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  • नई शिक्षा नीति के अनुरूप CBSE का निर्णय: 9वीं कक्षा में तीन भाषाएं अनिवार्य, 1 जुलाई से लागू नियम

    नई शिक्षा नीति के अनुरूप CBSE का निर्णय: 9वीं कक्षा में तीन भाषाएं अनिवार्य, 1 जुलाई से लागू नियम

    नई दिल्ली । भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी बदलाव की घोषणा की गई है, जिसने स्कूल शिक्षा के ढांचे को नई दिशा देने की शुरुआत कर दी है। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड CBSE ने कक्षा 9 के छात्रों के लिए एक नई भाषा नीति लागू करने का निर्णय लिया है, जिसके तहत अब छात्रों को कम से कम तीन भाषाओं का अध्ययन करना अनिवार्य होगा।

    यह व्यवस्था 1 जुलाई 2026 से पूरे देश के विद्यालयों में लागू की जाएगी और इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचे के अनुरूप एक बड़ा कदम माना जा रहा है। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य छात्रों में बहुभाषी क्षमता को विकसित करना, भारतीय भाषाओं के प्रति रुचि बढ़ाना और शिक्षा को अधिक समावेशी एवं व्यावहारिक बनाना है। नए नियम के अनुसार प्रत्येक छात्र को आर1, आर2 और आर3 के रूप में तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा, जिनमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय मूल की होनी आवश्यक हैं।

    यदि कोई छात्र विदेशी भाषा का चयन करता है तो उसे पहले दो भारतीय भाषाओं का अध्ययन करना अनिवार्य होगा, इसके बाद ही वह तीसरी या अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में विदेशी भाषा चुन सकेगा। इस निर्णय को शिक्षा विशेषज्ञ छात्रों के समग्र विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं, क्योंकि इससे न केवल भाषाई दक्षता बढ़ेगी बल्कि सांस्कृतिक समझ और संचार कौशल भी मजबूत होंगे।

    बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि कक्षा 10 में आर3 भाषा के लिए किसी प्रकार की बोर्ड परीक्षा आयोजित नहीं की जाएगी, बल्कि इसका मूल्यांकन पूरी तरह स्कूल स्तर पर आंतरिक रूप से किया जाएगा। इसका उद्देश्य छात्रों पर परीक्षा का अतिरिक्त बोझ कम करना और सीखने की प्रक्रिया को अधिक सहज बनाना है।

    हालांकि, आर3 विषय का प्रदर्शन छात्रों के प्रमाणपत्र में दर्ज किया जाएगा, जिससे उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों का उचित मूल्यांकन हो सके। इस नीति के लागू होने से विद्यालयों को भी अपनी तैयारी मजबूत करनी होगी क्योंकि उन्हें योग्य भाषा शिक्षकों की व्यवस्था करनी होगी। जिन स्कूलों में संसाधनों की कमी है, वहां अंतर-विद्यालय सहयोग, ऑनलाइन शिक्षण और मिश्रित शिक्षण मॉडल का सहारा लिया जा सकता है।

    इसके अलावा सेवानिवृत्त शिक्षकों और योग्य स्नातकोत्तर उम्मीदवारों की सेवाएं लेने की भी अनुमति दी गई है ताकि शिक्षण व्यवस्था प्रभावित न हो। यह भी सुनिश्चित किया गया है कि किसी भी छात्र को इस नई व्यवस्था के कारण बोर्ड परीक्षा से वंचित नहीं किया जाएगा और विशेष आवश्यकता वाले छात्रों के लिए आवश्यक छूट भी प्रदान की जाएगी। साथ ही विदेश से लौटने वाले छात्रों को भी विशेष परिस्थितियों में छूट देने का प्रावधान रखा गया है।

    कुल मिलाकर यह निर्णय भारतीय शिक्षा प्रणाली को एक बहुभाषी और आधुनिक ढांचे में ढालने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, जो आने वाले वर्षों में छात्रों की भाषा क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को नई मजबूती प्रदान करेगा।

  • ऋषि गालव विश्वविद्यालय के भूमिपूजन के साथ CM डॉ. मोहन यादव ने फूंका ज्ञान क्रांति का शंखनाद, मध्य प्रदेश बनेगा देश का एजुकेशन हब!

    ऋषि गालव विश्वविद्यालय के भूमिपूजन के साथ CM डॉ. मोहन यादव ने फूंका ज्ञान क्रांति का शंखनाद, मध्य प्रदेश बनेगा देश का एजुकेशन हब!


    मध्य प्रदेश
    की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगरी ग्वालियर अब ज्ञान और कौशल के नए वैश्विक केंद्र के रूप में अपनी पहचान स्थापित करने के लिए पूरी तरह तैयार है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने ग्वालियर की इस पावन धरा पर ‘ऋषि गालव विश्वविद्यालय’ का विधि-विधान से भूमिपूजन कर प्रदेश के शिक्षा जगत में एक नए अध्याय की शुरुआत की है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने ग्वालियर की वीरता, विद्वता और कला की त्रिवेणी का स्मरण करते हुए कहा कि एक विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाला केंद्र नहीं होता, बल्कि वह राष्ट्र निर्माण की आधारशिला होता है। ऋषि गालव के नाम पर स्थापित होने वाला यह संस्थान हमारी भावी पीढ़ियों को आधुनिक तकनीक के साथ-साथ हमारी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत और संस्कारों से भी जोड़ेगा, ताकि वे राष्ट्र निर्माण के अग्रदूत बन सकें।

    मुख्यमंत्री ने मध्य भारत शिक्षा समिति के संस्थापक सदाशिव गणेश गोखले के महान योगदान की सराहना करते हुए कहा कि पराधीनता के कठिन समय में वर्ष 1941 में जो दीया एक छोटे से स्कूल के रूप में जलाया गया था, वह आज चार महाविद्यालयों, पांच विद्यालयों और एक खेल अकादमी के रूप में एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। वर्तमान में पाँच हजार से अधिक विद्यार्थियों को शिक्षित कर रही यह संस्था अब विश्वविद्यालय के रूप में भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक विज्ञान के संगम का केंद्र बनेगी। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे नागरिकों का निर्माण करना है जो न केवल तकनीकी रूप से दक्ष हों, बल्कि चरित्रवान, नवाचारी और समाज के प्रति पूर्णतः उत्तरदायी भी हों। सरकार और समाज के सामूहिक प्रयासों का यह अनूठा उदाहरण प्रदेश के शैक्षणिक ढांचे को नई ऊंचाइयां प्रदान करेगा।

    शिक्षा प्रणाली में बदलाव की बात करते हुए मुख्यमंत्री ने नई शिक्षा नीति के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है और इसी को आधार मानकर प्रदेश में कई क्रांतिकारी नवाचार किए गए हैं। अब दीक्षांत समारोहों में औपनिवेशिक काल के काले कोट के स्थान पर भारतीय वेशभूषा और साफे की परंपरा को प्राथमिकता दी जा रही है। साथ ही, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को ‘कुलगुरु’ का गौरवपूर्ण संबोधन दिया गया है, जो हमारी गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति सम्मान को दर्शाता है। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि शिक्षा में अमीर-गरीब का भेद समाप्त होना चाहिए और सांदीपनि विद्यालयों के माध्यम से चरित्र निर्माण पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

    मध्य प्रदेश सरकार उच्च शिक्षा के लोकतंत्रीकरण के लिए निरंतर कार्यरत है, जिसके तहत प्रदेश के सभी 55 जिलों में ‘पीएम कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस’ की स्थापना की जा रही है। मुख्यमंत्री ने बताया कि सरकार ने गुमनाम नायकों और महान क्रांतिकारियों के सम्मान में तात्या टोपे विश्वविद्यालय, क्रांतिसूर्य टंट्या भील विश्वविद्यालय और रानी अवंतीबाई लोधी विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों की स्थापना की है, ताकि युवा पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास से प्रेरित हो सके। उन्होंने विश्वास जताया कि ग्वालियर का यह नया विश्वविद्यालय अगले वर्ष गुरु पूर्णिमा तक अपना कार्य प्रारंभ कर देगा और ग्वालियर न केवल मध्य भारत, बल्कि पूरे देश में शिक्षा के एक प्रमुख केंद्र (एजुकेशन हब) के रूप में नई चमक बिखेरेगा। यह संस्थान राष्ट्रवाद की भावना से ओतप्रोत होकर छात्रों के भीतर योग्यता और दक्षता का नया संचार करेगा।