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  • घर की सुख-समृद्धि और धन लाभ से जुड़ा है झाड़ू का नियम, शनिवार और अमावस्या के खास मुहूर्त पर पुरानी वस्तु बदलने से दूर हो सकता है बड़ा वास्तु दोष

    घर की सुख-समृद्धि और धन लाभ से जुड़ा है झाड़ू का नियम, शनिवार और अमावस्या के खास मुहूर्त पर पुरानी वस्तु बदलने से दूर हो सकता है बड़ा वास्तु दोष

    नई दिल्ली । भारतीय सनातन परंपरा और वास्तु शास्त्र के प्राचीन सिद्धांतों में घर की हर छोटी-बड़ी वस्तु का संबंध परिवार की आर्थिक और मानसिक स्थिति से जोड़ा गया है। इसी कड़ी में घर की नियमित सफाई के लिए उपयोग होने वाली झाड़ू को केवल एक साधारण वस्तु न मानकर, धन की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक और सकारात्मक ऊर्जा का संवाहक माना गया है। वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, दैनिक जीवन में अनजाने में की जाने वाली कुछ छोटी-सी गलतियां और झाड़ू का गलत दिशा में रखरखाव घर में कंगाली और आर्थिक तंगी का एक बड़ा कारण बन सकता है।

    आधुनिक जीवनशैली में अक्सर लोग घर की सफाई करने के बाद झाड़ू को किसी भी स्थान पर रख देते हैं, अथवा बहुत अधिक घिस जाने और टूटने के बाद भी उसका निरंतर उपयोग करते रहते हैं। वास्तु विज्ञान के मुताबिक, यह आदत घर की सकारात्मकता को नष्ट करती है। जब किसी झाड़ू के बाल झड़ने लगें या उसका हैंडल टूट जाए, तो उसे तुरंत घर से हटा देना चाहिए। टूटी हुई झाड़ू से सफाई करने पर घर के भीतर वित्तीय बाधाएं उत्पन्न होने लगती हैं और संचित धन अनावश्यक कार्यों में खर्च होने लगता है।

    शास्त्रों में पुरानी झाड़ू को घर से बाहर निकालने और नई झाड़ू को घर में प्रवेश कराने के लिए भी विशेष दिन और मुहूर्त निर्धारित किए गए हैं। किसी भी दिन झाड़ू बदलना वर्जित माना गया है। इसके लिए शनिवार का दिन सबसे उत्तम और शुभ फलदायी माना जाता है। शनिवार के दिन नई झाड़ू को उपयोग में लाने से घर की संचित नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता का पूरी तरह से नाश होता है। इसके अलावा, अमावस्या की तिथि, शुक्ल पक्ष की एकादशी या किसी भी शुभ नक्षत्र के दौरान नई झाड़ू खरीदना घर की बरकत को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होता है।

    इसके साथ ही, झाड़ू को रखने के स्थान और उसकी स्थिति को लेकर भी कड़े नियम बताए गए हैं। झाड़ू को कभी भी घर के मुख्य द्वार के ठीक सामने या ऐसी जगह पर नहीं रखना चाहिए, जहां बाहर से आने वाले किसी भी अतिथि की नजर उस पर सीधे पड़े। इसे हमेशा घर के किसी छिपे हुए और सुरक्षित स्थान पर ही लिटाकर रखना चाहिए। वास्तु के नियमों के अनुसार, झाड़ू को खड़ा करके रखना एक गंभीर दोष माना जाता है, जो घर के सदस्यों के बीच वैचारिक मतभेद और तनाव को बढ़ाता है। दिशाओं के संदर्भ में, इसे रखने के लिए हमेशा दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा यानी नैऋत्य कोण का ही चुनाव करना सबसे अधिक उपयुक्त माना गया है।

    समय चक्र के अनुसार भी सफाई व्यवस्था के कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं, जिनका उल्लंघन आर्थिक नुकसान का कारण बनता है। भारतीय परिवारों में सूर्यास्त के बाद यानी शाम के समय घर में झाड़ू लगाना पूरी तरह से वर्जित माना गया है। ऐसी मान्यता है कि संध्याकाल के समय सफाई करने से घर में मौजूद लक्ष्मी जी का अनादर होता है और वह घर से बाहर चली जाती हैं, जिससे परिवार को धन की कमी का सामना करना पड़ता है।

    वास्तु सिद्धांतों के अनुसार, पुरानी झाड़ू का विसर्जन करते समय भी बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता होती है। जब भी घर में नई झाड़ू लाई जाए, तो पुरानी झाड़ू को केवल शनिवार या अमावस्या के दिन ही घर की सीमा से बाहर करना चाहिए। इसे किसी सुनसान स्थान पर या किसी बड़े पेड़ के नीचे छोड़ देना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुपयोगी हो चुकी पुरानी झाड़ू को भूलकर भी जलाना नहीं चाहिए, क्योंकि झाड़ू को अग्नि के हवाले करना सीधे तौर पर महालक्ष्मी के अपमान के समान माना जाता है, जिससे घर की बरकत पूरी तरह से समाप्त हो सकती है।

  • आसमान से इतिहास तक पुष्पक विमान की कहानी और रामायणम् का अनोखा विजन

    आसमान से इतिहास तक पुष्पक विमान की कहानी और रामायणम् का अनोखा विजन


    नई दिल्ली । हनुमान जयंती के अवसर पर रिलीज हुए रामायणम् के पहले टीजर ने दर्शकों के बीच जबरदस्त उत्सुकता पैदा कर दी है। फिल्म में रणबीर कपूर श्रीराम की भूमिका में नजर आ रहे हैं और टीजर में उनकी झलक के साथ साथ जिस एक तत्व ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा वह है पुष्पक विमान। यह वही दिव्य विमान है जिसका उल्लेख रामायण में मिलता है और जिसे लेकर सदियों से जिज्ञासा बनी हुई है।

    टीजर में दिखाया गया पुष्पक विमान पारंपरिक चित्रण से अलग है। इसे फूल की आकृति से प्रेरित एक जीवंत संरचना की तरह प्रस्तुत किया गया है जो इसके नाम के अर्थ से मेल खाता है। अब तक रामलीलाओं और फिल्मों में इसे सामान्य उड़ने वाले रथ या पालकी के रूप में दिखाया जाता रहा है लेकिन इस बार इसकी डिजाइन अधिक कल्पनाशील और आधुनिक विजुअल इफेक्ट्स से भरपूर नजर आती है। यही कारण है कि दर्शकों के बीच इसकी चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है।

    पौराणिक कथाओं में पुष्पक विमान को एक अद्भुत आकाशीय वाहन बताया गया है। रावण इसका उपयोग करता था और इसी के माध्यम से वह आकाश मार्ग से यात्रा करता था। सीता हरण की कथा में भी इसका उल्लेख मिलता है। युद्ध के बाद श्रीराम इसी विमान से सीता और लक्ष्मण के साथ लंका से अयोध्या लौटे थे। कहा जाता है कि यह विमान मूल रूप से कुबेर का था जिसे रावण ने बलपूर्वक छीन लिया था।

    प्राचीन ग्रंथों में इसकी विशेषताओं का वर्णन बेहद रोचक है। इसे मन की गति से चलने वाला बताया गया है जो आवश्यकता अनुसार आकार बदल सकता था। कुछ कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि देव शिल्पी विश्वकर्मा ने इसे बनाया था जबकि इसकी संरचना ऋषियों के ज्ञान पर आधारित थी। महर्षि भारद्वाज को विमान विद्या का ज्ञाता माना जाता है और उनके नाम से जुड़े ग्रंथों में भी विमानों के उल्लेख मिलते हैं।

    हालांकि इन सभी विवरणों को लेकर आज भी बहस जारी है कि यह वास्तविक विज्ञान था या महज कल्पना। कुछ लोग इसे प्राचीन भारत की उन्नत तकनीक का संकेत मानते हैं तो कुछ इसे काव्यात्मक अभिव्यक्ति बताते हैं। आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो ऐसे विमानों के अस्तित्व का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है लेकिन इन कथाओं ने कल्पना और नवाचार की सोच को जरूर प्रेरित किया है।

    रामायणम् के टीजर ने इसी रहस्य को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया है। फिल्म के निर्देशक नितेश तिवारी ने तकनीक और परंपरा का मेल करते हुए पुष्पक विमान को एक नए रूप में दिखाने की कोशिश की है। यही वजह है कि यह सिर्फ एक पौराणिक वस्तु नहीं बल्कि एक सिनेमाई आकर्षण बन गया है।

    आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि फिल्म में इस दिव्य विमान को किस तरह विस्तार से दिखाया जाता है। क्या यह दर्शकों को प्राचीन विज्ञान की झलक देगा या फिर एक भव्य कल्पना के रूप में सामने आएगा। फिलहाल इतना तय है कि पुष्पक विमान ने एक बार फिर लोगों की कल्पना को पंख दे दिए हैं और इतिहास तथा मिथक के बीच की रेखा को और भी धुंधला कर दिया है।

  • सदीभर का सिनेमाई सफर कैसे रामायण ने हर दौर में जीता दर्शकों का दिल

    सदीभर का सिनेमाई सफर कैसे रामायण ने हर दौर में जीता दर्शकों का दिल


    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में रामायण केवल एक कहानी नहीं बल्कि भावनाओं आस्था और सांस्कृतिक पहचान का आधार रही है यही कारण है कि सिनेमा की शुरुआत से लेकर आज के आधुनिक दौर तक यह महाकाव्य लगातार नए रूपों में दर्शकों के सामने आता रहा है और हर बार उतनी ही गहराई से लोगों के दिलों को छूता है

    इस सफर की शुरुआत साल 1917 में हुई जब दादासाहेब फाल्के ने मूक फिल्म लंका दहन बनाई उस दौर में तकनीक सीमित थी लेकिन आस्था असीम थी इस फिल्म में अण्णा सालुंके ने राम और सीता दोनों की भूमिका निभाई जो अपने आप में अनोखा प्रयोग था यह फिल्म भारतीय सिनेमा की शुरुआती सफलताओं में शामिल हुई और इसने पौराणिक कथाओं को परदे पर लाने की परंपरा शुरू की

    इसके बाद दशकों तक इस महागाथा पर फिल्में बनती रहीं राम राज्य जैसी फिल्में अपने समय की बड़ी हिट साबित हुईं जबकि संपूर्ण रामायण ने पूरी कथा को विस्तार से दिखाने की कोशिश की आगे चलकर रामायण द लीजेंड ऑफ प्रिंस रामा जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की एनीमेशन फिल्म ने इस कहानी को वैश्विक पहचान दिलाई वहीं हनुमान बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय हुई

    अगर कुल आंकड़ों की बात करें तो मुख्य कथा पर लगभग पचास फिल्में बन चुकी हैं जबकि अलग अलग पात्रों और घटनाओं को जोड़कर यह संख्या साठ से ज्यादा हो जाती है एनीमेशन और लघु फिल्मों को मिलाकर यह आंकड़ा करीब दो सौ तक पहुंचता है जो इस बात का प्रमाण है कि हर दौर इस कथा को अपने तरीके से जीना चाहता है

    टीवी की दुनिया में रामानंद सागर की रामायण ने इतिहास रच दिया अरुण गोविल दीपिका चिखलिया और सुनील लहरी द्वारा निभाए गए किरदार इतने लोकप्रिय हुए कि दर्शकों ने उन्हें पूजनीय मान लिया 1987 से 1988 के बीच प्रसारित इस शो के दौरान सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था और 2020 में दोबारा प्रसारण के समय भी इसने रिकॉर्ड तोड़ दिए

    इसके बाद भी कई टीवी शोज आए जैसे सीता के राम और श्रीमद रामायण कुल मिलाकर हिंदी में कई बड़े और छोटे संस्करण बनाए जा चुके हैं जो इस कथा की निरंतर लोकप्रियता को दर्शाते हैं

    अब एक बार फिर यह महाकाव्य बड़े स्तर पर लौट रहा है निर्देशक नितेश तिवारी की नई फिल्म रामायण में रणबीर कपूर साई पल्लवी यश सनी देओल जैसे बड़े कलाकार नजर आएंगे इसे वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने की तैयारी है और इसका पहला भाग दिवाली 2026 में रिलीज होगा

    असल में रामायण की शक्ति इसकी कालातीतता में है इसमें त्याग कर्तव्य प्रेम और धर्म जैसे जीवन के मूल मूल्य समाहित हैं यही वजह है कि तकनीक बदलती है माध्यम बदलते हैं लेकिन यह कथा हर पीढ़ी के लिए नई बनी रहती है और आगे भी यूं ही प्रेरणा देती रहेगी

  • अनोखा शिव धाम: कच्छ के कल्याणेश्वर महादेव मंदिर में सदियों से टूटे शिवलिंग की होती है पूजा

    अनोखा शिव धाम: कच्छ के कल्याणेश्वर महादेव मंदिर में सदियों से टूटे शिवलिंग की होती है पूजा


    नई दिल्ली । गुजरात के कच्छ जिला में भुज के पास स्थित माधापार गांव का कल्याणेश्वर महादेव मंदिर आस्था और रहस्य का अनोखा संगम माना जाता है। इस मंदिर की सबसे खास बात यहां स्थापित शिवलिंग है जो सदियों से टूटी अवस्था में होने के बावजूद पूरी श्रद्धा और विधि विधान से पूजित हो रहा है।

    मान्यता है कि यह शिवलिंग मंदिर निर्माण से पहले से ही इसी स्वरूप में मौजूद था। समय के साथ जहां अन्य शिवलिंगों में परिवर्तन देखने को मिलता है वहीं यहां का शिवलिंग प्रारंभ से ही खंडित अवस्था में बताया जाता है। इसके बावजूद श्रद्धालु इसे भगवान शिव का साक्षात रूप मानकर जल दूध और बेलपत्र अर्पित करते हैं।

    खंडित होने पर भी पूजनीय

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवलिंग किसी भी अवस्था में पूजनीय होता है। यही कारण है कि यहां टूटा हुआ शिवलिंग भी उतनी ही आस्था के साथ पूजित है। जबकि अन्य देवी देवताओं की मूर्तियों के लिए खंडित होने पर पूजा के अलग नियम बताए जाते हैं।

    रहस्यमयी मान्यताएं
    मंदिर से जुड़ी कई रहस्यमयी बातें भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित हैं। कहा जाता है कि शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल या दूध कहां जाता है यह स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। इसके अलावा मंदिर परिसर में सांप दिखाई देने की भी स्थानीय लोगों द्वारा चर्चा की जाती है जिसे शिव की उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है।

    पौराणिक जुड़ाव
    इस मंदिर का संबंध पौराणिक कथाओं से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि पांडव ने अपने अज्ञातवास के दौरान यहां तपस्या की थी और शिवलिंग की स्थापना की थी। कुछ लोककथाओं में कर्ण और छत्रपति शिवाजी महाराज के यहां पूजा करने का भी उल्लेख मिलता है। आज भी दूर दूर से श्रद्धालु इस अद्भुत शिवधाम के दर्शन के लिए पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाएं लेकर भगवान शिव की शरण में आते हैं।