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  • नवरात्रि में ऑनलाइन फूड डिलीवरी की धूम, नोएडा में 11 हजार की व्रत थाली और मुंबई में रसगुल्लों का बड़ा ऑर्डर

    नवरात्रि में ऑनलाइन फूड डिलीवरी की धूम, नोएडा में 11 हजार की व्रत थाली और मुंबई में रसगुल्लों का बड़ा ऑर्डर


    नई दिल्ली । नवरात्रि के दौरान देशभर में व्रत के व्यंजनों और पारंपरिक मिठाइयों की ऑनलाइन मांग में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और दशहरे के आसपास त्योहार का उत्साह खाने-पीने के ऑर्डर में भी दिखाई दिया। इस दौरान लोगों ने साबूदाने से बने व्यंजनों, विशेष व्रत थालियों और मिठाइयों को प्राथमिकता दी। नवरात्रि के दौरान कुछ ग्राहकों के बड़े ऑर्डर भी चर्चा में रहे। नोएडा में एक ग्राहक ने 13 व्रत थालियों के लिए 11,072 रुपये खर्च किए, जबकि मुंबई में एक ग्राहक ने मिठाइयों और कॉफी रसगुल्ला तिरामिसु के लिए 9,870 रुपये का ऑर्डर दिया।

    17 से 20 अक्टूबर 2026 के बीच व्रत के व्यंजनों में साबूदाने से बनी चीजें सबसे ज्यादा पसंद की गईं। इस अवधि में हर घंटे औसतन 1,794 साबूदाने के व्यंजन ग्राहकों तक पहुंचाए गए। इसके बाद नवरात्रि व्रत थालियों, सिंघाड़े से बनी चीजों और कुट्टू तथा राजगिरा से तैयार विशेष व्यंजनों की मांग रही। समा के चावल और मखाने से बने पकवान भी लोगों के पसंदीदा विकल्पों में शामिल रहे।

    नवरात्रि के दौरान केवल अलग-अलग व्यंजनों ही नहीं, बल्कि पूरे भोजन के कॉम्बो भी ग्राहकों को आकर्षित करते रहे। विशेष व्रत थालियों में सिंघाड़े की पूरी वाली थाली की मांग सबसे आगे रही। इसके अलावा राजगिरा की पूरी और आलू-हींग से तैयार तीन कोर्स वाली थाली भी खूब पसंद की गई। इस तरह की थालियों के ऑर्डर दिल्ली, बेंगलुरु, गुरुग्राम और नोएडा जैसे शहरों से अधिक आए।

    शहरों के हिसाब से देखें तो मुंबई और बेंगलुरु में साबूदाना खिचड़ी की मांग सबसे ज्यादा रही। पुणे और जयपुर में भी इस व्यंजन को पसंद किया गया। व्रत के दौरान ऐसे भोजन की मांग बढ़ी, जिसे पारंपरिक स्वाद के साथ एक संपूर्ण भोजन के रूप में मंगाया जा सके। व्रत थालियों में अलग-अलग पकवानों के संयोजन ने ग्राहकों को कई विकल्प दिए।

    मिठाइयों की बात करें तो नवरात्रि के दौरान रसगुल्ला सबसे लोकप्रिय विकल्प बनकर सामने आया। 17 से 20 अक्टूबर के बीच देशभर में इसके हर घंटे औसतन 495 ऑर्डर मिले। दिल्ली, मुंबई और गुरुग्राम में रसगुल्ले की मांग विशेष रूप से अधिक रही। कुल मिलाकर पारंपरिक मिठाइयों के ऑर्डर में पिछले वर्ष की तुलना में 36.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

    रसगुल्ले के अलावा गुलाब जामुन, काजू कतली, जलेबी और रसमलाई भी त्योहार के दौरान खूब मंगाई गईं। बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली और हैदराबाद जैसे बड़े शहरों में मिठाइयों की मांग अधिक रही। वहीं पटना, देहरादून, जोधपुर, गया और तिरुवनंतपुरम जैसे शहरों में भी मिठाइयों के ऑर्डर में अच्छी गतिविधि देखने को मिली। छोटे शहरों में अगरतला, शिलांग, पलवल और भटिंडा में भी मिठाइयों की मांग उल्लेखनीय रही।

    इस अवधि के सबसे बड़े मिठाई ऑर्डरों में मुंबई के ग्राहक का 9,870 रुपये का ऑर्डर शामिल रहा। इसमें कई तरह की मिठाइयों के साथ कॉफी रसगुल्ला तिरामिसु भी मंगाया गया। यह मिठाई पारंपरिक भारतीय रसगुल्ले और इटली की प्रसिद्ध मिठाई तिरामिसु का फ्यूजन रूप है। त्योहार के दौरान इस तरह के नए स्वाद वाले विकल्प भी ग्राहकों के भोजन और मिठाई के चुनाव का हिस्सा बने।

    नवरात्रि के इन आंकड़ों से पता चलता है कि त्योहार के दौरान ग्राहकों की पसंद पारंपरिक व्रत के भोजन और मिठाइयों के इर्द-गिर्द रही। साबूदाने के व्यंजनों और व्रत थालियों की मांग के साथ रसगुल्ले सहित पारंपरिक मिठाइयों के ऑर्डर में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई।

  • आंध्र प्रदेश के मंदिर में महालक्ष्मी का साढ़े चार करोड़ रुपये के नोटों से भव्य शृंगार

    आंध्र प्रदेश के मंदिर में महालक्ष्मी का साढ़े चार करोड़ रुपये के नोटों से भव्य शृंगार


    नई दिल्ली । 
    आंध्र प्रदेश के कोनासीमा जिले के अमलापुरम स्थित श्री वासवी कन्यका परमेश्वरी मंदिर में शारदीय नवरात्र के अवसर पर देवी महालक्ष्मी का अनोखा शृंगार किया गया। करीब साढ़े चार करोड़ रुपये के करेंसी नोटों से की गई इस विशेष सजावट ने श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित किया है। मंदिर में देवी की प्रतिमा को अलग-अलग रंगों के नोटों से बनी आकर्षक मालाओं से सजाया गया। इसके अलावा मंदिर के आसपास के हिस्सों में भी करेंसी नोटों का इस्तेमाल करके विशेष सजावट की गई है। इस अनूठे शृंगार को देखने और देवी के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

    मंदिर में नवरात्र के दौरान की गई यह सजावट अपनी भव्यता और इसे तैयार करने में लगी मेहनत के कारण चर्चा में है। करेंसी नोटों को व्यवस्थित तरीके से सजाकर मालाओं का रूप दिया गया, जिन्हें देवी के शृंगार में शामिल किया गया। अलग-अलग रंगों के नोटों को बारीकी से जोड़कर तैयार की गई इन मालाओं ने मंदिर की सजावट को विशिष्ट रूप दिया। इस आयोजन में श्रद्धालुओं की भागीदारी भी अहम रही, क्योंकि सजावट के लिए इस्तेमाल किए गए नोट भक्तों की ओर से उपलब्ध कराए गए थे।

    मंदिर समिति के सदस्यों के अनुसार, करेंसी नोटों से बनी विशेष मालाओं को तैयार करने में लगभग 15 दिन का समय लगा। इस दौरान नोटों को सावधानीपूर्वक व्यवस्थित करके मालाएं बनाई गईं और फिर उनका इस्तेमाल देवी के शृंगार तथा मंदिर परिसर की सजावट के लिए किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में समय और मेहनत लगी। नवरात्र के दौरान मंदिर में होने वाले धार्मिक आयोजनों के बीच नोटों से किया गया यह विशेष शृंगार आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

    इस आयोजन की एक खास बात यह है कि सजावट पूरी होने के बाद करेंसी नोटों को मंदिर में स्थायी रूप से नहीं रखा जाएगा। मंदिर समिति के सदस्यों के मुताबिक, जिन श्रद्धालुओं ने सजावट के लिए नोट दिए हैं, उन्हें नवरात्र के बाद उनकी राशि वापस लौटा दी जाएगी। इस तरह नोटों का इस्तेमाल देवी के विशेष शृंगार के लिए किया गया है और बाद में उन्हें संबंधित श्रद्धालुओं तक पहुंचाया जाएगा।

    कुछ श्रद्धालुओं के बीच यह मान्यता भी प्रचलित है कि मंदिर में देवी के शृंगार में इस्तेमाल किए गए नोटों को घर या व्यावसायिक प्रतिष्ठान में रखने से सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है। उनका विश्वास है कि ऐसे नोट कारोबार में खुशहाली की कामना से जुड़े होते हैं। इसी कारण नोटों से किए गए इस शृंगार को धार्मिक आस्था के साथ आर्थिक समृद्धि की इच्छा से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, यह श्रद्धालुओं की धार्मिक मान्यता है।

    श्री वासवी कन्यका परमेश्वरी मंदिर में नवरात्र के दौरान हर साल विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इस अवसर पर देवी को विशेष भोग अर्पित किया जाता है, जिसे बाद में श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है। मंदिर परिसर में उत्सव के अनुरूप सजावट और तैयारियां भी की जाती हैं। इस बार करीब साढ़े चार करोड़ रुपये के नोटों से किया गया महालक्ष्मी का शृंगार इन आयोजनों का प्रमुख आकर्षण बना है। श्रद्धालुओं के लिए यह आयोजन देवी के दर्शन, धार्मिक परंपरा और सामूहिक सहभागिता का विशेष अवसर है।

  • अहमदाबाद में नवरात्रि की आठवीं रात पुरुष साड़ी पहनकर करते हैं गरबा, 200 साल पुरानी परंपरा के पीछे है साडू माता के बलिदान की कहानी

    अहमदाबाद में नवरात्रि की आठवीं रात पुरुष साड़ी पहनकर करते हैं गरबा, 200 साल पुरानी परंपरा के पीछे है साडू माता के बलिदान की कहानी

    नई दिल्ली । गुजरात में नवरात्रि के दौरान गरबा और देवी की आराधना का विशेष महत्व है। इस उत्सव के बीच अहमदाबाद के शाहपुर इलाके में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो अपनी अनूठी पहचान के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करती है। यहां नवरात्रि की आठवीं रात बारोट समुदाय के पुरुष साड़ी पहनकर गरबा करते हैं। माथे पर सिंदूर की बिंदी लगाकर होने वाला यह आयोजन करीब 200 साल पुरानी परंपरा का हिस्सा है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस रस्म का संबंध साडू माता के बलिदान और उनकी रक्षा नहीं कर पाने के बाद समुदाय द्वारा किए गए प्रायश्चित से है।

    शाहपुर की साडू माता नी पोल में हर साल नवरात्रि की आठवीं रात पुरुष एकत्र होते हैं और पारंपरिक तरीके से गरबा करते हैं। इस आयोजन में बारोट समुदाय के लोगों के साथ दूसरे समुदायों के लोग भी भाग लेते हैं। इस वर्ष भी कम से कम 40 पुरुष इस परंपरा में शामिल हुए। इनमें मुस्लिम समुदाय के लोग भी मौजूद थे। यह आयोजन अलग-अलग समुदायों की भागीदारी के साथ परंपरा के प्रति लोगों की आस्था को दर्शाता है।

    60 वर्षीय सतीश बारोट ने बताया कि वह 40 साल से अधिक समय से इस रस्म का हिस्सा बनते आ रहे हैं। वहीं, सुरेंद्रनगर से पिंटू बारोट अपने परिवार के साथ इस आयोजन में शामिल होने पहुंचे। उनके 10 वर्षीय बेटे, भाई और भतीजे ने पहली बार इस परंपरा में भाग लिया। इस तरह परिवार की नई पीढ़ी भी इस पुरानी रस्म से जुड़ रही है।

    स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस परंपरा की शुरुआत लगभग 200 साल पहले हुई एक घटना से जुड़ी है। मान्यता है कि बारोट समुदाय की साडू माता अपनी असाधारण सुंदरता के लिए जानी जाती थीं। उस समय के शासक ने उन्हें दरबार में पेश करने का आदेश दिया था। इस आदेश को पूरा कराने के लिए सैनिकों की एक टुकड़ी भेजी गई थी।

    स्थानीय मान्यता के अनुसार, समुदाय के लोगों ने साडू माता को उनकी इच्छा के विरुद्ध दरबार ले जाने का विरोध किया। इस दौरान सैनिकों और समुदाय के लोगों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई। बताया जाता है कि खतरा बढ़ने पर साडू माता ने पहले अपनी बेटी अजूबा की जान ले ली। इसके बाद उन्होंने अपने पति हाथीसिंह बारोट से कहा कि उन्हें शाही दरबार में ले जाने देने के बजाय तलवार के एक वार से उनकी जान ले लें। मान्यता के अनुसार, इसके बाद साडू माता की मृत्यु हो गई।

    इस घटना के बाद समुदाय के लोगों को गहरा पछतावा हुआ कि वे साडू माता की रक्षा नहीं कर सके। स्थानीय विश्वास के मुताबिक, उनकी मृत्यु के बाद समुदाय के परिवारों पर श्राप लगने की आशंका जताई जाने लगी। लोगों का दावा था कि परिवारों में पुरुषों की मौतें होने लगीं और वंश को आगे बढ़ाने में कठिनाइयां आने लगीं।

    इसके बाद समुदाय के लोग साडू माता के स्मारक पर एकत्र हुए। उन्होंने अपनी गलती के लिए प्रायश्चित किया और परिवारों की खुशहाली तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रार्थना की। इसी दौरान पुरुषों ने साडू माता से जुड़े वस्त्र पहनने का संकल्प लिया। समुदाय का विश्वास है कि प्रार्थनाओं के बाद परिवारों की वंश-परंपरा फिर आगे बढ़ने लगी। समय के साथ साड़ी पहनकर गरबा करने की यह रस्म नवरात्रि की आठवीं रात की स्थायी परंपरा बन गई।

    आज इस आयोजन में शामिल होने वाले पुरुष इसे केवल नृत्य या धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति, कृतज्ञता और सामूहिक प्रायश्चित के प्रतीक के रूप में देखते हैं। अहमदाबाद के शाहपुर में निभाई जाने वाली यह परंपरा गुजरात के नवरात्रि उत्सव की विविधता और स्थानीय लोकविश्वासों से जुड़ी पुरानी स्मृतियों को सामने लाती है।

  • गुजरात के राजकोट में अहीर गरबा महोत्सव की भव्यता, सोने के आभूषण पहनकर हजारों महिलाओं ने किया पारंपरिक रास-गरबा

    गुजरात के राजकोट में अहीर गरबा महोत्सव की भव्यता, सोने के आभूषण पहनकर हजारों महिलाओं ने किया पारंपरिक रास-गरबा


    नई दिल्ली ।
    गुजरात में शारदीय नवरात्र के दौरान भक्ति, शक्ति और सांस्कृतिक परंपराओं के विविध रंग देखने को मिल रहे हैं। कहीं पारंपरिक गरबा लोगों को आकर्षित कर रहा है, तो कहीं समाज की पुरानी परंपराएं विशेष आयोजनों के माध्यम से जीवंत नजर आ रही हैं। इसी बीच राजकोट में आयोजित अहीर गरबा महोत्सव ने अपने भव्य आयोजन और पारंपरिक अंदाज के कारण लोगों का ध्यान खींचा। यहां 15 हजार से ज्यादा महिलाओं ने करीब 900 किलो सोने के आभूषण पहनकर पारंपरिक रास-गरबा में हिस्सा लिया। इन आभूषणों की अनुमानित कीमत 1300 करोड़ रुपये से भी अधिक बताई गई है।

    सोने के आभूषणों से सजी महिलाओं की बड़ी संख्या और पारंपरिक नृत्य ने गरबा मैदान को विशेष रूप दे दिया। इस आयोजन में महिलाओं ने अपने पारंपरिक परिधानों के साथ सोने के हार, कंगन और अन्य आभूषण पहने। एक साथ बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी ने अहीर समाज की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक उत्सव की भव्यता को प्रदर्शित किया।

    राजकोट में अहीर गरबा महोत्सव का आयोजन
    राजकोट में अहीर सेना की ओर से अहीर गरबा महोत्सव आयोजित किया गया है। इस महोत्सव में अहीर समाज के भाई-बहन लगातार नौ दिनों तक पारंपरिक अंदाज में गरबा कर रहे हैं। नवरात्र के दौरान अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक पहचान को उत्सव के माध्यम से प्रदर्शित करना इस आयोजन का प्रमुख उद्देश्य है। इसी वजह से महोत्सव में समाज के लोगों का खासा उत्साह देखने को मिल रहा है।

    आयोजन में पारंपरिक रास-गरबा के साथ अहीर समाज की सांस्कृतिक विरासत को भी प्रमुखता दी गई। नवरात्र के सातवें दिन बड़ी संख्या में महिलाएं अपने पारंपरिक परिधानों और सोने के आभूषणों से सजकर गरबा मैदान में पहुंचीं। इसके बाद सामूहिक रूप से पारंपरिक रास-गरबा किया गया। हजारों महिलाओं की एक साथ भागीदारी इस आयोजन का प्रमुख आकर्षण रही।

    900 किलो सोने के आभूषणों ने खींचा ध्यान
    इस महोत्सव की सबसे खास बात महिलाओं द्वारा पहने गए सोने के आभूषण रहे। करीब 900 किलो सोने के गहनों की अनुमानित कीमत 1300 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है। महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों के साथ सोने के हार, कंगन और अन्य आभूषण पहने, जिससे आयोजन की भव्यता और बढ़ गई।

    करीब 15 हजार अहीराणियों की एक साथ मौजूदगी ने इस सांस्कृतिक आयोजन को विशेष पहचान दी। आभूषणों की चमक के साथ पारंपरिक वेशभूषा ने भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इस आयोजन में सोने के गहने केवल सजावट का हिस्सा नहीं रहे, बल्कि अहीर समाज की पारंपरिक संस्कृति और उत्सव की विशिष्टता को प्रदर्शित करने का माध्यम भी बने।

    सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बना गरबा
    अहीर गरबा महोत्सव में पारंपरिक रास खेलने की शैली भी आकर्षण का केंद्र रही। यहां गरबा केवल नृत्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज की एकता, सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं से जुड़े रहने का प्रतीक बनकर सामने आया। नौ दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में समाज के भाई-बहन पारंपरिक तरीके से भाग ले रहे हैं।

    शारदीय नवरात्र के दौरान आयोजित यह महोत्सव गुजरात की सांस्कृतिक विविधता और पारंपरिक उत्सवों की विशेषता को सामने लाता है। बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी, पारंपरिक परिधान, सोने के आभूषण और सामूहिक रास-गरबा ने राजकोट के इस आयोजन को खास बना दिया।

  • मां दुर्गा की बिंदी के नीचे क्यों बनाई जाती है मकड़ी और उसका जाल? जानिए महामाया, मोह-माया और इस अनोखी परंपरा का धार्मिक रहस्य

    मां दुर्गा की बिंदी के नीचे क्यों बनाई जाती है मकड़ी और उसका जाल? जानिए महामाया, मोह-माया और इस अनोखी परंपरा का धार्मिक रहस्य


    नई दिल्ली ।
    शारदीय नवरात्र का पावन पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना करने के बाद विजयादशमी के दिन देवी की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु भावुक मन से मां को विदाई देते हैं और अगले वर्ष फिर से उनके आगमन की प्रार्थना करते हैं। इस साल मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन 20 अक्टूबर को किया जाएगा। देश के विभिन्न हिस्सों में इस परंपरा को धार्मिक आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ निभाया जाता है।

    मां दुर्गा की प्रतिमाओं में कई ऐसी विशेषताएं होती हैं, जिनका संबंध धार्मिक मान्यताओं और प्रतीकों से माना जाता है। इन्हीं में से एक है देवी के माथे पर बिंदी के ठीक नीचे दिखाई देने वाली मकड़ी और उसका जाल। कुछ पारंपरिक प्रतिमाओं में नजर आने वाली यह आकृति सामान्य सजावट भर नहीं मानी जाती, बल्कि इसके पीछे एक विशेष धार्मिक अर्थ जुड़ा हुआ है। यह परंपरा डाकर साज से जुड़ी प्रतिमाओं की सजावट में देखने को मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकड़ी का जाल देवी की महामाया शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।

    महामाया का अर्थ उस दिव्य शक्ति से लगाया जाता है, जो अपनी माया के माध्यम से संसार का संचालन करती है। इस मान्यता में मकड़ी और उसके जाल को जीवन तथा संसार की जटिलताओं को समझाने वाले प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

    मकड़ी को महामाया से क्यों जोड़ते हैं?
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकड़ी अपने भीतर से जाल बनाती है और फिर उसी जाल के बीच रहती है। इसी उदाहरण के माध्यम से मनुष्य के जीवन को समझने का प्रयास किया जाता है। इंसान भी अपने जीवन में परिवार, रिश्तों, इच्छाओं और जिम्मेदारियों के बीच एक व्यवस्था बनाता है। समय बीतने के साथ वह इन्हीं संबंधों और इच्छाओं में इस तरह उलझ सकता है कि उसके लिए उनसे अलग होकर सोचना मुश्किल हो जाता है।

    मकड़ी के जाल को इसी सांसारिक उलझन का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जिस प्रकार मकड़ी जाल का निर्माण करती है, उसी तरह देवी की शक्ति से इस संसार की माया का संचालन होता है। इसलिए मकड़ी और उसके जाल को मां दुर्गा की महामाया शक्ति से जोड़कर देखा जाता है। प्रतिमा में यह प्रतीक मनुष्य को संसार की प्रकृति और मोह-माया के प्रभाव की याद दिलाता है।

    अपने जाल में कभी नहीं फंसती मकड़ी
    मकड़ी से जुड़ी इस धार्मिक व्याख्या का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वह अपना जाल बनाती है, लेकिन सामान्यतः उसमें स्वयं नहीं फंसती। इसी उदाहरण के माध्यम से मनुष्य को मोह-माया से बचने का संदेश दिया जाता है। पैसा, परिवार, रिश्ते और जिम्मेदारियां जीवन के आवश्यक हिस्से हैं, लेकिन इनके प्रति अत्यधिक मोह व्यक्ति को मानसिक रूप से उलझा सकता है।

    इस मान्यता के अनुसार, मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए जीवन में संतुलन बनाए रखना चाहिए। सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाना जरूरी है, लेकिन उनमें इतना नहीं उलझना चाहिए कि व्यक्ति स्वयं को ही भूल जाए। इस प्रकार मकड़ी का प्रतीक जीवन में संतुलन, विवेक और मोह से दूरी बनाए रखने की सीख से जुड़ता है।

    दुर्गा विसर्जन कब और किस मुहूर्त में होगा?
    पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट से शुरू होकर 21 अक्टूबर को दोपहर 2 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। इस अवधि में विजयादशमी का पर्व मनाया जाएगा और मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन की परंपरा निभाई जाएगी।

    बताए गए शुभ मुहूर्त के अनुसार, 20 अक्टूबर को दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से दोपहर 3 बजकर 30 मिनट तक दुर्गा विसर्जन किया जा सकेगा। इस अवधि में श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार किसी भी समय देवी की प्रतिमा का विसर्जन कर सकते हैं। विसर्जन के दौरान भक्त मां दुर्गा को भावपूर्ण विदाई देते हैं और अगले वर्ष फिर से उनके आगमन की कामना करते हैं।

  • महाष्टमी 2026: 19 अक्टूबर को करें कन्या पूजन, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा की सही विधि और महानवमी की तारीख

    महाष्टमी 2026: 19 अक्टूबर को करें कन्या पूजन, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा की सही विधि और महानवमी की तारीख

    नई दिल्ली । शारदीय नवरात्र के अंतिम दिनों में महाष्टमी और महानवमी की पूजा के साथ कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। इन दिनों भक्त मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करते हैं और छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर उनका पूजन करते हैं। वर्ष 2026 में अष्टमी तिथि दो दिनों तक रहने के कारण महाष्टमी की तारीख को लेकर असमंजस की स्थिति बन रही है। ऐसे में पूजा की तैयारी करने वाले श्रद्धालुओं के लिए अष्टमी की सही तारीख, कन्या पूजन का शुभ मुहूर्त और महानवमी का समय जानना जरूरी है।

    पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर 2026 को सुबह 8 बजकर 27 मिनट पर शुरू होगी। यह तिथि 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर महाष्टमी का पर्व 19 अक्टूबर, सोमवार को मनाया जाएगा। इस दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा की जाती है। श्रद्धालु व्रत रखकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार में सुख, शांति तथा समृद्धि की कामना करते हैं।

    महाष्टमी पर कन्या पूजन को नवरात्र की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में गिना जाता है। मान्यता है कि छोटी कन्याओं में मां दुर्गा का स्वरूप देखा जाता है और उनका सम्मानपूर्वक पूजन किया जाता है। 19 अक्टूबर को कन्या पूजन के लिए तीन प्रमुख शुभ समय बताए गए हैं। ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 52 मिनट से 5 बजकर 40 मिनट तक रहेगा। अमृत काल सुबह 7 बजकर 28 मिनट से 9 बजकर 16 मिनट तक है। वहीं, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 49 मिनट से दोपहर 12 बजकर 34 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग में दिए गए समय की पुष्टि भी कर लेनी चाहिए।

    कन्या पूजन की शुरुआत घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई से की जाती है। इसके बाद मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करके कन्याओं को आदरपूर्वक घर आमंत्रित किया जाता है। परंपरा के अनुसार, नौ कन्याओं के साथ एक बालक को भी बुलाया जाता है। बालक को भैरव स्वरूप मानने की धार्मिक मान्यता है। कन्याओं के घर आने पर उनके पैर धोए जाते हैं और उन्हें साफ आसन पर बैठाया जाता है। इसके बाद माथे पर तिलक लगाकर उनकी पूजा की जाती है।

    पूजन के बाद कन्याओं को श्रद्धापूर्वक भोजन कराया जाता है। भोजन में हलवा, पूरी और चने जैसी पारंपरिक चीजें शामिल की जाती हैं। भोजन कराने के बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा या उपहार देकर कन्याओं को सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है। इस परंपरा में कन्याओं के प्रति आदर और श्रद्धा को विशेष महत्व दिया जाता है।

    महाष्टमी के बाद महानवमी का पर्व मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, आश्विन शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 19 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 51 मिनट से शुरू होकर 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार, महानवमी 20 अक्टूबर, मंगलवार को मनाई जाएगी। इस दिन मां दुर्गा के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। कई श्रद्धालु महानवमी पर हवन और कन्या पूजन करने के बाद नौ दिनों से चल रहे व्रत का पारण करते हैं।

    धार्मिक मान्यताओं में मां महागौरी को शांति, पवित्रता और सौम्यता का प्रतीक माना गया है। महाष्टमी पर भक्त उनकी आराधना करके परिवार की खुशहाली और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। नवरात्र के दौरान कन्या पूजन को भी देवी की उपासना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन पूजा, भोजन और उपहार के माध्यम से कन्याओं के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं।

  • मुंबई के मॉल में गरबा देखकर भावुक हुईं रोमानिया की मारिया एलेक्जेंड्रा, बोलीं- भारत छोड़ने पर इन खूबसूरत पलों को बहुत याद करूंगी

    मुंबई के मॉल में गरबा देखकर भावुक हुईं रोमानिया की मारिया एलेक्जेंड्रा, बोलीं- भारत छोड़ने पर इन खूबसूरत पलों को बहुत याद करूंगी

    नई दिल्ली । नवरात्रि के दौरान मुंबई के एक मॉल में गरबा कर रहे लोगों को देखकर रोमानिया की मारिया एलेक्जेंड्रा भावुक हो गईं। पारंपरिक कपड़ों में सजे लोगों, ढोल की थाप पर थिरकते कदमों और मां दुर्गा की भक्ति से भरे माहौल ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इस अनुभव के दौरान उनकी आंखें भर आईं और उन्हें एहसास हुआ कि जब वह भारत से जाएंगी, तो यहां की संस्कृति और त्योहारों से जुड़े ऐसे यादगार पलों को बहुत याद करेंगी। उनका वीडियो सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रहा है।

    मारिया नवरात्रि के दौरान मुंबई के एक मॉल में आयोजित गरबा कार्यक्रम देख रही थीं। वहां बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक परिधानों में एक साथ नृत्य कर रहे थे। कोई गोल घेरे में घूमकर गरबा कर रहा था, तो कोई संगीत की लय के साथ अपने कदम मिला रहा था। चारों ओर उत्सव का माहौल था। मारिया ने इस दृश्य का वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया पर साझा किया। वीडियो में वह सफेद कुर्ते और झुमकों में दिखाई दे रही हैं। हालांकि, लोगों का ध्यान उनके पहनावे से ज्यादा उस भावुक प्रतिक्रिया पर गया, जो गरबा देखते समय उनके चेहरे पर नजर आई।

    मारिया ने बताया कि उस समय उन्हें खुद भी पूरी तरह समझ नहीं आ रहा था कि वह इतनी भावुक क्यों हो गईं। भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव, भारत छोड़ने का विचार या फिर बड़ी संख्या में लोगों को एक साथ खुशी मनाते देखना, इनमें से कोई भी वजह उनकी भावनाओं से जुड़ी हो सकती थी। उनके लिए यह केवल किसी उत्सव को देखने का अनुभव नहीं था, बल्कि भारत के साथ बने उनके भावनात्मक जुड़ाव को महसूस करने का एक खास अवसर था।

    उन्होंने कहा कि इस पल ने उन्हें एहसास कराया कि भारत छोड़ने के बाद वह ऐसे नजारों को बहुत याद करेंगी। त्योहार के दौरान लोगों की खुशी, एक-दूसरे के साथ उनका जुड़ाव और पूरे वातावरण में दिखाई देने वाली उमंग उनके लिए खास बन गई। किसी दूसरे देश में रहकर वहां की संस्कृति को करीब से देखना और उसके भावनात्मक पक्ष को महसूस करना उनके लिए यादगार अनुभव रहा।

    मारिया ने गरबा के धार्मिक महत्व पर भी बात की। उनके अनुसार, गरबा केवल संगीत पर किया जाने वाला नृत्य नहीं है, बल्कि नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के प्रति आस्था व्यक्त करने का माध्यम भी है। इस आयोजन में लोगों की खुशी और उनकी धार्मिक श्रद्धा एक साथ दिखाई देती है। नृत्य करते हुए लोग अपनी परंपराओं से जुड़े रहते हैं और सामूहिक रूप से त्योहार मनाते हैं। मारिया को यही मेल विशेष रूप से प्रभावित कर गया कि यहां उत्सव और भक्ति को एक साथ अनुभव किया जा सकता है।

    वीडियो के साथ उन्होंने यह भी लिखा कि इस अनुभव ने उन्हें याद दिलाया कि उन्हें भारत से प्यार क्यों हुआ था। उन्होंने नवरात्रि मनाने वाले लोगों से पूछा कि उनके लिए इस त्योहार का क्या अर्थ है। उनकी इस बात से पता चलता है कि वह केवल उत्सव का दृश्य देखने तक सीमित नहीं रहना चाहती थीं, बल्कि उसके पीछे की आस्था और परंपरा को भी समझना चाहती थीं।

    मारिया के वीडियो पर सोशल मीडिया यूजर्स ने भी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दीं। कई लोगों ने उनकी भावनाओं की सराहना की और कहा कि किसी संस्कृति को समझने का अर्थ उसके रीति-रिवाजों के साथ-साथ उनसे जुड़ी भावनाओं को जानना भी है। कुछ लोगों ने उनके अनुभव को प्रेरणादायक बताया, जबकि अन्य ने उन्हें भारत के दूसरे त्योहारों को देखने की सलाह दी। इनमें दुर्गा पूजा और दिवाली का अनुभव लेने के सुझाव भी शामिल थे।

    भारत के अलग-अलग हिस्सों में त्योहारों को विविध परंपराओं और तरीकों से मनाया जाता है। मारिया के लिए मुंबई के मॉल में गरबा देखना ऐसा ही एक अनुभव बना, जिसने उन्हें भारतीय संस्कृति से अपने जुड़ाव का एहसास कराया। उनकी भावुक प्रतिक्रिया ने यह दिखाया कि कभी-कभी किसी जगह के लोगों को खुशी मनाते देखना भी ऐसी याद बना सकता है, जिसे वहां से दूर जाने के बाद लंबे समय तक याद किया जाए।

  • 14 अक्टूबर 2026 का पंचांग: नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्माण्डा की पूजा, जानें राहुकाल और शुभ-अशुभ समय

    14 अक्टूबर 2026 का पंचांग: नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्माण्डा की पूजा, जानें राहुकाल और शुभ-अशुभ समय

    नई दिल्ली: 14 अक्टूबर 2026, बुधवार को आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि है। पंचांग के अनुसार, इस तिथि के देवता भगवान गणेश माने जाते हैं। यह दिन विरोधियों के खिलाफ रणनीतिक योजना बनाने के लिए अच्छा बताया गया है। हालांकि, रिक्ता तिथि होने के कारण इस दिन शुभ कार्यों को करने से बचने की सलाह दी जाती है। नवरात्रि के चौथे दिन मां कूष्माण्डा की पूजा-अर्चना का भी विशेष महत्व है।

    आज विक्रम संवत 2083 चल रहा है और मास आश्विन है। पक्ष शुक्ल तथा दिन बुधवार है। तिथि शुक्ल पक्ष चतुर्थी, योग आयुष्यमान और करण वणिज है। चंद्रमा वृश्चिक राशि में रहेगा, जबकि सूर्य कन्या राशि में स्थित रहेगा। आज सूर्योदय सुबह 6 बजकर 21 मिनट पर और सूर्यास्त शाम 5 बजकर 52 मिनट पर होगा। चंद्रोदय सुबह 9 बजकर 49 मिनट पर तथा चंद्रास्त शाम 7 बजकर 54 मिनट पर निर्धारित है।

    आज चंद्रमा वृश्चिक राशि में अनुराधा नक्षत्र में रहेगा। यह नक्षत्र वृश्चिक राशि में 3 डिग्री 20 मिनट से 16 डिग्री 40 मिनट तक फैला हुआ है। अनुराधा नक्षत्र के शासक ग्रह शनि हैं और इसके देवता मित्र माने जाते हैं, जो 12 आदित्यों में से एक हैं। इस नक्षत्र का स्वभाव सौम्य बताया गया है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, यह नक्षत्र ललित कलाओं को सीखने, मित्रता करने, रोमांस, नए वस्त्र धारण करने, विवाह, गायन और जुलूस में शामिल होने के लिए अनुकूल माना जाता है। कृषि कार्यों और यात्रा के लिए भी इसे शुभ बताया गया है।

    पंचांग के अनुसार, बुधवार को राहुकाल दोपहर 12 बजकर 7 मिनट से 1 बजकर 33 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में शुभ कार्य करने से बचने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा यमगंड, गुलिक, दुमुहूर्त और वर्ज्यम के समय का भी ध्यान रखना चाहिए। यमगंड का समय सुबह 7 बजकर 47 मिनट से 9 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी महत्वपूर्ण या शुभ कार्य की योजना बनाते समय इन समयावधियों को ध्यान में रखना उचित माना जाता है।

  • नवरात्रि व्रत में खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करें ये 6 मसाले, जानें किन 5 मसालों से परहेज करना चाहिए

    नवरात्रि व्रत में खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करें ये 6 मसाले, जानें किन 5 मसालों से परहेज करना चाहिए

    नई दिल्ली । नवरात्रि के दौरान व्रत रखने वाले लोग फलाहार के साथ साबूदाने की खिचड़ी, आलू के पकवान और कुट्टू से बनी चीजें खाते हैं। व्रत के भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए मसालों का चुनाव भी अहम होता है। रोजाना इस्तेमाल होने वाले कई मसालों की जगह व्रत में कुछ खास विकल्प अपनाए जाते हैं। जीरा, काली मिर्च और सेंधा नमक का इस्तेमाल कई घरों में किया जाता है, जबकि कुछ मसालों से परहेज रखा जाता है। हालांकि, व्रत में किन चीजों का इस्तेमाल करना है, यह परिवार की परंपरा और अपने व्रत के नियमों पर निर्भर करता है।

    व्रत के खाने में जीरे का इस्तेमाल कई घरों में किया जाता है। इसकी सौंधी खुशबू साबूदाने की खिचड़ी और उबले आलू जैसी साधारण डिश का स्वाद बढ़ा सकती है। भुने हुए जीरे का पाउडर दही या रायते में मिलाकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह, काली मिर्च को तीखापन लाने के विकल्प के तौर पर चुना जाता है। जिन लोग व्रत में लाल मिर्च पाउडर नहीं खाते, वे कुटी हुई काली मिर्च से आलू, खीरे के रायते और फ्रूट चाट का स्वाद बढ़ा सकते हैं।

    सेंधा नमक भी व्रत के भोजन में इस्तेमाल होने वाला प्रमुख विकल्प है। कई परिवार नवरात्रि के दौरान सामान्य नमक की जगह सेंधा नमक का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, नमक के इस्तेमाल को लेकर अपने व्रत के नियमों का ध्यान रखना जरूरी है। मीठे पकवानों में हरी इलायची का इस्तेमाल किया जा सकता है। खीर, दूध से बनी मिठाइयों और मखाने के मीठे पकवानों में इसकी सुगंध स्वाद को बेहतर बनाती है। दालचीनी भी कुछ व्यंजनों में इस्तेमाल की जाती है। इसे दूध में उबालकर या मीठे पकवानों में थोड़ी मात्रा में डाला जा सकता है, लेकिन व्रत में इसका इस्तेमाल घर की परंपरा के अनुसार ही किया जाता है।

    अजवाइन भी उन मसालों में शामिल है, जिनका इस्तेमाल कुछ घरों में व्रत के नमकीन पकवानों और स्नैक्स में किया जाता है। इसकी तेज खुशबू खाने का स्वाद बढ़ा सकती है। हालांकि, हर परिवार में व्रत के दौरान अजवाइन खाने की अनुमति नहीं होती। इसलिए किसी भी मसाले को इस्तेमाल करने से पहले अपने यहां अपनाए जाने वाले नियमों को ध्यान में रखना चाहिए।

    व्रत के दौरान कुछ मसालों से परहेज भी किया जाता है। इनमें हींग शामिल है, जिसका इस्तेमाल सामान्य दिनों में सब्जियों और दालों में तड़का लगाने के लिए होता है। नवरात्रि के व्रत में कई परिवार हींग नहीं खाते। पैकेट में मिलने वाली हींग में गेहूं का आटा या दूसरी सामग्री भी हो सकती है, इसलिए सामग्री की जानकारी रखना उपयोगी है। राई भी रोजाना के भोजन में तड़के और अचार के लिए इस्तेमाल होती है, लेकिन कई घरों में व्रत के दौरान इसे नहीं खाया जाता।

    मेथी दाना भी उन मसालों में शामिल है, जिनसे व्रत में कई परिवार दूरी रखते हैं। इसका स्वाद हल्का कड़वा होता है और इसे अचार, मसालों के मिश्रण तथा सब्जियों में इस्तेमाल किया जाता है। हल्दी को लेकर भी नियम अलग-अलग हैं। रोजाना के भोजन में इस्तेमाल होने वाली हल्दी कुछ परिवार नवरात्रि के व्रत वाले पकवानों में नहीं डालते। इसी तरह, लाल मिर्च पाउडर से भी कई लोग परहेज करते हैं और तीखापन लाने के लिए काली मिर्च चुनते हैं। हरी मिर्च के इस्तेमाल को लेकर भी परिवारों की परंपराएं अलग हो सकती हैं।

    इस तरह, नवरात्रि के व्रत में मसालों का चयन करते समय केवल स्वाद ही नहीं, बल्कि अपने घर में माने जाने वाले नियमों का ध्यान रखना भी जरूरी है। जीरा, काली मिर्च, सेंधा नमक, हरी इलायची, दालचीनी और अजवाइन का इस्तेमाल कुछ घरों में किया जाता है, जबकि हींग, राई, मेथी दाना, हल्दी और लाल मिर्च पाउडर से परहेज रखा जा सकता है। सभी मसालों के लिए एक जैसा नियम नहीं होता, इसलिए व्रत का भोजन तैयार करते समय पारिवारिक परंपरा के अनुसार फैसला करना चाहिए।

  • सुरेश रैना ने परिवार संग मां बगलामुखी के किए दर्शन, मंदिर में हवन के दौरान लाल मिर्च चढ़ाने की क्या है मान्यता?

    सुरेश रैना ने परिवार संग मां बगलामुखी के किए दर्शन, मंदिर में हवन के दौरान लाल मिर्च चढ़ाने की क्या है मान्यता?

    नई दिल्ली: पूर्व भारतीय क्रिकेटर सुरेश रैना ने शारदीय नवरात्र के पहले दिन अपने परिवार के साथ हिमाचल प्रदेश स्थित मां बगलामुखी मंदिर में दर्शन किए। नवरात्र के अवसर पर उन्होंने मां के दरबार में पहुंचकर पूजा-अर्चना की। मां बगलामुखी को दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या माना जाता है। देशभर से श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन करने आते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां बगलामुखी की उपासना शत्रुओं पर विजय, बाधाओं से मुक्ति और जीवन में आने वाली कठिनाइयों से निपटने की शक्ति प्राप्त करने के लिए की जाती है। मंदिर में विशेष हवन का भी महत्व है, जिसमें लाल मिर्च की आहुति देने की परंपरा प्रचलित है।

    मां बगलामुखी मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के बनखंडी क्षेत्र में स्थित है। यह शक्तिपीठ श्रद्धालुओं के बीच अपनी विशिष्ट पूजा पद्धति और धार्मिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। नवरात्र के दौरान यहां भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है। कई श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और जीवन की परेशानियों से छुटकारा पाने की कामना लेकर मंदिर पहुंचते हैं। सुरेश रैना का परिवार के साथ मंदिर में दर्शन करना भी इसी धार्मिक अवसर से जुड़ा रहा। नवरात्र के पहले दिन देवी की आराधना को विशेष महत्व दिया जाता है और भक्त विधि-विधान से पूजा कर आशीर्वाद मांगते हैं।

    मां बगलामुखी की पूजा में हवन का विशेष स्थान माना जाता है। इस दौरान लाल मिर्च की आहुति देने की परंपरा मंदिर की पहचान से जुड़ी हुई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां बगलामुखी को शत्रुओं की वाणी और नकारात्मक शक्तियों को नियंत्रित करने वाली देवी माना जाता है। लाल मिर्च की आहुति को इसी मान्यता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। भक्तों का विश्वास है कि इस प्रकार का हवन विरोधियों से उत्पन्न परेशानियों, विवादों और बाधाओं से मुक्ति की प्रार्थना के लिए किया जाता है। यह धार्मिक आस्था पर आधारित परंपरा है, जिसका महत्व श्रद्धालु अपनी मान्यताओं के अनुसार समझते हैं।

    मां बगलामुखी को पीतांबरा देवी के नाम से भी जाना जाता है। उनकी पूजा में पीले रंग को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, देवी को पीले वस्त्र अर्पित किए जाते हैं और पूजा में पीले फूलों तथा अन्य पीली सामग्री का उपयोग किया जाता है। मंदिर में होने वाले विशेष अनुष्ठानों के दौरान श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं के अनुसार पूजा कराते हैं। मां बगलामुखी की साधना को विशेष रूप से उन परिस्थितियों में महत्वपूर्ण माना जाता है, जब व्यक्ति किसी विवाद, विरोध या कठिन चुनौती का सामना कर रहा हो। हालांकि, इन मान्यताओं का आधार धार्मिक विश्वास है और इन्हें आस्था के संदर्भ में ही देखा जाता है।

    मां बगलामुखी से जुड़ी धार्मिक कथाओं में देवी को असाधारण शक्ति वाली महाविद्या के रूप में वर्णित किया गया है। मान्यता है कि देवी की आराधना से संकटों का सामना करने का साहस और मानसिक मजबूती मिलती है। नवरात्र के दौरान शक्तिपीठों में पूजा-अर्चना का विशेष महत्व रहता है। इस समय श्रद्धालु उपवास रखते हैं, देवी के मंत्रों का जाप करते हैं और हवन के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। सुरेश रैना का परिवार के साथ मां बगलामुखी के दर्शन करना इसी धार्मिक परंपरा से जुड़ा प्रसंग है। मंदिर में लाल मिर्च की आहुति की परंपरा भी देवी की शक्ति और शत्रु बाधाओं से रक्षा की मान्यता के कारण श्रद्धालुओं के बीच विशेष महत्व रखती है।