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  • ब्रह्मांड का व्यापक सर्वे करेगी NASA की अंतरिक्ष दूरबीन…. 16 लाख Km लंबे सफर पर रवाना

    ब्रह्मांड का व्यापक सर्वे करेगी NASA की अंतरिक्ष दूरबीन…. 16 लाख Km लंबे सफर पर रवाना


    वाशिंगटन।
    नासा (NASA) की सबसे नई और अत्याधुनिक अंतरिक्ष दूरबीन (Space telescope) रविवार को अंतरिक्ष के लिए रवाना हो गई। इसका उद्देश्य दूसरे तारों के आसपास मौजूद ग्रहों की खोज करना, रहस्यमयी ‘डार्क एनर्जी’ (Mysterious ‘Dark Energy’) का अध्ययन करना और ब्रह्मांड का अब तक का सबसे व्यापक सर्वेक्षण करना है।

    नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA) में विज्ञान मिशन निदेशक निक्की फॉक्स ने कहा कि यह दूरबीन हजारों सुपरनोवा, दसियों हजार ग्रहों, अरबों आकाशगंगाओं और खरबों तारों की खोज करने में सक्षम होगी। अपने विशाल दृश्य क्षेत्र के कारण यह ऐसे काम कर पाएगी, जो हम पहले कभी नहीं कर सके।

    स्पेसएक्स ने केनेडी स्पेस सेंटर से सुबह 4.3 अरब डॉलर की लागत वाले ‘रोमन स्पेस टेलीस्कोप’ (रोमन अंतरिक्ष दूरबीन) को अत्यधिक शक्तिशाली फाल्कन हेवी रॉकेट के जरिए प्रक्षेपित किया। यह दूरबीन 16 लाख किलोमीटर दूर उस स्थान के लिए रवाना हुई जहां नासा की एक अन्य प्रमुख अंतरिक्ष दूरबीन ‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’ पहले से मौजूद है। बस के आकार वाली इस दूरबीन का नाम नासा की पहली मुख्य खगोलशास्त्री दिवंगत नैंसी ग्रेस रोमन के नाम पर रखा गया है।

    इसे अपने गंतव्य तक पहुंचने में तीन महीने से अधिक का समय लगेगा। वहां पहुंचने के बाद यह अंतरिक्ष के छिपे हुए हिस्सों की अब तक की सबसे व्यापक तस्वीर पेश करेगी और ब्रह्मांड के अनजाने रहस्यों का पता लगाएगी। ‘रोमन स्पेस टेलीस्कोप’ का दृश्य क्षेत्र नासा की ‘हबल स्पेस टेलीस्कोप’ की तुलना में 100 गुना से भी अधिक बड़ा है। हबल 36 वर्षों से कक्षा में रहते हुए अंतरिक्ष की शानदार तस्वीरें भेज रही है। वहीं, जेम्स वेब दूरबीन ने कुछ वर्षों पहले इस अभियान में शामिल होकर ब्रह्मांड की शुरुआत से जुड़े बेहद पुराने खगोलीय पिंडों का अध्ययन शुरू किया था।

    ये तीनों अंतरिक्ष दूरबीनें यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के यूक्लिड अंतरिक्ष यान और चिली स्थित वेरा सी. रुबिन वेधशाला के साथ मिलकर ब्रह्मांड के कई बड़े रहस्यों को उजागर करने में मदद करेंगी। रोमन परियोजना की वरिष्ठ वैज्ञानिक जूली मैकएनेरी ने कहा कि रोमन की विशाल पहुंच हमें अजीब, दुर्लभ और असामान्य चीजों को खोजने में मदद करेगी। यह भूसे के ढेर में सुई खोजने की हमारी परिभाषा को बदल देगी।

    वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि रोमन दूरबीन ब्रह्मांड के अधिकांश हिस्से को बनाने वाले ‘डार्क मैटर’ और ‘डार्क एनर्जी’ के बारे में भी नई जानकारी देगी। ये दोनों अब तक वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बने हुए हैं। रोमन द्वारा तैयार आकाशगंगाओं की सूची से वैज्ञानिक को यह समझने में मदद मिलेगी कि इन अदृश्य शक्तियों के कारण ब्रह्मांड कितनी तेजी से फैल रहा है।

    रोमन की सबसे बड़ी खासियत उसकी गति होगी। मैकएनेरी के अनुसार, रोमन जितने मिल्की वे (आकाशगंगा) के अवलोकन एक महीने में कर लेगी, उन्हें पूरा करने में हबल को करीब एक सदी लग सकती है। उन्होंने कहा कि रोमन हमारी आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद हिस्से का अब तक का सबसे गहरा अध्ययन कर सकेगी।

    इस दूरबीन में एक अत्याधुनिक इन्फ्रारेड कैमरा लगाया गया है, जिसकी संवेदनशीलता हबल जैसी है, लेकिन यह हबल से करीब 1000 गुना तेजी से काम करेगा। इसके अलावा इसमें ऐसा उपकरण भी है, जो तारों की रोशनी को रोक सकेगा। इससे रोमन उन बेहद हल्के ग्रहों की सीधी तस्वीर लेने में सक्षम हो सकती है, जो किसी तारे की परिक्रमा कर रहे हों।

    इस दूरबीन को भविष्य में ईंधन भरने के लिए भी डिजाइन किया गया है। यदि आने वाले दशक में कोई रोबोटिक ईंधन टैंकर उपलब्ध होता है, तो इससे रोमन का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है।

  • अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय मूल के नासा अंतरिक्ष यात्री अनिल मेनन अगले सप्ताह अपनी पहली स्पेसवॉक करेंगे

    अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय मूल के नासा अंतरिक्ष यात्री अनिल मेनन अगले सप्ताह अपनी पहली स्पेसवॉक करेंगे

    नई दिल्ली । वैश्विक अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारतीय मूल के वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष यात्रियों की बढ़ती साख के बीच नासा के अंतरिक्ष यात्री अनिल मेनन अगले सप्ताह अपने करियर की पहली स्पेसवॉक करने के लिए तैयार हैं। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन परिसर के बाहर संचालित होने वाले इस महत्वपूर्ण अभियान के दौरान वे ऊर्जा प्रणालियों के संवर्धन और संचार नेटवर्क को अत्याधुनिक बनाने से जुड़े कई जटिल तकनीकी कार्यों को पूरा करेंगे। इस मिशन को अंतरिक्ष स्टेशन की कार्यप्रणाली को दीर्घकालिक और सुरक्षित बनाए रखने के दृष्टिकोण से बेहद अहम माना जा रहा है।

    निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार छह अगस्त से शुरू हो रहे इस अभियान में अनिल मेनन अपनी सहयोगी अंतरिक्ष यात्री के साथ कक्षीय प्रयोगशाला के बाहर जाकर विशेष रोल-आउट सोलर एरे स्थापित करने की पूर्व-तैयारियां करेंगे। यह नई सौर ऊर्जा प्रणाली अंतरिक्ष स्टेशन को अतिरिक्त बिजली की आपूर्ति प्रदान करेगी, जो भविष्य में प्रयोगशाला के नियंत्रित संचालन और शोध गतिविधियों के लिए आवश्यक है। इसके बाद अगस्त के मध्य में प्रस्तावित दूसरी स्पेसवॉक के दौरान पृथ्वी स्थित मिशन कंट्रोल सेंटर और अंतरिक्ष स्टेशन के बीच उच्च-गति डेटा ट्रांसमिशन सुनिश्चित करने वाले मुख्य संचार एंटीना को बदला जाएगा।

    अगस्त के अंतिम सप्ताह में आयोजित होने वाली तीसरी और अंतिम स्पेसवॉक में पावर केबल, डेटा रिले प्रणालियों को जोड़ने तथा अंतरिक्ष यान की सुरक्षित डॉकिंग के लिए उपयोग किए जाने वाले नेविगेशन उपकरणों को अद्यतन करने का कार्य किया जाएगा। अंतरिक्ष स्टेशन से जुड़ा यह बहुस्तरीय तकनीकी अभियान आने वाले वर्षों में वैज्ञानिक प्रयोगों और विभिन्न अभियानों के सुचारू संचालन में अहम भूमिका निभाएगा। पिछले माह अंतरिक्ष स्टेशन पर पहुंचे मेनन वहां लगभग आठ महीने का समय बिताएंगे और इस दौरान विभिन्न वैश्विक शोध परियोजनाओं में भाग लेंगे।

    अनिल मेनन द्वारा की जाने वाली यह चहलकदमी न केवल नासा के भावी अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए आधार तैयार करेगी, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान में भारतवंशी विशेषज्ञों की बढ़ती भागीदारी को भी रेखांकित करती है। इस संपूर्ण मिशन के सफलतापूर्वक पूरे होने से अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की परिचालन दक्षता में अभूतपूर्व वृद्धि होगी और वैज्ञानिक डेटा के त्वरित आदान-प्रदान में मदद मिलेगी। इस ऐतिहासिक मिशन की ओर पूरी दुनिया के अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थानों की निगाहें टिकी हुई हैं।

  • UFO पर फिर गरमाई दुनिया पेंटागन ने खोले 40 नए रिकॉर्ड लेकिन एलियन के सबूत पर क्या बोला अमेरिका

    UFO पर फिर गरमाई दुनिया पेंटागन ने खोले 40 नए रिकॉर्ड लेकिन एलियन के सबूत पर क्या बोला अमेरिका

    नई दिल्ली । क्या ब्रह्मांड में इंसानों के अलावा भी कोई बुद्धिमान जीवन मौजूद है यह सवाल दशकों से वैज्ञानिकों और आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। इसी बहस को एक बार फिर नई हवा तब मिली जब अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने रहस्यमयी उड़ने वाली वस्तुओं यानी यूएफओ से जुड़े 40 नए सरकारी रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दिए। इन दस्तावेजों में वीडियो तस्वीरें ऑडियो रिकॉर्डिंग और जांच रिपोर्ट शामिल हैं जिन्हें अमेरिका की कई प्रमुख सरकारी एजेंसियों ने वर्षों के दौरान तैयार किया था। इन रिकॉर्ड के सामने आने के बाद सोशल मीडिया से लेकर वैज्ञानिक समुदाय तक फिर से यह सवाल गूंजने लगा कि क्या सच में एलियन मौजूद हैं या इन घटनाओं के पीछे कोई और रहस्य छिपा है।

    पेंटागन की ओर से जारी रिकॉर्ड में कुल 14 दस्तावेज 19 वीडियो 4 ऑडियो रिकॉर्डिंग और तीन तस्वीरें शामिल हैं। यह सामग्री रक्षा विभाग नासा सीआईए एफबीआई और ऊर्जा विभाग जैसी एजेंसियों के पास सुरक्षित थी। इन्हें सार्वजनिक करने का फैसला सरकारी पारदर्शिता बढ़ाने की नीति के तहत लिया गया। अधिकांश रिकॉर्ड वर्ष 2010 के बाद के हैं और इनमें पश्चिमी प्रशांत महासागर अटलांटिक महासागर तथा मध्य पूर्व के ऊपर सैन्य विमानों द्वारा रिकॉर्ड की गई कई रहस्यमयी घटनाओं का उल्लेख किया गया है।

    हालांकि इन दस्तावेजों के सार्वजनिक होने के साथ सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पेंटागन ने साफ तौर पर कहा है कि अब तक किसी भी रिकॉर्ड में एलियन या पृथ्वी से बाहर मौजूद किसी सभ्यता का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिला है। विभाग के अनुसार कई घटनाएं अब भी जांच के दायरे में हैं लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर उन्हें एलियन गतिविधि नहीं कहा जा सकता।

    सबसे ज्यादा चर्चा वर्ष 2019 की एक घटना की हो रही है। एक अनुभवी अमेरिकी सैन्य पायलट ने उड़ान के दौरान एक बेहद तेज गति से चलने वाली रहस्यमयी वस्तु देखने का दावा किया। पायलट के अनुसार उसने अपने लगभग तीन दशक लंबे सैन्य करियर में कभी भी इतनी असामान्य उड़ान क्षमता वाली वस्तु नहीं देखी थी। उसने लगभग 10 से 15 सेकंड तक उस वस्तु का पीछा किया और वीडियो भी रिकॉर्ड किया लेकिन जैसे ही कैमरे का जूम बढ़ाया गया वह वस्तु इतनी तेजी से आगे निकल गई कि कैमरे की सीमा से बाहर हो गई। बाद में वीडियो की समीक्षा करने पर वह आयताकार आकार की दिखाई दी और विमान में मौजूद अन्य अनुभवी अधिकारियों ने भी उसकी पहचान नहीं कर पाई।

    दूसरी चर्चित घटना वर्ष 2015 की है जब टेक्सास स्थित पैनटेक्स परमाणु हथियार संयंत्र के ऊपर एक अज्ञात उड़ती वस्तु देखे जाने का दावा किया गया। सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत पूरे परिसर को हाई अलर्ट पर डाल दिया और उस वस्तु पर लगातार नजर रखी। रिपोर्ट के अनुसार वह बिना किसी आवाज के हवा में मौजूद थी और उसमें किसी इंजन या सामान्य उड़ान प्रणाली के संकेत भी दिखाई नहीं दिए। इस कारण यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील घटनाओं में शामिल किया गया था।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यूएफओ का अर्थ हमेशा एलियन नहीं होता। कई बार अत्याधुनिक सैन्य तकनीक मौसम संबंधी दुर्लभ घटनाएं कैमरे की तकनीकी सीमाएं या प्राकृतिक प्रकाश प्रभाव भी ऐसी रहस्यमयी तस्वीरों और वीडियो की वजह बन सकते हैं। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वैज्ञानिक जांच और ठोस प्रमाण बेहद जरूरी हैं।

    पेंटागन के नए दस्तावेजों ने दुनिया भर में जिज्ञासा जरूर बढ़ा दी है लेकिन फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इंसानों के अलावा किसी और सभ्यता के अस्तित्व का प्रमाण मिल गया है। फिलहाल रहस्य बरकरार है और विज्ञान इस सवाल का जवाब खोजने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है।

  • महासागर के भीतर मंडरा रही बड़ी तबाही की चेतावनी, AMOC करंट के कमजोर होने से बढ़ा खतरा

    महासागर के भीतर मंडरा रही बड़ी तबाही की चेतावनी, AMOC करंट के कमजोर होने से बढ़ा खतरा


    नई दिल्ली । धरती पर जलवायु परिवर्तन को लेकर अक्सर जंगलों की आग, पिघलते ग्लेशियर और बढ़ते समुद्र स्तर की तस्वीरें सामने आती हैं, लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा अदृश्य खतरा तेजी से बढ़ रहा है जो पूरी दुनिया के मौसम चक्र को बदल सकता है। यह खतरा अटलांटिक महासागर की गहराइयों में बहने वाली विशाल समुद्री धारा AMOC यानी अटलांटिक मेरिडियोनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन से जुड़ा है, जिसे धरती की जलवायु प्रणाली की रीढ़ भी माना जाता है।

    AMOC एक ऐसा महासागरीय तंत्र है जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्म पानी को उत्तरी अटलांटिक और यूरोप की ओर ले जाता है। वहां यह पानी ठंडा होकर भारी हो जाता है और हजारों मीटर गहराई में जाकर वापस दक्षिण दिशा की ओर बहता है। यह निरंतर प्रक्रिया सदियों से वैश्विक तापमान, समुद्री लवणता और मौसम संतुलन को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाती रही है।

    हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों और उपग्रह डेटा संकेतों के अनुसार यह शक्तिशाली समुद्री धारा अब धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह प्रणाली और अधिक धीमी पड़ गई या पूरी तरह असंतुलित हो गई, तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

    विशेषज्ञों के अनुसार इसके कमजोर होने से उत्तरी यूरोप में सर्दियां और अधिक कठोर हो सकती हैं, जहां तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे तक गिर सकता है। वहीं दूसरी ओर, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में मानसून के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल सकता है। इसके अलावा अमेरिका के पूर्वी तट पर समुद्र स्तर बढ़ने का खतरा भी बढ़ सकता है, जिससे तटीय इलाकों में बाढ़ जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं।

    इस पूरे मुद्दे की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह खतरा दिखाई नहीं देता। यह समुद्र की हजारों मीटर गहराई में बेहद धीमी गति से काम करता है, इसलिए इसका कोई स्पष्ट दृश्य प्रमाण नहीं होता जिसे कैमरे में कैद कर दिखाया जा सके। इसी कारण यह विषय आम जनता की नजरों से अक्सर दूर रह जाता है, जबकि इसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर बेहद बड़ा हो सकता है।

    वैज्ञानिकों का कहना है कि आधुनिक जलवायु संकटों में सबसे बड़ी समस्या यही है कि कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं अदृश्य हैं। वे न तो तूफान की तरह दिखाई देती हैं और न ही आग की तरह तुरंत महसूस होती हैं, लेकिन उनका प्रभाव लंबे समय में कहीं अधिक विनाशकारी हो सकता है।

    इस स्थिति की तुलना अक्सर महासागरों में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण से की जाती है, जो आंखों से दिखाई नहीं देता लेकिन पूरे समुद्री जीवन को प्रभावित करता है। इसी तरह AMOC भी एक ऐसा सिस्टम है जिसकी गिरावट धीरे-धीरे लेकिन गहरे प्रभाव के साथ सामने आ सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के जलवायु संकेतों को नजरअंदाज करना भविष्य में बड़े संकट को जन्म दे सकता है। इसलिए वैश्विक स्तर पर इस पर लगातार निगरानी और शोध बेहद जरूरी है ताकि समय रहते इसके प्रभावों को समझा और नियंत्रित किया जा सके।

  • सूर्य की सतह पर सक्रिय ‘4461 रीजन’ से निकला शक्तिशाली विस्फोट, धरती के चुंबकीय क्षेत्र पर खतरा, अंतरिक्ष एजेंसियों ने बढ़ाई निगरानी

    सूर्य की सतह पर सक्रिय ‘4461 रीजन’ से निकला शक्तिशाली विस्फोट, धरती के चुंबकीय क्षेत्र पर खतरा, अंतरिक्ष एजेंसियों ने बढ़ाई निगरानी

    नई दिल्ली । सूर्य की सतह पर हाल ही में हुए शक्तिशाली सौर विस्फोट के बाद धरती की ओर तेजी से एक मैग्नेटिक महातूफान बढ़ने की स्थिति बन गई है। अंतरिक्ष वैज्ञानिकों और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने इस सौर गतिविधि को लेकर चेतावनी जारी की है, जिसमें कहा गया है कि इसका प्रभाव पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र पर पड़ सकता है। इस घटना के कारण अंतरिक्ष मौसम में अस्थिरता देखी जा रही है और कई क्षेत्रों में इसका असर महसूस होने की संभावना जताई गई है।

    वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य के सक्रिय क्षेत्र 4461 में 6 जून 2026 की सुबह एक तेज सोलर फ्लेयर दर्ज किया गया, जिसे M1.8 श्रेणी में रखा गया है। इस विस्फोट के साथ एक भारी और अत्यधिक चुंबकीय फिलामेंट भी अंतरिक्ष में निकला, जो लगभग 1,400 किलोमीटर प्रति सेकंड की तेज रफ्तार से पृथ्वी की ओर बढ़ रहा है। यह स्थिति वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण इसलिए भी मानी जा रही है क्योंकि इस तरह के फिलामेंट सीधे तौर पर पृथ्वी के अंतरिक्ष वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं।

    नासा और स्पेस वेदर प्रेडिक्शन सेंटर ने इसे G3 श्रेणी का भू-चुंबकीय तूफान यानी जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म घोषित किया है। विशेषज्ञों के मुताबिक जब सौर कण पृथ्वी के मैग्नेटिक फील्ड से टकराते हैं, तो इससे अंतरिक्ष मौसम में बदलाव आता है, जिसका असर संचार प्रणालियों, उपग्रहों और बिजली नेटवर्क पर भी पड़ सकता है। हालांकि इसे एक प्राकृतिक खगोलीय घटना माना जाता है, लेकिन इसकी तीव्रता अधिक होने पर तकनीकी सिस्टम प्रभावित हो सकते हैं।

    वैज्ञानिकों ने बताया कि सूर्य के जिस क्षेत्र से यह विस्फोट हुआ है, वहां चुंबकीय रेखाएं असामान्य रूप से मुड़ी हुई थीं, जिससे अत्यधिक ऊर्जा एकत्रित हो गई। जब यह ऊर्जा अचानक रिलीज हुई, तो तेज एक्स-रे विकिरण भी उत्पन्न हुआ, जिसने कुछ समय के लिए रेडियो संचार में व्यवधान पैदा किया। यह प्रक्रिया सौर गतिविधियों के सामान्य चक्र का हिस्सा होती है, लेकिन इस बार इसकी तीव्रता अधिक देखी गई है।

    अंतरिक्ष मौसम विशेषज्ञों के अनुसार फिलामेंट सूर्य के कोरोना क्षेत्र में मौजूद ठंडी और घनी प्लाज्मा संरचना होती है। जब इसे थामे रखने वाला चुंबकीय संतुलन बिगड़ता है, तो यह अंतरिक्ष में तेजी से फैल जाता है। यही प्रक्रिया इस बार के सौर विस्फोट में देखी गई है, जिसे वैज्ञानिक बेहद महत्वपूर्ण घटना मान रहे हैं।

    इस सौर गतिविधि का एक सकारात्मक प्रभाव भी हो सकता है, जिसमें पृथ्वी के ध्रुवीय और कुछ उच्च अक्षांश क्षेत्रों में ऑरोरा यानी उत्तरी रोशनी का शानदार दृश्य दिखाई दे सकता है। यह दृश्य हरे, बैंगनी और लाल रंग की चमकदार रोशनी के रूप में आसमान में नजर आता है। आमतौर पर यह नजारा उत्तरी ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखता है, लेकिन G3 या उससे अधिक तीव्रता के तूफानों में यह निचले अक्षांश क्षेत्रों तक भी पहुंच सकता है।

    यदि मौसम और आकाशीय स्थितियां अनुकूल रहीं, तो उत्तरी भारत के कुछ ऊंचाई वाले क्षेत्रों जैसे हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और उत्तराखंड के हिस्सों में भी इस दुर्लभ खगोलीय दृश्य के दिखने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी तरह अंतरिक्ष मौसम की स्थिति और तूफान की तीव्रता पर निर्भर करेगा।

    अंतरिक्ष एजेंसियां लगातार इस सौर तूफान की निगरानी कर रही हैं और उपग्रहों के माध्यम से इसके प्रभाव का आकलन किया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन अगले कुछ दिनों में इसके प्रभाव स्पष्ट रूप से सामने आ सकते हैं।

  • समंदर में उतरा दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट, स्टारशिप टेस्ट के बाद स्पेसएक्स और नासा में जश्न का माहौल

    समंदर में उतरा दुनिया का सबसे बड़ा रॉकेट, स्टारशिप टेस्ट के बाद स्पेसएक्स और नासा में जश्न का माहौल


    नई दिल्ली । अंतरिक्ष तकनीक की दुनिया में एक बार फिर इतिहास रचते हुए Elon Musk की कंपनी SpaceX ने अपने महत्वाकांक्षी स्टारशिप V3 रॉकेट का सफल परीक्षण कर लिया है। दुनिया के सबसे बड़े और अत्याधुनिक रॉकेट सिस्टम माने जा रहे स्टारशिप के इस नए संस्करण ने अंतरिक्ष मिशनों की दिशा में एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। हालांकि परीक्षण के दौरान इंजन से जुड़ी तकनीकी समस्या सामने आई, लेकिन इसके बावजूद रॉकेट हिंद महासागर में सफलतापूर्वक उतरा, जिसे बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

    स्टारशिप V3 का यह परीक्षण स्पेसएक्स के लिए बेहद अहम था क्योंकि यह इस सीरीज की नई पीढ़ी का पहला टेस्ट था। भारतीय समयानुसार सुबह लॉन्च किए गए इस रॉकेट ने उड़ान के दौरान कई महत्वपूर्ण तकनीकी चरण सफलतापूर्वक पूरे किए। मिशन के बाद अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी NASA ने भी इस उपलब्धि की जमकर सराहना की और इसे भविष्य के चंद्रमा और मंगल मिशनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया।

    स्टारशिप सिस्टम में ऊपरी हिस्से को स्पेसक्राफ्ट और निचले हिस्से को सुपर हेवी बूस्टर कहा जाता है। दोनों को मिलाकर “स्टारशिप” नाम दिया गया है। इसकी कुल ऊंचाई लगभग 403 फीट बताई जा रही है, जो इसे दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे शक्तिशाली रॉकेट सिस्टम बनाती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरी तरह रीयूजेबल यानी दोबारा इस्तेमाल किया जा सकने वाला सिस्टम है, जिससे अंतरिक्ष मिशनों की लागत को काफी कम किया जा सकता है।

    नासा पहले ही घोषणा कर चुका है कि भविष्य के आर्टेमिस मिशन में स्टारशिप को ह्यूमन लैंडिंग सिस्टम के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा। इसी तकनीक के जरिए अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा की सतह तक पहुंचाने की तैयारी की जा रही है। लंबे समय से इंसानों को दोबारा चांद पर भेजने की योजना पर काम कर रही नासा के लिए यह टेस्ट नई उम्मीद लेकर आया है।

    हालांकि मिशन के अंतिम चरण में रॉकेट समुद्र में उतरने के बाद तेज धमाके के साथ फट गया, लेकिन वैज्ञानिकों के मुताबिक परीक्षण का मुख्य उद्देश्य सफलतापूर्वक पूरा हो गया। अंतरिक्ष विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के परीक्षण भविष्य में मानव मिशनों को सुरक्षित और अधिक प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभाएंगे।

    नासा अधिकारियों ने कहा कि स्टारशिप की टेस्टिंग के दौरान हॉट स्टेजिंग, ऑर्बिटल ऑपरेशन और बूस्टर प्रदर्शन जैसे कई महत्वपूर्ण लक्ष्य पूरे हुए हैं। एजेंसी का मानना है कि अगर यह तकनीक पूरी तरह सफल होती है तो आने वाले वर्षों में यही सिस्टम इंसानों को मंगल ग्रह तक पहुंचाने का आधार बन सकता है।

    इस उपलब्धि के बाद अंतरिक्ष जगत में उत्साह का माहौल है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्टारशिप की सफलता केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता के अंतरिक्ष भविष्य के लिए एक बड़ा संकेत है। आने वाले समय में यह तकनीक अंतरिक्ष यात्रा को पहले से कहीं ज्यादा आसान और सस्ता बना सकती है।

  • यूएफओ फाइल्स का बड़ा खुलासा: अमेरिका ने जारी किए चौंकाने वाले दस्तावेज, अपोलो मिशन से जुड़ी रहस्यमयी घटनाएं सामने आईं

    यूएफओ फाइल्स का बड़ा खुलासा: अमेरिका ने जारी किए चौंकाने वाले दस्तावेज, अपोलो मिशन से जुड़ी रहस्यमयी घटनाएं सामने आईं


    नई दिल्ली। अमेरिका में लंबे समय से गोपनीय रखी गई यूएफओ (UFO) से जुड़ी फाइलों का पहला बड़ा सेट सार्वजनिक कर दिया गया है। ट्रम्प प्रशासन के निर्देश पर जारी इन दस्तावेजों में सैकड़ों वीडियो, फोटो और सरकारी रिकॉर्ड शामिल हैं, जिनमें नासा के अपोलो मिशन से जुड़ी कई रहस्यमयी घटनाओं का भी उल्लेख है। इन खुलासों के बाद एक बार फिर एलियन जीवन और अनआइडेंटिफाइड एरियल फिनॉमिना (UAP) को लेकर बहस तेज हो गई है।

    जारी दस्तावेजों में सबसे ज्यादा चर्चा अपोलो 12 और अपोलो 17 मिशन से जुड़ी तस्वीरों और संवादों की हो रही है। एक तस्वीर में चांद की सतह के ऊपर आसमान में तीन चमकदार बिंदुओं के दिखने का दावा किया गया है, जिन्हें अब तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया जा सका है।

    सबसे दिलचस्प हिस्सा अपोलो 17 मिशन का रिकॉर्ड बताया जा रहा है, जिसमें अंतरिक्ष यात्री उड़ान के दौरान अपने यान के पास अजीब चमकती वस्तुओं को देखने की बात कर रहे हैं। रिकॉर्ड में एक अधिकारी को यह कहते सुना जा सकता है कि “मेरी खिड़की के बाहर कई चमकती चीजें दिख रही हैं, जैसे आतिशबाजी हो रही हो।” हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ये दृश्य अक्सर अंतरिक्ष मलबे, प्रकाश परावर्तन या तकनीकी कारणों से भी हो सकते हैं।

    इन फाइलों को जारी करने का आदेश खुद अमेरिकी राष्ट्रपति ने रक्षा विभाग को दिया था, ताकि UFO और UAP से जुड़ी सभी उपलब्ध जानकारी को सार्वजनिक किया जा सके। इसके बाद व्हाइट हाउस ने कहा कि इसका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना है, न कि किसी निष्कर्ष को साबित करना।

    पेंटागन द्वारा पहले भी कई बार स्पष्ट किया गया है कि अब तक किसी भी UFO घटना को एलियन जीवन या विदेशी तकनीक का ठोस सबूत नहीं माना गया है। कई मामलों की जांच में सामने आया कि रहस्यमयी दिखने वाली वस्तुएं दरअसल सैन्य ड्रोन, उपग्रह, गुब्बारे या प्राकृतिक घटनाएं थीं।

    नए जारी दस्तावेजों में 1999 के आसपास अमेरिकी सैन्य विमानों के पास देखी गई रहस्यमयी उड़ती वस्तुओं का भी जिक्र है। कुछ पायलटों ने दावा किया कि उन्होंने तेज रफ्तार से चलती चमकदार वस्तुओं को अपने विमान के पास देखा, जिन्हें कुछ समय तक रडार पर ट्रैक किया गया लेकिन बाद में वे गायब हो गईं।

    इसी तरह एक रिपोर्ट में 2024 में ओमान की खाड़ी के ऊपर इंफ्रारेड सेंसर द्वारा रिकॉर्ड की गई एक तेज रफ्तार “बूंद जैसी वस्तु” का भी उल्लेख है। हालांकि अधिकारियों ने साफ किया है कि ये सभी केवल अवलोकन और शुरुआती रिपोर्टें हैं, किसी निष्कर्ष की पुष्टि नहीं की गई है।

    इस बीच, सोशल मीडिया पर इन खुलासों के बाद एलियन जीवन को लेकर चर्चाएं और अटकलें तेज हो गई हैं। लेकिन वैज्ञानिक समुदाय लगातार यही कह रहा है कि किसी भी दावे को साबित करने के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी हैं।
  • अंतरिक्ष में धरती से 30% बड़े ‘सुपर-अर्थ’ की सतह का पहली बार अध्ययन, जेम्स वेब टेलीस्कोप ने खोले रहस्य

    अंतरिक्ष में धरती से 30% बड़े ‘सुपर-अर्थ’ की सतह का पहली बार अध्ययन, जेम्स वेब टेलीस्कोप ने खोले रहस्य

    वॉशिंगटन। अंतरिक्ष विज्ञान में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए वैज्ञानिकों ने पहली बार किसी दूरस्थ चट्टानी ग्रह की सतह का विस्तृत अध्ययन किया है। यह शोध जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की मदद से किया गया है, जिसमें एलएचएस 3844 बी नामक एक सुपर-अर्थ ग्रह के बारे में अहम जानकारियां सामने आई हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ग्रह हमारे सौरमंडल के बुध ग्रह जैसा बेहद गर्म, अंधकारमय और पूरी तरह निर्जीव हो सकता है। इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल ‘नेचर एस्ट्रोनॉमी’ में प्रकाशित हुए हैं।

    धरती से 48.5 प्रकाश-वर्ष दूर मौजूद है यह ग्रह
    एलएचएस 3844 बी पृथ्वी से लगभग 48.5 प्रकाश-वर्ष दूर स्थित है और आकार में हमारे ग्रह से करीब 30% बड़ा है। इसे सुपर-अर्थ श्रेणी में रखा गया है। सुपर-अर्थ वे ग्रह होते हैं जो पृथ्वी से बड़े तो होते हैं, लेकिन गैसीय दानव ग्रहों जितने विशाल नहीं होते।

    बेहद तेज कक्षा में घूमता है ग्रह
    यह ग्रह अपने तारे के बेहद करीब है और केवल 11 घंटे में अपने तारे का एक चक्कर पूरा कर लेता है। इस तेज परिक्रमा के कारण इसकी सतह पर अत्यधिक तापमान और कठोर परिस्थितियां बनी रहती हैं।

    वातावरण का कोई संकेत नहीं
    शोध में यह पाया गया है कि ग्रह पर किसी भी प्रकार का वातावरण मौजूद नहीं है। न तो वहां गैसीय परत है जो तापमान को नियंत्रित कर सके और न ही सतह को विकिरण से बचा सके। इसका मतलब यह है कि ग्रह सीधे अंतरिक्षीय विकिरण और उल्कापिंडों के प्रभाव में रहता है।

    बेसाल्ट जैसी चट्टानी सतह के संकेत
    वैज्ञानिकों के अनुसार इस ग्रह की सतह पृथ्वी जैसी नहीं है। प्रारंभिक विश्लेषण से संकेत मिले हैं कि इसकी सतह बेसाल्ट चट्टानों से बनी हो सकती है, जो ज्वालामुखीय लावा के ठंडा होने से बनती हैं।

    एमआईआरआई उपकरण ने निभाई अहम भूमिका
    इस अध्ययन में जेम्स वेब टेलीस्कोप पर लगे मिड-इंफ्रारेड इंस्ट्रूमेंट (MIRI) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस उपकरण ने ग्रह से आने वाली इन्फ्रारेड रोशनी का विश्लेषण किया और सतह के तापीय गुणों का अध्ययन संभव बनाया। वैज्ञानिक सीधे ग्रह की तस्वीर लेने में सफल नहीं हो सके, लेकिन ग्रह और उसके तारे से आने वाले प्रकाश में सूक्ष्म बदलावों का विश्लेषण कर स्पेक्ट्रम तैयार किया गया, जिससे उसकी सतह की संरचना का अनुमान लगाया गया।

    भविष्य की खोजों के लिए बड़ी उम्मीद
    विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज भविष्य में अन्य चट्टानी ग्रहों की सतह और भूगर्भीय इतिहास को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे यह संभावना बढ़ती है कि आने वाले समय में दूरस्थ ग्रहों पर जीवन की संभावनाओं की भी गहराई से जांच की जा सकेगी।

  • आर्टेमिस II मिशन में अंतरिक्ष यात्रियों ने सुरक्षित तरीके से देखा सूर्य ग्रहण, सोलर ग्लासेज का उपयोग अनिवार्य बताया

    आर्टेमिस II मिशन में अंतरिक्ष यात्रियों ने सुरक्षित तरीके से देखा सूर्य ग्रहण, सोलर ग्लासेज का उपयोग अनिवार्य बताया


    नई दिल्ली। अंतरिक्ष से सूर्य ग्रहण देखना जितना रोमांचक अनुभव है, उतना ही संवेदनशील भी है, क्योंकि इस दौरान आंखों की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। हाल ही में आर्टेमिस II मिशन के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों ने सूर्य ग्रहण का अद्भुत दृश्य देखा, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने सोलर व्यूइंग ग्लासेज के उपयोग की आवश्यकता को भी स्पष्ट रूप से सामने रखा। यह घटना एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि चाहे पृथ्वी हो या अंतरिक्ष, सूर्य को सीधे देखना हमेशा सावधानी की मांग करता है।

    इस मिशन में शामिल अंतरिक्ष यात्री क्रिस्टीना कोच, जेरेमी हैनसन, रीड वाइजमैन और विक्टर ग्लोवर ने ओरियन स्पेसक्राफ्ट से सूर्य ग्रहण का अवलोकन किया। उन्होंने विशेष सोलर एक्लिप्स ग्लासेज पहनकर ग्रहण के आंशिक चरणों को देखा, ताकि आंखों को किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे। वैज्ञानिकों के अनुसार, केवल पूर्ण सूर्य ग्रहण के कुछ क्षणों को छोड़कर बाकी समय सूर्य को सीधे देखना आंखों के लिए अत्यंत खतरनाक होता है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि सूर्य की तेज रोशनी और हानिकारक विकिरण आंखों की रेटिना को स्थायी नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि सामान्य धूप के चश्मे सूर्य ग्रहण देखने के लिए सुरक्षित नहीं माने जाते। सोलर व्यूइंग ग्लासेज विशेष रूप से इस उद्देश्य के लिए बनाए जाते हैं और ये अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होते हैं, जो आंखों को सुरक्षित रखते हैं।

    आंशिक और वलयाकार सूर्य ग्रहण के दौरान सावधानी और भी आवश्यक हो जाती है, क्योंकि इन स्थितियों में सूर्य पूरी तरह ढका नहीं होता। ऐसे में पूरे समय सोलर ग्लासेज पहनना जरूरी होता है। यदि चश्मे में किसी प्रकार की खरोंच या क्षति हो, तो उनका उपयोग तुरंत बंद कर देना चाहिए। बच्चों को ग्रहण दिखाते समय विशेष निगरानी की आवश्यकता होती है, ताकि वे बिना सुरक्षा के सूर्य की ओर न देखें।

    इसके अलावा, विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि सोलर ग्लासेज पहनकर भी कैमरा, दूरबीन या टेलीस्कोप के माध्यम से सूर्य को नहीं देखना चाहिए। इन उपकरणों के जरिए सूर्य की किरणें और अधिक तीव्र होकर आंखों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं। ऐसे उपकरणों के लिए अलग से विशेष सोलर फिल्टर का उपयोग करना अनिवार्य होता है।

    यदि सोलर व्यूइंग ग्लासेज उपलब्ध न हों, तो अप्रत्यक्ष तरीके से ग्रहण देखना एक सुरक्षित विकल्प है। पिनहोल प्रोजेक्टर जैसी सरल विधि के माध्यम से सूर्य की छवि को कागज या दीवार पर प्रोजेक्ट करके बिना किसी जोखिम के ग्रहण का आनंद लिया जा सकता है। इस तकनीक में सीधे सूर्य को देखने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे आंखों की सुरक्षा बनी रहती है।

  • अगले माह चांद के लिए रवाना होगा NASA, लेकिन सूरज की क्यों कर रहा निगरानी ? जानिए कारण

    अगले माह चांद के लिए रवाना होगा NASA, लेकिन सूरज की क्यों कर रहा निगरानी ? जानिए कारण


    नई दिल्ली। साल 1972 के बाद NASA का आर्टेमिस II मिशन अगले महीने 1 अप्रैल 2026 को लॉन्च होने जा रहा है। यह मिशन इंसानों को पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से बाहर लेकर चांद के करीब ले जाएगा। हालांकि रोमांचक यह सफर, सूर्य से निकलने वाले घातक रेडिएशन के खतरे के साथ भी है।

    सौर कणों से खतरा और 24 घंटे निगरानी

    चांद की यात्रा के दौरान अंतरिक्ष यात्री लगभग 10 दिनों तक रहेंगे। इस दौरान सबसे बड़ा खतरा सूरज से निकलने वाले सोलर एनर्जेटिक पार्टिकल्स सौर कण का होगा। ये कण सूरज पर होने वाले विस्फोटों के समय इतनी तेज़ी से यात्रा करते हैं कि एक घंटे से भी कम समय में अंतरिक्ष यान तक पहुँच सकते हैं। ये न केवल यान के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि अंतरिक्ष यात्रियों के शरीर की कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।

    मंगल पर परसीवरेंस रोवर देगा एडवांस वार्निंग

    NASA ने सूरज के इस खतरे से निपटने के लिए मंगल ग्रह पर मौजूद परसीवरेंस रोवर की मदद लेने का अनोखा तरीका निकाला है। रोवर का मास्टकैम-Z कैमरा सूरज के उस हिस्से की तस्वीरें खींचेगा, जो पृथ्वी से दिखाई नहीं देता। इससे वैज्ञानिकों को दो हफ्ते पहले पता चल जाएगा कि कौन से सनस्पॉट्स पृथ्वी और चांद की ओर आने वाले हैं। यह एडवांस वार्निंग वैज्ञानिकों को संभावित सौर तूफानों के लिए तैयार रहने का समय देगी।

    Orion यान में रेडिएशन सुरक्षा

    आर्टेमिस II मिशन के Orion अंतरिक्ष यान में HERA हाइब्रिड इलेक्ट्रॉनिक विकिरण मूल्यांकन नामक एडवांस सेंसर लगाया गया है। यह सेंसर लगातार रेडिएशन के स्तर की निगरानी करेगा। यदि रेडिएशन खतरनाक स्तर पर पहुंचता है, तो यान अलार्म बजाएगा। ऐसी स्थिति में अंतरिक्ष यात्री इम्प्रोवाइज्ड स्टॉर्म शेल्टर अस्थायी सुरक्षा घेरा बनाने के लिए प्रशिक्षित होंगे। यान के अंदर मौजूद सामान और वजन का इस्तेमाल करके वे सुरक्षा दीवार बनाएंगे, जिससे सौर कणों के सीधे हमले से बचा जा सके।