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  • संसद में दो-तिहाई बहुमत की तैयारी! डीएमके को NDA में लाने की रणनीति पर तेज हुई हलचल

    संसद में दो-तिहाई बहुमत की तैयारी! डीएमके को NDA में लाने की रणनीति पर तेज हुई हलचल


    नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजनीति में हाल ही में हुए बड़े बदलाव का असर अब राष्ट्रीय राजनीति पर भी साफ दिखाई देने लगा है। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद जहां राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले हैं, वहीं केंद्र की राजनीति में भी नए गठबंधन और रणनीतियों की चर्चा तेज हो गई है। इसी बीच भारतीय जनता पार्टी की नजर अब द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) पर टिक गई है, जिसे संसद में दो-तिहाई बहुमत के लक्ष्य से जोड़कर देखा जा रहा है।

    तमिलनाडु में नई सरकार बनने के बाद कांग्रेस और डीएमके के बीच वर्षों पुराना राजनीतिक रिश्ता कमजोर पड़ता नजर आया। बदले राजनीतिक माहौल में कांग्रेस ने नई सत्ता के साथ जाने का फैसला किया, जिससे डीएमके को बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। इसके बाद डीएमके ने विपक्षी गठबंधन से दूरी बनानी शुरू कर दी, जिसने राष्ट्रीय राजनीति में नई अटकलों को जन्म दे दिया।

    राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, बीजेपी अब डीएमके को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के करीब लाने की संभावनाओं पर काम कर रही है। हालांकि औपचारिक गठबंधन को लेकर अभी कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं, लेकिन संसद में मुद्दों के आधार पर समर्थन हासिल करने की रणनीति पर चर्चा तेज बताई जा रही है। माना जा रहा है कि बीजेपी का मुख्य फोकस डीएमके के लोकसभा और राज्यसभा सांसदों के समर्थन पर है, जिससे बड़े संवैधानिक विधेयकों को पारित कराने में मदद मिल सकती है।

    संसद में कई महत्वपूर्ण विधेयकों और संवैधानिक संशोधनों के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। ऐसे में केंद्र सरकार की कोशिश है कि भविष्य में “वन नेशन-वन इलेक्शन”, परिसीमन और न्यायिक सुधार जैसे बड़े प्रस्तावों को बिना किसी बड़ी बाधा के पारित कराया जा सके। इसी वजह से राजनीतिक रणनीतिकार उन दलों के समर्थन की संभावनाएं तलाश रहे हैं, जो औपचारिक रूप से गठबंधन का हिस्सा न होते हुए भी मुद्दों के आधार पर सहयोग दे सकते हैं।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि डीएमके और बीजेपी की विचारधाराएं कई मुद्दों पर अलग रही हैं, खासकर सनातन धर्म और सांस्कृतिक राजनीति को लेकर। इसके बावजूद वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां दोनों पक्षों को व्यावहारिक राजनीति की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। यह भी याद दिलाया जा रहा है कि अतीत में डीएमके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा रह चुकी है, इसलिए भविष्य में किसी प्रकार के सहयोग की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

    बीजेपी की रणनीति केवल प्रत्यक्ष गठबंधन तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि पर्दे के पीछे समर्थन जुटाने पर भी जोर दिया जा रहा है। माना जा रहा है कि यदि डीएमके के सांसद संसद में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार का समर्थन करते हैं, तो केंद्र सरकार को अपने बड़े राजनीतिक और संवैधानिक एजेंडे को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण ताकत मिल सकती है।

    तमिलनाडु की राजनीति में आए इस बदलाव ने राष्ट्रीय स्तर पर नए समीकरणों की संभावनाओं को जन्म दिया है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह केवल राजनीतिक चर्चा बनकर रह जाती है या फिर भारतीय राजनीति में एक नया गठबंधन अध्याय शुरू होता है।

  • NCP महाराष्ट्र में BJP-नेतृत्व वाले NDA के साथ बनी रहेगी, विलय की अटकलों को सुनील तटकरे ने किया खारिज

    NCP महाराष्ट्र में BJP-नेतृत्व वाले NDA के साथ बनी रहेगी, विलय की अटकलों को सुनील तटकरे ने किया खारिज


    नई दिल्ली। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी NCP की महाराष्ट्र इकाई के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद सुनील तटकरे ने स्पष्ट किया है कि उनकी पार्टी भाजपा नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन NDA का हिस्सा बनी रहेगी। उन्होंने कहा कि संगठन दिवंगत अजित पवार की विचारधारा और मार्ग पर आगे बढ़ेगा।

    विलय की अफवाहों पर प्रतिक्रिया

    हाल ही में यह दावा किया गया था कि NCP और शरद पवार की राकांपा का विलय 12 फरवरी को घोषित किया जाएगा। इस पर तटकरे ने कहा, “हमारा रुख स्पष्ट है। पार्टी और अजित दादा की विचारधारा को हम आगे बढ़ाएंगे। राजग के साथ हमारा सहयोग कायम रहेगा।” उन्होंने जोर देकर कहा कि अजित पवार की सहमति के बिना कोई राजनीतिक निर्णय नहीं लिया गया।

    शपथ और पार्टी संबंध
    तटकरे ने सुनेत्रा पवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने की जल्दबाजी पर कहा कि यह निर्णय महाराष्ट्र के हित में और राकांपा को मजबूत करने के लिए लिया गया। उन्होंने भाजपा की प्रशंसा करते हुए कहा कि गठबंधन में हमेशा सम्मानजनक व्यवहार रहा है।

    अस्थियों का अंतिम संस्कार और आगे की प्रक्रिया
    सुनील तटकरे ने बताया कि अजित पवार की अस्थियों को राज्य के सभी जिलों में ले जाकर श्रद्धांजलि दी जाएगी। वहीं, राकांपा के वरिष्ठ नेता माणिकराव कोकाटे ने कहा कि विलय या आगे की राजनीतिक दिशा का फैसला सुनेत्रा पवार करेंगी और उनका निर्णय पार्टी में सभी के लिए बाध्यकारी होगा।

  • UP Politics: शिवसेना की एंट्री से सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल की मुश्किलें बढ़ीं, 2027 विधानसभा चुनाव में NDA में नया समीकरण

    UP Politics: शिवसेना की एंट्री से सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल की मुश्किलें बढ़ीं, 2027 विधानसभा चुनाव में NDA में नया समीकरण


    नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ अब गर्म होती दिख रही हैं। एनडीए के घटक दलों में से शिवसेना (शिंदे गुट) ने राज्य में सक्रिय भूमिका निभाने का ऐलान कर दिया है, जिससे सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल (एस) की रणनीति पर असर पड़ने की संभावना बढ़ गई है। शिवसेना ने साफ किया कि वह बीजेपी के साथ गठबंधन में विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेगी और कुछ सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी।

    शिवसेना के मुख्य राष्ट्रीय समन्वयक अभिषेक वर्मा ने कहा कि पार्टी अब यूपी में मजबूत स्थिति में है और इसे और बेहतर किया जाएगा। वर्मा ने स्पष्ट किया कि शिवसेना केवल विधानसभा चुनाव में ही नहीं, बल्कि जिला पंचायत, नगर पंचायत और निकाय चुनावों में भी सक्रिय होगी।

    उन्होंने कहा, “हम बीजेपी को बड़ा मानकर चुनाव लड़ेंगे, और कुछ सीटों पर हमारे उम्मीदवार उतारने की अनुमति भी मिल चुकी है।”

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवसेना की एंट्री यूपी के राजनीतिक परिदृश्य में नई हलचल पैदा करेगी। सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि वे पंचायत चुनाव अकेले लड़ेंगे और विधानसभा चुनाव के लिए रणनीति तैयार कर रहे हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि किस दल की रणनीति प्रभावित होती है और किस सीट पर खेल बदल सकता है।

    उत्तर भारतीयों के साथ महाराष्ट्र में कथित भेदभाव और मारपीट के सवाल पर वर्मा ने स्पष्ट किया कि शिवसेना गुंडागर्दी नहीं करती।

    उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएं महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और उद्धव ठाकरे के शिवसेना गुट से जुड़ी हैं। वर्मा ने आगे कहा, “अगर उत्तर भारतीयों से इतनी ही दिक्कत है, तो इसे बॉलीवुड या अन्य सार्वजनिक मंचों पर भी उजागर किया जा सकता है।”

    शिवसेना की सक्रियता से उत्तर प्रदेश में हिंदू वोट बैंक में हलचल और एनडीए के गठबंधन में सीटों के बंटवारे को लेकर नई रणनीति बन सकती है। बीजेपी के लिए यह चुनौती और अवसर दोनों है, क्योंकि गठबंधन में सीटों का बंटवारा और उम्मीदवार चयन अब और अधिक संवेदनशील मुद्दा बन गया है।

    पार्टी पदाधिकारी ने कहा कि यूपी में संगठन को मजबूत किया जाएगा, स्थानीय नेताओं और युवा कार्यकर्ताओं को जोड़कर पार्टी का नेटवर्क हर जिले में फैलाया जाएगा। यह कदम शिवसेना को सुभासपा, निषाद पार्टी और अपना दल के मुकाबले चुनावी मैदान में मजबूती देने के साथ ही बीजेपी के लिए भी नए समीकरण तैयार करेगा।

    विशेषज्ञों का कहना है कि 2027 विधानसभा चुनाव में शिवसेना की भागीदारी राज्य में राजनीतिक समीकरण बदल सकती है। अब यह देखना रोचक होगा कि कौन सा दल इस नए मोड़ का फायदा उठाता है और किसकी रणनीति प्रभावित होती है। राजनीतिक हलचल और गठबंधन की राजनीति यूपी के मतदाताओं के लिए भी बेहद दिलचस्प और निर्णायक साबित हो सकती है।