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  • स्कूली शिक्षा में डिजिटल क्रांति का केंद्र बना ‘दीक्षा’ प्लेटफॉर्म, बहुभाषी और समावेशी लर्निंग सिस्टम को मिला राष्ट्रीय विस्तार

    स्कूली शिक्षा में डिजिटल क्रांति का केंद्र बना ‘दीक्षा’ प्लेटफॉर्म, बहुभाषी और समावेशी लर्निंग सिस्टम को मिला राष्ट्रीय विस्तार

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने कहा है कि स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल परिवर्तन को गति देने वाला ‘दीक्षा’ प्लेटफॉर्म अब देश में ‘वन नेशन, वन डिजिटल प्लेटफॉर्म’ के रूप में एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है। यह प्लेटफॉर्म शिक्षा को अधिक सुलभ, समावेशी और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में लगातार विस्तार कर रहा है।

    दीक्षा की शुरुआत वर्ष 2017 में की गई थी और इसे नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) के तहत सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशनल टेक्नोलॉजी (CIET) के सहयोग से संचालित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य देशभर के छात्रों और शिक्षकों को एकीकृत डिजिटल लर्निंग इकोसिस्टम उपलब्ध कराना है।

    सरकारी जानकारी के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म कक्षा 1 से 12 तक के लिए व्यापक डिजिटल लर्निंग सपोर्ट प्रदान करता है। इसमें प्रारंभिक साक्षरता और अंक ज्ञान से लेकर वरिष्ठ माध्यमिक स्तर तक की पढ़ाई शामिल है, जिससे विद्यार्थियों को एक समान और संरचित शैक्षिक अनुभव मिल सके।

    दीक्षा को लगभग सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा बोर्डों ने अपनाया है। यह प्लेटफॉर्म क्षेत्रीय भाषाओं, पाठ्यक्रम और शिक्षण आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलित किया जा सकता है, जिससे स्थानीय स्तर पर शिक्षा की पहुंच और प्रभावशीलता बढ़ती है।

    इस डिजिटल प्लेटफॉर्म में 2D और 3D एनिमेशन, ऑगमेंटेड रियलिटी अनुभव, सिमुलेशन, वर्चुअल लैब और साइन लैंग्वेज वीडियो जैसी आधुनिक सुविधाएं शामिल हैं। इन तकनीकों का उद्देश्य छात्रों के लिए सीखने की प्रक्रिया को अधिक रोचक और समझने योग्य बनाना है।

    सरकार ने बताया कि QR-कोड आधारित पाठ्यपुस्तकें NCERT की किताबों को वीडियो, इंटरैक्टिव सामग्री और शिक्षक गाइड से जोड़ती हैं। इससे कक्षा शिक्षण में डिजिटल सामग्री का सहज उपयोग संभव होता है और विषयों की बेहतर समझ विकसित होती है।

    दिव्यांग शिक्षार्थियों के लिए भी इस प्लेटफॉर्म पर विशेष सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसमें DAISY प्रारूप, टेक्स्ट-टू-स्पीच फीचर और भारतीय सांकेतिक भाषा वीडियो शामिल हैं, जिससे समावेशी शिक्षा को बढ़ावा मिलता है और हर वर्ग के विद्यार्थियों तक समान अवसर पहुंचते हैं।

    दीक्षा प्लेटफॉर्म व्यक्तिगत शिक्षण को भी समर्थन देता है। अभ्यास प्रश्नों, अनुकूली मूल्यांकन और योग्यता आधारित प्रश्न बैंक के माध्यम से विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता का आकलन किया जाता है और कमजोर क्षेत्रों की पहचान कर समय पर सुधार किया जाता है।

    इसके साथ ही यह प्लेटफॉर्म शिक्षक प्रशिक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। एनआईएसएचटीएचए जैसे कार्यक्रमों के जरिए शिक्षकों को स्व-गति आधारित प्रमाणित पाठ्यक्रम उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे उनकी व्यावसायिक क्षमता में निरंतर सुधार हो सके।

    सरकार के अनुसार, दीक्षा एक संघबद्ध और विकेंद्रीकृत मॉडल पर काम करता है, जिसमें राज्यों और संस्थानों को स्थानीय भाषाओं में सामग्री अपलोड करने की स्वतंत्रता मिलती है। हालांकि गुणवत्ता नियंत्रण सीआईईटी-एनसीईआरटी द्वारा समय-समय पर किया जाता है।

    यह प्लेटफॉर्म ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध है, जिससे इंटरनेट की सीमित पहुंच वाले क्षेत्रों में भी शिक्षा बाधित नहीं होती। स्मार्ट क्लासरूम और डाउनलोड सुविधा के माध्यम से छात्रों को निरंतर अध्ययन का अवसर मिलता है, जिससे डिजिटल शिक्षा का दायरा और अधिक व्यापक हो रहा है।

  • NCERT की नई कन्नड़ पाठ्यपुस्तक पर छिड़ा विवाद, ‘कृष्णा’ नाम और खान-पान को लेकर उठे सवालों पर बोर्ड ने दी विस्तृत सफाई

    NCERT की नई कन्नड़ पाठ्यपुस्तक पर छिड़ा विवाद, ‘कृष्णा’ नाम और खान-पान को लेकर उठे सवालों पर बोर्ड ने दी विस्तृत सफाई

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 6 की नई कन्नड़ पाठ्यपुस्तक को लेकर सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर छिड़े विवाद के बीच शिक्षा बोर्ड को आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा है। हाल के दिनों में कुछ पोस्ट और रिपोर्टों में यह दावा किया गया था कि नई पाठ्यपुस्तक में ‘कृष्णा’ नाम से जुड़े संदर्भों में बदलाव किया गया है और भारत की खान-पान संस्कृति का वर्णन करते समय मांसाहारी भोजन को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया है। इन दावों के वायरल होने के बाद NCERT ने पूरे मामले पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है।

    बोर्ड ने कहा है कि नई पुस्तकों को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित की जा रही कई जानकारियां अधूरी और भ्रामक हैं। परिषद के अनुसार पाठ्यपुस्तकों में किसी प्रकार के तथ्यात्मक बदलाव या सांस्कृतिक पक्षपात के आरोप निराधार हैं। शिक्षा बोर्ड का कहना है कि नई किताबों को निर्धारित शैक्षणिक प्रक्रियाओं, विशेषज्ञों की सलाह और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के दिशा-निर्देशों के आधार पर तैयार किया गया है।

    विवाद का सबसे चर्चित पहलू ‘कृष्णा’ नाम से जुड़ा रहा। सोशल मीडिया पर यह दावा किया गया कि नई कन्नड़ पुस्तक में ‘कृष्णा’ नाम को हटाया गया या उसमें बदलाव किया गया है। इस पर NCERT ने स्पष्ट किया कि जिस संदर्भ की चर्चा की जा रही है, वह भूगोल विषय से संबंधित है और उसमें भारत की प्रमुख नदियों का वर्णन किया गया है। बोर्ड के अनुसार पुस्तक में कृष्णा नदी का नाम यथावत मौजूद है और उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया है। परिषद ने कहा कि भौगोलिक तथ्यों को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया गया है।

    दूसरा विवाद भोजन संस्कृति से जुड़ा रहा। कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि पुस्तक में भारतीय खान-पान की विविधता को दर्शाते समय मांसाहारी भोजन के उल्लेख को शामिल नहीं किया गया। इस पर NCERT ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता को ध्यान में रखते हुए सामग्री तैयार की जाती है। पुस्तकों में विभिन्न क्षेत्रों की जीवनशैली, परंपराओं और खान-पान संबंधी विशेषताओं को संतुलित तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। बोर्ड का कहना है कि किसी विशेष भोजन पद्धति को जानबूझकर बाहर रखने का दावा वास्तविक तथ्यों से मेल नहीं खाता।

    NCERT ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप तैयार की जा रही नई पुस्तकों का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल रटने की शिक्षा देना नहीं, बल्कि व्यावहारिक समझ और अनुभव आधारित सीखने को बढ़ावा देना है। इसी दृष्टिकोण से पाठ्यसामग्री को सरल, स्थानीय और विद्यार्थियों के परिवेश से जोड़ने का प्रयास किया जाता है। कई बार क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद के दौरान उदाहरणों और संदर्भों को स्थानीय संदर्भों के अनुरूप प्रस्तुत किया जाता है, जिससे कुछ लोगों के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

    बोर्ड ने कहा कि यदि किसी पाठ्यपुस्तक में भाषाई, तकनीकी या अनुवाद संबंधी कोई त्रुटि सामने आती है, तो उसे विशेषज्ञ समितियों की समीक्षा के बाद सुधारा जाता है। ऐसे मामलों को किसी छिपे हुए एजेंडे या बड़े वैचारिक बदलाव के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है। शिक्षा से जुड़े विषयों पर तथ्यात्मक जानकारी के आधार पर ही चर्चा होनी चाहिए।

    NCERT ने अभिभावकों, शिक्षकों और विद्यार्थियों से अपील की है कि वे सोशल मीडिया पर प्रसारित अपुष्ट सूचनाओं पर भरोसा करने से पहले आधिकारिक स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करें। परिषद का कहना है कि सभी नई पाठ्यपुस्तकें और उनका डिजिटल संस्करण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं, जहां कोई भी व्यक्ति सामग्री की स्वयं जांच कर सकता है। बोर्ड ने दोहराया कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, तथ्यात्मकता और शैक्षणिक गुणवत्ता बनाए रखना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है।

  • CBSE की तीन-भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट की तत्काल रोक से इनकार, विस्तृत सुनवाई तक जारी रहेगा नया नियम, छात्रों और अभिभावकों की चिंताएं बरकरार

    CBSE की तीन-भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट की तत्काल रोक से इनकार, विस्तृत सुनवाई तक जारी रहेगा नया नियम, छात्रों और अभिभावकों की चिंताएं बरकरार

    नई दिल्ली । कक्षा 9 के विद्यार्थियों के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा लागू की गई नई तीन-भाषा नीति को लेकर जारी विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण में पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस नीति पर तत्काल रोक लगाने की मांग को स्वीकार करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया है कि इतने महत्वपूर्ण शैक्षणिक और नीतिगत विषय पर कोई भी अंतरिम आदेश विस्तृत सुनवाई के बाद ही पारित किया जा सकता है। अदालत के इस रुख से फिलहाल बोर्ड की नई व्यवस्था प्रभावी बनी रहेगी, जबकि नीति का विरोध कर रहे अभिभावकों और शिक्षकों की चिंताएं भी बरकरार हैं।

    मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अदालत से आग्रह किया था कि आगामी शैक्षणिक सत्र में इस नीति के क्रियान्वयन पर अस्थायी रोक लगाई जाए। उनका तर्क था कि नई व्यवस्था के तहत छात्रों को दो भारतीय भाषाओं सहित कुल तीन भाषाओं का अध्ययन करना होगा, जिसके लिए स्कूलों में अभी पर्याप्त तैयारी नहीं है। हालांकि अवकाशकालीन पीठ ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और कहा कि इस विषय से जुड़ी अन्य याचिकाएं पहले से लंबित हैं, जिनकी सुनवाई निर्धारित तिथि पर की जाएगी।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान याचिका को भी पहले से लंबित मामलों के साथ जोड़ा जाएगा ताकि सभी संबंधित पक्षों की दलीलें एक साथ सुनी जा सकें। न्यायालय का मानना है कि शिक्षा नीति से जुड़े ऐसे मामलों में जल्दबाजी में कोई फैसला देना उचित नहीं होगा और सभी तथ्यों तथा परिस्थितियों की गहन समीक्षा आवश्यक है।

    विवाद की जड़ हाल के महीनों में बोर्ड द्वारा जारी किए गए निर्देशों में हुए बदलाव को माना जा रहा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि पहले यह संकेत दिया गया था कि नई भाषा व्यवस्था को आगामी वर्षों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा, लेकिन बाद में अचानक समयसीमा बदलकर इसे जल्दी लागू करने का निर्णय लिया गया। इससे छात्रों, अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन के बीच असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।

    याचिका में यह भी कहा गया है कि कई विद्यालय अभी तक नई भाषा व्यवस्था के अनुरूप आवश्यक संसाधन विकसित नहीं कर पाए हैं। कई क्षेत्रों में प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता सीमित है, जबकि कुछ भाषाओं की पाठ्यपुस्तकें भी समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। ऐसे में विद्यार्थियों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव पड़ने की आशंका जताई गई है।

    अभिभावकों और शिक्षकों का एक वर्ग यह भी तर्क दे रहा है कि भाषा सीखना व्यक्तिगत रुचि, क्षेत्रीय आवश्यकता और शैक्षणिक सुविधा से जुड़ा विषय है। उनका मानना है कि पहले से निर्धारित पाठ्यक्रम के बीच नई भाषा को अनिवार्य रूप से शामिल करने से छात्रों को समायोजन संबंधी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। विशेष रूप से उन विद्यार्थियों के लिए चुनौती अधिक हो सकती है जो पहले से दो भाषाओं के साथ अन्य विषयों का संतुलन बना रहे हैं।

    दूसरी ओर, नई शिक्षा व्यवस्था के समर्थकों का मानना है कि बहुभाषी शिक्षा छात्रों के बौद्धिक विकास, सांस्कृतिक समझ और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में सहायक हो सकती है। उनका तर्क है कि भारतीय भाषाओं के अध्ययन को बढ़ावा देना शिक्षा के व्यापक उद्देश्यों के अनुरूप है और इससे विद्यार्थियों को विविध भाषाई परिवेश को समझने का अवसर मिलेगा।

    फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि नई तीन-भाषा नीति पर अंतिम निर्णय आने में अभी समय लगेगा। आगामी सुनवाई में अदालत बोर्ड, संबंधित शैक्षणिक संस्थाओं और याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर विस्तार से विचार करेगी। तब तक यह मुद्दा देश के शिक्षा क्षेत्र में चर्चा और बहस का प्रमुख विषय बना रहेगा।

  • मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' प्रतिमा के चित्रण पर छिड़ा विवाद, चौतरफा आलोचना के बाद अब मूल तस्वीर ही छापेगा NCERT

    मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' प्रतिमा के चित्रण पर छिड़ा विवाद, चौतरफा आलोचना के बाद अब मूल तस्वीर ही छापेगा NCERT

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की नौवीं कक्षा की नई पाठ्यपुस्तक में सिंधु घाटी सभ्यता की ऐतिहासिक कलाकृति ‘डांसिंग गर्ल’ (नृत्य करती युवती) के चित्रण को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल, परिषद द्वारा कला शिक्षा की नई पुस्तक ‘मधुरिमा’ के पहले अध्याय ‘कला का इतिहास’ में मोहनजोदड़ो से प्राप्त इस सुप्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा के वास्तविक रूप में बदलाव करते हुए उसके बिना कपड़ों वाले धड़ को छायांकन (शेडिंग) के जरिए ढका हुआ दिखाया गया था। ऐतिहासिक धरोहर के इस बदले हुए रूप की शिक्षाविदों, पुरातत्वविदों और इतिहासकारों ने तीखी आलोचना की थी। चौतरफा दबाव और विरोध के बीच अब एनसीईआरटी ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए पाठ्यपुस्तक में इस मूर्ति की मूल और वास्तविक तस्वीर को ही प्रकाशित करने का अंतिम फैसला लिया है।

    इस पूरे मामले पर एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश सकलानी ने एक साक्षात्कार के दौरान आधिकारिक पुष्टि की है। जब उनसे यह सवाल पूछा गया कि क्या परिषद कक्षा नौ की कला विषय की पुस्तक में संशोधित और विवादित तस्वीर को हटाकर मूल कांस्य प्रतिमा का चित्र शामिल करेगी, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘हां’ में जवाब दिया। उल्लेखनीय है कि इस नई पुस्तक में प्रतिमा के ऊपरी हिस्से के मूल स्वरूप को इस तरह बदला गया था कि शरीर के वे हिस्से साफ दिखाई नहीं दे रहे थे जो वास्तविक पुरातात्विक खोज में नजर आते हैं। इसके विपरीत, परिषद द्वारा ही तैयार की गई कक्षा छठी की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में इसी ‘डांसिंग गर्ल’ की तस्वीर को उसके मूल और वास्तविक ऐतिहासिक स्वरूप के बेहद करीब दिखाया गया है, जिसने इस विसंगति को और उजागर कर दिया।

    कक्षा छठी की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक समिति के पूर्व प्रमुख रहे माइकल डैनिनो ने इस बदलाव पर अपनी गहरी आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने खुलासा किया कि इससे पहले उन्हें यह तर्क दिया गया था कि इस प्राचीन प्रतिमा का नग्न स्वरूप छोटे बच्चों की ‘उम्र के अनुसार उपयुक्त नहीं’ है। डैनिनो के अनुसार, उनकी पूरी टीम इस तर्क से असहमत थी और जब उन्होंने कक्षा छठी के शिक्षकों से इस संबंध में बात की, तो उन सभी का कहना था कि क्लासरूम में इस ऐतिहासिक कलाकृति को लेकर कभी कोई समस्या या असहजता नहीं रही। डैनिनो ने तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि कलाकृति की नग्नता को अनुपयुक्त मानना वास्तव में विक्टोरियन युग की पुरानी और संकीर्ण औपनिवेशिक सोच का हिस्सा है, जबकि वर्तमान में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को इन्हीं औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करने की बातें की जा रही हैं।

    जानकारों का मानना है कि यदि भारतीय कला पर आधारित किसी गंभीर अध्याय में भी किसी ऐतिहासिक कलाकृति को उसके वास्तविक रूप और सही शारीरिक अनुपात में नहीं दिखाया जा सकता, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए एक गंभीर समस्या है। इतिहासकारों ने इस बदलाव की तुलना मध्य युग की उस घटना से की है जब चर्च ने अपनी संकीर्ण सोच के कारण ‘डेविड’ की विश्वप्रसिद्ध सुंदर प्रतिमा पर अंजीर का पत्ता जोड़कर उसे गलत रूप में प्रस्तुत किया था। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी ऐतिहासिक साक्ष्य या कलाकृति की तस्वीरों में इस तरह का मनमाना बदलाव करना एक तरह से ‘नकली कलाकृति’ बनाने जैसा है, जो यह साबित करता है कि जिम्मेदार संस्थाओं में इतिहास और पुरातत्व को प्रस्तुत करने की समझ बेहद कम है।

    ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, यह ‘डांसिंग गर्ल’ मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग २६०० ईसा पूर्व की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कांस्य प्रतिमा है। सिंधु घाटी सभ्यता की इस अद्भुत कलाकृति को ‘लॉस्ट-वैक्स तकनीक’ (मोम पिघलाकर धातु ढालने की विधि) से बनाया गया था, जो तकनीक आज भी भारत के पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से प्रचलित है। पुरातत्वविदों के अनुसार, कमर पर हाथ रखकर खड़े होने की यह विशिष्ट मुद्रा राजस्थान के हड़प्पा कालीन स्थल ‘भिरड़ाना’ से मिले मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों पर भी अंकित मिली है, जो यह दर्शाती है कि इस मुद्रा का प्राचीन काल में कोई गहरा सांस्कृतिक और कलात्मक महत्व था।

  • NCERT के विवादित चैप्टर पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे विशेषज्ञ, CJI सूर्यकांत के सामने रखा पक्ष

    NCERT के विवादित चैप्टर पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे विशेषज्ञ, CJI सूर्यकांत के सामने रखा पक्ष

    नई दिल्ली। एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका से जुड़े विवादित अध्याय पर घिरे तीन शिक्षाविदों ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। मामले की सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष हुई, जहां विशेषज्ञों ने कहा कि अध्याय का मसौदा किसी एक व्यक्ति ने नहीं, बल्कि सामूहिक प्रक्रिया से तैयार किया गया था।

    विशेषज्ञों ने क्या कहा

    याचिका में मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार की ओर से दलील दी गई कि उन्हें “अविश्वसनीय” बताना उचित नहीं है और उनकी पेशेवर विश्वसनीयता प्रभावित हुई है। उन्होंने अदालत से पूरी प्रक्रिया सामने रखने का मौका मांगा।

    आलोक प्रसन्न कुमार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि पिछली टिप्पणियों से शिक्षाविदों को नुकसान हुआ है और वे संदर्भ स्पष्ट करना चाहते हैं। वहीं सुपर्णा दिवाकर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जे साई दीपक ने कहा कि पाठ्य सामग्री तैयार करना सामूहिक निर्णय की प्रक्रिया थी।

    कोर्ट ने क्या कहा

    पीठ ने आवेदन रिकॉर्ड में लेने का निर्देश दिया और दो सप्ताह बाद सुनवाई तय की। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि संशोधित अध्याय की समीक्षा के लिए एक समिति बनाई गई है, जिसमें इंदु मल्होत्रा, के.के. वेणुगोपाल और प्रकाश सिंह शामिल हैं।

    समिति राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के सहयोग से काम करेगी, जिसकी अध्यक्षता अनिरुद्ध बोस कर रहे हैं।

    पहले दिया था संबंध तोड़ने का निर्देश

    इससे पहले 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को तीनों विशेषज्ञों से संबंध खत्म करने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा था कि विवादित सामग्री से न्यायपालिका की नकारात्मक छवि प्रस्तुत होती है।

    माफी भी दायर

    मामले में दिनेश प्रसाद सकलानी ने बिना शर्त माफी का हलफनामा दाखिल किया। इससे पहले अदालत ने विवादित अध्याय वाले प्रकाशन, पुनर्मुद्रण और डिजिटल प्रसार पर भी रोक लगा दी थी।
    अब इस मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी, जिसमें विशेषज्ञों की दलीलों पर विस्तार से विचार किया जाएगा।

  • NCERT की 8वीं क्लास की किताब में ज्यूडिशियरी करप्शन पर CJI सूर्यकांत भड़के, बोले न्यायपालिका को बदनाम

    NCERT की 8वीं क्लास की किताब में ज्यूडिशियरी करप्शन पर CJI सूर्यकांत भड़के, बोले न्यायपालिका को बदनाम


    नई दिल्ली । दिल्ली में नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग की 8वीं कक्षा की सोशल साइंस की किताब में पहली बार ज्यूडिशियरी करप्शन नामक चैप्टर शामिल किया गया है। इस चैप्टर में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार लंबित मुकदमों की बड़ी संख्या और जजों की पर्याप्त कमी जैसे मुद्दों को समझाया गया है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत ने इस कदम पर कड़ा विरोध जताया और इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की सोची-समझी कार्रवाई बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह की सामग्री देश में वकीलों और जजों के बीच चिंता का कारण बन रही है और वे न्यायपालिका की गरिमा को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होने देंगे।

    CJI सूर्यकांत ने यह प्रतिक्रिया बुधवार 25 फरवरी 2026 को तब दी जब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने मामले को उनके समक्ष उठाया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायपालिका की छवि को बदनाम करने की किसी भी कोशिश को मंजूरी नहीं दी जाएगी। न्यायपालिका में पारदर्शिता बनाए रखने और भ्रष्टाचार के मामलों को नियंत्रित करने के लिए पहले से ही ठोस तंत्र मौजूद हैं और इनकी जानकारी बच्चों तक पहुंचाना इस तरह के ढंग में सही नहीं है।

    NCERT की नई किताब में हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका शीर्षक वाले चैप्टर में अदालतों के पदानुक्रम न्याय तक पहुंच और न्यायिक प्रणाली की चुनौतियों के समाधान का उल्लेख किया गया है। इस चैप्टर में यह भी बताया गया है कि जज एक आचार संहिता Code of Conduct के तहत बंधे होते हैं जो न केवल अदालत के भीतर बल्कि बाहर भी उनके आचरण को नियंत्रित करती है। गंभीर मामलों में जज को हटाने के संवैधानिक नियम पार्लियामेंट के इंपीचमेंट मोशन और केंद्रीय एवं राज्य स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाने के उपायों का भी जिक्र है।

    किताब में CPGRAMS सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रिवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम के जरिए 2017 से 2021 के बीच लगभग 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त होने का आंकड़ा भी साझा किया गया है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट में 81,000 हाईकोर्ट्स में 62.40 लाख और जिला तथा अधीनस्थ न्यायालयों में 4.70 करोड़ लंबित मामले होने का विवरण भी दिया गया है।

    सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका के अलग-अलग स्तरों पर भ्रष्टाचार का सामना करने वाले मामले सही रूप में और संतुलित तरीके से प्रस्तुत किए जाने चाहिए। गरीब और वंचित वर्ग के लिए न्याय तक पहुंच का मुद्दा गंभीर है लेकिन इसे पाठ्यपुस्तक में इस तरह से दर्शाना न्यायपालिका की छवि को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी है और वे किसी भी कदम को रोकने या संशोधित करने में सक्रिय भूमिका निभाएंगे।

    इस विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बच्चों को शिक्षा में वास्तविकता और संवेदनशील विषयों को कैसे प्रस्तुत किया जाए ताकि उन्हें जानकारी मिल सके लेकिन संस्थाओं की छवि को बदनाम किए बिना। NCERT ने इस एडिशन में मुख्य रूप से सिस्टम की कमजोरियों और सुधार प्रयासों को उजागर किया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवेदनशील मानते हुए आगे कार्रवाई की संभावना जताई है।