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  • जब मोहम्मद रफी की आवाज ने रचा इतिहास इस एक गीत ने दिलाया जिंदगी का पहला और आखिरी नेशनल अवॉर्ड

    जब मोहम्मद रफी की आवाज ने रचा इतिहास इस एक गीत ने दिलाया जिंदगी का पहला और आखिरी नेशनल अवॉर्ड


    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर की बात जब भी होती है तो मोहम्मद रफी का नाम सबसे पहले लिया जाता है। उनकी आवाज में ऐसी मिठास ऐसी गहराई और ऐसा दर्द था जिसने करोड़ों लोगों के दिलों में हमेशा के लिए जगह बना ली। चार दशक से ज्यादा लंबे अपने शानदार करियर में उन्होंने हजारों गीत गाए और हर तरह की भावनाओं को अपनी गायकी से जीवंत कर दिया। रोमांस हो भक्ति हो देशभक्ति हो या फिर बिछड़ने का दर्द रफी साहब की आवाज हर एहसास को श्रोताओं तक पूरी सच्चाई के साथ पहुंचाती थी। यही वजह है कि आज भी उनके गीत उतने ही पसंद किए जाते हैं जितने अपने दौर में हुआ करते थे।

    मोहम्मद रफी को अपने करियर में कई सम्मान मिले लेकिन एक उपलब्धि ऐसी रही जिसने उनके नाम को भारतीय संगीत इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज कर दिया। यह उपलब्धि थी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार यानी नेशनल अवॉर्ड। खास बात यह रही कि उन्हें यह सम्मान अपने पूरे करियर में केवल एक बार मिला और वह भी एक ऐसे गीत के लिए जो आज भी लोगों की जुबान पर रहता है।

    साल 1977 में रिलीज हुई फिल्म हम किसी से कम नहीं उस दौर की सबसे चर्चित म्यूजिकल फिल्मों में शामिल थी। फिल्म में ऋषि कपूर और तारिक खान मुख्य भूमिका में नजर आए थे। आरडी बर्मन के संगीत से सजी इस फिल्म के लगभग सभी गीत सुपरहिट साबित हुए। बचना ऐ हसीनों चांद मेरा दिल है अगर दुश्मन जमाना और हमको तो यारा तेरी यारी जैसे गीतों ने फिल्म को जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई। लेकिन इन सभी गीतों के बीच एक ऐसा गाना था जिसने लोगों के दिलों को सबसे ज्यादा छुआ और वह था क्या हुआ तेरा वादा।

    यह गीत सिर्फ एक फिल्मी गाना नहीं बल्कि टूटे हुए प्यार के दर्द की ऐसी अभिव्यक्ति बन गया जिसे हर पीढ़ी ने अपनाया। पर्दे पर अभिनेता तारिक खान की भावनाओं को मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज से ऐसा जीवन दिया कि हर श्रोता इस गीत से जुड़ गया। उनकी आवाज में दर्द की गहराई और भावनाओं की सच्चाई इतनी प्रभावशाली थी कि यह गीत सुनने वालों की आंखें नम कर देता था।

    इसी गीत के लिए मोहम्मद रफी को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का नेशनल अवॉर्ड मिला। यही उनके जीवन का पहला और आखिरी राष्ट्रीय सम्मान साबित हुआ। इतना ही नहीं इसी गीत के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला जबकि गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार प्रदान किया गया। इस गीत ने उस दौर के कई दिग्गज गायकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई और संगीत प्रेमियों के दिलों में स्थायी स्थान हासिल किया।

    फिल्म हम किसी से कम नहीं उस वर्ष की सबसे सफल फिल्मों में शामिल रही। अमिताभ बच्चन की कई बड़ी फिल्मों के बीच भी इस फिल्म ने अपने संगीत के दम पर अलग पहचान बनाई। आरडी बर्मन की धुनें और मोहम्मद रफी की जादुई आवाज ने इसे हिंदी फिल्म संगीत की अमर धरोहर बना दिया। आज भी जब क्या हुआ तेरा वादा सुनाई देता है तो यह सिर्फ एक गीत नहीं बल्कि मोहम्मद रफी की महान गायकी और भारतीय संगीत की समृद्ध विरासत की याद ताजा कर देता है। यही कारण है कि यह गीत और उससे जुड़ा यह राष्ट्रीय सम्मान हमेशा संगीत प्रेमियों के लिए खास बना रहेगा।

  • बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली लेकिन इतिहास में दर्ज हुई मुंबई मेरी जान दो साल बाद आई फिल्म ने जीता नेशनल अवॉर्ड

    बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली लेकिन इतिहास में दर्ज हुई मुंबई मेरी जान दो साल बाद आई फिल्म ने जीता नेशनल अवॉर्ड

    नई दिल्ली । 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इन हमलों में सैकड़ों लोगों की जान गई और हजारों परिवारों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। इस दर्दनाक घटना के करीब दो साल बाद निर्देशक निशिकांत कामत ने इसी त्रासदी से प्रेरित फिल्म मुंबई मेरी जान बनाई जिसने दर्शकों को मनोरंजन नहीं बल्कि समाज की सच्चाई से रूबरू कराया। वर्ष 2008 में रिलीज हुई यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकी लेकिन समय के साथ इसे भारतीय सिनेमा की सबसे प्रभावशाली फिल्मों में गिना जाने लगा। अपनी संवेदनशील कहानी और बेहतरीन प्रस्तुति के दम पर फिल्म ने राष्ट्रीय पुरस्कार भी अपने नाम किया और आज इसकी पहचान एक क्लासिक फिल्म के रूप में होती है।

    मुंबई मेरी जान किसी अपराधी की तलाश या जांच की कहानी नहीं है बल्कि यह उन आम लोगों की मानसिक स्थिति को सामने लाती है जिनकी जिंदगी एक आतंकी हमले के बाद पूरी तरह बदल जाती है। फिल्म कई अलग अलग किरदारों के माध्यम से यह दिखाती है कि आतंकवाद का असर केवल जानमाल के नुकसान तक सीमित नहीं रहता बल्कि समाज की सोच रिश्तों और इंसानी भरोसे को भी गहराई से प्रभावित करता है। यही वजह है कि यह फिल्म आज भी उतनी ही प्रासंगिक महसूस होती है जितनी अपनी रिलीज के समय थी।

    फिल्म में केके मेनन आर माधवन परेश रावल सोहा अली खान इरफान खान और आयशा रजा मिश्रा जैसे शानदार कलाकारों ने अपने अभिनय से कहानी को जीवंत बना दिया। केके मेनन ने ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया है जो धमाकों के बाद हर मुस्लिम नागरिक को शक की नजर से देखने लगता है। उनका किरदार समाज में फैलने वाले डर और पूर्वाग्रह को बेहद प्रभावशाली तरीके से सामने लाता है।

    आर माधवन फिल्म में रोजाना लोकल ट्रेन से सफर करने वाले निखिल अग्रवाल बने हैं जो धमाके के बाद मानसिक आघात का शिकार हो जाते हैं। उनका किरदार बताता है कि आतंकवादी घटनाओं का असर केवल शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी लोगों को लंबे समय तक परेशान करता है। दूसरी ओर परेश रावल एक अनुभवी पुलिस अधिकारी की भूमिका में नजर आते हैं जो अपने व्यवहार और समझदारी से लोगों को नफरत की बजाय इंसानियत का रास्ता अपनाने का संदेश देते हैं।

    सोहा अली खान ने एक टीवी पत्रकार की भूमिका निभाई है जिसकी निजी जिंदगी भी इस हादसे से प्रभावित होती है। वहीं इरफान खान ने थॉमस का किरदार निभाया है जो अफवाहों और भय के माहौल में गलतियां करता है लेकिन अंत में अपनी भूल का एहसास भी करता है। उनका किरदार समाज में फैलती अफवाहों और उनके खतरनाक परिणामों को बेहद संवेदनशील तरीके से दर्शाता है।

    करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सीमित कमाई की लेकिन इसकी कहानी और तकनीकी गुणवत्ता की खूब सराहना हुई। फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया और आज भी इसे भारतीय सिनेमा की सबसे प्रभावशाली ट्रेजेडी ड्रामा फिल्मों में गिना जाता है। IMDb पर 7.7 की रेटिंग इस बात का प्रमाण है कि समय के साथ इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ी है।

    मुंबई मेरी जान केवल एक फिल्म नहीं बल्कि आतंकवाद के खिलाफ इंसानियत की आवाज है। यह दर्शाती है कि भय और नफरत के बीच भी संवेदनशीलता और आपसी विश्वास ही समाज को मजबूत बनाते हैं। यही संदेश इस फिल्म को वर्षों बाद भी प्रासंगिक और यादगार बनाता है।

  • मंथन: जब 5 लाख किसानों ने 2-2 रुपये जोड़कर बनाई देश की पहली 'क्राउड फंडेड' फ़िल्म, कान्स तक गूंजी थी सफलता

    मंथन: जब 5 लाख किसानों ने 2-2 रुपये जोड़कर बनाई देश की पहली 'क्राउड फंडेड' फ़िल्म, कान्स तक गूंजी थी सफलता


    मुंबई। अक्सर फ़िल्मों के बजट करोड़ों में होते हैं और उनके पीछे बड़े कॉर्पोरेट घरानों का हाथ होता है, लेकिन 1976 में एक ऐसी फ़िल्म आई जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘मंथन’ भारतीय सिनेमा की वह क्रांतिकारी फ़िल्म है, जिसे किसी फ़ाइनेंसर ने नहीं बल्कि गुजरात के 5 लाख किसानों ने अपने दो-दो रुपये के चंदे से बनाया था। करीब 10 लाख रुपये के बजट में तैयार हुई यह फ़िल्म भारत की पहली ‘क्राउड फंडेड’ फ़िल्म कहलाई, जिसकी शुरुआत में गर्व से लिखा गया गुजरात के 5 लाख किसान इस फ़िल्म को प्रस्तुत कर रहे हैं।

    श्वेत क्रांति की वह अनकही दास्तान फ़िल्म की कहानी गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन और डॉ. वर्गीज कुरियन के ‘श्वेत क्रांति’ के संघर्ष पर आधारित थी। विजय तेंदुलकर और श्याम बेनेगल द्वारा लिखित यह कहानी एक ऐसे समाज को दिखाती है जहाँ गरीब किसान डेयरी मालिकों के शोषण और जाति प्रथा की बेड़ियों में जकड़े हुए थे। फ़िल्म में गिरीश कर्नाड ने डॉ. राव डॉ. कुरियन से प्रेरित का किरदार निभाया, जो गाँव में सहकारिता का अलख जगाने पहुँचते हैं। वहीं, दिवंगत अभिनेत्री स्मिता पाटिल ने ‘बिंदु’ नामक एक आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी ग्रामीण महिला का किरदार निभाकर अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया।

    कलाकारों का दिग्गज जमावड़ा और नेशनल अवॉर्ड का सफर ‘मंथन’ केवल अपनी फंडिंग के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी जबरदस्त स्टारकास्ट के लिए भी जानी जाती है। नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा और अमरीश पुरी जैसे मंझे हुए कलाकारों ने इस फ़िल्म को जीवंत बना दिया। इस फ़िल्म की गुणवत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस साल इसने दो नेशनल अवॉर्ड अपने नाम किए बेस्ट फीचर फ़िल्म और बेस्ट स्क्रीनप्ले। प्रीति सागर के गाने मेरो गाम काठा पारे ने न केवल फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड जीता, बल्कि यह आज भी अमूल के विज्ञापनों की पहचान बना हुआ है।

    48 साल बाद भी कायम है चमक मई 2024 में इस फ़िल्म ने तब एक बार फिर सुर्खियां बटोरीं, जब इसकी रिलीज के 48 साल पूरे होने पर इसे प्रतिष्ठित कान्स फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया। यह इस बात का प्रमाण है कि किसानों के छोटे से सहयोग से शुरू हुई यह यात्रा आज भी वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक है। ‘मंथन’ आज भी हमें याद दिलाती है कि यदि नीयत साफ़ हो और उद्देश्य नेक, तो जनता का छोटा-सा चंदा भी इतिहास रचने की ताकत रखता है।