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  • लापता अभिनेता राज किरण का रहस्यमयी अतीत: 23 वर्षों से गायब 80 के दशक के सितारे की अनसुलझी दास्तान

    लापता अभिनेता राज किरण का रहस्यमयी अतीत: 23 वर्षों से गायब 80 के दशक के सितारे की अनसुलझी दास्तान

    नई दिल्ली । 80 के दशक के प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता राज किरण के रहस्यमयी तरीके से गायब होने की खबर एक बार फिर चर्चा में है। 23 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस बात का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिल सका है कि सौ से अधिक फिल्मों में काम कर चुके यह अभिनेता इस समय कहां हैं। वर्ष 1975 में 26 साल की उम्र में कागज की नाव फिल्म से अपने अभिनय करियर की शुरुआत करने वाले इस कलाकार ने कर्ज और अर्थ जैसी यादगार फिल्मों में काम किया था। वर्ष 1980 में उनकी आठ फिल्में प्रदर्शित हुई थीं, जिससे वे उस दौर के प्रमुख अभिनेताओं में शामिल हो गए थे।

    वर्ष 1990 के दशक में काम न मिलने और आर्थिक तंगी के कारण अभिनेता मानसिक तनाव का शिकार हो गए थे। पारिवारिक समस्याओं और वैवाहिक जीवन में तनाव के चलते उनकी स्थिति बिगड़ती चली गई। डिप्रेशन के कारण उन्होंने उस दौर में बन रही कई बड़ी फिल्मों की शूटिंग बीच में ही छोड़ दी थी। इसके बाद वे अमेरिका चले गए, जहां उनके टैक्सी चलाने और बाद में मुंबई के एक मेंटल अस्पताल में भर्ती होने की खबरें सामने आई थीं। हालांकि, अस्पताल से बाहर आने के बाद भी जब उन्हें फिल्मों में काम नहीं मिला, तो वे पुनः विदेश चले गए।

    वर्ष 2011 में जब दिवंगत अभिनेता ऋषि कपूर ने अमेरिका यात्रा के दौरान उनके भाई से संपर्क किया, तब यह बात सामने आई थी कि वे अटलांटा के एक मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती हैं। हालांकि, अभिनेता के परिजनों ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा था कि वे खुद कई सालों से उनकी तलाश कर रहे हैं। वर्तमान में भी निजी जांचकर्ताओं और उद्योग से जुड़े लोगों द्वारा उनकी खोज जारी है, लेकिन अब तक उनका कोई आधिकारिक सुराग नहीं मिल पाया है। 80 के दशक का यह स्थापित कलाकार आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े अनसुलझे रहस्यों में से एक बना हुआ है।

  • दक्षिण भारत के ऐतिहासिक मंदिरों की नक्काशी ने वैज्ञानिकों को किया हैरान..

    दक्षिण भारत के ऐतिहासिक मंदिरों की नक्काशी ने वैज्ञानिकों को किया हैरान..

    नई दिल्ली । भारतीय वास्तुकला और प्राचीन इतिहास हमेशा से ही अपने भीतर कई अनसुलझे रहस्यों को समेटे हुए है। समकालीन दुनिया में जब भी समय यात्रा या ‘टाइम ट्रेवल’ का उल्लेख होता है, तो सामान्यतः हॉलीवुड की फिल्मों या विज्ञान कथाओं का ध्यान आता है। लेकिन दक्षिण भारत के कुछ बेहद प्राचीन मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों ने आधुनिक विज्ञान और अनुसंधानकर्ताओं को एक नए विमर्श पर मजबूर कर दिया है। इन ऐतिहासिक स्थलों की वास्तुकला और पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी इस सीमा तक विस्मयकारी है कि इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो उस दौर के शिल्पकारों को भविष्य की तकनीकों का आभास था या उनके पास कोई अत्यंत उन्नत वैज्ञानिक समझ मौजूद थी।

    तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में स्थित पंचवर्णस्वामी मंदिर इस अनूठे रहस्य का एक अत्यंत सटीक उदाहरण प्रस्तुत करता है। लगभग दो हजार वर्ष प्राचीन माने जाने वाले इस ऐतिहासिक मंदिर की एक दीवार पर एक ऐसी नक्काशी देखने को मिलती है जो आधुनिक इतिहासकारों को चकित कर देती है। इस नक्काशी में एक मानव आकृति को स्पष्ट रूप से दो पहियों वाली साइकिल जैसी सवारी चलाते हुए प्रदर्शित किया गया है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, आधुनिक दुनिया में साइकिल का आविष्कार उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सदियों पहले के मूर्तिकारों ने एक ऐसी सवारी की परिकल्पना कैसे की, जिसे पैडल मारकर चलाया जाता है। इसे लेकर विभिन्न विशेषज्ञ प्राचीन विज्ञान के उन्नत होने के कयास लगा रहे हैं।

    इसी प्रकार का तकनीकी कौतूहल कर्नाटक के प्रसिद्ध होयसलेश्वर मंदिर में भी देखने को मिलता है। इस मंदिर की दीवारों पर स्थापित कुछ मूर्तियों के हाथों में ऐसे उपकरण और आकृतियां दिखाई देती हैं, जो वर्तमान समय के आधुनिक गैजेट्स, गियर अथवा यांत्रिक पुर्जों से अत्यधिक मेल खाती हैं। कुछ विशिष्ट आकृतियों में इतनी सूक्ष्मता से काम किया गया है कि वे किसी दूरबीन या सूक्ष्मदर्शी यंत्र जैसी प्रतीत होती हैं। ग्रेनाइट जैसे अत्यंत कठोर पत्थरों पर इतनी फिनिशिंग और सटीकता के साथ आकृतियों को उकेरना आज की अत्याधुनिक मशीनों के बिना अत्यंत कठिन माना जाता है, जो इस बात की ओर संकेत करता है कि प्राचीन काल में निर्माण तकनीक हमारी वर्तमान सोच से कहीं अधिक विकसित थी।

    इन सबमें सबसे अधिक चौंकाने वाला रहस्य कुछ मंदिरों के स्तंभों पर मिली वह नक्काशी है, जो आधुनिक अंतरिक्ष यात्री यानी एस्ट्रोनॉट की वेशभूषा से मिलती-जुलती है। इस विशिष्ट आकृति के सिर पर एक गोल हेलमेट जैसी संरचना है और पीठ पर एक ऐसा उपकरण बंधा हुआ दिखाई देता है जो आधुनिक स्पेससूट के ऑक्सीजन टैंक जैसा प्रतीत होता है। उस प्राचीन काल में, जब विमानन तकनीक का विकास नहीं हुआ था, पत्थरों पर ऐसी आकृति का पाया जाना शोधकर्ताओं के लिए एक बड़ी पहेली बना हुआ है। यही कारण है कि जिज्ञासु और विश्लेषक इन प्राचीन धरोहरों को समय यात्रा के विजुअल साक्ष्यों से जोड़कर देखने लगे हैं।

    वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक और इतिहासकार इन प्राचीन कलाकृतियों के पीछे छिपे वास्तविक कारणों का पता लगाने में जुटे हैं। जहां कुछ विश्लेषक इसे केवल एक संयोग या कलात्मक कल्पना का परिणाम मानते हैं, वहीं विशेषज्ञों का एक वर्ग यह तर्क देता है कि प्राचीन भारतीय विज्ञान और विमानन शास्त्र का स्तर अत्यंत उच्च था। प्राचीन ग्रंथों और संहिताओं में भी ऐसी उन्नत तकनीकों के सांकेतिक संदर्भ मिलते हैं। कारण चाहे जो भी हो, दक्षिण भारत के ये ऐतिहासिक मंदिर इस तथ्य की पुष्टि अवश्य करते हैं कि हमारी प्राचीन सांस्कृतिक और वैज्ञानिक विरासत में ऐसे अनेक रहस्य छिपे हैं, जिनकी पूर्ण व्याख्या करने में आधुनिक विज्ञान को अभी लंबा समय लगेगा।

  • बाघ की खाल से भस्म तक… महादेव के ये 10 प्रतीक बताते हैं जीवन, मृत्यु और ब्रह्मांड के गहरे रहस्य

    बाघ की खाल से भस्म तक… महादेव के ये 10 प्रतीक बताते हैं जीवन, मृत्यु और ब्रह्मांड के गहरे रहस्य


    नई दिल्‍ली । महादेव जो कुछ भी धारण करते हैं उसका बड़ा अर्थ होता है. शिव जी का स्वरूप अन्य सभी देवी-देवताओं से अलग और विचित्र है. गले में सांप, जटा में गंगा और मस्तक पर चंद्रमा का होना अपने भीतर गहरे रहस्यों को छुपाए हुए है. लेकिन क्या आपको पता है कि महादेव की धारण की हुई 10 प्रतीकों का क्या मतलब है.

    ब्रह्मांड, जीवन और मृत्यु के गहरे रहस्यों को दर्शाने वाले डमरू से लेकर भस्म तक महादेव के इन 10 मुख्य प्रतीकों का क्या अर्थ है. आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

    महादेव के 10 मुख्य प्रतीक
    1. जटाएं: शिव जी की जटाएं उसकी सबसे बड़ी पहचान है जो अंतरिक्ष को दर्शाता है.

    2. चंद्र: शिव जी के मस्तक पर स्थित चंद्रमा व्यक्ति के मन का प्रतीक है जो समय चक्र, मन के नियंत्रण, और शीतलता को दर्शाता है.

    3. त्रिनेत्र: शिव की तीन आंखें भौतिक संसार से परे दिव्य दृष्टि, सर्वज्ञान और संतुलन को दर्शाती हैं. मान्यता है कि महादेव के त्रिनेत्र तीन गुणों का भी प्रतीक है- सत्व, रज, तम. त्रिनेत्र तीन कालों को भी दर्शाता है- भूत, वर्तमान, भविष्य. तीनों लोकों के बारे में भी बताता है- स्वर्ग, मृत्यु पाताल.

    4. सर्पहार: सर्प जैसा हिंसक जीव महादेव के गले में विराजता है जो तमोगुणी व संहारक होकर भी शिव जी के वश में है और उनकी भक्ति में लीन है. नागराज वासुका का महादेव के गले में होना नियंत्रण और संतुलन को दर्शाता है.

    5. त्रिशूल: शिव के हाथ में एक शस्त्र भी है, वह मारक शस्त्र त्रिशूल है जो भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करने की शक्ति रखता है.

    6. डमरू: शिव जी एक हाथ में डमरू धारण करते हैं जो तांडव के समय बजाते हैं. डमरू का नाद ब्रह्मा रूप माना गया है. यह डमरू सृष्टि के निर्माण, ब्रह्मांड की लय और चेतना का प्रतीक है.

    7. मुंडमाला: शिव जी के गले में मुंडमाला का होना सती के अटूट प्रेम और अमरता को दर्शाता है. यह मुंडमाला इस बात का प्रतीक है कि शिव जी ने मृत्यु को अपने वश में किया हुआ है.

    8. छाल: शिव जी अपने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल धारण करते हैं. बाघ एक हिंसक जानवर है जो अहंकार को भी दर्शाता है. जिसका मतलब है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबाया हुआ है. संसार के हर व्यक्ति को अपने भीतर की हिंसक भावना को अपने नीचे दबा देना चाहिए.

    9. भस्म: महादेव अपने शरीर पर भस्म लगाते हैं. शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म करने का विधान है. भस्म जीवन के गहरे रहस्य को बताता है. यह भस्म बताता है कि संसार नश्वर है.

    10. वृषभ: शिव का वाहन वृषभ है यानी बैल दो शिव जी के साथ-साथ होता है. बैल धर्म का प्रतीक माना गया है जिस पर महादेव सवारी करते हैं. बैल के 4 पैर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को बताता है जो महादेव की कृपा से प्राप्त होती है.

    (डिस्क्लेमर- यह सामग्री धार्मिक मान्यताओं, प्रचलित परंपराओं एवं उपलब्ध धार्मिक स्रोतों पर आधारित है. विभिन्न क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार मान्यताओं में अंतर संभव है.)

  • होयसल राजवंश कालीन 1000 वर्ष पुराने मंदिर का रहस्य विज्ञान के लिए भी पहेली, दीपावली पर कपाट खुलने के बाद उमड़ती है लाखों श्रद्धालुओं की भारी भीड़

    होयसल राजवंश कालीन 1000 वर्ष पुराने मंदिर का रहस्य विज्ञान के लिए भी पहेली, दीपावली पर कपाट खुलने के बाद उमड़ती है लाखों श्रद्धालुओं की भारी भीड़

    नई दिल्ली । भारत के प्राचीन और ऐतिहासिक देवस्थलों में छिपे रहस्य अक्सर आधुनिक विज्ञान और पुरातत्वविदों को हैरत में डाल देते हैं। ऐसा ही एक अविश्वसनीय और बेहद रहस्यमयी मामला दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य से सामने आया है, जहां हासन शहर में स्थित करीब 1000 साल पुराना ‘हसनंबा मंदिर’ अपने अनोखे चमत्कारों के लिए पूरी दुनिया में कौतूहल का विषय बना हुआ है। यह मंदिर आम धार्मिक स्थलों की तरह प्रतिदिन श्रद्धालुओं के लिए नहीं खुलता है, बल्कि इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे वर्ष में केवल एक बार, दीपावली के पावन त्योहार के दौरान मात्र 10 से 12 दिनों के लिए ही खोला जाता है। शेष पूरे वर्ष इस मंदिर के भारी कपाट पूरी तरह से बंद और सील रहते हैं।

    इस प्राचीन मंदिर का इतिहास बेहद गौरवशाली है और इसका सीधा संबंध ऐतिहासिक होयसल राजवंश से जुड़ता है। मशहूर ऐतिहासिक दस्तावेजों के साथ-साथ मैसूर गजेटियर जैसी प्रामाणिक सरकारी किताबों में इस मंदिर के महात्म्य और राजाओं की अगाध श्रद्धा का विस्तृत विवरण मिलता है। होयसल शासकों के काल में निर्मित इस मंदिर की अद्भुत वास्तुकला और स्थापत्य शैली को देखकर आज भी पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञ दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। प्रामाणिक ऐतिहासिक कड़ियों और सरकारी गजेटियर में दर्ज होने के कारण इस मंदिर की साख और इसका ऐतिहासिक महत्व शोधकर्ताओं के बीच और अधिक बढ़ जाता है।

    मंदिर से जुड़ा सबसे बड़ा वैज्ञानिक सस्पेंस इसके गर्भगृह के भीतर घटित होने वाली वह घटना है, जो भौतिक विज्ञान के नियमों को सीधी चुनौती देती नजर आती है। दीपावली के उत्सव की समाप्ति के बाद जब इस मंदिर को आगामी एक वर्ष के लिए बंद किया जाता है, तब मुख्य पुजारी द्वारा गर्भगृह के भीतर एक विशेष अनुष्ठान संपन्न किया जाता है। मंदिर को अंतिम रूप से बंद करने से ठीक पहले माता हसनंबा की दिव्य मूर्ति के समक्ष घी का एक दीया प्रज्वलित करके रख दिया जाता है। इसके साथ ही देवी मां को ताजे पके हुए चावलों का नैवेद्य अर्पित किया जाता है और कुछ बेहद सुंदर ताजे फूल भी चरणों में चढ़ाए जाते हैं।

    इन सभी सामग्रियों को गर्भगृह के भीतर यथास्थान सजाकर मंदिर के मुख्य विशाल द्वारों को बंद कर दिया जाता है और प्रशासन व पुजारियों की मौजूदगी में उन्हें पूरी तरह सील कर दिया जाता है। इसके बाद ठीक एक साल बाद जब अगले वर्ष दीपावली के तय समय पर इस मंदिर को दोबारा खोला जाता है, तो भीतर का नजारा पुजारियों और वहां मौजूद अधिकारियों को स्तब्ध कर देता है। जब सील तोड़कर गर्भगृह का भारी दरवाजा खोला जाता है, तो वह दीया बिना किसी अतिरिक्त ईंधन या मानवीय सहायता के ठीक उसी प्रकार जलता हुआ प्राप्त होता है, जैसा उसे एक वर्ष पूर्व छोड़ कर जाया गया था।

    इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि मां को चढ़ाया गया पके हुए चावल का प्रसाद भीषण गर्मी और मौसम के बदलावों के बाद भी एक साल तक बिल्कुल ताजा बना रहता है। इस भोजन में से न तो किसी प्रकार की दुर्गंध आती है और न ही यह दूषित होता है। यही नहीं, माता के चरणों में अर्पित किए गए फूल भी एक वर्ष तक बिना पानी और हवा के वैसे ही खिले, महकते और ताजे दिखाई देते हैं। स्थानीय समाज और देश भर से आने वाले श्रद्धालु इसे हसनंबा देवी का साक्षात दिव्य चमत्कार मानते हैं। यही कारण है कि वर्ष के उन चुनिंदा 10-12 दिनों में इस अलौकिक दृश्य और माता के दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है।