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  • अयोध्या साधु-संत बोले—गाय माता है, राष्ट्रीय पशु बहस पर सीएम योगी के बयान का किया समर्थन

    अयोध्या साधु-संत बोले—गाय माता है, राष्ट्रीय पशु बहस पर सीएम योगी के बयान का किया समर्थन

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग पर दिए गए बयान के बाद धार्मिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। इस मुद्दे पर अयोध्या के कई प्रमुख साधु-संतों ने मुख्यमंत्री के रुख का समर्थन किया है और गाय को केवल पशु नहीं बल्कि ‘गौमाता’ बताते हुए इसे भारतीय संस्कृति और आस्था का अभिन्न हिस्सा बताया है। संतों का कहना है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग परंपरागत धार्मिक भावनाओं के विपरीत है और इससे समाज में अनावश्यक विवाद पैदा होता है।

    सीएम योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा था कि गाय हिंदू समाज के लिए केवल एक पशु नहीं बल्कि माता के समान है और माता-पुत्र के संबंध को किसी सरकारी घोषणा की आवश्यकता नहीं होती। उनके इस बयान के बाद अयोध्या में धार्मिक नेताओं की प्रतिक्रिया सामने आई, जिसमें कई संतों ने इसे सनातन परंपरा के अनुरूप बताया। साकेत भवन मंदिर के महंत सीताराम दास महाराज ने कहा कि गाय को विश्व माता का दर्जा प्राप्त है और उसमें देवी-देवताओं का वास माना जाता है। उन्होंने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग को गलत मानसिकता से प्रेरित बताया।

    तपस्वी छावनी पीठाधीश्वर जगद्गुरु परमहंसाचार्य ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि गाय को लेकर सनातन परंपरा में स्पष्ट सम्मान का भाव है और इसे किसी औपचारिक घोषणा की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में गाय को माता का स्थान दिया गया है और इसे समझने के लिए सनातन परंपराओं का ज्ञान आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि समाज में इस तरह के विषयों पर अनावश्यक विवाद पैदा करना उचित नहीं है और इससे सांस्कृतिक असंतुलन उत्पन्न होता है।

    हनुमानगढ़ी के महंत डॉ. देवेशाचार्य महाराज ने कहा कि गाय को पशु कहने का विचार ही भारतीय आस्था के खिलाफ है। उन्होंने मांग की कि गाय को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाना चाहिए और इसके संरक्षण के लिए सख्त कानून बनाए जाने चाहिए। उनके अनुसार यह विषय केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

    इसी क्रम में हनुमानगढ़ी के ही महंत हरीश दास ने कहा कि सीएम योगी का बयान समाज में संतुलन और परंपरा के अनुरूप है। उन्होंने कहा कि गाय भारतीय जीवन मूल्यों का केंद्र है और इसे किसी विवाद में नहीं खींचा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शासन द्वारा कानून-व्यवस्था और सामाजिक अनुशासन पर की जा रही कार्रवाई सराहनीय है और इससे समाज में स्थिरता बनी रहती है।

    इस पूरे मुद्दे ने एक बार फिर गाय को लेकर देश में चल रही वैचारिक बहस को सामने ला दिया है। एक ओर जहां धार्मिक संत इसे आस्था और परंपरा का विषय मानते हैं, वहीं दूसरी ओर यह विषय सामाजिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अयोध्या के संतों के समर्थन ने इस बहस को और अधिक व्यापक बना दिया है।

    अंततः यह मामला केवल एक बयान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भारतीय समाज में परंपरा, आस्था और आधुनिक संवैधानिक सोच के बीच संतुलन की बड़ी बहस को दर्शाता है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर और भी प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है, जिससे यह चर्चा और गहराती दिखाई दे सकती है।

  • इकबाल अंसारी की मांग: गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए, कुर्बानी को बताया अनुचित

    इकबाल अंसारी की मांग: गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए, कुर्बानी को बताया अनुचित

    नई दिल्ली। बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामले के पूर्व वादी इकबाल अंसारी ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने और उसकी कुर्बानी पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सभी धर्मों को एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और गाय का आदर करना सामाजिक एकता के लिए जरूरी है।

    उत्तर प्रदेश में बकरीद के मौके पर गाय की कुर्बानी और सार्वजनिक धार्मिक गतिविधियों को लेकर चल रही बहस के बीच बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि केस के पूर्व वादी इकबाल अंसारी का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि गाय को “गौमाता” माना जाता है और इसका सम्मान हर नागरिक की जिम्मेदारी है, चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो।

    इकबाल अंसारी ने मांग की है कि सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करे, ताकि इसके संरक्षण और सम्मान को और मजबूती मिल सके। उन्होंने कहा कि गाय केवल एक पशु नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और आस्था से जुड़ी हुई है। ऐसे में उसकी कुर्बानी किसी भी स्थिति में उचित नहीं ठहराई जा सकती।

    उन्होंने यह भी कहा कि हम भारतीय मुसलमान हैं और देश की साझा परंपराओं का सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी है। उनके अनुसार समाज में शांति और भाईचारे को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सभी धर्म एक-दूसरे की भावनाओं को समझें और उसका सम्मान करें। उन्होंने यह भी जोड़ा कि पड़ोसी धर्म की आस्था का ध्यान रखना भी सामाजिक सद्भाव का हिस्सा है।

    इकबाल अंसारी ने कहा कि गाय का दूध स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी है और इसे प्रकृति का एक उपयोगी उपहार माना जाता है। इसलिए गाय का संरक्षण और सम्मान और भी जरूरी हो जाता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस्लाम भी निर्दोष और उपयोगी जीवों के प्रति क्रूरता को बढ़ावा नहीं देता, और समाज के कुछ लोग गलत कार्यों से पूरे समुदाय को बदनाम करते हैं।

    उन्होंने समाज के लोगों से अपील करते हुए कहा कि गायों के साथ किसी भी प्रकार का गलत व्यवहार नहीं होना चाहिए और जो भी ऐसा करता है, उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। उनका कहना है कि इस मुद्दे को राजनीति से दूर रखना चाहिए और केवल सामाजिक सौहार्द के नजरिए से देखा जाना चाहिए।

    पूर्व वादी ने यह भी कहा कि यदि समाज में भाईचारा बनाए रखना है तो सभी धर्मों को एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना होगा। उन्होंने अयोध्या के संतों की राय का भी समर्थन करते हुए कहा कि धर्मों के बीच संवाद और सम्मान ही देश को मजबूत बनाता है।

    इस बयान पर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। कुछ लोग इसे सांप्रदायिक सौहार्द की दिशा में सकारात्मक कदम बता रहे हैं, तो कुछ इसे धार्मिक और राजनीतिक बहस से जोड़कर देख रहे हैं।

  • मौलाना मदनी बोले- गाय को दिया जाए राष्ट्रीय पशु का दर्जा….इससे मॉब लिंचिंग व हिंसा रुकेगी

    मौलाना मदनी बोले- गाय को दिया जाए राष्ट्रीय पशु का दर्जा….इससे मॉब लिंचिंग व हिंसा रुकेगी


    सहारनपुर।
    जमीयत उलमा-ए-हिंद (Jamiat Ulama-e-Hind) के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी (Maulana Arshad Madani) ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग की है। उन्होंने कहा, इससे गाय के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग और हिंसा (Mob lynching and violence) पर रोक लग सकती है। सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने से क्यों बच रही है, यह बड़ा सवाल है।

    मदनी ने कहा, गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने पर मुसलमानों को कोई आपत्ति नहीं होगी, बल्कि उन्हें खुशी होगी कि समाज में नफरत और तनाव कम होगा। मदनी ने कहा कि गाय के मुद्दे को राजनीतिक और भावनात्मक हथियार बना दिया गया है।