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  • सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी से बदला आतंकियों का गेमप्लान, कश्मीर में दबाव बढ़ने के बाद गुजरात और राजस्थान के आर्थिक प्रतिष्ठान निशाने पर

    सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी से बदला आतंकियों का गेमप्लान, कश्मीर में दबाव बढ़ने के बाद गुजरात और राजस्थान के आर्थिक प्रतिष्ठान निशाने पर

    नई दिल्ली । भारत की आंतरिक सुरक्षा के सामने आतंकवाद का स्वरूप लगातार बदलता नजर आ रहा है। लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर तक सीमित रहने वाली आतंकी गतिविधियों के बाद अब सुरक्षा एजेंसियां पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों पर भी विशेष नजर बनाए हुए हैं। हाल के दिनों में एक संदिग्ध आतंकी मॉड्यूल का खुलासा होने के बाद सुरक्षा तंत्र ने सीमावर्ती और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्यों में सतर्कता बढ़ा दी है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि आतंकवादी संगठन केवल पारंपरिक संवेदनशील क्षेत्रों तक सीमित रहने के बजाय देश के आर्थिक और औद्योगिक ढांचे को नुकसान पहुंचाने की मंशा से नई रणनीतियों पर काम कर सकते हैं। इसी कारण महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा को और मजबूत किया जा रहा है।

    सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, गुजरात और राजस्थान की भौगोलिक स्थिति उन्हें रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। दोनों राज्यों की सीमाएं पाकिस्तान से जुड़ी होने के कारण यहां लगातार निगरानी रखी जाती है। इसके अलावा इन राज्यों में देश के कई बड़े औद्योगिक केंद्र, ऊर्जा परियोजनाएं, परिवहन नेटवर्क और बंदरगाह स्थित हैं। यदि ऐसे किसी महत्वपूर्ण ढांचे को निशाना बनाने का प्रयास होता है, तो उसका असर केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था, आपूर्ति श्रृंखला और निवेश के माहौल पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि सुरक्षा एजेंसियां इन क्षेत्रों को विशेष सुरक्षा दायरे में रखकर लगातार निगरानी कर रही हैं।

    विश्लेषकों का कहना है कि आतंकवादी संगठनों की रणनीति समय के साथ बदली है। पहले जहां उनका मुख्य उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में अस्थिरता पैदा करना और सुरक्षा बलों को चुनौती देना होता था, वहीं अब देश के महत्वपूर्ण आर्थिक और औद्योगिक ढांचों को संभावित लक्ष्य के रूप में देखा जा सकता है। पश्चिमी भारत के बड़े बंदरगाह, पेट्रोलियम रिफाइनरी, ऊर्जा परियोजनाएं और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम हैं। ऐसे में इन परिसंपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है। इसी दिशा में तटीय निगरानी, संवेदनशील प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और तकनीकी निगरानी तंत्र को लगातार मजबूत किया जा रहा है।

    इतिहास भी इस बात का संकेत देता है कि देश के आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व वाले शहरों को पहले भी आतंकवादी निशाना बनाने का प्रयास कर चुके हैं। अतीत में बड़े आतंकी हमलों के बाद तटीय सुरक्षा, समुद्री निगरानी और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय को काफी मजबूत किया गया था। वर्तमान समय में सुरक्षा एजेंसियों के सामने एक नई चुनौती डिजिटल माध्यमों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग भी है। जांच एजेंसियां इस संभावना पर भी नजर रख रही हैं कि संदिग्ध नेटवर्क सामान्य उपयोग की वस्तुओं का अलग-अलग स्थानों से संग्रह कर कानून प्रवर्तन एजेंसियों की नजर से बचने का प्रयास कर सकते हैं। इसलिए साइबर निगरानी, वित्तीय लेनदेन की जांच और तकनीकी खुफिया तंत्र को भी लगातार सशक्त बनाया जा रहा है।

    उभरते सुरक्षा परिदृश्य को देखते हुए केंद्रीय और राज्य स्तरीय एजेंसियां पूरी सतर्कता के साथ काम कर रही हैं। सीमावर्ती और तटीय क्षेत्रों में गश्त बढ़ाई गई है, जबकि महत्वपूर्ण औद्योगिक प्रतिष्ठानों, ऊर्जा केंद्रों, बंदरगाहों और सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया गया है। विभिन्न राज्यों की पुलिस, केंद्रीय जांच एजेंसियों और खुफिया संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय के जरिए संभावित खतरों की समय रहते पहचान करने और उन्हें विफल करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक, प्रभावी खुफिया तंत्र और नागरिकों की सतर्कता के संयुक्त प्रयास से ही बदलती चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सकता है।

  • सुरक्षा ढांचे में अहम नियुक्ति: लेफ्टिनेंट जनरल एन एस राजा सुब्रमणि संभालेंगे भारत के नए सीडीएस का दायित्व

    सुरक्षा ढांचे में अहम नियुक्ति: लेफ्टिनेंट जनरल एन एस राजा सुब्रमणि संभालेंगे भारत के नए सीडीएस का दायित्व

    नई दिल्ली ।
    भारतीय रक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव के तहत लेफ्टिनेंट जनरल एन एस राजा सुब्रमणि को देश का नया चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ नियुक्त किया गया है। इस निर्णय के साथ देश की सैन्य संरचना में एक नए चरण की शुरुआत मानी जा रही है, जहां तीनों सेनाओं के बीच समन्वय और संयुक्त रणनीति को और अधिक मजबूत बनाने पर जोर दिया जाएगा। वे मौजूदा सीडीएस का स्थान संभालेंगे और आने वाले समय में भारतीय सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने की जिम्मेदारी निभाएंगे।

    लेफ्टिनेंट जनरल एन एस राजा सुब्रमणि का सैन्य जीवन बेहद लंबा और अनुभवपूर्ण रहा है। उन्होंने वर्ष 1985 में गढ़वाल राइफल्स के साथ भारतीय सेना में अपने करियर की शुरुआत की थी। अपने लगभग चार दशक लंबे सेवा काल में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया और विभिन्न सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभाई। सीमावर्ती क्षेत्रों में उनकी रणनीतिक समझ और संचालन क्षमता ने उन्हें एक मजबूत और भरोसेमंद सैन्य नेता के रूप में स्थापित किया है। उन्होंने देश की सुरक्षा से जुड़े कई संवेदनशील मोर्चों पर अपनी नेतृत्व क्षमता का प्रभावशाली परिचय दिया है।

    अपने करियर में वे सेना के उप-प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी कार्य कर चुके हैं और मध्य कमान के प्रमुख के रूप में भी उन्होंने बड़ी जिम्मेदारियां निभाई हैं। सैन्य संचालन और संगठनात्मक सुधारों में उनकी भूमिका हमेशा निर्णायक रही है। उनकी नेतृत्व शैली में स्पष्टता, अनुशासन और रणनीतिक सोच का संतुलन देखने को मिलता है, जो उन्हें अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से अलग बनाता है।

    सीडीएस बनने से पहले वे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सैन्य सलाहकार के रूप में कार्यरत थे। इस भूमिका में उन्होंने देश की सुरक्षा रणनीतियों और रक्षा नीतियों को मजबूत करने में योगदान दिया। उनकी शैक्षिक पृष्ठभूमि भी काफी सशक्त है, जिसमें रक्षा अध्ययन और रणनीतिक प्रबंधन से जुड़ी उच्च शिक्षा शामिल है। उन्हें सेना में उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं, जो उनके लंबे और सफल करियर को दर्शाते हैं।

    नए सीडीएस के रूप में उनके सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी तीनों सेनाओं को थिएटर कमांड प्रणाली के तहत एकीकृत करना होगा। इस प्रणाली का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी युद्ध या आपात स्थिति में सेना, नौसेना और वायु सेना मिलकर एक साझा रणनीति के तहत तेजी से कार्रवाई कर सकें। इसके साथ ही रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और स्वदेशी तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा देने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा।

    वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों और सुरक्षा चुनौतियों के बीच उनकी नियुक्ति को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके अनुभव और रणनीतिक दृष्टिकोण से उम्मीद की जा रही है कि भारतीय रक्षा व्यवस्था और अधिक आधुनिक, संगठित और प्रभावशाली बनेगी। आने वाले समय में उनके नेतृत्व में देश की सैन्य शक्ति को नई दिशा और मजबूती मिलने की संभावना है।

  • भारत–सऊदी सुरक्षा सहयोग को नई धार: NSA डोभाल और सऊदी समकक्ष के बीच हुई अहम चर्चा

    भारत–सऊदी सुरक्षा सहयोग को नई धार: NSA डोभाल और सऊदी समकक्ष के बीच हुई अहम चर्चा


    नई दिल्‍ली । भारत और सऊदी अरब के बीच रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने बुधवार को रियाद में अपने सऊदी समकक्ष मूसाएद बिन मोहम्मद अल-ऐबन से मुलाकात की। इस उच्चस्तरीय बैठक में द्विपक्षीय सहयोग के साथ-साथ क्षेत्रीय सुरक्षाआतंकवाद से निपटने और आपसी हितों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई।

    रियाद स्थित भारतीय दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि अजीत डोभाल और सऊदी अरब के विदेश राज्य मंत्री, कैबिनेट सदस्य एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डॉ. मूसाएद बिन मोहम्मद अल-ऐबन के बीच हुई यह बैठक बेहद सकारात्मक और उपयोगी” रही। पोस्ट के अनुसार, बातचीत में भारत सऊदी संबंधों के विभिन्न आयामों के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों पर भी विचार-विमर्श हुआ।

    आधिकारिक दौरे पर रियाद पहुंचे डोभाल

    अजीत डोभाल मंगलवार को एक आधिकारिक दौरे पर सऊदी अरब की राजधानी रियाद पहुंचे थे। किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उनका स्वागत सऊदी अरब में भारत के राजदूत सुहेल एजाज खान और सऊदी विदेश मंत्रालय में राजनीतिक मामलों के उप मंत्री सऊद अल-साती ने किया। डोभाल की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब भारत और सऊदी अरब के बीच सुरक्षा और काउंटर टेररिज्म सहयोग लगातार गहराता जा रहा है।

    रणनीतिक साझेदारी के तहत सुरक्षा सहयोग पर जोर

    गौरतलब है कि पिछले सप्ताह ही भारत और सऊदी अरब ने रियाद में स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप काउंसिल के तहत पॉलिटिकल, काउंसलर और सिक्योरिटी कोऑपरेशन कमेटी के अंतर्गत सिक्योरिटी वर्किंग ग्रुप की तीसरी बैठक आयोजित की थी। इस बैठक में दोनों देशों के बीच चल रहे द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग की व्यापक समीक्षा की गई थी और भविष्य की दिशा तय करने पर सहमति बनी थी।

    आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ साझा रणनीति

    विदेश मंत्रालय के अनुसार, दोनों देशों ने आतंकवाद का मुकाबला करने से जुड़ी मौजूदा और उभरती चुनौतियों पर गहन विचार-विमर्श किया। इसमें उग्रवाद और कट्टरपंथ से निपटना, आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकना, आतंकवादी उद्देश्यों के लिए टेक्नोलॉजी के दुरुपयोग को नियंत्रित करना और अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध व आतंकवाद के बीच बढ़ते संबंधों जैसे मुद्दे शामिल रहे।

    ने बताया कि भारत और सऊदी अरब के अधिकारियों ने द्विपक्षीय कानूनी और न्यायिक सहयोग को और मजबूत करने तथा कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाने के उपायों पर भी चर्चा की। इसका उद्देश्य आतंकवाद और संगठित अपराध के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करना है।

    आतंकवाद की कड़ी निंदा, हालिया हमलों का उल्लेख

    विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया कि दोनों पक्षों ने आतंकवाद के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों की कड़ी निंदा दोहराई। इसमें सीमा पार आतंकवाद के साथ-साथ भारत में हुए हालिया आतंकवादी हमलों का भी विशेष रूप से उल्लेख किया गया। बयान में 22 अप्रैल, 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में निर्दोष नागरिकों पर हुए कायरतापूर्ण आतंकवादी हमले और 10 नवंबर, 2025 को नई दिल्ली में लाल किले के पास हुई आतंकवादी घटना को गंभीर चिंता का विषय बताया गया।

    उच्चस्तरीय अधिकारियों की भागीदारी

    सिक्योरिटी वर्किंग ग्रुप की इस अहम बैठक की सह-अध्यक्षता भारत की ओर से विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव काउंटर टेररिज्म विनोद बहादे और सऊदी अरब की ओर से गृह मंत्रालय में लीगल अफेयर्स एवं इंटरनेशनल कोऑपरेशन के डायरेक्टर जनरल अहमद अल-ईसा ने की। बैठक में दोनों देशों के वरिष्ठ सुरक्षा और कूटनीतिक अधिकारियों ने हिस्सा लिया।

    अगली बैठक भारत में होगी

    MEA के अनुसार, सिक्योरिटी वर्किंग ग्रुप की अगली बैठक आपसी सहमति से तय की गई तारीख पर भारत में आयोजित की जाएगी। यह बैठक भारत–सऊदी अरब के बीच बढ़ते रणनीतिक विश्वास और सुरक्षा साझेदारी को और मजबूती देने में अहम भूमिका निभाएगी।

  • CDS जनरल अनिल चौहान का कड़ा संदेश, कहा- 'खोखले दावों से नहीं जीती जाती जंग', पाकिस्तान पर परोक्ष हमला

    CDS जनरल अनिल चौहान का कड़ा संदेश, कहा- 'खोखले दावों से नहीं जीती जाती जंग', पाकिस्तान पर परोक्ष हमला


    भारत । के चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण बयान दिया, जिसमें उन्होंने युद्ध जीतने के लिए साफ उद्देश्य, अनुशासन और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका यह बयान पाकिस्तान के खिलाफ परोक्ष रूप से था, खासकर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान द्वारा की जा रही जीत के दावों पर प्रतिक्रिया के रूप में।

    जनरल चौहान एयर फोर्स अकादमी, डुंडीगल में दिसंबर 2025 की संयुक्त दीक्षांत परेड के दौरान युवा सैन्य अधिकारियों से बात कर रहे थे। उन्होंने कहा, “युद्ध केवल बयानबाज़ी और दिखावे से नहीं जीते जाते, बल्कि तैयारी, सही फैसलों और उनका ज़मीन पर लागू करने से जीते जाते हैं।” यह टिप्पणी पाकिस्तान के झूठे दावों के संदर्भ में थी, जहां ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारी नुकसान के बावजूद पाकिस्तान ने अपनी जीत का दावा किया था।

    सीडीएस ने आगे कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में अस्थिरता इसलिए बढ़ रही है क्योंकि वहां के संस्थान कमजोर हैं और निर्णय जल्दबाजी में लिए जाते हैं। इसके विपरीत, भारत की ताकत उसकी मजबूत संस्थाएं, लोकतांत्रिक व्यवस्था और पेशेवर सोच वाले सशस्त्र बलों में है।

    उन्होंने भारतीय सेना की तारीफ करते हुए कहा कि अनुशासन और जिम्मेदारी के प्रति समर्पण ही देश की सुरक्षा का मुख्य आधार है। नए अधिकारियों से उन्होंने अपील की कि वे इस मजबूत परंपरा के संरक्षक बनें और हर स्थिति में सतर्क और तैयार रहें।

    जनरल चौहान ने अंत में युवा अधिकारियों से कहा कि वे खुद को उदाहरण के रूप में पेश करें। उनका मानना था कि सतर्कता, तैयारी और पेशेवर रवैया ही किसी भी सैन्य अधिकारी की सफलता की कुंजी है, चाहे वह युद्ध का समय हो या शांति का।

    यह बयान पाकिस्तान को एक कड़ा संदेश था, और यह स्पष्ट कर दिया कि भारत की सैन्य शक्ति केवल बातों में नहीं, बल्कि असलियत में उस शक्ति को जमीन पर लागू करने में है।

  • 148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला

    148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला


    नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने ‘जेल नहीं, जमानत'(Bail) के सिद्धांत में अपवाद को जोड़ते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता(Personal freedom) का अधिकार संरक्षित तो है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की संप्रभुता से जुड़े मामलों में केवल इसी आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती। विशेषकर गैरकानूनी(illegal) गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA जैसे कानूनों के तहत दर्ज मामलों में अदालत को व्यापक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखना होगा।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी सीबीआई की उस अपील पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा दिए गए जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी। यह मामला 9 जून 2010 को पश्चिम बंगाल में हुई भीषण रेल दुर्घटना से जुड़ा है, जब रेलवे ट्रैक से छेड़छाड़ किए जाने के कारण ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई और एक मालगाड़ी से टकरा गई। इस हादसे में 148 लोगों की मौत हुई थी और 170 से अधिक यात्री घायल हुए थे। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में माओवादियों द्वारा रेलवे ट्रैक उखाड़ने से ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी और एक मालगाड़ी से टकरा गई थी। निर्दोष लोगों की मौतों के अलावा, सरकार को सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान से करीब 25 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।

    राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
    पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। यह राष्ट्रीय हित, संप्रभुता और देश की अखंडता जैसे उच्चतर उद्देश्यों के अधीन है। अदालत ने कहा कि न्याय की तराजू को एक ओर संविधान द्वारा प्रदत्त अनुच्छेद 21 के अधिकार और दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे ‘न्यायसंगत अपवादों’ के बीच संतुलन बनाना होता है।

    फैसले को लिखते हुए जस्टिस संजय करोल ने कहा कि कुछ मामले अपनी प्रकृति और प्रभाव के कारण व्यापक दृष्टिकोण की मांग करते हैं, जहां मुद्दा केवल किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का होता है।

    माओवादी साजिश और भारी नुकसान
    अदालत के अनुसार, यह रेल हादसा माओवादी कैडरों द्वारा अंजाम दी गई साजिश का नतीजा था। इसका उद्देश्य झारग्राम क्षेत्र में राज्य पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की संयुक्त तैनाती को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाना था। इस घटना में न केवल बड़ी संख्या में निर्दोष यात्रियों की जान गई और लोग घायल हुए, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति को भी करीब 25 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा।

    विरोध का अधिकार, लेकिन हिंसा नहीं
    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर नागरिक को सरकार की नीतियों के खिलाफ कानून के दायरे में रहकर विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन निर्दोष लोगों की जान लेने वाली बर्बर और अमानवीय हरकतों को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि ट्रेन पटरियों से छेड़छाड़ कर लगभग 150 यात्रियों की मौत का कारण बनने वाले कृत्य को किसी भी लोकतांत्रिक अधिकार के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

    12 साल की कैद पर भी जमानत नहीं
    आरोपियों की ओर से यह दलील भी दी गई थी कि वे 12 साल से अधिक समय से जेल में हैं, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A के तहत उन्हें जमानत मिलनी चाहिए। इस धारा के अनुसार, यदि कोई अंडरट्रायल आरोपी किसी अपराध की अधिकतम सजा के आधे से अधिक समय तक जेल में रह चुका हो, तो उसे जमानत दी जा सकती है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि आतंकवादी कृत्यों जैसे अपराधों में संभावित सजा मृत्युदंड तक हो सकती है। ऐसे में 12 साल की कैद को धारा 436A के तहत जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    UAPA में उलटा बोझ और निष्पक्ष सुनवाई
    अदालत ने UAPA के तहत आरोपियों पर डाले गए ‘रिवर्स बर्डन’ (उलटे बोझ) का भी उल्लेख किया, जिसमें आरोपी को खुद अपनी बेगुनाही साबित करनी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट्स को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में आरोपियों को उनके खिलाफ इस्तेमाल होने वाले सभी दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वे अपनी रक्षा की तैयारी कर सकें और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके।

    शीघ्र सुनवाई के निर्देश
    15 साल से अधिक पुराने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल को तेजी से पूरा करने का आदेश दिया है, ताकि न्याय में और देरी न हो। इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में जमानत के सिद्धांतों को स्पष्ट करने और ‘बेल, नॉट जेल’ के व्यापक सिद्धांत पर एक महत्वपूर्ण अपवाद के रूप में देखा जा रहा है।