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  • शिवपुरी में नवदुर्गा सांस्कृतिक समारोह मंडल का भव्य विसर्जन समारोह, आकर्षक झांकियों और बच्चों की प्रस्तुतियों ने जीता दिल

    शिवपुरी में नवदुर्गा सांस्कृतिक समारोह मंडल का भव्य विसर्जन समारोह, आकर्षक झांकियों और बच्चों की प्रस्तुतियों ने जीता दिल


    शिवपुरी: में श्री नवदुर्गा सांस्कृतिक समारोह मंडल की ओर से नवरात्रि के समापन पर देवी प्रतिमा विसर्जन समारोह भव्य रूप से आयोजित किया गया। माधव चौक चौराहे पर सजाए गए मंच से विभिन्न स्थानों से आईं देवी प्रतिमाओं की झांकियों और आकर्षक विमानों का स्वागत किया गया। कार्यक्रम में बच्चों की नृत्य प्रस्तुतियों, डांडिया, गरबा, योग प्रदर्शन और बाहर से आए कलाकारों की प्रस्तुतियों ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। चल झांकियों का भी भव्य प्रदर्शन किया गया। समारोह में बड़ी संख्या में शहरवासियों ने भाग लेकर धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन का आनंद लिया।

    कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आईटीबीपी शिवपुरी के डीआईजी राजीव लोचन शुक्ला उपस्थित रहे, जबकि अध्यक्षता शिवपुरी के डीएफओ सुधांशु यादव ने की। समारोह की शुरुआत अतिथियों और समिति के सदस्यों द्वारा माता की आरती तथा भगवान श्रीगणेश की वंदना के साथ हुई। इसके बाद समिति अध्यक्ष तरुण अग्रवाल ने स्वागत भाषण दिया। आयोजन में पहुंचे अतिथियों का समिति के सदस्यों ने स्वागत किया।

    समारोह में महामंडलेश्वर पुरुषोत्तम दास जी महाराज, प्रहलाद भारती, मंशापूर्णी माता मंदिर की महंत मंजू दीक्षित, सनातन सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष भगवती प्रसाद शुक्ल, राजू बाथम, डीपीसी दफेदार सिंह और महेंद्र सिंह वशिष्ठ विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। समिति के संरक्षकों रामविलास गुप्ता, अमन गोयल, राजेश कोचेटा और हरज्ञान प्रजापति सहित अन्य सदस्यों का भी स्वागत किया गया।

    आयोजन में सहयोग देने वाले प्रायोजकों को सम्मानित किया गया। इनमें सुमत गुप्ता, पुरुषोत्तम दास गर्ग, विनायक सेठ, उमा देवी शर्मा और सुषमा पांडेय शामिल रहे। हम फाउंडेशन की ओर से साधना गुप्ता, साधना शर्मा और अर्चना माहेश्वरी का भी सम्मान किया गया। विशेष सहयोगी के रूप में पटेल एंड संस के भूपेंद्र रावत का योगदान रहा।

    माधव चौक पर बनाए गए मंच से गुजरने वाले सभी विमान, झांकी मंडलों और समाजसेवी संस्थाओं का नवदुर्गा मंडल की ओर से शॉल, श्रीफल और माल्यार्पण कर स्वागत किया गया। देवी के स्वागत के लिए विभिन्न समितियों ने शहर के अलग-अलग स्थानों पर निःशुल्क हलवा-चना, शरबत, खिचड़ी और सब्जी-पूड़ी का वितरण किया। इस दौरान शहरवासियों ने प्रसादी ग्रहण की और आयोजन में सहभागिता की।

    सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान बच्चों ने मंच पर नृत्य और योग की प्रस्तुतियां दीं। डांडिया और गरबा कार्यक्रम में भी प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। नृत्य प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में प्रियंका व्यास, नेत्रा जोशी, टीना गुप्ता और दीपा बंसल शामिल रहीं। बाहर से आए कलाकारों ने भी विशेष प्रस्तुतियां दीं। मंच पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से धार्मिक उत्सव का माहौल बना रहा।

    कार्यक्रम के संचालन में मणिका शर्मा, वरुण राजौरिया, शिखा मंगल और भोपाल की एंकर नम्रता शुक्ला की भूमिका रही। आयोजन को सफल बनाने में अध्यक्ष तरुण अग्रवाल, संयोजक संदीप वशिष्ठ, स्वागत अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र गुप्ता, सह स्वागत अध्यक्ष बृजेश शर्मा, उपाध्यक्ष रामलखन मुढ़ौतिया और वरुण राजौरिया सहित समिति के पदाधिकारियों और सदस्यों ने योगदान दिया। सचिव अरुण शर्मा, सह सचिव हर्षित मंगल, कोषाध्यक्ष हृदेश गोयल, सह कोषाध्यक्ष रवि पाराशर, मंच प्रभारी संकेत शुक्ला और सह मंच प्रभारी देवेंद्र जैन खतौरा सहित अन्य सदस्य भी आयोजन की व्यवस्थाओं में शामिल रहे।

    कार्यक्रम संयोजक संदीप वशिष्ठ ने जिला पुलिस प्रशासन, नगरपालिका, विद्युत विभाग और शहर की धर्मप्रेमी जनता के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने शहरवासियों को दशहरा पर्व की शुभकामनाएं भी दीं। आयोजन के अंत में माता की महाआरती की गई और भावपूर्ण विदाई के साथ विसर्जन समारोह संपन्न हुआ।

    मुख्य समारोह से पहले नवदुर्गा सांस्कृतिक समारोह मंडल ने क्षत्रिय समाज की बाइक रैली और दशहरा मिलन चल समारोह का स्वागत किया था। दोपहर में खटीक समाज की काली माता रैली तथा शाम को पंजाबी परिषद और श्री नरसिंह मंदिर उत्सव समिति की ओर से निकाली गई राम बारात का भी स्वागत किया गया।

  • नवरात्रि 2026 में नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों को चढ़ाएं अलग-अलग भोग, जानें किस दिन क्या अर्पित करें

    नवरात्रि 2026 में नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों को चढ़ाएं अलग-अलग भोग, जानें किस दिन क्या अर्पित करें

    नई दिल्ली । शारदीय नवरात्रि 2026 की शुरुआत 11 अक्टूबर से होगी और नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाएगी। नवरात्रि का समापन 19 अक्टूबर को होगा, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना के साथ उन्हें अलग-अलग भोग अर्पित करने की भी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी के प्रत्येक स्वरूप को उसकी मान्यता के अनुसार भोग चढ़ाया जाता है और श्रद्धालु सुख, शांति, समृद्धि तथा अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

    नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन माता को देसी घी अर्पित करने की परंपरा बताई जाती है। भक्त माता की पूजा कर सुख, समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की आराधना होती है और उन्हें शक्कर का भोग लगाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में शक्कर को संयम, तप और शुभता से जोड़कर देखा जाता है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा होती है। इस दिन माता को दूध या खीर का भोग लगाने की परंपरा है और भक्त घर में सुख-शांति तथा सकारात्मकता की कामना करते हैं।

    नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। इस दिन माता को मालपुए का भोग अर्पित किया जाता है। घर पर बनाए गए सात्विक मालपुए से भी भोग लगाने की परंपरा बताई जाती है। पांचवें दिन मां स्कंदमाता की आराधना होती है और उन्हें केले का भोग लगाया जाता है। पूजा के बाद केले को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की मान्यता है। छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा की जाती है और उन्हें शहद अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में शहद को मधुरता और शुभता से जोड़ा जाता है।

    सातवें दिन मां कालरात्रि की आराधना होती है। इस दिन माता को गुड़ का भोग लगाया जाता है। भक्त जीवन की बाधाएं दूर होने और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं। आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है और उन्हें नारियल का भोग अर्पित करने की परंपरा है। कई घरों में अष्टमी के दिन कन्या पूजन भी किया जाता है। नवरात्रि के अंतिम यानी नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की आराधना होती है। इस दिन माता को तिल का भोग लगाया जाता है और भक्त सुख, शांति तथा समृद्धि की कामना करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं में भोग को केवल किसी खाद्य सामग्री के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसे देवी के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव माना जाता है। इसलिए भोग तैयार करते समय साफ-सफाई और सात्विकता का ध्यान रखने की परंपरा है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और पूजा पद्धतियों में भोग से जुड़ी परंपराएं अलग हो सकती हैं। इसलिए ऊपर बताए गए भोग प्रचलित धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं और इन्हें अनिवार्य नियम नहीं माना जाता। श्रद्धालु अपने परिवार और स्थानीय पूजा परंपरा के अनुसार भी माता को भोग अर्पित कर सकते हैं।