Tag: NewDelhi

  • ई-25 पेट्रोल पर अटकलों पर केंद्र का विराम, सरकार ने कहा- फिलहाल ई-20 से आगे बढ़ाने का कोई फैसला नहीं; वैज्ञानिक परीक्षण के बाद ही होगा अगला कदम

    ई-25 पेट्रोल पर अटकलों पर केंद्र का विराम, सरकार ने कहा- फिलहाल ई-20 से आगे बढ़ाने का कोई फैसला नहीं; वैज्ञानिक परीक्षण के बाद ही होगा अगला कदम

    नई दिल्ली । देश में एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच केंद्र सरकार ने ई-25 पेट्रोल को जल्द लागू किए जाने संबंधी खबरों का खंडन किया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल ई-20 से अधिक एथेनॉल मिश्रण लागू करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है। अधिकारियों के अनुसार भविष्य में यदि इस दिशा में कोई कदम उठाया जाता है तो वह केवल व्यापक वैज्ञानिक परीक्षण, तकनीकी मूल्यांकन और सुरक्षा मानकों की पुष्टि के बाद ही किया जाएगा।

    सरकार का यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब सोशल मीडिया और विभिन्न मंचों पर अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन को लेकर कई तरह की आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं। इनमें वाहनों के प्रदर्शन, इंजन की कार्यक्षमता और माइलेज पर संभावित प्रभाव को लेकर कई दावे सामने आए थे। सरकार ने कहा कि वर्तमान में उपयोग किया जा रहा ई-20 पेट्रोल लंबे समय तक परीक्षण और मूल्यांकन के बाद ही चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया है, इसलिए उपभोक्ताओं को किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

    सरकारी जानकारी के अनुसार देश में करोड़ों दोपहिया और लाखों पेट्रोल आधारित चारपहिया वाहन पहले से एथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग कर रहे हैं। एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को धीरे-धीरे लागू किया गया ताकि वाहन निर्माता कंपनियां, ईंधन आपूर्ति व्यवस्था और उपभोक्ता सभी इसके अनुरूप स्वयं को तैयार कर सकें। सरकार का कहना है कि यह कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय अनुभवों और वैज्ञानिक मानकों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाया गया है।

    हाल ही में सरकार ने एथेनॉल मिश्रण से जुड़े कई प्रमुख बिंदुओं पर विस्तृत स्पष्टीकरण भी जारी किया था। इसमें कहा गया कि ई-20 पेट्रोल किसी प्रयोगात्मक ईंधन की श्रेणी में नहीं आता, बल्कि इसके पीछे व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन, सुरक्षा परीक्षण और नियामकीय मानकों का पालन किया गया है। सरकार के अनुसार दुनिया के अनेक देशों में दशकों से एथेनॉल मिश्रित ईंधन का सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है और भारत ने भी उसी अनुभव के आधार पर अपनी नीति तैयार की है।

    सरकार ने एथेनॉल उत्पादन में अत्यधिक पानी की खपत संबंधी दावों को भी भ्रामक बताया है। अधिकारियों के अनुसार आधुनिक एथेनॉल डिस्टिलरी में एक लीटर एथेनॉल तैयार करने के लिए सीमित मात्रा में प्रोसेस्ड पानी की आवश्यकता होती है तथा अधिकांश इकाइयों में जीरो लिक्विड डिस्चार्ज जैसी आधुनिक तकनीक अपनाई जा रही है। इससे पानी का पुनर्चक्रण संभव हो रहा है और जल संसाधनों पर दबाव कम पड़ता है।

    सरकार का यह भी कहना है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए अब केवल अतिरिक्त खाद्यान्न पर निर्भरता नहीं है। मक्का आधारित एथेनॉल उत्पादन में लगातार वृद्धि हुई है और वर्तमान आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी स्रोत से आ रहा है। मक्का की खेती में अपेक्षाकृत कम सिंचाई की आवश्यकता होती है, जिससे जल संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है। किसानों को इस दिशा में प्रोत्साहित करने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सहित अन्य नीतिगत कदम भी उठाए गए हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का उद्देश्य केवल पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना ही नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, किसानों की आय बढ़ाना और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना भी है। सरकार ने दोहराया है कि ईंधन नीति से जुड़ा हर अगला निर्णय वैज्ञानिक प्रमाण, तकनीकी परीक्षण और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए ही लिया जाएगा। फिलहाल देश में ई-20 कार्यक्रम निर्धारित नीति के अनुसार जारी रहेगा और ई-25 को लेकर कोई तत्काल योजना नहीं है।

  • रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस बैंक धोखाधड़ी मामले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, पहली चार्जशीट दाखिल; दो कंपनियों समेत सात आरोपी नामजद

    रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस बैंक धोखाधड़ी मामले में सीबीआई की बड़ी कार्रवाई, पहली चार्जशीट दाखिल; दो कंपनियों समेत सात आरोपी नामजद

    नई दिल्ली । रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड से जुड़े कथित बैंक धोखाधड़ी मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने जांच को आगे बढ़ाते हुए पहली चार्जशीट विशेष अदालत में दाखिल कर दी है। इस आरोपपत्र में दो रिलायंस समूह की कंपनियों सहित कुल सात आरोपियों को नामजद किया गया है। जांच एजेंसी का आरोप है कि इस मामले में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को हजारों करोड़ रुपये का वित्तीय नुकसान हुआ, जबकि संबंधित कंपनियों और कुछ अधिकारियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। मामले की जांच अभी भी जारी है और आगे पूरक आरोपपत्र दाखिल किए जाने की संभावना जताई गई है।

    जांच एजेंसी के अनुसार आरोपपत्र में रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड तथा रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड के पांच पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों के नाम शामिल किए गए हैं। इनमें तत्कालीन निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, निदेशक तथा जोखिम प्रबंधन से जुड़े वरिष्ठ पदों पर कार्यरत अधिकारी शामिल हैं। सीबीआई ने सभी आरोपियों पर आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को वित्तीय नुकसान पहुंचाने से संबंधित आरोप लगाए हैं।

    जांच में यह आरोप सामने आया है कि बैंकों से प्राप्त ऋण राशि का उपयोग निर्धारित शर्तों के अनुरूप नहीं किया गया। एजेंसी का दावा है कि ऋण की राशि को विभिन्न मध्यस्थ और शेल कंपनियों के माध्यम से समूह की अन्य कंपनियों में स्थानांतरित किया गया। जांच के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया के कारण ऋण देने वाले सरकारी बैंकों को भारी वित्तीय क्षति हुई और संबंधित पक्षों को अनुचित आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ।

    यह मामला बैंक ऑफ महाराष्ट्र सहित सार्वजनिक क्षेत्र के कई बैंकों की शिकायतों के आधार पर दर्ज किया गया था। जांच एजेंसी के अनुसार बैंकिंग कंसोर्टियम से जुड़े 13 सरकारी बैंकों को कुल 4,097 करोड़ रुपये का कथित नुकसान हुआ है। इसी आधार पर विस्तृत जांच शुरू की गई, जिसके बाद पहली चार्जशीट अदालत में प्रस्तुत की गई है।

    सीबीआई ने स्पष्ट किया है कि जांच केवल वर्तमान आरोपियों तक सीमित नहीं है। एजेंसी अन्य निदेशकों, कंपनियों तथा संभावित रूप से जुड़े सार्वजनिक अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त आरोपियों के खिलाफ पूरक चार्जशीट दाखिल की जाएगी। एजेंसी का कहना है कि पूरे मामले की हर कड़ी की गहन जांच की जा रही है।

    इस मामले में अब तक तीन लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें रिलायंस कैपिटल लिमिटेड के पूर्व उपाध्यक्ष अमिताभ झुनझुनवाला, रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड के पूर्व मुख्य कार्यकारी अधिकारी देवांग मोदी तथा रिलायंस कैपिटल के पूर्व मुख्य वित्त अधिकारी अमित बापना शामिल हैं। वर्तमान में दो आरोपी न्यायिक हिरासत में हैं, जबकि एक आरोपी जांच एजेंसी की हिरासत में है।

    सीबीआई के अनुसार रिलायंस समूह की विभिन्न कंपनियों से जुड़े मामलों में अब तक कई प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें रिलायंस कम्युनिकेशंस, रिलायंस होम फाइनेंस, रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस और रिलायंस टेलीकॉम से संबंधित मामले शामिल हैं। इन मामलों में विभिन्न सरकारी बैंकों और भारतीय जीवन बीमा निगम की शिकायतों के आधार पर जांच आगे बढ़ाई जा रही है।

    जांच एजेंसी ने यह भी बताया कि इससे पहले रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुड़े मामले में भी आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है। मौजूदा कार्रवाई उसी श्रृंखला का अगला महत्वपूर्ण चरण मानी जा रही है। एजेंसी का कहना है कि सभी मामलों की निष्पक्ष, व्यापक और समयबद्ध जांच जारी है तथा आगे मिलने वाले साक्ष्यों के आधार पर आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

  • चुनावी प्रक्रिया पर विपक्ष का बड़ा हमला, 23 दलों ने CJI सूर्यकांत को लिखा पत्र, निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग

    चुनावी प्रक्रिया पर विपक्ष का बड़ा हमला, 23 दलों ने CJI सूर्यकांत को लिखा पत्र, निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग

    नई दिल्ली । देश की चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इंडिया गठबंधन से जुड़े 23 राजनीतिक दलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को संयुक्त पत्र भेजकर चुनावी व्यवस्था से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चिंता व्यक्त की है। विपक्षी दलों ने पत्र में न्यायपालिका से हस्तक्षेप की अपील करते हुए कहा है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की मूल आधारशिला हैं और इनकी विश्वसनीयता बनाए रखना सभी संवैधानिक संस्थाओं की साझा जिम्मेदारी है।

    संयुक्त पत्र में विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि वर्तमान परिस्थितियों में चुनावी प्रक्रिया को लेकर व्यापक स्तर पर संदेह और अविश्वास का वातावरण बन रहा है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है कि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और सभी राजनीतिक दलों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने वाले हों। इसी उद्देश्य से उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय से संवैधानिक दायरे में आवश्यक हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है।

    पत्र में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर भी कई सवाल उठाए गए हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान आयोग का रवैया पूरी तरह निष्पक्ष दिखाई नहीं देता। उनका कहना है कि आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े मामलों में समान मानकों का पालन नहीं किया गया और कई अवसरों पर सत्ताधारी दल के नेताओं के खिलाफ अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि कई मामलों में विपक्षी दलों के प्रति आयोग का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत कठोर रहा।

    पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। विपक्षी दलों का कहना है कि जब किसी भी संवैधानिक व्यवस्था पर सवाल उठते हैं तो न्यायपालिका नागरिकों और राजनीतिक दलों के लिए अंतिम संवैधानिक मंच के रूप में सामने आती है। इसलिए उन्होंने न्यायपालिका से चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया है।

    इससे पहले भी चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कुछ मुद्दों को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग सामने आ चुकी है। हाल के दिनों में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया तथा अन्य चुनाव संबंधी विषयों को लेकर भी सर्वोच्च न्यायालय का ध्यान आकर्षित करने के प्रयास किए गए थे। अब विपक्षी दलों के संयुक्त पत्र ने इस पूरे मुद्दे को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है।

    विपक्षी दलों का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी संवैधानिक संस्था की गरिमा को चुनौती देना नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का विश्वास बनाए रखना है। पत्र में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि मजबूत लोकतंत्र के लिए सभी संवैधानिक संस्थाओं का स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह तरीके से कार्य करना आवश्यक है। उनका मानना है कि चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता लोकतंत्र की स्थिरता और जनविश्वास से सीधे जुड़ी हुई है।

    फिलहाल इस संयुक्त पत्र पर सर्वोच्च न्यायालय की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की ओर से भी इस पत्र में लगाए गए आरोपों पर कोई आधिकारिक टिप्पणी जारी नहीं की गई है। ऐसे में आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर न्यायिक और राजनीतिक स्तर पर होने वाली गतिविधियों पर सभी की नजर बनी रहेगी।

  • चुनावी प्रक्रिया पर विपक्ष का बड़ा हमला, 23 दलों ने मुख्य न्यायाधीश को लिखा संयुक्त पत्र, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और एसआईआर प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    चुनावी प्रक्रिया पर विपक्ष का बड़ा हमला, 23 दलों ने मुख्य न्यायाधीश को लिखा संयुक्त पत्र, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और एसआईआर प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल

    नई दिल्ली । देश में चुनावी प्रक्रिया और निर्वाचन व्यवस्था को लेकर विपक्षी दलों ने एक बार फिर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्षी गठबंधन से जुड़े 23 राजनीतिक दलों और एक निर्दलीय सांसद ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को संयुक्त पत्र लिखकर विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया, चुनाव आयोग की निष्पक्षता तथा चुनावी व्यवस्था से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की है। अब इस पत्र को सार्वजनिक किए जाने के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।

    संयुक्त पत्र में विपक्षी दलों ने दावा किया है कि देश की चुनावी प्रक्रिया के संबंध में कई गंभीर चिंताएं सामने आ रही हैं। पत्र में कहा गया है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव अनिवार्य हैं तथा इस व्यवस्था की रक्षा करना न्यायपालिका का महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व है। विपक्ष का कहना है कि जब लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तब न्यायपालिका से अपेक्षा की जाती है कि वह संविधान की भावना के अनुरूप आवश्यक हस्तक्षेप करे।

    पत्र में चुनाव आयोग की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए गए हैं। विपक्षी दलों का आरोप है कि आयोग की निष्पक्षता को लेकर जनता के बीच संदेह की स्थिति उत्पन्न हुई है। उन्होंने दावा किया कि चुनावी प्रक्रियाओं के दौरान आयोग का रवैया कई अवसरों पर पक्षपातपूर्ण प्रतीत हुआ है। विपक्ष का यह भी कहना है कि आदर्श आचार संहिता के कथित उल्लंघनों पर समान रूप से कार्रवाई नहीं होने के कारण चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होने की आशंका पैदा हुई है।

    विपक्षी दलों ने अपने पत्र में यह भी आरोप लगाया कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक संस्थागत तंत्र अपेक्षित स्तर पर प्रभावी दिखाई नहीं दे रहा है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में सभी संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास बना रहना आवश्यक है और यदि किसी संस्था की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं तो उसका समाधान संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना चाहिए।

    पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि विपक्ष न्यायपालिका की भूमिका और स्वतंत्रता का सम्मान करता है तथा उसका उद्देश्य किसी संस्था की गरिमा पर प्रश्न उठाना नहीं है। इसके विपरीत, विपक्ष का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब विभिन्न स्तरों पर मतभेद या विवाद उत्पन्न होते हैं, तब न्यायपालिका अंतिम संवैधानिक मंच के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी आधार पर मुख्य न्यायाधीश से चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देने और आवश्यक कदम उठाने का आग्रह किया गया है।

    विपक्षी दलों का यह भी कहना है कि चुनावी प्रक्रिया में जनता का विश्वास बनाए रखना लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उनके अनुसार यदि चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर संदेह बढ़ता है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। इसी कारण उन्होंने चुनावी प्रक्रियाओं में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    इस घटनाक्रम के बाद चुनावी सुधार, निर्वाचन आयोग की भूमिका और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज होने की संभावना है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों, संवैधानिक संस्थाओं और न्यायिक प्रक्रिया की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण मानी जाएगी। फिलहाल विपक्ष का यह संयुक्त पत्र देश की चुनावी व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली को लेकर जारी बहस का एक अहम राजनीतिक दस्तावेज बनकर सामने आया है।

  • देश की सेवा जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य' कहकर जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सौंपी जिम्मेदारी, संयुक्त सैन्य शक्ति पर दिया भविष्य का विजन

    देश की सेवा जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य' कहकर जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सौंपी जिम्मेदारी, संयुक्त सैन्य शक्ति पर दिया भविष्य का विजन

    नई दिल्ली । भारतीय सेना में नेतृत्व परिवर्तन के महत्वपूर्ण चरण के तहत मंगलवार को जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने सेना प्रमुख का पदभार जनरल धीरज सेठ को सौंप दिया। चार दशक से अधिक समय तक भारतीय सेना की सेवा करने वाले जनरल द्विवेदी ने अपने विदाई संबोधन में सैन्य जीवन को अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य बताया और कहा कि देश की रक्षा के लिए समर्पित प्रत्येक सैनिक का योगदान भारतीय सेना की सबसे बड़ी शक्ति है। इस अवसर पर उन्होंने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पहुंचकर शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि भी अर्पित की।

    अपने विदाई संबोधन में जनरल द्विवेदी ने कहा कि सैनिक विद्यालय से लेकर भारतीय सेना के सर्वोच्च पद तक का उनका सफर अविस्मरणीय रहा। उन्होंने कहा कि सेना प्रमुख के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त करते हुए उनके मन में विनम्रता, कृतज्ञता, गर्व और संतोष की भावना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय सेना की असली ताकत किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि उन लाखों सैनिकों, अधिकारियों, पूर्व सैनिकों, उनके परिवारों और देशवासियों के विश्वास में निहित है, जिन्होंने हमेशा सेना का मनोबल बढ़ाया है।

    उन्होंने उन सभी सैनिकों को विशेष श्रद्धांजलि दी जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया। जनरल द्विवेदी ने कहा कि भारतीय सेना की परंपराएं, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा ही उसकी सबसे बड़ी पहचान हैं और यही मूल्य भविष्य में भी सेना का मार्गदर्शन करते रहेंगे। उन्होंने विश्वास जताया कि नया नेतृत्व भी इन्हीं आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए सेना को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगा।

    अपने कार्यकाल की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए जनरल द्विवेदी ने कहा कि पिछले दो वर्षों में भारतीय सेना ने हर मोर्चे पर उच्च स्तर की तैयारी, सतर्कता और संतुलन बनाए रखा। उन्होंने उत्तरी सीमाओं पर संचालित ऑपरेशन स्नो लेपर्ड का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद सेना ने पूरी मजबूती और सजगता के साथ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। इसी प्रकार पश्चिमी मोर्चे पर ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी सेना ने अनुशासन, संयम और रणनीतिक दक्षता का प्रभावी प्रदर्शन किया।

    उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रत्येक निर्णय और कार्रवाई में भारतीय सेना ने स्पष्ट उद्देश्य, जिम्मेदारी और पेशेवर दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी। इसी सोच ने बदलते सुरक्षा परिदृश्य में देश के लिए एक नए सुरक्षा मानक को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके अनुसार आधुनिक युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और भविष्य में संयुक्त सैन्य अभियानों का महत्व लगातार बढ़ेगा।

    जनरल द्विवेदी ने तीनों सेनाओं के बीच बढ़ते समन्वय को भी अपने कार्यकाल की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना, नौसेना और वायु सेना ने साझा रणनीति, आपसी विश्वास और बेहतर समन्वय के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत किया है। उनका मानना है कि भविष्य के युद्ध अधिक एकीकृत, तकनीक आधारित और संयुक्त अभियान पर केंद्रित होंगे। इसलिए तीनों सेनाओं को एक साथ स्थिति का आकलन करने, संयुक्त रूप से निर्णय लेने और समन्वित कार्रवाई करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

    नई जिम्मेदारी संभालने वाले जनरल धीरज सेठ के नेतृत्व में भारतीय सेना अब बदलती सुरक्षा चुनौतियों और आधुनिक सैन्य आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी रणनीतियों को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ेगी। नेतृत्व परिवर्तन के इस अवसर पर जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने विश्वास व्यक्त किया कि भारतीय सेना अपनी गौरवशाली परंपराओं, पेशेवर उत्कृष्टता और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण के साथ भविष्य में भी देश की सुरक्षा सुनिश्चित करती रहेगी।

  • कच्चे तेल में नरमी के बावजूद तुरंत नहीं घटेंगी पेट्रोल-डीजल की कीमतें, सरकार ने बताया 12,000 करोड़ रुपये के बोझ और वैश्विक हालात का पूरा गणित

    कच्चे तेल में नरमी के बावजूद तुरंत नहीं घटेंगी पेट्रोल-डीजल की कीमतें, सरकार ने बताया 12,000 करोड़ रुपये के बोझ और वैश्विक हालात का पूरा गणित

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हालिया गिरावट के बाद देश में पेट्रोल और डीजल के दाम कम होने की उम्मीदें बढ़ी हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल कच्चे तेल के सस्ता होने से उपभोक्ताओं को तुरंत राहत मिलना संभव नहीं है। सरकार का कहना है कि घरेलू ईंधन कीमतों का निर्धारण एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें वैश्विक बाजार की स्थिति के साथ-साथ आयात, परिवहन, कर व्यवस्था और तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति जैसे कई महत्वपूर्ण पहलू शामिल होते हैं।

    पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से दिए गए बयान में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर भारतीय बाजार तक पहुंचने में समय लगता है। कम कीमत पर खरीदा गया कच्चा तेल तुरंत रिफाइनरियों तक नहीं पहुंचता, बल्कि इसके आयात, परिवहन और प्रसंस्करण की पूरी प्रक्रिया में कई सप्ताह लग सकते हैं। ऐसे में वैश्विक बाजार में आई तात्कालिक नरमी का सीधा प्रभाव घरेलू खुदरा कीमतों पर तुरंत दिखाई नहीं देता।

    सरकार ने यह भी रेखांकित किया कि हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव और संघर्षों के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ी थी। इस दौरान कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला, जिससे आयात लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। ऐसी स्थिति में उपभोक्ताओं पर पूरा बोझ डालने के बजाय सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों ने अतिरिक्त वित्तीय दबाव अपने ऊपर लिया।

    सरकारी आकलन के अनुसार, बढ़ी हुई लागत का असर सीमित रखने के प्रयास में केंद्र को लगभग 12,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ा। सरकार का मानना है कि इस आर्थिक दबाव की भरपाई और बाजार संतुलन बनाए रखने के लिए मूल्य निर्धारण में सावधानी बरतना आवश्यक है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में थोड़ी गिरावट आते ही खुदरा ईंधन दरों में तत्काल कटौती करना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का भी मानना है कि भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें केवल कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव से निर्धारित नहीं होतीं। इसमें रिफाइनिंग लागत, फ्रेट चार्ज, बीमा, मुद्रा विनिमय दर, केंद्रीय और राज्य कर तथा विपणन खर्च भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इनमें से किसी एक क्षेत्र में लागत बढ़ती है तो उसका असर अंतिम कीमतों पर पड़ सकता है।

    इस बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में गुरुवार को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड करीब 78 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार करता दिखाई दिया, जबकि अमेरिकी डब्ल्यूटीआई क्रूड भी नरम रुख के साथ 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया में तनाव कम होने और कूटनीतिक प्रयासों में प्रगति के संकेतों ने निवेशकों की चिंताओं को कुछ हद तक कम किया है, जिससे तेल कीमतों पर दबाव घटा है।

    हालांकि ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि वैश्विक बाजार अभी भी पूरी तरह स्थिर नहीं हुआ है। भू-राजनीतिक घटनाक्रम, आपूर्ति श्रृंखला की स्थिति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा जैसे कारक आने वाले समय में तेल कीमतों की दिशा तय करेंगे। ऐसे में भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर किसी भी त्वरित निर्णय की संभावना फिलहाल सीमित दिखाई देती है।

  • ग्रामीण कनेक्टिविटी को ऐतिहासिक रफ्तार: वित्त वर्ष 2027 में 26,474 किमी नई सड़कों का निर्माण होगा, 18,907 करोड़ रुपए के निवेश से दूरदराज गांवों तक पहुंचेगी विकास की नई राह

    ग्रामीण कनेक्टिविटी को ऐतिहासिक रफ्तार: वित्त वर्ष 2027 में 26,474 किमी नई सड़कों का निर्माण होगा, 18,907 करोड़ रुपए के निवेश से दूरदराज गांवों तक पहुंचेगी विकास की नई राह

    नई दिल्ली। देश के ग्रामीण इलाकों में सड़क संपर्क को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सरकार ने 26,474 किलोमीटर नई ग्रामीण सड़कों के निर्माण का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए 18,907 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया है। सरकार का उद्देश्य उन गांवों और बस्तियों तक हर मौसम में सड़क सुविधा पहुंचाना है जो अभी भी पर्याप्त संपर्क व्यवस्था से वंचित हैं।

    ग्रामीण सड़क विकास को लेकर आयोजित एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और अन्य ग्रामीण संपर्क परियोजनाओं की प्रगति का विस्तृत आकलन किया गया। बैठक में विभिन्न राज्यों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया और निर्माणाधीन परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति के साथ आगामी लक्ष्यों पर चर्चा की गई। सरकार ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क केवल परिवहन का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास की बुनियाद है।

    बैठक के दौरान उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया जो अब तक सड़क नेटवर्क से पूरी तरह नहीं जुड़ पाए हैं। राज्यों को निर्देश दिए गए कि वे शेष असंबद्ध गांवों और बस्तियों को निर्धारित समय सीमा के भीतर सड़क संपर्क से जोड़ने के लिए कार्यों में तेजी लाएं। इसके साथ ही परियोजनाओं के क्रियान्वयन में आने वाली प्रशासनिक और तकनीकी बाधाओं को प्राथमिकता के आधार पर दूर करने को कहा गया।

    विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों की बस्तियों तक सड़क पहुंच सुनिश्चित करना भी सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल रहा। अधिकारियों ने कहा कि दूरस्थ आदिवासी क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क का विस्तार शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सेवाओं तक पहुंच को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। राज्यों को विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया को तेज करने और स्वीकृत परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के निर्देश दिए गए।

    समीक्षा बैठक में वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में चल रही सड़क परियोजनाओं की प्रगति पर भी विस्तार से चर्चा हुई। सरकार का मानना है कि इन क्षेत्रों में बेहतर सड़क ढांचा सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ प्रशासनिक पहुंच और विकास गतिविधियों को गति देने में सहायक होगा। संबंधित राज्यों से विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाकर परियोजनाओं को तय समय के भीतर पूरा करने को कहा गया।

    बैठक के दौरान राज्यों ने आश्वासन दिया कि लंबित परियोजनाओं को प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाएगा और वार्षिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। केंद्र सरकार ने भी परियोजनाओं की नियमित निगरानी और तकनीकी सहायता के माध्यम से राज्यों को सहयोग देने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    ग्रामीण सड़क परियोजनाओं की गुणवत्ता और दीर्घकालिक टिकाऊपन को भी समीक्षा का प्रमुख विषय बनाया गया। अधिकारियों ने कहा कि केवल सड़क निर्माण ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका बेहतर रखरखाव और गुणवत्ता मानकों का पालन भी उतना ही आवश्यक है। राज्यों को फील्ड निरीक्षण बढ़ाने, निगरानी तंत्र मजबूत करने और निर्माण कार्यों में निर्धारित मानकों का सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।

    डिजिटल निगरानी को बढ़ावा देने के लिए ई-मार्ग प्लेटफॉर्म के व्यापक उपयोग पर भी जोर दिया गया। यह प्रणाली ग्रामीण सड़कों के रखरखाव, प्रदर्शन मूल्यांकन और भुगतान प्रक्रियाओं की रियल-टाइम मॉनिटरिंग में मदद करती है। सरकार को उम्मीद है कि डिजिटल तकनीक के उपयोग से पारदर्शिता, जवाबदेही और कार्यकुशलता में उल्लेखनीय सुधार होगा तथा ग्रामीण सड़क विकास कार्यक्रमों को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।

  • आत्मनिर्भरता से वैश्विक नेतृत्व तक, रक्षा निर्यात 686 करोड़ से बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये; दुनिया में मजबूत हुई भारत की पहचान

    आत्मनिर्भरता से वैश्विक नेतृत्व तक, रक्षा निर्यात 686 करोड़ से बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये; दुनिया में मजबूत हुई भारत की पहचान


    नई दिल्ली ।
    भारत का रक्षा क्षेत्र पिछले एक दशक में व्यापक बदलाव और तेज प्रगति का साक्षी बना है। स्वदेशी उत्पादन, तकनीकी नवाचार और नीतिगत सुधारों के बल पर देश ने न केवल अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत किया है, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत का रक्षा निर्यात वर्ष 2013-14 के 686 करोड़ रुपये से बढ़कर 2025-26 में 38,424 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह वृद्धि देश की रक्षा निर्माण क्षमता और वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाती है।

    रक्षा क्षेत्र में यह बदलाव आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखकर लागू की गई विभिन्न नीतियों का परिणाम माना जा रहा है। पिछले वर्षों में स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। रक्षा खरीद प्रक्रियाओं को सरल बनाया गया, घरेलू उद्योगों को प्रोत्साहन दिया गया और निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। इसके परिणामस्वरूप रक्षा निर्माण से जुड़ी गतिविधियों में उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिला।

    आज भारत के रक्षा उत्पादों की मांग दुनिया के 80 से अधिक देशों में है। यह स्थिति उस समय से बिल्कुल अलग है जब देश मुख्य रूप से रक्षा आयात पर निर्भर माना जाता था। अब स्वदेशी रूप से विकसित सैन्य उपकरण, हथियार प्रणालियां और रक्षा तकनीकें अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पहचान बना रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि भारत की तकनीकी क्षमता और उत्पादन गुणवत्ता में बढ़ते विश्वास का संकेत है।

    रक्षा अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है। अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ने से नई तकनीकों के विकास को गति मिली है। अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों, निगरानी तकनीकों और आधुनिक सैन्य उपकरणों के निर्माण में अनुसंधान की भूमिका लगातार बढ़ी है। इसी कारण देश की रक्षा आवश्यकताओं को स्वदेशी स्तर पर पूरा करने की क्षमता मजबूत हुई है।

    रक्षा बजट में निरंतर वृद्धि ने भी इस परिवर्तन को गति प्रदान की है। पिछले दशक में रक्षा क्षेत्र के लिए वित्तीय आवंटन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की गई है, जिससे सैन्य आधुनिकीकरण, अनुसंधान परियोजनाओं और उत्पादन क्षमताओं को मजबूती मिली है। रक्षा उत्पादन का कुल मूल्य भी कई गुना बढ़कर नए रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुका है। इससे रक्षा उद्योग से जुड़े हजारों उद्यमों और रोजगार अवसरों को भी लाभ मिला है।

    सरकार ने नवाचार को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप, उद्योग और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया है। अनुसंधान एवं विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों का एक हिस्सा निजी क्षेत्र और नवाचार आधारित संस्थाओं के लिए खोला गया है। इससे नई तकनीकों के विकास और रक्षा क्षेत्र में उद्यमिता को प्रोत्साहन मिला है। विशेषज्ञ इसे रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानते हैं।

    इसके साथ ही परीक्षण और अनुसंधान सुविधाओं को अधिक सुलभ बनाकर निजी कंपनियों को भी रक्षा तकनीकों के विकास में सहयोग प्रदान किया गया है। इससे रक्षा उत्पादन का दायरा केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हुआ है। इस मॉडल ने देश में रक्षा निर्माण क्षमता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    विश्लेषकों का मानना है कि रक्षा निर्यात में हुई तेज वृद्धि केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं बल्कि रणनीतिक महत्व भी रखती है। इससे भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा, सामरिक साझेदारियां और रक्षा कूटनीति को मजबूती मिली है। आने वाले वर्षों में स्वदेशी तकनीक, अनुसंधान और उत्पादन पर आधारित यह मॉडल भारत को वैश्विक रक्षा उद्योग के प्रमुख देशों में शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • LPG उपभोक्ताओं को फिलहाल नहीं मिली राहत, जून में बढ़ी कीमतें बरकरार; सिलेंडर बुकिंग से पहले जानें ताजा रेट

    LPG उपभोक्ताओं को फिलहाल नहीं मिली राहत, जून में बढ़ी कीमतें बरकरार; सिलेंडर बुकिंग से पहले जानें ताजा रेट

    नई दिल्ली । देशभर में एलपीजी गैस सिलेंडर का उपयोग करने वाले करोड़ों उपभोक्ताओं के लिए 17 जून को राहत और चिंता दोनों तरह की स्थिति बनी हुई है। राहत इस बात की है कि आज घरेलू और कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतों में कोई नई वृद्धि नहीं की गई है, जबकि चिंता का कारण यह है कि जून महीने में लागू हुई बढ़ी हुई दरें अभी भी प्रभावी हैं। ऐसे में गैस सिलेंडर बुक कराने वाले उपभोक्ताओं को पहले की तुलना में अधिक राशि खर्च करनी पड़ रही है।

    देश में एलपीजी की कीमतों की समीक्षा आमतौर पर प्रत्येक महीने की शुरुआत में की जाती है। इसी प्रक्रिया के तहत जून में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी की गई थी। इस फैसले के बाद विभिन्न महानगरों और प्रमुख शहरों में उपभोक्ताओं को अतिरिक्त भुगतान करना पड़ रहा है। वर्तमान में 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतें पिछले संशोधन के अनुसार ही लागू हैं और आज इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया है।

    राजधानी दिल्ली सहित देश के कई बड़े शहरों में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमतें पहले की तुलना में अधिक स्तर पर बनी हुई हैं। मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, जयपुर, चंडीगढ़, भुवनेश्वर और पटना जैसे शहरों में भी उपभोक्ताओं को बढ़ी हुई दरों का सामना करना पड़ रहा है। अलग-अलग राज्यों में करों और परिवहन लागत के कारण कीमतों में अंतर देखने को मिलता है, लेकिन कुल मिलाकर अधिकांश क्षेत्रों में गैस उपभोक्ताओं की मासिक रसोई लागत बढ़ी है।

    घरेलू उपभोक्ताओं के साथ-साथ व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर भी लागत का दबाव बढ़ा है। होटल, रेस्तरां, कैटरिंग सेवाएं और छोटे व्यावसायिक प्रतिष्ठान कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर का उपयोग करते हैं। जून में कमर्शियल सिलेंडरों की कीमतों में भी वृद्धि दर्ज की गई थी, जिसका सीधा प्रभाव व्यवसायिक संचालन लागत पर पड़ा है। कई क्षेत्रों में छोटे व्यापारियों ने बढ़ती ऊर्जा लागत को लेकर चिंता भी व्यक्त की है।

    ऊर्जा बाजार के जानकारों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर घरेलू बाजार पर पड़ता है। वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान, भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा मांग में बदलाव जैसी परिस्थितियां एलपीजी मूल्य निर्धारण को प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ महीनों में गैस कीमतों में अस्थिरता देखने को मिली है।

    विशेषज्ञों के अनुसार एलपीजी केवल घरेलू ईंधन नहीं बल्कि व्यापक आर्थिक गतिविधियों से जुड़ा महत्वपूर्ण उत्पाद है। इसकी कीमतों में बदलाव का असर परिवारों के मासिक बजट से लेकर छोटे व्यवसायों की लागत संरचना तक दिखाई देता है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में एलपीजी की बढ़ती खपत को देखते हुए उपभोक्ता मूल्य परिवर्तन पर लगातार नजर बनाए रखते हैं।

    वर्तमान स्थिति में उपभोक्ताओं को किसी नई बढ़ोतरी का सामना नहीं करना पड़ रहा है, लेकिन जून में लागू संशोधित दरें अभी भी प्रभावी हैं। ऐसे में गैस सिलेंडर बुक कराने से पहले अपने क्षेत्र की मौजूदा कीमतों की जानकारी प्राप्त करना उपयोगी माना जा रहा है। आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार की दिशा और घरेलू मूल्य समीक्षा के आधार पर एलपीजी दरों में आगे बदलाव संभव हो सकता है।

    फिलहाल 17 जून को एलपीजी उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि कीमतों में कोई नया संशोधन नहीं हुआ है, लेकिन हालिया बढ़ोतरी का असर अभी भी पूरी तरह बना हुआ है और इसका प्रभाव घरेलू बजट तथा व्यावसायिक खर्चों पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

  • AI निगरानी, बायोमेट्रिक जांच और एयरफोर्स से पेपर डिलीवरी पर विवाद, NEET री-टेस्ट से पहले अन्नामलाई और बीजेपी आमने-सामने

    AI निगरानी, बायोमेट्रिक जांच और एयरफोर्स से पेपर डिलीवरी पर विवाद, NEET री-टेस्ट से पहले अन्नामलाई और बीजेपी आमने-सामने

    नई दिल्ली । देश की सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में शामिल NEET री-टेस्ट से पहले सुरक्षा व्यवस्था को लेकर राजनीतिक और शैक्षणिक बहस तेज हो गई है। आगामी 21 जून को आयोजित होने वाली परीक्षा के लिए केंद्र सरकार और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने अभूतपूर्व सुरक्षा उपाय लागू किए हैं। हालांकि इन व्यवस्थाओं को लेकर विभिन्न पक्षों से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। एक ओर परीक्षा की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है।

    हाल के वर्षों में कई प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और नकल से जुड़े मामलों ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। इसी पृष्ठभूमि में इस बार NEET री-टेस्ट के लिए बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था तैयार की गई है। परीक्षा प्रश्नपत्रों को देशभर के विभिन्न केंद्रों तक पहुंचाने के लिए विशेष सुरक्षा प्रबंध किए गए हैं। परीक्षा केंद्रों पर अभ्यर्थियों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए बायोमेट्रिक सत्यापन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित फेस रिकग्निशन तकनीक का भी उपयोग किया जाएगा।

    इन सुरक्षा उपायों पर प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि परीक्षा की सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर ऐसी व्यवस्थाएं नहीं होनी चाहिएं जो छात्रों के लिए अतिरिक्त तनाव का कारण बन जाएं। उन्होंने कहा कि लंबी जांच प्रक्रियाएं, बढ़ी हुई निगरानी और अतिरिक्त सत्यापन छात्रों की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं, विशेष रूप से तब जब वे पहले से ही एक अत्यधिक प्रतिस्पर्धी परीक्षा की तैयारी कर रहे हों।

    अन्नामलाई ने यह भी तर्क दिया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का प्रमुख उद्देश्य छात्रों पर परीक्षा संबंधी दबाव कम करना था। उनके अनुसार वर्तमान व्यवस्था इस लक्ष्य के विपरीत दिखाई देती है। उन्होंने परीक्षा से पहले एडमिट कार्ड डाउनलोड करने में आई तकनीकी समस्याओं का भी उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे मुद्दे छात्रों की चिंता को और बढ़ा सकते हैं।

    वहीं भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इन आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा है कि परीक्षा की विश्वसनीयता और पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। पार्टी नेताओं का कहना है कि बायोमेट्रिक सत्यापन, सीसीटीवी निगरानी और डिजिटल पहचान जैसी व्यवस्थाएं आज दुनिया की कई प्रमुख परीक्षाओं में सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। उनका मानना है कि इन उपायों का उद्देश्य किसी पर दबाव बनाना नहीं बल्कि योग्य और मेहनती छात्रों के हितों की रक्षा करना है।

    परीक्षा एजेंसियों का भी कहना है कि हाल के वर्षों में सामने आए पेपर लीक नेटवर्क और संगठित नकल गिरोहों को देखते हुए सुरक्षा मानकों को मजबूत करना आवश्यक हो गया था। इसी क्रम में डिजिटल संचार माध्यमों की निगरानी और कुछ प्लेटफॉर्म्स की पहुंच पर अस्थायी नियंत्रण जैसे कदम भी उठाए गए हैं ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता को रोका जा सके।

    शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षा की निष्पक्षता और छात्रों की सुविधा दोनों के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है। जहां मजबूत सुरक्षा व्यवस्था परीक्षा प्रणाली में विश्वास बढ़ाती है, वहीं यह भी आवश्यक है कि छात्रों को अनावश्यक प्रक्रियात्मक दबाव का सामना न करना पड़े। ऐसे में NEET री-टेस्ट केवल एक परीक्षा नहीं बल्कि परीक्षा प्रबंधन और सुरक्षा मॉडल की भी महत्वपूर्ण परीक्षा बन गया है, जिसके परिणाम भविष्य की राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं की दिशा तय कर सकते हैं।