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  • नसीरुद्दीन शाह और पुनीत इस्सर के बीच वैचारिक टकराव, JNU और सरकार के मुद्दे पर अभिनेता ने उठाए तीखे सवाल

    नसीरुद्दीन शाह और पुनीत इस्सर के बीच वैचारिक टकराव, JNU और सरकार के मुद्दे पर अभिनेता ने उठाए तीखे सवाल


    नई दिल्ली। बॉलीवुड और टेलीविजन की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले अभिनेता पुनीत इस्सर इन दिनों अपने एक बयान को लेकर चर्चा में हैं। बीआर चोपड़ा के लोकप्रिय धारावाहिक महाभारत में दुर्योधन की भूमिका निभाकर घर घर में पहचान बनाने वाले पुनीत इस्सर ने दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के हालिया बयानों पर नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि नसीरुद्दीन शाह उनके सीनियर ही नहीं बल्कि शिक्षक भी रहे हैं और एक बेहतरीन कलाकार हैं। इसके बावजूद देश से जुड़े मुद्दों पर उनके बयान देने के तरीके से वह सहमत नहीं हैं। पुनीत का आरोप है कि नसीरुद्दीन शाह कई अहम विषयों पर चुप रहते हैं और कुछ चुनिंदा मुद्दों पर ही अपनी राय सामने रखते हैं।

    एक समाचार एजेंसी से बातचीत के दौरान पुनीत इस्सर ने कहा कि नसीरुद्दीन शाह का सम्मान अपनी जगह है लेकिन जब कोई सार्वजनिक रूप से अपनी राय रखता है तो उसे सभी पक्षों को ध्यान में रखना चाहिए। उनके मुताबिक देश और दुनिया में कई ऐसी घटनाएं होती हैं जिन पर कलाकारों और बुद्धिजीवियों को अपनी बात रखनी चाहिए। पुनीत ने आरोप लगाया कि नसीरुद्दीन शाह का नजरिया एकतरफा दिखाई देता है और वह वामपंथी तथा नक्सल समर्थक विचारों से जुड़े मुद्दों पर ही अधिक बोलते हैं। उन्होंने इसे चुनिंदा मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने की प्रवृत्ति बताया।

    पुनीत इस्सर ने अपनी बातचीत में जेएनयू के छात्रों और कथित टुकड़े टुकड़े गैंग का भी जिक्र किया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश में दोषी अपराधियों और जेल में बंद आतंकवादियों से जुड़े मामले सामने आते हैं तो कुछ लोग उनके समर्थन में आवाज उठाते हैं। पुनीत के अनुसार ऐसे मामलों पर भी खुलकर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश के प्रति जिम्मेदारी केवल सरकार की आलोचना करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि देश की सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों से जुड़े विषयों पर भी स्पष्ट रुख सामने आना चाहिए। ये सभी पुनीत इस्सर के निजी विचार हैं।

    अभिनेता ने यह भी साफ किया कि उन्हें नसीरुद्दीन शाह के विचार रखने या सरकार की आलोचना करने के अधिकार से कोई आपत्ति नहीं है। उनका कहना था कि लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी बात कहने और सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार है। लेकिन यदि किसी को मौजूदा सरकार की नीतियां पसंद नहीं हैं तो उसे राजनीतिक रास्ता भी अपनाना चाहिए। पुनीत ने कहा कि ऐसे लोगों को चुनावी मैदान में उतरना चाहिए जनता के बीच जाना चाहिए और चुनाव जीतकर सरकार को बदलने की कोशिश करनी चाहिए।

    उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा सरकार को जनता ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुना है। इसलिए केवल असहमति जताने के बजाय राजनीतिक विकल्प के जरिए अपनी बात जनता तक पहुंचाना चाहिए। उनके इस बयान को नसीरुद्दीन शाह की हालिया टिप्पणियों पर सीधी प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा रहा है।

    दरअसल नसीरुद्दीन शाह ने हाल ही में जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्रों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन किया था। छात्र अपनी छात्र यूनियन को बहाल करने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो में खुद को दिमागी नक्सल बताया था। नसीरुद्दीन शाह ने केंद्र सरकार पर शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करने और युवाओं का हौसला तोड़ने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया था।

    इन्हीं बयानों के बाद पुनीत इस्सर की प्रतिक्रिया सामने आई है। दोनों अभिनेता अपने अपने विचारों को लेकर चर्चा में हैं। इस पूरे मामले ने एक बार फिर फिल्मी दुनिया के कलाकारों की राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर राय को लेकर बहस तेज कर दी है।

  • जावेद अख्तर सोशल मीडिया से क्यों हुए दूर, बेईमान और मूर्खतापूर्ण रवैये पर जताई नाराजगी

    जावेद अख्तर सोशल मीडिया से क्यों हुए दूर, बेईमान और मूर्खतापूर्ण रवैये पर जताई नाराजगी

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स से कुछ दिनों का ब्रेक लेने का ऐलान किया है। उनके इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा तेज हो गई है। जावेद अख्तर ने अपनी पोस्ट में कहा कि वह कुछ समय के लिए सोशल मीडिया से दूरी बनाकर सकारात्मक कामों पर ध्यान देना चाहते हैं। उन्होंने कुछ लोगों के व्यवहार को निराशाजनक बताते हुए कहा कि मूर्खतापूर्ण और बेईमानी भरा रवैया देखकर उन्हें परेशानी होती है। हालांकि उन्होंने अपनी पोस्ट में किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया है लेकिन उनके बयान को लेकर यूजर्स अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

    जावेद अख्तर ने एक्स पर लिखा कि वह कुछ दिनों का ब्रेक ले रहे हैं ताकि कुछ सकारात्मक काम कर सकें। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों का मूर्खतापूर्ण और बेईमानी से भरा रवैया देखना काफी निराशाजनक है। उन्हें इस बात पर भी हैरानी होती है कि ऐसे लोग भी बाकी इंसानों की तरह ही होमो सेपियन्स यानी मानव प्रजाति का हिस्सा हैं। उनके इस बयान से जाहिर होता है कि सोशल मीडिया पर होने वाली कुछ चर्चाओं और लोगों के व्यवहार से वह असहज महसूस कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि उनका यह फैसला किसी एक घटना की वजह से है या लगातार मिल रही प्रतिक्रियाओं के कारण उन्होंने कुछ समय दूर रहने का निर्णय लिया है।

    जावेद अख्तर की पोस्ट सामने आने के बाद कई यूजर्स ने उनका समर्थन किया। एक यूजर ने उन्हें सलाह दी कि वह बेवजह लोगों की बातों पर अपनी ऊर्जा खर्च न करें और मानसिक शांति को प्राथमिकता दें। वहीं एक अन्य यूजर ने उनसे अपील की कि वह नसीरुद्दीन शाह की वजह से नाराज या परेशान न हों। इस टिप्पणी के बाद लोगों के बीच यह सवाल भी उठा कि क्या जावेद अख्तर के ब्रेक का किसी हालिया विवाद से संबंध है। हालांकि जावेद अख्तर ने अपनी पोस्ट में नसीरुद्दीन शाह का नाम नहीं लिया है इसलिए इस तरह की प्रतिक्रियाओं को यूजर्स की अटकलों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

    जावेद अख्तर हाल के दिनों में रश्मिका मंदाना के हिंदी उच्चारण को लेकर चल रही ऑनलाइन बहस पर अपनी राय देने के कारण भी चर्चा में रहे थे। उन्होंने अभिनेत्री के हिंदी बोलने के अंदाज का मजाक उड़ाने वालों की आलोचना की थी। उनका कहना था कि किसी की भाषा या उच्चारण के आधार पर उसका मजाक उड़ाना उचित नहीं है। इस दौरान उन्होंने रश्मिका को गलती से तमिल अभिनेत्री कह दिया था जबकि वह कन्नड़ भाषी हैं। इसके बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने जावेद अख्तर की इस गलती को लेकर सवाल उठाए। बाद में उन्होंने अपनी गलती स्वीकार करते हुए माफी भी मांगी थी।

    जावेद अख्तर लंबे समय से अपने विचारों और बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं। वह सामाजिक मुद्दों और धर्म से जुड़े विषयों पर खुलकर अपनी राय रखते रहे हैं। उनकी टिप्पणियों पर कभी समर्थन मिलता है तो कभी सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना भी देखने को मिलती है। उनकी पत्नी और अभिनेत्री शबाना आजमी के साथ धर्म और रोजमर्रा की अभिव्यक्तियों को लेकर हुई बातचीत भी पहले चर्चा का विषय बन चुकी है। ऐसे मामलों में उनके विचारों को लेकर सोशल मीडिया पर बहस होती रही है।

    इस बार एक्स से ब्रेक लेने के उनके फैसले ने फिर से यह सवाल खड़ा किया है कि सोशल मीडिया की लगातार चलने वाली बहसें सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों को किस तरह प्रभावित करती हैं। जावेद अख्तर ने फिलहाल केवल कुछ दिनों की दूरी बनाने की बात कही है। उन्होंने यह नहीं बताया कि वह दोबारा कब सक्रिय होंगे। फिलहाल उनका कहना है कि वह अपना समय सकारात्मक कामों में लगाना चाहते हैं। उनके प्रशंसक उम्मीद कर रहे हैं कि वह जल्द लौटेंगे और अपने विचारों को पहले की तरह साझा करेंगे।

  • बीजेपी को ब्लडी झूठी पार्टी कहने पर नसीरुद्दीन शाह पर बरसे गजेंद्र चौहान, बोले- आप सिक्के के दोनों पहलू नहीं देखते

    बीजेपी को ब्लडी झूठी पार्टी कहने पर नसीरुद्दीन शाह पर बरसे गजेंद्र चौहान, बोले- आप सिक्के के दोनों पहलू नहीं देखते


    नई दिल्ली । बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह और अभिनेता गजेंद्र चौहान के बीच राजनीतिक बयान को लेकर जुबानी बहस तेज हो गई है। नसीरुद्दीन शाह की भारतीय जनता पार्टी पर की गई टिप्पणी के बाद गजेंद्र चौहान ने नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि नसीरुद्दीन शाह वरिष्ठ और बेहतरीन कलाकार हैं लेकिन राजनीतिक मुद्दों पर उनकी टिप्पणियों में अक्सर एकतरफा नजरिया दिखाई देता है। गजेंद्र चौहान ने सवाल उठाया कि किसी राजनीतिक दल की आलोचना करने के बजाय देश और समाज से जुड़े मुद्दों पर रचनात्मक सुझाव भी दिए जाने चाहिए। यह विवाद कोलकाता स्थित सत्यजीत रे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट यानी एसआरएफटीआई में जारी छात्र विरोध प्रदर्शन को लेकर सामने आया है।

    नसीरुद्दीन शाह की टिप्पणी पर जताई नाराजगी

    एक समाचार एजेंसी से बातचीत में गजेंद्र चौहान ने नसीरुद्दीन शाह की उस टिप्पणी पर आपत्ति जताई जिसमें उन्होंने बीजेपी के लिए ब्लडी झूठी पार्टी जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। गजेंद्र चौहान ने कहा कि यह दुखद है कि एक वरिष्ठ कलाकार इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिस पार्टी को देश के करोड़ों लोगों ने समर्थन दिया है उसके बारे में इस तरह की टिप्पणी करने से बचना चाहिए। गजेंद्र चौहान ने अपनी बात रखते हुए नसीरुद्दीन शाह से कहा कि उन्हें शर्म आनी चाहिए।

    गजेंद्र चौहान ने यह भी स्पष्ट किया कि वह नसीरुद्दीन शाह की अभिनय प्रतिभा का सम्मान करते हैं। हालांकि उनके मुताबिक राजनीतिक और सामाजिक मामलों पर विचार रखते समय सभी पक्षों को समझना जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि नसीरुद्दीन शाह की सोशल मीडिया पोस्ट और वीडियो में कई बार किसी मुद्दे का केवल एक पक्ष सामने आता है। गजेंद्र चौहान ने कहा कि वह उन्हें एक बेहतरीन कलाकार और अच्छा इंसान मानते हैं लेकिन उनकी टिप्पणियों में संतुलित नजरिए की कमी महसूस करते हैं।

    छात्र आंदोलन को लेकर क्या बोले गजेंद्र चौहान

    यह विवाद एसआरएफटीआई में चल रहे छात्र आंदोलन के बीच सामने आया है। संस्थान में छात्रों के विरोध प्रदर्शन को लेकर नसीरुद्दीन शाह ने अपनी राय जाहिर की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि सत्तारूढ़ दल उन लोगों से बदला लेने की कोशिश करता है जो उसकी विचारधारा और नीतियों से सहमत नहीं हैं। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक और फिल्म जगत से जुड़ी बहस तेज हो गई।

    गजेंद्र चौहान ने छात्र आंदोलन पर बात करते हुए कहा कि छात्रों को अपनी मांगों और चिंताओं को लेकर विरोध करने का अधिकार है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किसी विवाद का स्थायी समाधान निकालने के लिए छात्रों और संस्थान के प्रशासन के बीच बातचीत जरूरी है। उनके मुताबिक लंबे समय तक चलने वाला आंदोलन अपने आप समस्या का समाधान नहीं कर सकता। इसके लिए दोनों पक्षों को एक दूसरे की बात सुननी होगी और सहमति बनाने की दिशा में प्रयास करना होगा।

    राजनीतिक मुद्दों पर कलाकारों की राय से बढ़ी बहस

    नसीरुद्दीन शाह और गजेंद्र चौहान की इस बयानबाजी ने एक बार फिर राजनीतिक मुद्दों पर कलाकारों की भूमिका को चर्चा में ला दिया है। एक ओर नसीरुद्दीन शाह ने सरकार और सत्तारूढ़ दल की नीतियों पर सवाल उठाए हैं तो दूसरी ओर गजेंद्र चौहान ने उनकी भाषा और नजरिए पर आपत्ति जताई है। दोनों कलाकारों की टिप्पणियों के बीच एसआरएफटीआई का छात्र आंदोलन भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

    इस पूरे मामले में छात्रों की मांगों और संस्थान के प्रशासन के पक्ष को समझना भी जरूरी है। फिलहाल गजेंद्र चौहान की टिप्पणी के बाद दोनों कलाकारों के बयानों को लेकर बहस जारी है। विवाद का समाधान बातचीत से निकलता है या राजनीतिक बयानबाजी आगे भी जारी रहती है इस पर सबकी नजर बनी हुई है।

  • नसीरुद्दीन शाह पर कंगना का पलटवार, ‘लोमड़ी’ कहकर साधा निशाना, पीयूष मिश्रा के समर्थन में उतरीं

    नसीरुद्दीन शाह पर कंगना का पलटवार, ‘लोमड़ी’ कहकर साधा निशाना, पीयूष मिश्रा के समर्थन में उतरीं


    नई दिल्ली। नसीरुद्दीन शाह और पीयूष मिश्रा के बीच चल रहे बयानबाजी के विवाद में अब अभिनेत्री और सांसद कंगना रनौत भी कूद पड़ी हैं। कंगना ने पीयूष मिश्रा के बयान का समर्थन करते हुए नसीरुद्दीन शाह पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने नसीरुद्दीन शाह को लोमड़ी तक कह दिया और कहा कि उन्हें गर्व है कि वह जिस देश की रोटी खाती हैं उसके लिए आवाज उठाती हैं और जरूरत पड़ने पर उसके लिए लड़ती हैं। कंगना की इस टिप्पणी के बाद बॉलीवुड से जुड़े इस विवाद ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है।

    दरअसल पूरा मामला छात्र आंदोलनों और फिल्म इंडस्ट्री की कथित चुप्पी से जुड़ा है। नसीरुद्दीन शाह ने छात्र प्रदर्शन के दौरान बॉलीवुड कलाकारों के छात्रों के समर्थन में खुलकर सामने नहीं आने पर सवाल उठाया था। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री की तुलना ऐसे कुत्ते से की थी जिसके मुंह में हड्डी हो और वह भौंक नहीं सकता। नसीरुद्दीन शाह की इस टिप्पणी के बाद पीयूष मिश्रा ने भी उन पर पलटवार किया और झारखंड में छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान उनकी चुप्पी को लेकर सवाल खड़े किए।

    अब कंगना रनौत ने सोशल मीडिया पर पीयूष मिश्रा के रुख का समर्थन करते हुए नसीरुद्दीन शाह को निशाने पर लिया। कंगना ने कहा कि आज के समय में किसी को कुत्ता कहना भी तारीफ माना जा सकता है क्योंकि कुत्ते अपनी वफादारी और मासूमियत के लिए पहचाने जाते हैं। उन्होंने कहा कि हर कोई किसी न किसी का कुत्ता है, लेकिन उन्हें इस बात पर गर्व है कि वह अपने देश के लिए बोलती हैं और उसकी रखवाली करती हैं।

    कंगना ने नसीरुद्दीन शाह पर निशाना साधते हुए आगे कहा कि नसीर साहब देश की रोटी खाते हैं लेकिन पड़ोसी देश के लिए लड़ते हैं। इसके बाद उन्होंने अपनी तुलना नसीरुद्दीन शाह से करते हुए कहा कि वह उनकी तरह लोमड़ी बनने के बजाय कुत्ता बनना पसंद करेंगी। कंगना की इस टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस तेज होने की संभावना है और लोग अपने-अपने तरीके से इस विवाद पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

    इससे पहले पीयूष मिश्रा ने भी नसीरुद्दीन शाह की टिप्पणी पर सवाल उठाए थे। उन्होंने झारखंड के छात्र आंदोलन का जिक्र करते हुए पूछा था कि अगर फिल्म इंडस्ट्री के कुछ कलाकार छात्रों के समर्थन में आवाज नहीं उठा रहे थे तो दूसरे कलाकार कहां थे। उन्होंने नसीरुद्दीन शाह के कुत्ते और हड्डी वाले बयान को आधार बनाकर उनसे ही सवाल किया कि जब छात्र विरोध कर रहे थे तब वे आवाज उठाने के लिए आगे क्यों नहीं आए।

    पीयूष मिश्रा ने अपने बयान में छात्र आंदोलनों के दौरान प्रदर्शनकारियों की प्राथमिकताओं पर भी टिप्पणी की थी। उन्होंने दिल्ली और मुंबई में हुए छात्र प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ छात्र विरोध प्रदर्शन से ज्यादा पिज्जा और बर्गर पर ध्यान दे रहे थे। उनके इस बयान ने भी विवाद को और हवा दी।

    अब कंगना रनौत के नसीरुद्दीन शाह पर सीधे हमले के बाद मामला और ज्यादा राजनीतिक तथा व्यक्तिगत रंग लेता दिखाई दे रहा है। एक तरफ जहां कंगना ने देश और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट किया है, वहीं दूसरी ओर नसीरुद्दीन शाह की पुरानी टिप्पणी को लेकर बहस जारी है। आने वाले दिनों में इस विवाद पर दोनों पक्षों की ओर से और बयान सामने आने की संभावना बनी हुई है।

  • जेनजी प्रोटेस्ट पर रघुवीर यादव का भावुक संदेश, छात्रों के समर्थन में बोले मेरे जिस्म का कतरा कतरा उनके साथ है

    जेनजी प्रोटेस्ट पर रघुवीर यादव का भावुक संदेश, छात्रों के समर्थन में बोले मेरे जिस्म का कतरा कतरा उनके साथ है


    मध्यप्रदेश । CJP के जेनजी प्रोटेस्ट के दौरान छात्रों पर हुए कथित लाठीचार्ज को लेकर अब फिल्म और रंगमंच जगत की हस्तियां भी खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दे रही हैं। चर्चित अभिनेता रघुवीर यादव ने सोशल मीडिया पर एक भावुक वीडियो साझा करते हुए घटना पर गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने छात्रों के साथ हुए कथित व्यवहार को मानवता के लिए पीड़ादायक बताया और कहा कि ऐसी घटनाओं को समाज कभी नहीं भूल सकता। वहीं अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराते हुए छात्रों के पक्ष में अपनी बात रखी।

    इन दिनों लोकप्रिय वेब सीरीज पंचायत में प्रधान के किरदार से चर्चा में रहे रघुवीर यादव ने वीडियो संदेश में कहा कि जो दृश्य उन्होंने देखे उन पर उन्हें विश्वास नहीं हो रहा। उन्होंने कहा कि मासूम बच्चों के साथ जिस तरह का कथित व्यवहार हुआ उसने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया है। अभिनेता ने कहा कि यह केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं बल्कि संवेदनशीलता और मानवता से जुड़ा विषय है।

    रघुवीर यादव ने अपने संदेश में सवाल उठाया कि प्रदर्शन में शामिल छात्रों का आखिर दोष क्या था। उन्होंने कहा कि यदि किसी बच्चे के साथ इस तरह की घटना होती है तो उसका दर्द केवल उसी परिवार तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाओं पर हर संवेदनशील व्यक्ति को आत्ममंथन करने की जरूरत है।

    वीडियो के दौरान अभिनेता भावुक भी नजर आए। उन्होंने कहा कि आंदोलन में शामिल छात्रों के साहस को वह सलाम करते हैं और उनका समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि युवाओं ने जिस हिम्मत के साथ अपनी बात रखने का प्रयास किया है उससे उन्हें उम्मीद है कि उनकी आवाज सुनी जाएगी। साथ ही उन्होंने जिम्मेदार पक्षों से भी संवेदनशीलता के साथ स्थिति को देखने की अपील की।

    रघुवीर यादव ने अपने संबोधन में पुलिसकर्मियों का जिक्र करते हुए भी भावनात्मक टिप्पणी की और कहा कि किसी भी परिस्थिति में बच्चों और युवाओं के साथ मानवीय व्यवहार होना चाहिए। उनका कहना था कि ऐसी घटनाएं समाज पर गहरा असर छोड़ती हैं और भविष्य में भी लंबे समय तक याद रखी जाती हैं।

    इस बीच वरिष्ठ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने भी छात्रों के समर्थन में अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक वीडियो संदेश में शिक्षा और छात्रों के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में युवाओं की आवाज को सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों के साथ काम करते हुए उन्होंने उनसे बहुत कुछ सीखा है और समाज के भविष्य के लिए उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।

    हालांकि इस पूरे घटनाक्रम को लेकर अलग अलग पक्षों के अपने अपने दावे हैं। प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई को लेकर आधिकारिक जांच तथा प्रशासनिक पक्ष भी सामने आ चुके हैं। ऐसे में मामले से जुड़े सभी तथ्यों और जांच के निष्कर्षों का इंतजार किया जा रहा है।

    फिलहाल रघुवीर यादव और नसीरुद्दीन शाह की प्रतिक्रियाओं के बाद यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है और सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर व्यापक बहस जारी है।

  • 1982 फिल्मफेयर में हुआ बड़ा उलटफेर, नसीरुद्दीन शाह के आगे फीके पड़े अमिताभ और राजेश खन्ना

    1982 फिल्मफेयर में हुआ बड़ा उलटफेर, नसीरुद्दीन शाह के आगे फीके पड़े अमिताभ और राजेश खन्ना


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के इतिहास में 1982 का फिल्मफेयर अवॉर्ड समारोह उन यादगार मौकों में गिना जाता है, जब स्टारडम से ज्यादा अभिनय को महत्व मिला। उस दौर में अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, कमल हासन और दिलीप कुमार जैसे सितारों का दबदबा था, लेकिन बेस्ट एक्टर का पुरस्कार नसीरुद्दीन शाह ने अपनी दमदार अदाकारी के दम पर जीत लिया।

    साल 1981 में अमिताभ बच्चन की ‘नसीब’, ‘लावारिस’ और ‘याराना’ जैसी सुपरहिट फिल्में रिलीज हुई थीं। वहीं राजेश खन्ना, कमल हासन और अन्य बड़े सितारों की फिल्में भी दर्शकों के बीच खूब पसंद की गईं। इसके बावजूद 29वें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में नसीरुद्दीन शाह ने फिल्म ‘चक्र’ के लिए बेस्ट एक्टर का सम्मान अपने नाम किया।

    उस वर्ष बेस्ट एक्टर की दौड़ में अमिताभ बच्चन को ‘लावारिस’ और ‘सिलसिला’, राजेश खन्ना को ‘दर्द’ तथा कमल हासन को ‘एक दूजे के लिए’ के लिए नामांकन मिला था। हालांकि निर्णायकों ने नसीरुद्दीन शाह के यथार्थवादी और प्रभावशाली अभिनय को सर्वश्रेष्ठ माना।

    सिर्फ नसीरुद्दीन शाह ही नहीं, स्मिता पाटिल ने भी फिल्म ‘चक्र’ के लिए बेस्ट एक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवॉर्ड जीता। उन्होंने हेमा मालिनी, जया बच्चन, रेखा और राखी जैसी दिग्गज अभिनेत्रियों को पीछे छोड़ दिया। ‘चक्र’ को कुल छह श्रेणियों में नामांकन मिला था, जिनमें से तीन पुरस्कार फिल्म ने अपने नाम किए। दिलचस्प बात यह रही कि अमिताभ बच्चन की चर्चित फिल्मों को उस वर्ष कोई फिल्मफेयर अवॉर्ड नहीं मिला।

    समाज का आईना थी ‘चक्र’

    निर्देशक रवींद्र धर्मराज की फिल्म ‘चक्र’ मुंबई की झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले गरीब परिवारों के संघर्ष को बेहद यथार्थवादी अंदाज में दिखाती है। फिल्म में स्मिता पाटिल ने ‘अम्मा’ का किरदार निभाया है, जो पति की मौत के बाद अपने बेटे का पालन-पोषण करने के लिए संघर्ष करती है। इसी दौरान उसकी मुलाकात नसीरुद्दीन शाह द्वारा निभाए गए ‘लुक्का’ के किरदार से होती है। गरीबी, सामाजिक असमानता और जीवन के कठोर यथार्थ को दिखाने वाली इस फिल्म को भारतीय समानांतर सिनेमा की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है।

    आज भी ‘चक्र’ को नसीरुद्दीन शाह और स्मिता पाटिल के करियर की बेहतरीन फिल्मों में शामिल किया जाता है। अभिनय की बारीकियों और मजबूत कहानी के कारण यह फिल्म समय के साथ एक क्लासिक का दर्जा हासिल कर चुकी है।

  • हेमा मालिनी संग सीन देने में हुई झिझक! नसीरुद्दीन शाह के इनकार के बाद मेकर्स ने निकाला अनोखा रास्ता

    हेमा मालिनी संग सीन देने में हुई झिझक! नसीरुद्दीन शाह के इनकार के बाद मेकर्स ने निकाला अनोखा रास्ता


    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा में कई बार ऐसे किस्से सामने आते हैं जो फिल्मों से ज्यादा उनकी शूटिंग के दौरान घटी घटनाओं की वजह से चर्चा में रहते हैं। कलाकार अक्सर अपने किरदार की जरूरत के अनुसार चुनौतीपूर्ण दृश्य निभाते हैं लेकिन कुछ मौके ऐसे भी आए जब कलाकारों ने व्यक्तिगत असहजता के कारण कुछ दृश्यों को करने से परहेज किया। ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा साल 1988 में रिलीज हुई फिल्म रिहाई से जुड़ा है जिसमें हेमा मालिनी और नसीरुद्दीन शाह अहम भूमिकाओं में नजर आए थे।

    बताया जाता है कि फिल्म की कहानी के अनुसार नसीरुद्दीन शाह और हेमा मालिनी के बीच एक रोमांटिक दृश्य फिल्माया जाना था। जब अभिनेता को इस दृश्य के बारे में जानकारी मिली तो उन्होंने इसे करने में असहजता जताई। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार नसीरुद्दीन शाह का मानना था कि हेमा मालिनी जैसी वरिष्ठ और प्रतिष्ठित अभिनेत्री के साथ इस तरह का दृश्य करना उनके लिए सहज नहीं था। उन्होंने निर्देशक से अपनी झिझक भी साझा की।

    कहा जाता है कि फिल्म की निर्देशक अरुणा राजे और स्वयं हेमा मालिनी ने उन्हें समझाने का प्रयास किया ताकि दृश्य कहानी की जरूरत के अनुसार पूरा किया जा सके। हालांकि अभिनेता अपने फैसले पर कायम रहे। इसके बाद फिल्म की टीम ने वैकल्पिक तरीका अपनाते हुए संबंधित दृश्य को बॉडी डबल की मदद से फिल्माने का निर्णय लिया। इस तरह फिल्म की शूटिंग पूरी की गई और कहानी के प्रवाह को भी बनाए रखा गया।

    फिल्म रिहाई अपने समय की अलग विषयवस्तु वाली फिल्मों में गिनी जाती है। इसमें ग्रामीण समाज महिलाओं के अकेलेपन सामाजिक बदलाव और रिश्तों की जटिलताओं को संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत किया गया था। फिल्म में हेमा मालिनी के अलावा विनोद खन्ना नसीरुद्दीन शाह और नीना गुप्ता जैसे कलाकारों ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। समीक्षकों ने इसकी कहानी और अभिनय की सराहना की थी।

    रिपोर्टों के मुताबिक इस फिल्म के लिए शुरुआत में अभिनेत्री स्मिता पाटिल पर भी विचार किया गया था। बाद में यह भूमिका हेमा मालिनी को मिली और उन्होंने मजबूत कहानी तथा महिला निर्देशक के साथ काम करने की इच्छा के चलते फिल्म स्वीकार की। एक इंटरव्यू में हेमा मालिनी ने भी बताया था कि अरुणा राजे के निर्देशन में काम करना उनके लिए एक विशेष अनुभव था और यही वजह थी कि उन्होंने यह फिल्म करने का फैसला लिया।

    आज भी रिहाई केवल अपनी कहानी के लिए ही नहीं बल्कि शूटिंग से जुड़े इन दिलचस्प किस्सों के कारण भी याद की जाती है। यह घटना इस बात का उदाहरण मानी जाती है कि कलाकारों की व्यक्तिगत सहजता और पेशेवर जरूरतों के बीच संतुलन बनाने के लिए फिल्म निर्माण के दौरान कई बार अलग-अलग समाधान तलाशने पड़ते हैं।

  • करणवीर बोहरा के पिता और फिल्म प्रोड्यूसर महेंद्र बोहरा का निधन, तेजा और टक्कर जैसी फिल्मों के निर्माता रहे

    करणवीर बोहरा के पिता और फिल्म प्रोड्यूसर महेंद्र बोहरा का निधन, तेजा और टक्कर जैसी फिल्मों के निर्माता रहे


    नई दिल्ली। अएक्टर करणवीर बोहरा ने सोशल मीडिया के जरिए अपने पिता और जाने-माने फिल्म प्रोड्यूसर महेंद्र बोहरा के निधन की जानकारी दी। महेंद्र बोहरा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से कई दशकों से जुड़े थे और उन्होंने तेजा, टक्कर, प्यार का कर्ज और लश्कर जैसी फिल्मों का निर्माण किया।

    करणवीर ने इंस्टाग्राम पोस्ट में अपने पिता को याद करते हुए लिखा, “लव यू डैड। मैंने आपको शब्दों से ज्यादा मिस करूंगा। आपने एक अच्छी और पूरी जिंदगी जी।” उन्होंने बताया कि उनके पिता हमेशा कहते थे कि इस दुनिया से शांति से और बिना किसी तकलीफ के जाना चाहिए, और महेंद्र बोहरा ने ऐसा ही किया।

    एक्टर ने आगे कहा कि उनके पिता ने उन्हें और उनकी बहन को हिम्मत, उम्मीद और मेहनत करना सिखाया। उन्होंने लिखा, आपने मुझे सिखाया कि चाहे हालात कितने भी मुश्किल हों, उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। गिरो तो दोबारा खड़े होना चाहिए। जिंदगी को जोश और पॉजिटिविटी के साथ जीना चाहिए।

    करणवीर ने अपने पिता के पेशेवर जीवन की भी तारीफ की और कहा कि महेंद्र बोहरा ने उन्हें सिखाया कि एक्टर और प्रोड्यूसर दोनों के तौर पर मेहनत और क्रिएटिविटी की अहमियत समझना चाहिए। उनके पिता ने हमेशा अच्छा व्यवहार करना और सपने देखने की प्रेरणा दी।

    महेंद्र बोहरा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में रामकुमार बोहरा के बेटे के रूप में आए और कई बड़े सितारों जैसे नसीरुद्दीन शाह, संजय दत्त, सुनील शेट्टी और सोनाली बेंद्रे के साथ काम किया। उनकी फिल्में दर्शकों में हमेशा यादगार रही हैं।

  • मंथन: जब 5 लाख किसानों ने 2-2 रुपये जोड़कर बनाई देश की पहली 'क्राउड फंडेड' फ़िल्म, कान्स तक गूंजी थी सफलता

    मंथन: जब 5 लाख किसानों ने 2-2 रुपये जोड़कर बनाई देश की पहली 'क्राउड फंडेड' फ़िल्म, कान्स तक गूंजी थी सफलता


    मुंबई। अक्सर फ़िल्मों के बजट करोड़ों में होते हैं और उनके पीछे बड़े कॉर्पोरेट घरानों का हाथ होता है, लेकिन 1976 में एक ऐसी फ़िल्म आई जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘मंथन’ भारतीय सिनेमा की वह क्रांतिकारी फ़िल्म है, जिसे किसी फ़ाइनेंसर ने नहीं बल्कि गुजरात के 5 लाख किसानों ने अपने दो-दो रुपये के चंदे से बनाया था। करीब 10 लाख रुपये के बजट में तैयार हुई यह फ़िल्म भारत की पहली ‘क्राउड फंडेड’ फ़िल्म कहलाई, जिसकी शुरुआत में गर्व से लिखा गया गुजरात के 5 लाख किसान इस फ़िल्म को प्रस्तुत कर रहे हैं।

    श्वेत क्रांति की वह अनकही दास्तान फ़िल्म की कहानी गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन और डॉ. वर्गीज कुरियन के ‘श्वेत क्रांति’ के संघर्ष पर आधारित थी। विजय तेंदुलकर और श्याम बेनेगल द्वारा लिखित यह कहानी एक ऐसे समाज को दिखाती है जहाँ गरीब किसान डेयरी मालिकों के शोषण और जाति प्रथा की बेड़ियों में जकड़े हुए थे। फ़िल्म में गिरीश कर्नाड ने डॉ. राव डॉ. कुरियन से प्रेरित का किरदार निभाया, जो गाँव में सहकारिता का अलख जगाने पहुँचते हैं। वहीं, दिवंगत अभिनेत्री स्मिता पाटिल ने ‘बिंदु’ नामक एक आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी ग्रामीण महिला का किरदार निभाकर अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया।

    कलाकारों का दिग्गज जमावड़ा और नेशनल अवॉर्ड का सफर ‘मंथन’ केवल अपनी फंडिंग के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी जबरदस्त स्टारकास्ट के लिए भी जानी जाती है। नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा और अमरीश पुरी जैसे मंझे हुए कलाकारों ने इस फ़िल्म को जीवंत बना दिया। इस फ़िल्म की गुणवत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस साल इसने दो नेशनल अवॉर्ड अपने नाम किए बेस्ट फीचर फ़िल्म और बेस्ट स्क्रीनप्ले। प्रीति सागर के गाने मेरो गाम काठा पारे ने न केवल फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड जीता, बल्कि यह आज भी अमूल के विज्ञापनों की पहचान बना हुआ है।

    48 साल बाद भी कायम है चमक मई 2024 में इस फ़िल्म ने तब एक बार फिर सुर्खियां बटोरीं, जब इसकी रिलीज के 48 साल पूरे होने पर इसे प्रतिष्ठित कान्स फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया। यह इस बात का प्रमाण है कि किसानों के छोटे से सहयोग से शुरू हुई यह यात्रा आज भी वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक है। ‘मंथन’ आज भी हमें याद दिलाती है कि यदि नीयत साफ़ हो और उद्देश्य नेक, तो जनता का छोटा-सा चंदा भी इतिहास रचने की ताकत रखता है।