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  • सायोनी घोष की संभावित नई भूमिका, नंदीग्राम और रेजीनगर में भाजपा के लिए प्रचार की चर्चा

    सायोनी घोष की संभावित नई भूमिका, नंदीग्राम और रेजीनगर में भाजपा के लिए प्रचार की चर्चा

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI ने दोनों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार करने का फैसला किया है। हालांकि, पार्टी ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि प्रचार अभियान में कौन-कौन से नेता शामिल होंगे। इसी वजह से सांसद सायोनी घोष की संभावित भूमिका को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।

    सायोनी घोष उन सांसदों में शामिल हैं, जिन्होंने तृणमूल कांग्रेस से अलग होने के बाद NCPI में विलय किया था। इससे पहले पश्चिम बंगाल की राजनीति में वह भाजपा की मुखर विरोधी रही हैं। अब NCPI के भाजपा समर्थित प्रचार अभियान के फैसले के बाद उनकी संभावित भूमिका को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, अभी तक पार्टी की ओर से सायोनी घोष के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

    NCPI ने दोनों विधानसभा सीटों पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है। पार्टी का कहना है कि इसी वजह से उसने भाजपा के समर्थन में प्रचार करने का निर्णय लिया है। पार्टी ने खुद को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में भाजपा के बाद सबसे बड़ा साझेदार भी बताया है। NCPI के अनुसार, उसके साथ कुल 20 सांसद हैं।

    पार्टी नेतृत्व ने पश्चिम बंगाल में लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक टकराव को कम करने और मिलकर काम करने की जरूरत पर जोर दिया है। NCPI की ओर से आने वाले समय में गठबंधन नेतृत्व के साथ एक बड़ी बैठक किए जाने की बात भी कही गई है। इसमें राज्य से जुड़े राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।

    हालांकि, भाजपा ने NCPI के इस समर्थन को औपचारिक चुनावी गठबंधन नहीं माना है। भाजपा की ओर से स्पष्ट किया गया है कि दोनों सीटों पर समर्थन में प्रचार करने का अर्थ भविष्य में सीटों के बंटवारे या किसी औपचारिक चुनावी समझौते से नहीं है। यानी फिलहाल NCPI का समर्थन प्रचार तक सीमित बताया गया है।

    उधर, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए नेताओं का एक गुट भी उपचुनाव को लेकर अपनी रणनीति तैयार कर रहा है। इस गुट ने नंदीग्राम सीट से मोहम्मद एतेशामुल हक को उम्मीदवार बनाया है। गुट की ओर से चुनाव को तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहे राजनीतिक मतभेदों से जोड़कर देखा जा रहा है।

    नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों पर 6 अक्टूबर को मतदान होना है, जबकि 9 अक्टूबर को मतगणना की जाएगी। नंदीग्राम सीट मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के विधानसभा सदस्य पद से इस्तीफा देने के बाद खाली हुई है। रेजीनगर सीट भी रिक्त होने के बाद उपचुनाव के लिए निर्धारित की गई है।

    उपचुनाव से पहले दोनों सीटों पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की गतिविधियां बढ़ गई हैं। NCPI के भाजपा समर्थन वाले फैसले ने इन चुनावों में एक नया राजनीतिक समीकरण जरूर सामने रखा है। वहीं, सायोनी घोष की भूमिका अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। यदि पार्टी उन्हें प्रचार अभियान में शामिल करती है, तो उनकी सार्वजनिक भूमिका में बदलाव को लेकर चर्चा और बढ़ सकती है।

    फिलहाल आधिकारिक तौर पर इतना ही स्पष्ट है कि NCPI नंदीग्राम और रेजीनगर में भाजपा उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार करेगी। सायोनी घोष समेत किन नेताओं को प्रचार अभियान में उतारा जाएगा, इसकी तस्वीर पार्टी की अंतिम घोषणा के बाद ही साफ होगी।

  • टीएमसी के 17 सांसद भाजपा में जा सकते हैं, यूसुफ पठान समेत तीन ने NDA को बाहर से समर्थन देने का किया ऐलान

    टीएमसी के 17 सांसद भाजपा में जा सकते हैं, यूसुफ पठान समेत तीन ने NDA को बाहर से समर्थन देने का किया ऐलान

    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए सांसदों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। टीएमसी छोड़कर नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI में शामिल हुए बागी सांसद जगदीश चंद्र बर्मा बसुनिया ने दावा किया है कि गुट के 17 सांसद भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो सकते हैं। उनके इस दावे के बाद यूसुफ पठान, सायोनी घोष समेत कई नेताओं को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि, बागी गुट के एक अन्य नेता ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि भाजपा में शामिल होने की कोई योजना नहीं है।

    बसुनिया के अनुसार, 17 सांसद भाजपा में जाने की तैयारी कर रहे हैं और इस संबंध में प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा चुका है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि दल बदल की प्रक्रिया दुर्गा पूजा के बाद हो सकती है। इससे पहले टीएमसी के 20 सांसद अलग होकर NCPI में शामिल हुए थे और उन्होंने NDA को समर्थन देने की घोषणा की थी।

    बागी गुट में शामिल अबू ताहेर खान ने बसुनिया के दावे पर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि बसुनिया को पूरे गुट की ओर से बयान देने का अधिकार नहीं है। खान ने स्पष्ट किया कि वे भाजपा में नहीं जाएंगे और न ही NDA में शामिल होंगे। उन्होंने जंगीपुर के सांसद खलीलुर रहमान और बहरामपुर के सांसद यूसुफ पठान का भी नाम लिया। उनके मुताबिक तीनों सांसद NDA को बाहर से समर्थन देंगे, लेकिन भाजपा या NDA का हिस्सा नहीं बनेंगे।

    अबू ताहेर खान ने यह भी स्पष्ट किया कि यूसुफ पठान, खलीलुर रहमान और उनके जैसे नेता भाजपा या NDA की बैठकों में शामिल नहीं होंगे। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की ओर से विकास से जुड़े मुद्दों पर बुलाई जाने वाली बैठकों में शामिल होने पर उन्होंने सहमति जताई है।

    सायोनी घोष को लेकर स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। बसुनिया ने 17 सांसदों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं। ऐसे में यह तय नहीं है कि घोष उन सांसदों में शामिल हैं या नहीं। कुल 20 सांसदों के टीएमसी से अलग होने की बात सामने आई है, जिनमें से तीन ने भाजपा में शामिल नहीं होने और NDA को बाहर से समर्थन देने की बात कही है। इसलिए बाकी सांसदों को लेकर अलग-अलग दावे और अटकलें जारी हैं।

    यह राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब पश्चिम बंगाल में कोलकाता नगर निगम और हावड़ा नगर निगम समेत स्थानीय चुनावों की तैयारियां चल रही हैं। भाजपा ने स्पष्ट किया है कि वह इन चुनावों में अपने दम पर मैदान में उतरेगी। पार्टी के सत्ता में आने के बाद राज्य में पहली बार होने वाले इन चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ी हुई हैं।

    भाजपा की ओर से भी फिलहाल बागी सांसदों को पार्टी में शामिल करने की किसी तत्काल योजना से इनकार किया गया है। पार्टी प्रवक्ता देबजीत सरकार ने कहा कि उनकी जानकारी के अनुसार टीएमसी या NCPI से कोई भी व्यक्ति भाजपा में शामिल नहीं हो रहा है। उन्होंने टीएमसी शासन के दौरान इन नेताओं और सांसदों की भूमिका पर भी सवाल उठाया।

    इसी बीच आगामी नंदीग्राम और रेजीनगर सीटों के उपचुनाव को लेकर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं। टीएमसी में सांसदों के अलावा विधायक स्तर पर भी टूट की चर्चा है। ऋताब्रत बनर्जी गुट के साथ 60 से अधिक विधायकों के होने का दावा किया जा रहा है। पार्टी ने नंदीग्राम से संचिता प्रधान डे और रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में सांसदों के संभावित दल बदल को लेकर चल रही अटकलों के बीच आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल की राजनीति में स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है।

  • एंटी पेपर लीक विधेयक पर चर्चा से पहले एनडीए बैठक में शामिल हुए नए सहयोगी सांसद, पीएम मोदी की मौजूदगी में हुई रणनीतिक चर्चा

    एंटी पेपर लीक विधेयक पर चर्चा से पहले एनडीए बैठक में शामिल हुए नए सहयोगी सांसद, पीएम मोदी की मौजूदगी में हुई रणनीतिक चर्चा

    नई दिल्ली । संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में एंटी पेपर लीक विधेयक पर चर्चा से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की साप्ताहिक ‘मंगल मिलन’ बैठक आयोजित की गई। संसद भवन परिसर स्थित लाइब्रेरी भवन में हुई इस बैठक की खास बात यह रही कि पहली बार एनसीपीआई के सांसद भी इसमें शामिल हुए। ये सांसद पहले तृणमूल कांग्रेस से जुड़े थे और बाद में अपनी नई राजनीतिक भूमिका के तहत एनडीए का समर्थन कर चुके हैं।

    बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी सहित कई वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री और एनडीए के सांसद मौजूद रहे। संसदीय रणनीति और आगामी विधायी कार्यों को लेकर हुई इस बैठक में गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच समन्वय बढ़ाने और संसद में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने पर चर्चा की गई।

    बैठक में शामिल होने के बाद एनसीपीआई सांसद सायोनी घोष ने इसे सकारात्मक और ज्ञानवर्धक अनुभव बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में हुई चर्चा से कई महत्वपूर्ण विषयों को समझने का अवसर मिला। उनके अनुसार बैठक में मुक्त व्यापार समझौतों सहित विभिन्न राष्ट्रीय मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया, जिससे सांसदों को व्यापक दृष्टिकोण प्राप्त हुआ।

    सायोनी घोष के साथ एनसीपीआई की अन्य सांसद काकोली घोष और शताब्दी रॉय भी पहली बार एनडीए संसदीय दल की बैठक में शामिल हुईं। तीनों सांसद पहले तृणमूल कांग्रेस का हिस्सा थीं। एनसीपीआई में शामिल होने के बाद उन्होंने एनडीए के प्रति अपना समर्थन दोहराया और गठबंधन की संसदीय गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की शुरुआत की।

    बैठक के दौरान सरकार ने सांसदों से ‘पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अमेंडमेंट बिल, 2026’ के समर्थन की भी अपील की। यह विधेयक सार्वजनिक परीक्षाओं में होने वाली गड़बड़ियों और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से लाया गया है। सरकार का कहना है कि इस कानून के जरिए परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, विश्वसनीयता और छात्रों के भविष्य की सुरक्षा को और मजबूत किया जाएगा।

    प्रस्तावित संशोधनों के तहत परीक्षा में अनियमितताओं के मामलों में कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। इसमें दोषी पाए जाने पर लंबी अवधि की सजा, भारी आर्थिक दंड, अवैध गतिविधियों से जुड़ी संपत्ति जब्त करने तथा मामलों के शीघ्र निपटारे की व्यवस्था जैसे प्रावधान शामिल हैं। सरकार का मानना है कि इन उपायों से संगठित परीक्षा अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा।

    यह बैठक ऐसे समय आयोजित हुई, जब संसद के भीतर एंटी पेपर लीक विधेयक पर चर्चा की तैयारी चल रही है और दूसरी ओर विपक्ष जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन तथा प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस बल प्रयोग के मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है। ऐसे राजनीतिक माहौल में एनडीए की यह बैठक संसदीय समन्वय और रणनीतिक तैयारी के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    ‘मंगल मिलन’ बैठक एनडीए संसदीय दल की नियमित रणनीतिक बैठक का नया स्वरूप है। इसका उद्देश्य सहयोगी दलों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना, संसद में विभिन्न विषयों पर प्रभावी चर्चा सुनिश्चित करना और फ्लोर मैनेजमेंट को मजबूत बनाना है। साथ ही यह मंच गठबंधन के सभी घटक दलों को अपनी भूमिका स्पष्ट करने, जिम्मेदारियों का समन्वय करने और संसद के भीतर साझा रणनीति के साथ आगे बढ़ने का अवसर भी प्रदान करता है।

  • TMC सांसदों का NCPI में विलय: राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक या कानूनी जोखिम?

    TMC सांसदों का NCPI में विलय: राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक या कानूनी जोखिम?


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सियासत में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली All India Trinamool Congress को बड़ा झटका देते हुए उसके 20 बागी सांसदों ने खुद को Nationalist Citizens Party of India में विलय करने का दावा किया है। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपने और संसद में अलग बैठने की मांग के साथ इस घटनाक्रम ने राष्ट्रीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। हालांकि राजनीतिक तौर पर यह कदम बागी सांसदों के लिए सुरक्षित दिखाई देता है, लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञ इसे इतना आसान नहीं मान रहे हैं।

    दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी सांसद या विधायक को अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल होने पर सदस्यता गंवानी पड़ सकती है। इसी खतरे से बचने के लिए बागी सांसदों ने ‘विलय’ का रास्ता चुना है। उनके पास कुल 28 में से 20 सांसदों का समर्थन है, जो दो-तिहाई की कानूनी शर्त पूरी करता है। लेकिन असली विवाद यहीं से शुरू होता है।

    क्या केवल सांसदों का समूह किसी दूसरी पार्टी में विलय कर सकता है?
    संविधान विशेषज्ञों और संसद के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य का कहना है कि दल-बदल कानून के तहत केवल सांसदों या विधायकों का समूह किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाए, तो उसे विलय नहीं माना जा सकता। कानून के अनुसार मूल राजनीतिक दल का भी दूसरी पार्टी में विलय होना जरूरी है। उनका तर्क है कि दसवीं अनुसूची के पैरा-4 में स्पष्ट रूप से राजनीतिक दल के विलय की बात कही गई है, न कि केवल संसदीय दल के। ऐसे में सांसदों का यह कदम कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले क्यों बन सकते हैं परेशानी?
    इस पूरे मामले में कई महत्वपूर्ण न्यायिक फैसलों का उल्लेख किया जा रहा है। वर्ष 2023 में हुए Shiv Sena Political Crisis से जुड़े फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ‘मूल राजनीतिक दल’ और ‘विधायक या सांसद दल’ अलग-अलग इकाइयाँ हैं। अदालत ने कहा था कि किसी पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधि खुद को संगठन का मालिक नहीं मान सकते। पार्टी के आधिकारिक फैसलों का अधिकार मूल संगठन और उसके नेतृत्व के पास ही रहता है। यही सिद्धांत अब TMC के पक्ष को मजबूत करता दिखाई दे रहा है।

    ममता खेमे की कानूनी तैयारी शुरू
    TMC नेतृत्व ने बागी सांसदों के कदम को चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी की ओर से लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर किसी अलग गुट को मान्यता नहीं देने की मांग की गई है। साथ ही, पश्चिम बंगाल में बागी विधायकों को मिली मान्यता के खिलाफ अदालत का दरवाजा भी खटखटाया गया है। पार्टी का कहना है कि संगठन स्तर पर किसी प्रकार का विलय नहीं हुआ है, इसलिए सांसदों का दावा संवैधानिक रूप से टिकाऊ नहीं है।

    NCPI को अचानक मिला राष्ट्रीय महत्व
    त्रिपुरा में पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त Nationalist Citizens Party of India अब अचानक राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गई है। 2023 में गठित यह छोटी पार्टी अब बागी सांसदों के कारण संसद में उल्लेखनीय उपस्थिति का दावा कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम कानूनी सुरक्षा हासिल करने की रणनीति हो सकती है, लेकिन अंतिम फैसला अदालतों और लोकसभा अध्यक्ष की व्याख्या पर निर्भर करेगा।

    आगे क्या होगा?
    अब सबकी निगाहें लोकसभा अध्यक्ष और न्यायपालिका पर टिकी हैं। यदि बागी सांसदों का ‘विलय’ कानूनी रूप से मान्य माना जाता है तो यह दल-बदल कानून की नई व्याख्या का रास्ता खोल सकता है। लेकिन यदि अदालतों ने इसे केवल ‘दल-बदल’ माना, तो सांसदों की सदस्यता पर संकट गहरा सकता है। फिलहाल यह मामला भारतीय राजनीति में दल-बदल कानून की प्रभावशीलता, उसकी खामियों और भविष्य में संभावित संशोधनों को लेकर नई बहस छेड़ चुका है।