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  • भारत की ‘S5’ परमाणु सबमरीन: समुद्र में छिपा ‘ब्रह्मास्त्र’, चीन-पाकिस्तान के लिए बढ़ी टेंशन

    भारत की ‘S5’ परमाणु सबमरीन: समुद्र में छिपा ‘ब्रह्मास्त्र’, चीन-पाकिस्तान के लिए बढ़ी टेंशन



    नई दिल्ली। भारत अपनी रणनीतिक समुद्री ताकत को लगातार मजबूत कर रहा है, और ब्रिटिश थिंक टैंक IISS की रिपोर्ट के मुताबिक आने वाली S5 श्रेणी की परमाणु पनडुब्बियां देश की न्यूक्लियर डिटरेंस क्षमता को एक नए स्तर पर ले जाएंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ये पनडुब्बियां भारत की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” को और ज्यादा मजबूत बनाकर दुश्मनों के लिए जवाबी हमला लगभग अटूट बना देंगी।

    भारतीय नौसेना पहले ही INS अरिहंत (S2), INS अरिघात (S3) और हाल ही में शामिल INS अरिदमन (S4) के साथ अपनी परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी क्षमता को मजबूत कर चुकी है। इन पनडुब्बियों का काम समुद्र की गहराइयों में छिपकर परमाणु मिसाइलों के जरिए लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता रखना है।

    रिपोर्टों के अनुसार INS अरिदमन का हाल ही में विशाखापत्तनम में कमीशन होना भारत की रणनीतिक शक्ति में बड़ा कदम माना जा रहा है। यह पनडुब्बी INS अरिहंत और INS अरिघात के साथ मिलकर काम करेगी, जिससे भारत की समुद्री परमाणु शक्ति और मजबूत होगी।

    पनडुब्बियों की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि ये महीनों तक समुद्र में बिना सतह पर आए रह सकती हैं और इन्हें ट्रैक करना बेहद मुश्किल होता है। इसी वजह से इन्हें किसी भी देश की “सेकंड स्ट्राइक कैपेबिलिटी” की रीढ़ माना जाता है, यानी अगर भारत पर परमाणु हमला हो तो जवाबी हमला निश्चित रूप से किया जा सकता है।

    डिफेंस एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत का लक्ष्य “Continuous At-Sea Deterrence (CASD)” हासिल करना है, जिसमें हमेशा कम से कम एक परमाणु पनडुब्बी समुद्र में तैनात रहे। इससे भारत की रणनीतिक स्थिति और मजबूत होगी।

    इसके साथ ही भारत अपनी आगामी S5 श्रेणी की पनडुब्बियों पर भी काम कर रहा है, जिन्हें मौजूदा SSBN से अधिक लंबा, एडवांस और ज्यादा मिसाइल क्षमता वाला बताया जा रहा है। साथ ही विशाखापत्तनम के पास बन रहा ‘आईएनएस वर्षा’ बेस भी इन पनडुब्बियों के संचालन में अहम भूमिका निभाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इन विकासों के बाद भारत की परमाणु त्रिस्तरीय (न्यूक्लियर ट्रायड) क्षमता पूरी तरह मजबूत हो जाएगी, जिससे समुद्र के रास्ते देश की सुरक्षा रणनीति पहले से कहीं अधिक सशक्त बन जाएगी।

  • Hangor Submarine Deal: चीन ने पाकिस्तान को सौंपी पहली हैंगोर पनडुब्बी, भारत का P75-I प्रोजेक्ट अभी भी अटका, समंदर में बढ़ी नौसेना की रेस

    Hangor Submarine Deal: चीन ने पाकिस्तान को सौंपी पहली हैंगोर पनडुब्बी, भारत का P75-I प्रोजेक्ट अभी भी अटका, समंदर में बढ़ी नौसेना की रेस



    नई दिल्ली। चीन और पाकिस्तान के बीच पनडुब्बी साझेदारी ने दक्षिण एशिया में समुद्री सुरक्षा संतुलन को फिर चर्चा में ला दिया है। चीन ने पाकिस्तान नौसेना को पहली हैंगोर-क्लास पनडुब्बी सौंप दी है। यह वही डील है जिसके तहत कुल 8 आधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक AIP (Air Independent Propulsion) पनडुब्बियां पाकिस्तान को मिलनी हैं।यह पनडुब्बियां चीन की Type 039 (Yuan-class) तकनीक पर आधारित हैं, जिन्हें बेहतर स्टील्थ, लंबी अवधि तक पानी के भीतर रहने की क्षमता और आधुनिक हथियार प्रणालियों के लिए जाना जाता है।

    कैसे हो रहा है पूरा प्रोजेक्ट?
    इस पूरे प्रोजेक्ट की कीमत करीब 5 अरब डॉलर बताई जा रही है।
    4 पनडुब्बियां चीन के वुचांग शिपयार्ड में बन रही हैं
    4 पनडुब्बियां पाकिस्तान के कराची शिपयार्ड (KS&EW) में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत बनाई जाएंगी
    पहली पनडुब्बी की डिलीवरी चीन के सान्या नौसैनिक बेस पर की गई, जो PLA Navy का अहम अड्डा माना जाता है।

    पाकिस्तान को क्या फायदा मिलेगा?
    इस डील को पाकिस्तान के लिए “नौसेना में JF-17 मॉडल” की तरह देखा जा रहा है।
    यानी सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि निर्माण क्षमता भी मिल रही है
    पनडुब्बियों का आंशिक निर्माण
    मेंटेनेंस और रिपेयर क्षमता
    भविष्य में तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
    हालांकि रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि असली तकनीकी नियंत्रण और हाई-एंड सिस्टम अभी भी चीन के पास ही रहेंगे।

    हैंगोर पनडुब्बी क्यों खास है?
    हैंगोर-क्लास पनडुब्बियां आधुनिक AIP तकनीक से लैस हैं, जिससे येलंबे समय तक पानी के नीचे रह सकती हैंआसानी से डिटेक्ट नहीं होतींटॉरपीडो और एंटी-शिप मिसाइलों से हमला कर सकती हैं

    कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि इनमें रणनीतिक हथियारों की क्षमता हो सकती है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है।

    भारत की चिंता क्यों बढ़ी?
    इसी बीच भारत का महत्वाकांक्षी P75-I पनडुब्बी प्रोजेक्ट अभी तक फाइनल कॉन्ट्रैक्ट स्टेज में ही अटका हुआ है।इस प्रोजेक्ट के तहत भारत को 6 एडवांस AIP पनडुब्बियां बनानी हैं, जिन्हें मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स (MDL) और जर्मनी की कंपनी TKMS मिलकर बनाएंगे।

    लेकिन समस्या ये हैप्रोजेक्ट 20 साल से ज्यादा समय से चर्चा में हैटेक्नोलॉजी ट्रांसफर और शर्तों पर बातचीत लंबी खिंच रही हैफाइनल डील अभी तक पूरी नहीं हुईअगर सब कुछ तय भी हो जाए, तो पहली पनडुब्बी को सेवा में आने में 2032 या उससे भी ज्यादा समय लग सकता है।

    भारत का मौजूदा सबमरीन बेड़ा
    भारतीय नौसेना के पास अभी लगभग 16–17 पारंपरिक पनडुब्बियां हैं, जिनमें शामिल हैं
    किलो-क्लास (रूस)
    टाइप-209 (जर्मनी)
    स्कॉर्पीन/कलवरी क्लास (फ्रांस)
    लेकिन बड़ी चुनौती यह है कि इनमें से कई पुरानी हो चुकी हैं और AIP तकनीक सीमित है, जिससे उनकी अंडरवॉटर स्टे क्षमता नई पीढ़ी की पनडुब्बियों से कम है।

    दक्षिण एशिया में अब नौसेना की दौड़ तेज हो गई है।एक तरफ पाकिस्तान चीन के सहयोग से तेजी से नई पनडुब्बियां शामिल कर रहा है, वहीं भारत अभी अपनी अगली पीढ़ी की पनडुब्बियों के लिए प्रक्रिया पूरी करने में जुटा है।विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले दशक में समुद्री शक्ति ही रणनीतिक संतुलन तय करने में सबसे बड़ा रोल निभाएगी।

  • LPG संकट में भारत का ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा….जानें नौसेना होर्मुज से कैसे निकाल रही जहाज!

    LPG संकट में भारत का ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा….जानें नौसेना होर्मुज से कैसे निकाल रही जहाज!


    नई दिल्ली।
    भारत (India) में LPG संकट के बीच ऑपरेशन ऊर्जा सुरक्षा (Operation Energy Security) की शुरुआत की गई है। खबर है कि भारतीय नौसेना (Indian Navy) ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) से जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए युद्धपोत तैनात किए हैं। हालांकि, इसे लेकर सेना की ओर से आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Iran’s Foreign Minister Abbas Araghchi) ने कहा है कि मित्र देशों के जहाजों को निकलने की अनुमति दी गई है, जिनमें भारत भी शामिल है।

    एक रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि ऑपरेशन के तहत भारतीय नौसेना ने 5 से ज्यादा युद्धपोत तैनात किए हैं। ऑपरेशन का मकसद उन जलमार्गों और जहाजों को सुरक्षित करना है, जिनके जरिए एलपीजी, एलएजी और कच्चा तेल भारत पहुंच रहा है। माना जा रहा है कि ईरान और अमेरिका के बीच जारी जंग में भारत के लिए निकले 20 कार्गो फंस गए हैं।

    एक सूत्र ने बताया, ‘जब भारत आने वाला कोई मालवाहक जहाज इस स्ट्रेट को पार कर लेता है, तो ओमान की खाड़ी में तैनात नौसेना के युद्धपोत उस जहाज को सुरक्षा देते हैं और उसे संकटग्रस्त क्षेत्र से बाहर अरब सागर की ओर ले जाते हैं।’ वहीं, रिस्क एनालिस्ट मार्टिन कैली कहते हैं, ‘ऐसा लगता है कि ईरान चुनिंदा जहाजों को वेरिफिकेशन के बाद होर्मुज से गुजरने की अनुमति दे रहा है, जो ईरानी जलक्षेत्र के अंदर जहाजों के ट्रांजिट के दौरान किया जाता है।’


    नौसेना का ऐक्शन

    रिपोर्ट के अनुसार, फारस की खाड़ी से निकलने वाले भारतीय कार्गो के संपर्क में नौसेना बनी रहती है। जहाज जब ईरान की सहमति से एक पॉइंट से गुजर जाता है, तो नौसेना के डेस्ट्रॉयर्स और फ्रिगेट्स कमान संभालते हैं। ये मिलकर जहाज को खतरे के क्षेत्र से बाहर निकालकर ले जाते हैं।


    भारत पहुंचे कई जहाज

    खबर है कि इस मिशन के चलते कई भारतीय जहाज सुरक्षित रूप से भारत लौट आए हैं। इनमें एलपीजी लाने वाले पाइन गैस और जग वसंत का नाम शामिल है। दोनों मिलकर करीब 92 हजार टन एलपीजी लाए हैं।


    ईरान ने दिया भारतीय जहाजों को रास्ता

    मुंबई में ईरान के कॉन्सुलेट ने एक पोस्ट में कहा, ‘ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची: हमने चीन, रूस, भारत, इराक और पाकिस्तान सहित मित्र देशों के लिए Strait of Hormuz से गुजरने की अनुमति दे दी है।


    इन लोगों की एलपीजी सप्लाई बंद करने की तैयारी

    पाइप के जरिये आपूर्ति की जाने वाली रसोई गैस (पीएनजी) की सुविधा उपलब्ध होने पर भी इसकी सेवा नहीं लेने वाले उपभोक्ताओं की घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) की आपूर्ति बंद कर दी जाएगी। सरकार ने आदेश जारी कर इसकी जानकारी दी है। यह कदम गैस नेटवर्क के विस्तार को तेज करने और एक ही ईंधन पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

    पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा कि नोटिस मिलने के तीन महीने के भीतर ग्राहकों को पीएनजी अपनानी होगी, ऐसा न करने पर रसोई गैस (एलपीजी) की आपूर्ति बंद कर दी जाएगी।

  • अमेरिका ने होर्मुज के पास ईरान के मिसाइल ठिकानों पर हमला किया, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी तेज

    अमेरिका ने होर्मुज के पास ईरान के मिसाइल ठिकानों पर हमला किया, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी तेज


    वॉशिंगटन। अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के पास ईरान के मिसाइल ठिकानों पर नए हमले किए हैं। अमेरिकी सेना के अधिकारियों के अनुसार ये ठिकाने अंतरराष्ट्रीय जहाजों और समुद्री व्यापार के लिए खतरा बन रहे थे। यह कार्रवाई ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत की जा रही है और अब इसे और तेज कर दिया गया है।

    अमेरिकी सेंट्रल कमांड सेंटकॉम ने बताया कि इन हमलों में भारी वजन वाले बमों का इस्तेमाल किया गया जो मजबूत और सुरक्षित ठिकानों को भी नष्ट करने में सक्षम हैं। ये मिसाइल ठिकाने ईरान के तटीय इलाके में होर्मुज स्ट्रेट के पास स्थित थे और यहां तैनात एंटी शिप मिसाइलें गुजरने वाले जहाजों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही थीं।

    सेंटकॉम ने बताया कि ऑपरेशन के दौरान अमेरिकी नौसेना के विमानों ने सैकड़ों लड़ाकू उड़ानें भरी हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका समुद्र से भी अपनी हवाई ताकत बनाए रखने में सक्षम है। 28 फरवरी से शुरू हुए इस अभियान में अब तक 7,000 से ज्यादा लक्ष्यों पर हमला किया जा चुका है जिसमें बैलिस्टिक मिसाइल साइट एंटी शिप मिसाइल ठिकाने आईआरजीसी मुख्यालय एयर डिफेंस सिस्टम और सैन्य संचार से जुड़े सिस्टम शामिल हैं।

    इसके अलावा अब तक 100 से ज्यादा ईरानी जहाजों को नुकसान पहुंचाया गया या नष्ट कर दिया गया है जबकि अमेरिकी सेना ने 6,500 से अधिक लड़ाकू उड़ानें पूरी कर ली हैं। इस अभियान में अमेरिका ने हवा जमीन और समुद्र तीनों मोर्चों पर अपनी ताकत का इस्तेमाल किया है। बी 1 बी 2 और बी 52 जैसे बमवर्षक एफ 22 और एफ 35 जैसे आधुनिक फाइटर जेट निगरानी विमान और ड्रोन इस ऑपरेशन का हिस्सा रहे। समुद्र में परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विमानवाहक पोत पनडुब्बियां और मिसाइल से लैस युद्धपोत तैनात किए गए हैं।

    जमीन पर पैट्रियट और थाड जैसे मिसाइल रक्षा सिस्टम रॉकेट आर्टिलरी और ड्रोन निवारक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे साफ है कि ऑपरेशन कई स्तरों पर एक साथ चलाया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार विशेष रूप से एंटी शिप मिसाइल ठिकानों पर ध्यान दिया जा रहा है क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया में तेल आपूर्ति का एक बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। यदि यहां कोई बाधा आती है तो इसका असर वैश्विक व्यापार और तेल बाजार पर पड़ सकता है।

    ऑपरेशन एपिक फ्यूरी ने साफ कर दिया है कि अमेरिका ईरानी ठिकानों और उनके समुद्री खतरों को गंभीरता से ले रहा है। सेना के अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई न केवल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए है बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की रक्षा के लिए भी अहम है।

  • भारत ने बनाई घातक मिसाइलों से लैस तीसरी स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी, नौसेना के बेड़े में जल्द होगी शामिल

    भारत ने बनाई घातक मिसाइलों से लैस तीसरी स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी, नौसेना के बेड़े में जल्द होगी शामिल

    नई दिल्ली। भारत (India) अपनी समुद्री सैन्य शक्ति और परमाणु प्रतिरोधक क्षमता

    submarine

    को एक नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए तैयार है। देश की तीसरी स्वदेशी परमाणु-सक्षम पनडुब्बी (Indigenous Nuclear-Capable Submarine) (SSBN), INS अरिधमन (S4) इस साल अप्रैल-मई तक नौसेना (Navy) में शामिल होने की संभावना है।


    भारत की ‘सेकंड स्ट्राइक’ क्षमता में बड़ा इजाफा

    भारतीय नौसेना के प्रमुख एडमिरल डी.के. त्रिपाठी ने पिछले दिसंबर में संकेत दिया था कि INS अरिधमन को 2026 में कमीशन किया जाएगा। वर्तमान में यह पनडुब्बी अपने समुद्री परीक्षणों के अंतिम चरण में है।

    INS अरिधमन के शामिल होने के साथ ही भारत के पास पहली बार तीन परिचालन परमाणु पनडुब्बियां होंगी। यह भारत को ‘कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस’ की रणनीति हासिल करने के करीब ले जाएगा, जिसका अर्थ है कि साल के 365 दिन भारत की कम से कम एक परमाणु पनडुब्बी समुद्र में गश्त पर तैनात रहेगी।


    INS अरिधमन: क्यों है यह खास?

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल (ATV) प्रोजेक्ट के तहत विशाखापत्तनम में निर्मित यह पनडुब्बी अपने पूर्ववर्तियों (INS अरिहंत और INS अरिघात) की तुलना में अधिक घातक और एडवांस है।

    बड़ा आकार और क्षमता: अरिधमन का वजन 7,000 टन है, जबकि पिछली पनडुब्बियां 6,000 टन की थीं।

    हथियार प्रणाली: यह पनडुब्बी K-4 बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस होगी, जिसकी मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर है। इसके अलावा, यह 24 K-15 ‘सागरिका’ मिसाइलों (750 किमी रेंज) को भी ले जा सकती है।

    इंजन और तकनीक: इसमें 83 मेगावाट का प्रेशराइज्ड वॉटर रिएक्टर लगा है। दुश्मन की नजरों से बचने के लिए इसमें उन्नत ‘एनेकोइक टाइल्स’ लगाई गई हैं, जो शोर को कम करती हैं और इसे रडार की पकड़ से दूर रखती हैं।

    स्वदेशी सेंसर: बेहतर लक्ष्य पहचान के लिए इसमें भारत में विकसित ‘उषस’ (USHUS) और ‘पंचेंद्रिय’ सोनार सिस्टम लगाए गए हैं।


    क्षेत्रीय सुरक्षा जरूरी

    भारत की यह तैयारी ऐसे समय में हो रही है जब क्षेत्र में सैन्य संतुलन बदल रहा है।
    पाकिस्तान की तैयारी: पाकिस्तान चीन से $5 बिलियन के सौदे के तहत आठ उन्नत ‘हंगोर-क्लास’ पनडुब्बियां खरीद रहा है।
    रूस से मदद: भारत रूस से एक अकुला-क्लास परमाणु हमलावर पनडुब्बी (चक्र-III) को भी लीज पर लेने की प्रक्रिया में है, जो 2027-28 तक आने की उम्मीद है।
    जर्मनी के साथ डील: भारत और जर्मनी के बीच $8-10 बिलियन का प्रोजेक्ट-75(I) समझौता अंतिम चरण में है, जिसके तहत एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक वाली छह अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां बनाई जाएंगी।
    एक बार चालू होने के बाद, INS अरिधमन को विशाखापत्तनम के पास ‘प्रोजेक्ट वर्षा’ नामक एक उच्च-सुरक्षा वाले भूमिगत बेस पर तैनात किया जाएगा। यह विकास भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में मजबूती से खड़ा करता है जिनके पास समुद्र के नीचे से परमाणु हमले को विफल करने और उसका जवाब देने की अचूक क्षमता है।