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  • कृषि क्षेत्र में बदलाव की दिशा में बड़ा कदम, 22 राज्यों ने प्राकृतिक खेती को नीतिगत समर्थन दिया

    कृषि क्षेत्र में बदलाव की दिशा में बड़ा कदम, 22 राज्यों ने प्राकृतिक खेती को नीतिगत समर्थन दिया

    नई दिल्ली । देश में कृषि विकास के अगले चरण को नई दिशा देने के उद्देश्य से प्राकृतिक खेती को लेकर व्यापक सहमति बनती दिखाई दे रही है। केंद्र सरकार के अनुसार 22 राज्यों के कृषि मंत्रियों ने न केवल इस पद्धति को नीतिगत स्तर पर समर्थन दिया है, बल्कि किसानों का विश्वास बढ़ाने के लिए इसे अपने-अपने खेतों में अपनाकर व्यावहारिक उदाहरण भी प्रस्तुत किए हैं। यह जानकारी राष्ट्रीय राजधानी स्थित पूसा परिसर में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन के दौरान सामने आई, जहां देशभर के कृषि मंत्री एक मंच पर एकत्र हुए और कृषि क्षेत्र के भविष्य को लेकर विस्तृत चर्चा की गई।

    सम्मेलन में कृषि सुधार, खरीफ फसलों की तैयारी, दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता, उर्वरकों के संतुलित उपयोग तथा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने जैसे विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ। केंद्रीय कृषि मंत्री ने इस अवसर पर कहा कि कृषि भूमि की रक्षा केवल उत्पादन बढ़ाने का विषय नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, मिट्टी की सेहत और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कृषि नीति का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि इसे टिकाऊ और संतुलित बनाना होना चाहिए।

    केंद्र सरकार ने इस दौरान स्पष्ट किया कि रासायनिक उर्वरकों का पूरी तरह से निषेध सरकार का लक्ष्य नहीं है, बल्कि उनका वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना प्राथमिकता है। इसके लिए देशभर में जागरूकता अभियान चलाने और संस्थागत स्तर पर मजबूत निगरानी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। अधिकारियों ने सुझाव दिया कि इस दिशा में एक समन्वित तंत्र विकसित किया जाए, जिससे किसानों तक सही जानकारी और तकनीकी सहायता समय पर पहुंच सके।

    सम्मेलन में यह भी रेखांकित किया गया कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्यों की सक्रिय भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण है। कई राज्यों ने अपने स्तर पर प्रयोगात्मक रूप से प्राकृतिक खेती को अपनाकर इसके सकारात्मक परिणामों को सामने रखा है, जिससे अन्य राज्यों में भी इस दिशा में रुचि बढ़ी है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्राकृतिक खेती को बड़े पैमाने पर अपनाया जाता है तो इससे न केवल उत्पादन लागत कम हो सकती है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरणीय संतुलन भी बेहतर हो सकता है।

    राष्ट्रीय खरीफ सम्मेलन को एक ऐसे मंच के रूप में देखा गया, जहां केंद्र और राज्यों के बीच कृषि नीतियों को लेकर साझा दृष्टिकोण विकसित हुआ। यहां यह भी तय किया गया कि खरीफ फसलों की योजना अब केवल मौसमी तैयारियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे दीर्घकालिक कृषि रणनीति से जोड़ा जाएगा। इसमें दलहन और तिलहन में आत्मनिर्भरता, कृषि लागत में कमी, उत्पादन क्षमता में वृद्धि और मिट्टी के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाएगी।

    कृषि क्षेत्र में इस तरह के समन्वित प्रयासों को विशेषज्ञ एक सकारात्मक संकेत के रूप में देख रहे हैं, जो भविष्य में देश की खाद्य सुरक्षा, किसानों की आय और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों को एक साथ साधने में मदद कर सकते हैं। सरकार का मानना है कि कृषि को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के रूप में विकसित करना समय की आवश्यकता है।

  • प्राकृतिक खेती से धरती मां की सेहत और किसान की आमदनी दोनों सुरक्षितः शिवराज सिंह चौहान

    प्राकृतिक खेती से धरती मां की सेहत और किसान की आमदनी दोनों सुरक्षितः शिवराज सिंह चौहान

    नई दिल्ली। लोकसभा में बुधवार को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय पर हुई

    Shivraj Singh Chouhan

    विस्तृत चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि नरेन्द्र मोदी की सरकार सिर्फ शासन नहीं चलाती, समाज बदलती है, जीवन बदलती है और राष्ट्र का भविष्य गढ़ती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चिंता है कि अत्यधिक केमिकल फर्टिलाइज़र से धरती मां की सेहत बिगड़ रही है और आने वाली पीढ़ियों के लिए भूमि उत्पादन से इनकार कर सकती है। उसी भाव से प्राकृतिक खेती मिशन के तहत 1 करोड़ किसानों को जागरूक, 18 लाख किसानों को प्रशिक्षित करने और 75 लाख हेक्टेयर में चरणबद्ध रूप से प्राकृतिक खेती का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें अभी लाखों किसान और लाखों हेक्टेयर भूमि जुड़ चुकी है।

    उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक रूप से ये सिद्ध है कि सही ढंग से प्राकृतिक खेती करने पर कई मामलों में उत्पादन घटता नहीं बल्कि बढ़ सकता है और लागत में भारी कमी आती है, इसीलिए मोदी सरकार इसे “भारत की आने वाली पीढ़ियों के लिए मिट्टी की अमानत” मानकर आगे बढ़ा रही है। किसानों के हितों, कृषि सुधारों, आधुनिक तकनीक, सिंचाई, बीमा, प्राकृतिक खेती और डिजिटल एग्रीकल्चर की चर्चा करते हुए उन्होंने विपक्ष के प्रश्नों के जवाब दिए।

    केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह ने कहा कि किसानों के नाम पर सिर्फ सियासी नारे और अर्द्धसत्यों से काम नहीं चलेगा। खेत-खलिहान की हकीकत पर बात करनी होगी। उन्होंने दो टूक कहा कि सवाल ये होना चाहिए कि किसान के लिए ज़मीन पर क्या काम हुआ, कितना पैसा सीधे उसके खाते में पहुंचा और कौन सी व्यवस्था बदली। चौहान ने याद दिलाया कि पिछली सरकार के समय 140 सिंचाई परियोजनाओं में से 99 परियोजनाएं दशकों से लटकी पड़ी थीं, जिनपर कोई काम आगे नहीं बढ़ रहा था। मोदी सरकार ने इन्हें प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत प्राथमिकता दी और लगभग 27 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचित क्षेत्र सुनिश्चित करने की दिशा में तेज़ी से काम बढ़ाया।

    उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का “नदी जोड़ो” (रिवर लिंकिंग) ड्रीम प्रोजेक्ट भी वास्तव में मोदी सरकार के दौरान आगे बढ़ा, जहां कैन–बेतवा जैसी परियोजनाएं मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश को जोड़ते हुए बाढ़-सूखे की समस्या का दीर्घकालिक समाधान देने के लिए शुरू की गईं। केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि सिर्फ 500 या 1000 रुपये की घोषणा से किसानों का भला नहीं होगा, असली सवाल है कि बीज, खाद और कीटनाशक की गुणवत्ता क्या है। उन्होंने घोषणा की कि सरकार नया पेस्टिसाइड एक्ट और बीज एक्ट लाने जा रही है, जिसमें किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज, मानक खाद, और सुरक्षित एवं प्रभावी कीटनाशक सुनिश्चित किए जाएंगे।

    चौहान ने बताया कि डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत अबतक लगभग 9 करोड़ किसानों के पहचान तैयार की जा चुकी हैं। किसान के पास किसान–आईडी होने पर बैंक में लोन स्वीकृत होने में “एक मिनट” से ज़्यादा नहीं लगना चाहिए क्योंकि उसकी पूरी प्रोफाइल, जमीन, फसल और लेनदेन का डेटा डिजिटल रूप से उपलब्ध होगा। पहले किसान को बैंक के चक्कर काटने पड़ते थे, फाइलों–कागज़ों में पैसा और समय दोनों खर्च होते थे; अब यह बाधा डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाई जा रही है। उन्होंने कहा कि डिजिटल क्रॉप सर्वे और एग्री–स्टैक डेटा के उपयोग से पीएम-किसान से लेकर एमएसपी खरीद तक हर योजना में किसानों को लक्षित और पारदर्शी लाभ मिलेगा। वित्त मंत्री की घोषणा का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि सरकार ने ‘भारत विस्तार’ नामक एआई प्लेटफॉर्म तैयार कर लिया है। किसान खेत से फसल की तस्वीर भेजकर या फोन करके पूछ सकेंगे कि “फसल में क्या बीमारी है, क्या दवा डालूं, मेरी मिट्टी के मुताबिक कौन सी फसल बोऊँ?” उसे उसकी अपनी भाषा में त्वरित सलाह मिलेगी। केंद्रीय मंत्री ने इसे किसान के हाथ में विशेषज्ञ-सलाह और तकनीक का नया हथियार बताया जो मोदी सरकार के “टेक–ड्रिवन किसान कल्याण” मॉडल का प्रतीक है।

  • नागलवाड़ी में पहली कृषि कैबिनेट, लोक देवता भीलट देव से समृद्धि की कामना

    नागलवाड़ी में पहली कृषि कैबिनेट, लोक देवता भीलट देव से समृद्धि की कामना


    भोपाल/बड़वानी। किसान कल्याण वर्ष के संकल्प के साथ मध्यप्रदेश सरकार की पहली कृषि कैबिनेट की शुरुआत आस्था और परंपरा के वातावरण में हुई। मुख्यमंत्री मोहन यादव और मंत्रि परिषद के सदस्यों ने बड़वानी जिले के नागलवाड़ी स्थित भीलट देव मंदिर में निमाड़ मालवा के लोक देवता भीलट देव के दर्शन कर प्रदेश के किसानों की सुख समृद्धि की कामना की। सतपुड़ा की सुरम्य पहाड़ियों पर बसे इस तपोभूमि में आयोजित कैबिनेट बैठक ने विकास और संस्कृति के समन्वय का संदेश दिया।

    दर्शन के उपरांत मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राज्य सरकार प्रदेश के सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि निमाड़ मालवा क्षेत्र के आराध्य भीलट देव के आशीर्वाद से जो भी निर्णय लिए जाएंगे, वे किसानों और प्रदेशवासियों के हित में होंगे। मुख्यमंत्री ने निमाड़ क्षेत्र को मां नर्मदा का वरदान बताते हुए कहा कि नर्मदा के जल से सिंचित यह भूमि किसानों को समृद्ध और प्रगतिशील बना रही है। सूक्ष्म सिंचाई परियोजनाओं के माध्यम से बड़वानी सहित पूरे निमाड़ क्षेत्र में खेती को नई मजबूती मिली है।

    उन्होंने वर्ष 2026 को किसान कल्याण वर्ष घोषित किए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार का लक्ष्य किसानों को आर्थिक रूप से और अधिक सशक्त बनाना है। मुख्यमंत्री ने किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि शुरुआत में उत्पादन कम हो सकता है, लेकिन इससे मिट्टी की उर्वराशक्ति बढ़ेगी और दीर्घकाल में उत्पादन क्षमता में स्थायी वृद्धि होगी। किसानों की आर्थिक उन्नति को ही प्रदेश की समग्र उन्नति का आधार बताते हुए उन्होंने कृषि सुधारों को सरकार की प्राथमिकता बताया।

    मुख्यमंत्री ने मंदिर परिसर की भव्यता और सकारात्मक ऊर्जा की सराहना करते हुए कहा कि सतपुड़ा की वादियों में बसा नागलवाड़ी का यह धाम आध्यात्मिक शक्ति से परिपूर्ण है। मंदिर के जीर्णोद्धार में संत श्री सियाराम बाबा के योगदान का भी उन्होंने स्मरण किया। दर्शन के बाद मुख्यमंत्री और मंत्रि परिषद सदस्यों ने सामूहिक रूप से मंदिर परिसर में फोटो भी खिंचवाया।

    कैबिनेट बैठक से पूर्व मुख्यमंत्री ने निमाड़ क्षेत्र की कृषि प्रदर्शनी का अवलोकन किया। प्रदर्शनी में प्राकृतिक खेती के प्रभावी मॉडल, वोकल फॉर लोकल, केला विकास मॉडल, डॉलर चना की संपूर्ण मूल्य श्रृंखला, बड़वानी मिर्च प्लास्टर, तिल को उभरती फसल के रूप में प्रोत्साहन, गन्ना आधारित आर्थिक मॉडल, मिशन सिकलसेल उन्मूलन और वन्य ग्राम समृद्धि अभियान जैसी थीम प्रस्तुत की गईं। बड़वानी कलेक्टर जयति सिंह ने विभिन्न कृषि पहलों पर विस्तृत प्रस्तुतीकरण भी दिया।

    नागलवाड़ी में आयोजित यह पहली कृषि कैबिनेट केवल प्रशासनिक बैठक नहीं रही, बल्कि यह संदेश भी दिया कि सरकार परंपरा, प्रकृति और प्रगति को साथ लेकर आगे बढ़ना चाहती है। लोक आस्था के आंगन से शुरू हुआ यह संकल्प किसानों की समृद्धि और प्रदेश के उज्ज्वल भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।