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  • कार्तिक आर्यन की उपलब्धि पर भावुक हुए मुरलीकांत पेटकर, मेहनत और अभिनय की जमकर सराहना

    कार्तिक आर्यन की उपलब्धि पर भावुक हुए मुरलीकांत पेटकर, मेहनत और अभिनय की जमकर सराहना

    नई दिल्ली ।कार्तिक आर्यन के लिए 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में बेस्ट एक्टर का सम्मान हासिल करना बेहद खास उपलब्धि रही। फिल्म ‘चंदू चैंपियन’ में मुरलीकांत पेटकर का किरदार निभाने के लिए उन्हें यह पुरस्कार मिला। सम्मान मिलने के बाद कार्तिक को फिल्म जगत से लगातार बधाइयां मिल रही हैं। इनमें सबसे खास बधाई उस वास्तविक शख्स की रही, जिसकी जिंदगी को उन्होंने पर्दे पर जीवंत किया।

    पैरालिंपिक गोल्ड मेडलिस्ट मुरलीकांत पेटकर ने कार्तिक आर्यन को इस उपलब्धि के लिए शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कार्तिक की मेहनत और फिल्म में उनके अभिनय की सराहना करते हुए इसे गर्व का क्षण बताया। मुरलीकांत ने कहा कि कार्तिक ने जिस समर्पण के साथ उनके किरदार को निभाया, वह प्रशंसा के योग्य है।

    मुरलीकांत पेटकर ने कार्तिक की उपलब्धि पर खुशी जताते हुए कहा कि ‘चंदू चैंपियन’ के लिए बेस्ट एक्टर का पुरस्कार मिलना गर्व की बात है। उन्होंने फिल्म में किरदार को निभाने के लिए कार्तिक द्वारा की गई मेहनत को भी विशेष रूप से सराहा।

    उन्होंने फिल्म के निर्देशक कबीर खान और निर्माता साजिद नाडियाडवाला के प्रयासों की भी प्रशंसा की। उनके अनुसार, मुरलीकांत पेटकर की कहानी को बड़े पर्दे पर संवेदनशीलता और ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया गया। फिल्म की पूरी टीम ने मिलकर उनकी जीवन यात्रा और संघर्ष को दर्शकों तक पहुंचाने का काम किया।

    ‘चंदू चैंपियन’ 14 जून 2024 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी। फिल्म का निर्देशन कबीर खान ने किया था और कार्तिक आर्यन ने इसमें मुरलीकांत पेटकर की भूमिका निभाई थी। कहानी एक ऐसे व्यक्ति के जीवन पर आधारित है, जिसने कई कठिन परिस्थितियों का सामना करने के बाद भी अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा।

    मुरलीकांत पेटकर भारतीय सेना में रह चुके हैं। एक हादसे के बाद उन्हें शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी। इसके बाद उन्होंने खेल को अपनी नई दिशा बनाया और पैरालिंपिक में भारत के लिए गोल्ड मेडल हासिल किया।

    फिल्म में कार्तिक आर्यन के साथ विजय राज, राजपाल यादव और भाग्यश्री भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में नजर आए। मुरलीकांत पेटकर के जीवन के अलग-अलग चरणों को पर्दे पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए कार्तिक ने अपनी फिटनेस और शारीरिक क्षमता पर काफी काम किया था।

    कार्तिक ने फिल्म के लिए बॉक्सिंग और तैराकी की ट्रेनिंग ली। उन्होंने अपने शरीर में भी बड़ा बदलाव किया, ताकि किरदार के अलग-अलग दौर को वास्तविक रूप में प्रस्तुत किया जा सके। उनके अभिनय और तैयारी को मिली राष्ट्रीय स्तर की मान्यता के बाद खुद मुरलीकांत पेटकर की ओर से मिली बधाई ने इस उपलब्धि को और खास बना दिया है।

    फिल्म की कहानी संघर्ष, मेहनत, आत्मविश्वास और लक्ष्य के प्रति दृढ़ता पर केंद्रित है। मुरलीकांत पेटकर की वास्तविक जीवन यात्रा को पर्दे पर निभाने वाले कार्तिक आर्यन को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना उनके अभिनय सफर में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आया है।

  • पांच बार बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड जीत चुकीं शबाना आजमी, कभी 30 रुपये में बेचती थीं कॉफी

    पांच बार बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड जीत चुकीं शबाना आजमी, कभी 30 रुपये में बेचती थीं कॉफी

    नई दिल्ली ।भारतीय सिनेमा में शबाना आजमी का नाम दमदार अभिनय और शानदार फिल्मी सफर के लिए जाना जाता है। उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में पांच बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतना शामिल है। यह उपलब्धि उन्हें अलग पहचान देती है। उन्होंने अलग-अलग फिल्मों में चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं निभाईं और हर बार अपने अभिनय की अलग छाप छोड़ी।

    शबाना आजमी ने जिन फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किया, उनमें ‘अंकुर’, ‘अर्थ’, ‘खंडहर’, ‘पार’ और ‘गॉडमदर’ शामिल हैं। उनकी पहली ही फिल्म ‘अंकुर’ ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इसके बाद उनके अभिनय का सिलसिला लगातार मजबूत होता गया।

    वर्ष 1974 में रिलीज हुई ‘अंकुर’ से शबाना ने अभिनय की दुनिया में कदम रखा था। फिल्म में उन्होंने एक ग्रामीण महिला की भूमिका निभाई थी। अपने शुरुआती ही काम में उन्होंने किरदार को बेहद प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया और इसी फिल्म के लिए उन्हें पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।

    इसके बाद ‘अर्थ’ में उन्होंने शादीशुदा जिंदगी से जुड़े भावनात्मक संघर्षों को पर्दे पर उतारा। इस भूमिका के लिए उन्हें दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इसके अगले वर्ष ‘खंडहर’ में उनके गंभीर अभिनय को भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला।

    ‘पार’ में निभाया गया रामा का किरदार उनके पुरस्कारों की सूची में चौथी उपलब्धि लेकर आया। इसके बाद लंबे अंतराल के बाद 1998 में आई ‘गॉडमदर’ में उन्होंने रामबाई का किरदार निभाया। इस भूमिका में उनके अभिनय को काफी सराहना मिली और उन्हें पांचवीं बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

    शबाना आजमी का सफर इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि फिल्मी परिवार से आने के बावजूद उनके शुरुआती जीवन में मेहनत और आत्मनिर्भरता का अनुभव रहा। वह प्रसिद्ध कवि कैफी आजमी और रंगमंच से जुड़ी शौकत आजमी की बेटी हैं। कॉलेज के दिनों में उन्होंने अपनी पॉकेट मनी के लिए काम किया था।

    बताया जाता है कि उन्होंने मुंबई के एक पेट्रोल पंप पर कॉफी प्रमोटर के तौर पर काम किया। वहां वह आने वाले लोगों को कॉफी बेचती थीं और इस काम के बदले उन्हें रोजाना 30 रुपये मिलते थे। उस दौर का यह अनुभव उनके जीवन के संघर्ष और मेहनत से जुड़े अध्यायों में शामिल है।

    अभिनय को पेशे के तौर पर चुनने के लिए शबाना ने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से प्रशिक्षण लिया। वहां उन्होंने अभिनय का कोर्स किया और गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके बाद ‘अंकुर’ से उनके फिल्मी करियर की शुरुआत हुई और उन्होंने जल्द ही गंभीर भूमिकाओं के लिए अपनी अलग पहचान बना ली।

    राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के अलावा शबाना आजमी को भारत सरकार की ओर से पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे सम्मान भी मिल चुके हैं। उनका करियर कई दशकों में फैला हुआ है और उन्होंने फिल्मों के साथ-साथ रंगमंच में भी काम किया है।

    सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के राष्ट्रीय पुरस्कार की बात करें तो शबाना आजमी की पांच जीत एक उल्लेखनीय रिकॉर्ड है। वहीं सर्वश्रेष्ठ अभिनेता की श्रेणी में अमिताभ बच्चन और ममूटी चार-चार बार यह सम्मान हासिल कर चुके हैं। शबाना की उपलब्धियां उनके लंबे और विविधतापूर्ण फिल्मी सफर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

  • 'वंदे मातरम' पर शर्मिला टैगोर के बयान पर भड़कीं कंगना रनौत, कहा- कला और कविता पर विचार सीमित न रखें

    'वंदे मातरम' पर शर्मिला टैगोर के बयान पर भड़कीं कंगना रनौत, कहा- कला और कविता पर विचार सीमित न रखें


    नई दिल्ली । 
    राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के गायन और उसके छंदों को लेकर शुरू हुई बहस में अब मनोरंजन जगत की दो प्रमुख हस्तियों के अलग-अलग विचार सामने आए हैं। वरिष्ठ अभिनेत्री शर्मिला टैगोर द्वारा ‘वंदे मातरम’ के छंदों को लेकर दिए गए बयान के बाद अभिनेत्री और सांसद कंगना रनौत ने उस पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इस विषय को लेकर दोनों कलाकारों की अलग-अलग सोच के बाद सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर नई चर्चा छिड़ गई है।

    पूरे विवाद की शुरुआत शर्मिला टैगोर के उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंदों को पर्याप्त और सर्वसमावेशी बताया था। उन्होंने कहा था कि शुरुआती दो छंदों के बाद के हिस्सों में जिन प्रतीकों और अभिव्यक्तियों का प्रयोग किया गया है, वे केवल एक ही ईश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों या विभिन्न धर्मावलंबियों के लिए कहना थोड़ा असहज या मुश्किल हो सकता है। उनके अनुसार, देश की विविधता को ध्यान में रखते हुए प्रथम दो छंदों को गाना अधिक व्यावहारिक है।

    शर्मिला टैगोर की इस टिप्पणी पर असहमति जताते हुए कंगना रनौत ने अपनी प्रतिक्रिया साझा की। उन्होंने कहा कि एक कलाकार के रूप में कला और कविता को देखने का नजरिया इतना सीमित नहीं होना चाहिए। किसी भी रचना या कविता में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द और प्रतीक रूपक की तरह होते हैं, जिनका उद्देश्य मनचाही भावना का संचार करना होता है। ‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की चेतना और देशवासियों को प्रेरित करने वाली भावना है।

    कंगना रनौत ने अपनी बात रखते हुए कहा कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह राष्ट्रगीत देश की आंतरिक शक्ति को जगाने का संदेश देता है। उन्होंने संकीर्ण सोच से बाहर निकलने का सुझाव देते हुए कहा कि किसी भी कलात्मक अभिव्यक्ति को हिंदू या मुस्लिम दृष्टिकोण से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यदि कोई विचारधारा या धर्म किसी एक ही स्वरूप या अभिव्यक्ति तक सीमित है, तो यह उसका व्यक्तिगत या सीमित विषय हो सकता है, लेकिन इसे व्यापक राष्ट्रीय भावना पर लागू नहीं किया जा सकता।

    विभिन्न हिस्सों में इस विषय पर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक ओर जहां कुछ लोग शर्मिला टैगोर के सुझाव को सभी वर्गों को साथ लेकर चलने वाला विचार मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई लोग कंगना रनौत के इस पक्ष का समर्थन कर रहे हैं कि राष्ट्रीय गीत की मूल आत्मा और स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक संदर्भ के साथ कोई समझौता या उसका सीमित आंकलन नहीं होना चाहिए।

    सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विषयों पर अक्सर इस प्रकार के अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते रहे हैं। ‘वंदे मातरम’ के छंदों को लेकर शुरू हुआ यह संवाद अब कलात्मक स्वतंत्रता, धार्मिक मान्यताओं और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान से जुड़ी व्यापक बहस का रूप ले चुका है, जिस पर विभिन्न क्षेत्रों के लोग अपनी राय दे रहे हैं।