिंध से अतिरिक्त पुलिस बल की भी तैनाती की गई। इसके बावजूद कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए और प्रदर्शनकारियों ने सड़कें अवरुद्ध कर मतदान प्रक्रिया का विरोध किया। कुछ इलाकों में मतदान प्रभावित होने की भी खबरें सामने आईं।

    प्रतिबंधित जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने चुनाव प्रक्रिया का विरोध करते हुए आरोप लगाया कि विधानसभा की 12 विवादित सीटों को लेकर पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है। संगठन का कहना है कि इन सीटों के जरिए राजनीतिक समीकरण प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। प्रदर्शनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी शिकायतों और विरोध प्रदर्शनों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। चुनाव के पहले चरण के दौरान भी सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पों की घटनाएं सामने आई थीं, जिससे पूरे क्षेत्र में पहले से ही तनाव का माहौल बना हुआ था।

    पीओके की 45 सदस्यीय विधानसभा के लिए चुनाव तीन चरणों में कराए जा रहे हैं। पहले चरण में मीरपुर डिवीजन की 13 सीटों पर मतदान हुआ था, जबकि दूसरे चरण में मुजफ्फराबाद और शरणार्थी सीटों पर वोट डाले गए। तीसरे चरण का मतदान पुंछ डिवीजन की नौ सीटों पर निर्धारित है। इस बीच भारत लगातार यह दोहराता रहा है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख सहित पाकिस्तान के कब्जे वाले सभी क्षेत्र भारत के अभिन्न और अविभाज्य अंग हैं तथा वहां कराया जा रहा चुनाव भारत के दृष्टिकोण से वैध नहीं माना जाता। ऐसे में चुनावी परिणामों के साथ-साथ राजनीतिक विवाद और विरोध प्रदर्शन आने वाले दिनों में भी चर्चा का विषय बने रह सकते हैं।

  • पीओके में जेएएसी का लॉन्ग मार्च शुरू, अधिकारियों से वार्ता विफल होने के बाद बढ़ा राजनीतिक तनाव

    पीओके में जेएएसी का लॉन्ग मार्च शुरू, अधिकारियों से वार्ता विफल होने के बाद बढ़ा राजनीतिक तनाव

    नई दिल्ली । पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) और पाकिस्तानी अधिकारियों के बीच हुई बातचीत किसी साझा सहमति पर नहीं पहुंच सकी, जिसके बाद क्षेत्र में प्रस्तावित लॉन्ग मार्च शुरू हो गया। रावलकोट से मुजफ्फराबाद तक निकाले जा रहे इस मार्च के चलते इलाके में राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी गतिविधियां तेज हो गई हैं। घटनाक्रम पर विभिन्न संगठनों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर बनी हुई है।

    जेएएसी ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि वह अपनी मांगों को लेकर चरणबद्ध तरीके से लॉन्ग मार्च आयोजित करेगा। योजना के अनुसार विभिन्न स्थानों से प्रदर्शनकारी एकत्र होकर रावलकोट पहुंचे और वहां से मुजफ्फराबाद की ओर कूच किया। आंदोलन के आयोजकों का कहना है कि उनकी मांगों को लेकर हुई वार्ता का कोई स्वीकार्य समाधान नहीं निकल सका, जिसके कारण आंदोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया।

    इस बीच यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी (यूकेपीएनपी) ने पाकिस्तानी प्रशासन से संयम बरतने की अपील की है। संगठन ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेने वाले लोगों के खिलाफ किसी भी प्रकार के बल प्रयोग से बचा जाना चाहिए। उसके अनुसार शांतिपूर्ण विरोध, संगठन बनाने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार सिद्धांतों के तहत महत्वपूर्ण अधिकार हैं, जिनका हर परिस्थिति में सम्मान किया जाना चाहिए।

    यूकेपीएनपी ने यह भी दावा किया कि क्षेत्र में पिछले कुछ समय से जारी अशांति के दौरान कई लोगों की जान जा चुकी है। संगठन ने ऐसी सभी घटनाओं पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि प्रत्येक मौत या घायल होने की घटना की निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच होनी चाहिए, ताकि यदि कहीं कोई जिम्मेदारी बनती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।

    मार्च की घोषणा के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी गई है। विभिन्न सुरक्षा बलों की अतिरिक्त तैनाती की खबरों के बीच प्रशासन हालात पर नजर बनाए हुए है। बढ़ी हुई सुरक्षा व्यवस्था के कारण इलाके में तनाव का माहौल बना हुआ है, हालांकि प्रदर्शनकारी अपने कार्यक्रम को शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाने की बात कह रहे हैं। प्रशासन की ओर से भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।

    यूकेपीएनपी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की है। संगठन का कहना है कि वैश्विक संस्थाओं और प्रमुख देशों को क्षेत्र की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए तथा संवाद और शांतिपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके साथ ही स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया से भी घटनाक्रम की निष्पक्ष निगरानी और रिपोर्टिंग की अपील की गई है।

    विश्लेषकों का मानना है कि पीओके में मौजूदा घटनाक्रम आने वाले दिनों में क्षेत्रीय स्थिति को प्रभावित कर सकता है। यदि वार्ता की प्रक्रिया दोबारा शुरू होती है और सभी पक्ष बातचीत के माध्यम से समाधान तलाशते हैं तो तनाव कम होने की संभावना बन सकती है। वहीं यदि गतिरोध बना रहता है तो क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां और विरोध प्रदर्शन आगे भी जारी रह सकते हैं। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर है कि प्रशासन और आंदोलनकारी आगे की स्थिति को किस प्रकार संभालते हैं और क्या दोनों पक्ष किसी नए संवाद के रास्ते पर सहमत हो पाते हैं।

  • पीओके में 1971 जैसा जनविद्रोह: ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में पाकिस्तानी फौज को चुनौती, मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी के बीच उठी भारत में विलय की मांग

    पीओके में 1971 जैसा जनविद्रोह: ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में पाकिस्तानी फौज को चुनौती, मानवाधिकार संगठनों की चुप्पी के बीच उठी भारत में विलय की मांग

    नई दिल्ली । वर्ष 1971 में पाकिस्तान की दमनकारी नीतियों और सैन्य बर्बरता के परिणामस्वरूप तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोह की जो आग भड़की थी, उसने इतिहास की दिशा बदलते हुए बांग्लादेश को जन्म दिया था। आज करीब 55 साल बाद, इतिहास एक बार फिर खुद को दोहराता हुआ प्रतीत हो रहा है। इस बार बगावत का यह मुख्य केंद्र पूर्वी पाकिस्तान नहीं, बल्कि पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला कश्मीर यानी पीओके बना हुआ है। पिछले कई दिनों से जारी भारी विरोध प्रदर्शनों के कारण स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण हो गई है और राजनीतिक विश्लेषक अब पाकिस्तान के एक और संभावित विभाजन की अटकलें लगाने लगे हैं।

    पीओके के मुजफ्फरराबाद, डड्याल, रावलकोट और मीरपुर जैसे प्रमुख शहरों में स्थानीय अवाम अपनी बुनियादी जरूरतों जैसे आटा, चावल और सस्ती बिजली की मांग को लेकर सड़कों पर उतरी है। इस शांतिपूर्ण नागरिक प्रदर्शन को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना और सरकार द्वारा अत्यधिक दमनकारी नीतियां अपनाई जा रही हैं। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए सैन्य बलों ने प्रमुख पुलों और रास्तों को अपने नियंत्रण में ले लिया है और भीड़ पर सीधे गोलीबारी की है। इस सैन्य कार्रवाई में अब तक दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं और कई नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, जिससे क्षेत्र में आक्रोश की अग्नि और अधिक धधक गई है।

    वर्तमान में पीओके के भीतर जो परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, वे काफी हद तक 1971 के घटनाक्रम से मेल खाती हैं। उस दौर में जिस प्रकार तत्कालीन केंद्र सरकार पूर्वी पाकिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर उसे पश्चिमी हिस्से के विकास में लगाती थी, ठीक वैसा ही व्यवहार आज पीओके के साथ किया जा रहा है। क्षेत्र में स्थित जलविद्युत बांधों से बड़े पैमाने पर बिजली का उत्पादन तो किया जाता है, परंतु उसका लाभ स्थानीय निवासियों को देने के बजाय पाकिस्तान के अन्य प्रांतों को भेज दिया जाता है, जिससे पूरा पीओके अक्सर अंधेरे में डूबा रहता है।

    इस दमन और शोषण के विरुद्ध लड़ रहे लोगों की आवाज को संगठित करने के लिए वहां ‘ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (JAAC) नामक संस्था प्रमुख भूमिका निभा रही है, जिसकी तुलना जानकार 1971 की ‘मुक्ति वाहिनी’ से कर रहे हैं। हालांकि, इस ऐतिहासिक घटनाक्रम और वर्तमान आंदोलन में एक बड़ा वैचारिक अंतर भी साफ देखा जा सकता है। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग कर रहा था, जबकि आज पीओके की जनता न केवल पाकिस्तान से पूर्ण मुक्ति चाहती है, बल्कि वे सार्वजनिक रूप से भारत के पक्ष में नारे लगाते हुए भारत सरकार से सैन्य व कूटनीतिक हस्तक्षेप की गुहार लगा रहे हैं।

    इस बेहद गंभीर मानवीय संकट के बावजूद, वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों का ढोल पीटने वाले कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और प्रमुख पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने इस विषय पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। कश्मीर के नाम पर अक्सर भारत के खिलाफ नकारात्मक प्रचार करने वाले वैश्विक मंच और समाचार एजेंसियां पीओके में हो रहे इस दमन पर मौन हैं। दूसरी ओर, भारत का रुख इस मामले पर हमेशा से अत्यंत स्पष्ट रहा है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और पीओके भारत का अभिन्न अंग है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की उपेक्षा के बीच एलओसी के उस पार से उठ रही यह पुकार आने वाले समय में दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को एक नया मोड़ दे सकती है।

  • PoK में संकट गहराया, भोजन, दवा और ईंधन की भारी कमी, विरोध दबाने के आरोपों के बीच हालात तनावपूर्ण

    PoK में संकट गहराया, भोजन, दवा और ईंधन की भारी कमी, विरोध दबाने के आरोपों के बीच हालात तनावपूर्ण

    इस्लामाबाद। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में जारी सरकार-विरोधी प्रदर्शनों के बीच हालात गंभीर हो गए हैं। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, इस्लामाबाद पर आरोप है कि उसने विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए क्षेत्र में भोजन, राशन, दवाओं और ईंधन की आपूर्ति पर रोक जैसी स्थिति पैदा कर दी है, जिससे कई इलाकों में मानवीय संकट गहरा गया है।

    रिपोर्टों के मुताबिक मुजफ्फरनगर, पुंछ, रावलाकोट, बाग और नीलम घाटी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में खाद्यान्न और आवश्यक वस्तुओं की भारी कमी देखी जा रही है। स्थानीय लोगों, ट्रक ड्राइवरों और विपक्षी नेताओं का कहना है कि आवश्यक सामान ले जाने वाले वाहनों को सीमा चौकियों पर रोका जा रहा है, जिससे स्थिति और बिगड़ गई है।

    जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहे शटडाउन और विरोध प्रदर्शनों के कारण पहले से ही आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित थी, लेकिन अब इसे और गंभीर बताया जा रहा है। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों ने किसी भी प्रकार की नाकेबंदी से इनकार किया है, जबकि BBC उर्दू और डॉन जैसी मीडिया रिपोर्टों में हालात को चिंताजनक बताया गया है।

    सीमा चौकियों पर वाहनों की आवाजाही प्रभावित

    स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, पीओके में खाद्यान्न और दवाओं की कमी के बाद लोग खैबर पख्तूनख्वा, रावलपिंडी और इस्लामाबाद से सामान लाने को मजबूर हैं, लेकिन उन्हें सीमा चौकियों पर रोका जा रहा है। आजाद पट्टन और फगवारी क्षेत्रों में तैनात पुलिस द्वारा व्यावसायिक और निजी वाहनों की जांच की जा रही है, जिससे कई वाहन लंबे समय से रुके हुए हैं और खराब होने वाला सामान नष्ट हो रहा है।

    स्थानीय लोगों की परेशानियां बढ़ीं

    स्थानीय नागरिकों के अनुसार स्थिति बेहद कठिन हो गई है। एक निवासी नवीद ने बताया कि उन्हें रावलपिंडी से लाया गया भोजन और दवाएं ले जाने से रोका गया और कथित तौर पर सामान फेंकने के बाद ही आगे बढ़ने की अनुमति देने की बात कही गई।

    नीलम घाटी के निवासी अलिफ दीन के अनुसार, शटडाउन और आपूर्ति बाधित होने के कारण पिछले कई दिनों से राशन उपलब्ध नहीं है। सरकारी डिपो पर भुगतान के बावजूद लोगों को आटा नहीं मिल पा रहा है और खुले बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।

    दवा और ईंधन की गंभीर कमी

    मुजफ्फरनगर के 64 वर्षीय मोहम्मद मकीन ने बताया कि क्षेत्र में दवाओं की भारी कमी है और सभी बड़े मेडिकल स्टोर पिछले दो सप्ताह से बंद पड़े हैं। वहीं पुंछ और मुजफ्फरनगर में पेट्रोल पंप बंद होने से लोग ब्लैक मार्केट से महंगा ईंधन खरीदने को मजबूर हैं।

    आरोप और राजनीतिक बयानबाजी

    पाकिस्तानी अधिकारियों ने नाकेबंदी के आरोपों से इनकार किया है, जबकि मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि सरकार बिना सीधे बल प्रयोग के प्रदर्शन समाप्त करने के लिए आपूर्ति लाइन बाधित करने की रणनीति अपना रही है।

    पीओके में जारी विरोध का मुख्य कारण जम्मू-कश्मीर शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 विधानसभा सीटें बताई जा रही हैं। स्थानीय समूहों का आरोप है कि इन सीटों के माध्यम से चुनावी प्रक्रिया प्रभावित की जाती है। इसी मुद्दे पर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में आंदोलन जारी है, जिसके दौरान इंटरनेट सेवाएं भी बाधित की गई हैं। रिपोर्टों के अनुसार, झड़पों में अब तक कम से कम 58 लोगों की मौत का दावा किया गया है।

    पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की पीओके इकाई ने सोशल मीडिया पर इस कार्रवाई की आलोचना करते हुए इसे गंभीर दमन बताया है।

    बड़ा आंदोलन जारी

    रिपोर्टों के अनुसार, रावलाकोट के ईदगाह मैदान में चल रहे धरने में पिछले दो हफ्तों में 70,000 से अधिक लोग शामिल हुए हैं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी ने चेतावनी दी है कि यदि मांगें पूरी नहीं की गईं तो मुजफ्फरनगर तक 1,00,000 लोगों का बड़ा मार्च निकाला जा सकता है।