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  • श्रीश्री रविशंकर के आर्ट ऑफ लिविंग को 5 करोड़ रुपये लौटाएगा DDA…. SC ने रद्द किया NGT का आदेश

    श्रीश्री रविशंकर के आर्ट ऑफ लिविंग को 5 करोड़ रुपये लौटाएगा DDA…. SC ने रद्द किया NGT का आदेश


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने NGT (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) के 2017 के उस आदेश को शनिवार को रद्द कर दिया, जिसमें साल 2016 में आयोजित विश्व संस्कृति महोत्सव (World Culture Festival) के कारण यमुना (Yamuna) के बाढ़ क्षेत्र को हुए नुकसान के लिए श्रीश्री रविशंकर (Sri Sri Ravi Shankar) के ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ (‘Art of Living Foundation’) को जिम्मेदार ठहराया गया था। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को फाउंडेशन द्वारा जमा किए गए पांच करोड़ रुपए के पर्यावरणीय मुआवजे को भी वापस करने का निर्देश दिया और इसके लिए उसे चार सप्ताह का समय भी दिया।

    यमुना के बाढ़ क्षेत्र डीएनडी फ्लाईवे में गंदगी फैलाने के आरोपों से आर्ट ऑफ लिविंग को क्लीन चिट देते हुए जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर पर्याप्त सामग्री मौजूद है, जिससे पता चलता है कि आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन को सौंपे जाने से पहले ही कार्यक्रम स्थल खराब स्थिति में था। पीठ ने कहा, ‘रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री वास्तव में यह साबित करती है कि यदि कोई नुकसान हुआ भी है, तो उसके लिए अपीलकर्ता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता…।’


    सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया 9 साल पुराना फैसला

    पीठ ने कहा, ‘सात दिसंबर 2017 के फैसले को रद्द किया जाता है और इसके परिणामस्वरूप अपीलकर्ता के खिलाफ की गई सभी कार्रवाइयों और अंतरिम आदेशों को भी निरस्त किया जाता है। अपीलकर्ता नौ मार्च 2016 के अधिकरण के आदेश के अनुपालन में डीडीए के पास जमा की गई पांच करोड़ रुपए की राशि वापस पाने का हकदार है। डीडीए आज से चार सप्ताह के भीतर यह राशि वापस करेगा।’


    NGT ने दिया था 5 करोड़ रुपए DDA को देने का आदेश

    शीर्ष अदालत ने यह आदेश ‘आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ से जुड़े ‘व्यक्ति विकास केंद्र इंडिया’ की ओर से दायर एक अपील पर दिया। एक समिति की रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन को पांच करोड़ रुपए जमा करने का निर्देश दिया था और कहा था कि कार्यक्रम से बाढ़ क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है।


    कोर्ट बोला- रिपोर्ट से पूरी तरह प्रभावित हो गया था NGT

    शीर्ष अदालत ने कहा कि NGT, विशेषज्ञ समिति की उस रिपोर्ट से प्रभावित हो गया, जिसमें कहा गया था कि स्थल पर बड़े पैमाने पर तैयारियां चल रही थीं और इस आधार पर उसने निष्कर्ष निकाला कि ऐसे काम करके अपीलकर्ता (आर्ट ऑफ लिविंग) ने बाढ़ क्षेत्र को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया।


    बाढ़ क्षेत्र में कार्यक्रम की अनुमति देने पर भड़का कोर्ट

    अदालत ने सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति देने के लिए डीडीए की भी आलोचना की और उसे एनजीटी के निर्देश के अनुसार यमुना के बाढ़ क्षेत्र के बहाली का काम जारी रखने का निर्देश दिया। विश्व सांस्कृतिक महोत्सव 11 से 13 मार्च, 2016 तक आयोजित किया गया था। यह कार्यक्रम दिल्ली में यमुना नदी के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र में डीएनडी फ्लाईवे के आगे की ओर 25 हेक्टेयर क्षेत्र में आयोजित किया गया था।

  • ग्रेट निकोबार परियोजना पर फिर उठे सवाल, जयराम रमेश ने NGT से मांगी सीलबंद रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग

    ग्रेट निकोबार परियोजना पर फिर उठे सवाल, जयराम रमेश ने NGT से मांगी सीलबंद रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग

    नई दिल्ली ।कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी से उस उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है, जिसे परियोजना को मिली पर्यावरण संबंधी मंजूरियों की समीक्षा के लिए गठित किया गया था। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद परियोजना की मंजूरी प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं और यह स्पष्ट हो सकेगा कि इसमें कोई गंभीर खामी रही है या नहीं।

    जयराम रमेश ने कहा कि एनजीटी को अपनी स्वतंत्र भूमिका और कानूनी अधिकारों को प्रभावी ढंग से निभाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि अलग-अलग न्यायाधिकरण, विशेष रूप से एनजीटी, अपनी संस्थागत विश्वसनीयता और अधिकार को फिर से मजबूत करेंगे तथा कानून के तहत निर्धारित जिम्मेदारियों का पूरी तरह पालन करेंगे।

    उन्होंने न्यायाधिकरण सुधार विधेयक, 2026 का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, इस विधेयक पर लोकसभा में चर्चा प्रस्तावित है। यह विधेयक पिछले वर्षों में गठित 16 अर्द्ध-न्यायिक अधिकरणों के लिए नई व्यवस्था तय करने से जुड़ा है। इनमें राष्ट्रीय हरित अधिकरण भी शामिल है, जिसका गठन अक्टूबर 2010 में संसद के एक कानून के तहत किया गया था।

    रमेश ने कहा कि प्रस्तावित विधेयक का संबंध 19 नवंबर 2025 के उच्चतम न्यायालय के महत्वपूर्ण फैसले से भी है। इस फैसले में न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के प्रमुख प्रावधानों को रद्द किया गया था। साथ ही न्यायाधिकरणों में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन की दिशा में निर्देश दिए गए थे।

    कांग्रेस नेता ने न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता से जुड़े पुराने विवादों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वह 2021 के कानून को चुनौती देने वाले लोगों में शामिल थे। इससे पहले उन्होंने वित्त अधिनियम, 2017 के उन प्रावधानों को भी चुनौती दी थी, जिनके माध्यम से न्यायाधिकरणों की व्यवस्था में बदलाव किए गए थे।

    रमेश ने आरोप लगाया कि कुछ संशोधनों को धन विधेयक का हिस्सा बनाकर संसद के दोनों सदनों, खासकर राज्यसभा में विस्तृत विधायी समीक्षा से बचने का प्रयास किया गया। उन्होंने कहा कि न्यायाधिकरणों की भूमिका और स्वतंत्रता को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है और अब इस व्यवस्था में जरूरी सुधारों को लागू करने की आवश्यकता सामने आई है।

    ग्रेट निकोबार परियोजना से जुड़ी उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट को उन्होंने इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, समिति ने अपनी रिपोर्ट 8 जुलाई 2025 को एनजीटी के समक्ष सीलबंद लिफाफे में प्रस्तुत की थी। उन्होंने मांग की कि इस रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरियों की समीक्षा के दौरान समिति ने किन तथ्यों और निष्कर्षों को सामने रखा था।

    जयराम रमेश ने कहा कि रिपोर्ट सार्वजनिक करना एनजीटी की पारदर्शिता और स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण संकेत होगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि न्यायाधिकरण पर्यावरणीय मामलों में अपने कानूनी दायित्वों का पालन करते हुए स्वतंत्र रूप से काम करेंगे।

    न्यायाधिकरण सुधार विधेयक में अध्यक्षों और सदस्यों की योग्यता तथा नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के साथ स्वतंत्रता, पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित करने का प्रस्ताव है। इसमें राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन की रूपरेखा भी शामिल है। ऐसे में ग्रेट निकोबार परियोजना की समीक्षा रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग ने पर्यावरणीय मंजूरियों के साथ न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता और पारदर्शिता के मुद्दे को भी प्रमुखता से सामने ला दिया है।

  • एनजीटी के आदेशों की अनदेखी कर वेटलैंड में मड रैली जैव विविधता पर मंडराया खतरा प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल

    एनजीटी के आदेशों की अनदेखी कर वेटलैंड में मड रैली जैव विविधता पर मंडराया खतरा प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल


    भोपाल । भोपाल के कलियासोत डैम के वेटलैंड क्षेत्र में आयोजित मड रैली एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। पर्यावरणविदों और वन्यजीव विशेषज्ञों ने इस आयोजन को प्राकृतिक पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा बताते हुए आयोजकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि जिस क्षेत्र में सैकड़ों लोग और दर्जनों वाहन पहुंचे वहां पहले से ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की ओर से ऐसे आयोजनों पर रोक लगाई जा चुकी है। इसके बावजूद खुलेआम मड रैली का आयोजन होना कई सवाल खड़े करता है।

    रविवार को कलियासोत डैम के किनारे बड़ी संख्या में ऑफरोड वाहनों की रेस आयोजित की गई। आयोजन में पचास से अधिक गाड़ियों ने हिस्सा लिया जबकि सैकड़ों लोग वहां मौजूद रहे। इस दौरान कई वाहन आपस में टकरा गए और कुछ लोगों के घायल होने की भी जानकारी सामने आई। इतनी बड़ी गतिविधि होने के बावजूद स्थानीय प्रशासन और पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगी जिससे उनकी कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।

    पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि वेटलैंड केवल जलभराव वाला क्षेत्र नहीं होता बल्कि यह अनेक दुर्लभ जलीय जीव जंतुओं पक्षियों और वनस्पतियों का प्राकृतिक आवास होता है। यहां मगरमच्छ घड़ियाल कछुए मछलियां और कई प्रवासी पक्षी निवास करते हैं। भारी वाहनों की आवाजाही तेज आवाज और भीड़भाड़ से इन जीवों का प्राकृतिक जीवन प्रभावित होता है। इतना ही नहीं कई जीवों के घोंसले और अंडे भी ऐसे आयोजनों के कारण नष्ट हो सकते हैं।

    विशेषज्ञों ने याद दिलाया कि वर्ष 2019 में भी इसी तरह की मड रैली के खिलाफ एनजीटी में याचिका दायर की गई थी। इसके बाद जनवरी 2020 में एनजीटी ने देशभर के वेटलैंड क्षेत्रों में मड रैली और इसी तरह की गतिविधियों पर रोक लगाने के आदेश दिए थे। उस समय भोपाल जिला प्रशासन ने भी ऐसे आयोजन की अनुमति निरस्त कर दी थी। इसके बावजूद दोबारा ऐसे आयोजन का होना नियमों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

    वन विभाग के अनुसार कलियासोत और आसपास के जंगलों में बाघ तेंदुए सहित कई वन्यजीवों की आवाजाही रहती है। ऐसे में तेज रफ्तार वाहनों और अत्यधिक शोर से वन्यजीवों के व्यवहार पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि समय रहते ऐसे आयोजनों पर रोक नहीं लगी तो क्षेत्र की जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है।

    घटना के बाद प्रशासन भी सक्रिय हुआ है। राजस्व अधिकारियों को जांच के निर्देश दिए गए हैं और अवैध रूप से मड रैली आयोजित करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की तैयारी की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में हर शनिवार और रविवार को विशेष निगरानी रखी जाएगी ताकि इस तरह की गतिविधियों को रोका जा सके।

    जानकारों के मुताबिक ऐसे आयोजनों की जानकारी आम तौर पर सार्वजनिक नहीं की जाती। सोशल मीडिया और निजी मैसेजिंग ग्रुप के माध्यम से चुनिंदा लोगों को सूचना दी जाती है जिससे बड़ी संख्या में ऑफरोड वाहन चालक और दर्शक मौके पर पहुंच जाते हैं। यही वजह है कि प्रशासन को समय रहते सूचना नहीं मिल पाती।

    पर्यावरण विशेषज्ञों ने मांग की है कि वेटलैंड क्षेत्रों में वाहनों की आवाजाही पूरी तरह नियंत्रित की जाए नियमित गश्त बढ़ाई जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए। उनका मानना है कि प्राकृतिक धरोहरों की सुरक्षा केवल कानून का विषय नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।

  • लेक सिटी नैनीताल की प्राकृतिक सुंदरता पर मंडरा रहा खतरा… NGT ने दी चेतावनी

    लेक सिटी नैनीताल की प्राकृतिक सुंदरता पर मंडरा रहा खतरा… NGT ने दी चेतावनी


    नैनीताल।
    उत्तराखंड (Uttarakhand) की सरोवर नगरी नैनीताल (Lake City Nainital) पर बढ़ते पर्यावरणीय खतरे को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal-NGT) ने बड़ा अलर्ट जारी किया है. मंगलवार को नैनीताल क्लब में आयोजित हाई लेवल समीक्षा बैठक में NGT के माननीय सदस्य और न्यायमूर्ति डॉ. अफरोज अहमद ने साफ शब्दों में कहा कि यदि नदी-नाले, प्राकृतिक जलस्रोत और जलधाराएं नहीं बचीं तो पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता और पारिस्थितिकी को बचा पाना मुश्किल हो जाएगा.

    बैठक में नैनीताल के सामने खड़ी कई गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई. इनमें नैनीझील का लगातार घटता जलस्तर, झील में बढ़ता प्रदूषण, कचरा प्रबंधन की समस्या, ड्रेनेज और सीवरेज नेटवर्क की स्थिति तथा जलस्रोतों पर बढ़ते अतिक्रमण जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।

    बैठक के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि नैनीझील का जलस्तर लगातार प्रभावित हो रहा है. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उन प्राकृतिक जलस्रोतों का कमजोर होना है जो सालों से झील को पानी उपलब्ध कराते रहे हैं. यदि समय रहते इन स्रोतों को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है.


    वॉटर बॉडी और वेटलैंड से हटेगा अतिक्रमण

    अधिकारियों ने जानकारी दी कि नैनीताल शहर में कुल 13 वॉटर बॉडी और वेटलैंड मौजूद हैं. ये सभी बरसात के पानी को जमा करके धीरे-धीरे नैनीझील तक पहुंचाते हैं. यही जलस्रोत सर्दियों के मौसम में भी झील के जलस्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

    हालांकि समय के साथ इन वॉटर बॉडी और वेटलैंड पर अतिक्रमण बढ़ गया है. कई स्थानों पर पानी का प्राकृतिक प्रवाह और भराव भी बाधित हो गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि नैनीझील का घटता जलस्तर इसी समस्या से जुड़ा हुआ है.

    मामले की गंभीरता को देखते हुए NGT सदस्य सचिव ने कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत और जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल को सभी वॉटर बॉडी और वेटलैंड को अतिक्रमण मुक्त कराने के निर्देश दिए हैं. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस दिशा में विशेष अभियान चलाया जा सकता है.

    बैठक में पर्यटन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभावों पर भी चर्चा की गई. अधिकारियों ने बताया कि पर्यटन सीजन के दौरान नैनीताल में लाखों लोग पहुंचते हैं. इससे शहर की अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता है, लेकिन कचरे और प्रदूषण का दबाव भी कई गुना बढ़ जाता है. NGT ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि शहर में 100 प्रतिशत डोर-टू-डोर कूड़ा संग्रहण सुनिश्चित किया जाए. साथ ही पर्यटन सीजन के लिए विशेष कचरा प्रबंधन योजना तैयार की जाए ताकि झील और आसपास के पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे.


    लाइट और ध्वनि प्रदूषण भी चिंता का विषय

    बैठक में कुमाऊं आयुक्त दीपक रावत ने लाइट पॉल्यूशन और ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा भी उठाया. विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक कृत्रिम रोशनी और लगातार बढ़ता शोर वन्यजीवों, पक्षियों और पहाड़ की प्राकृतिक जीवनशैली पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है. इसलिए इन दोनों समस्याओं पर भी गंभीरता से काम करने की जरूरत बताई गई.


    कचरा निस्तारण को लेकर तैयारी

    अधिकारियों ने बताया कि जिले के नगरीय क्षेत्रों से प्रतिदिन लगभग 230 मीट्रिक टन कूड़ा गोलापार ट्रंचिंग ग्राउंड भेजा जा रहा है. वहां जल्द ही आधुनिक कचरा निस्तारण मशीन स्थापित की जाएगी. इसके अलावा पुराने कूड़े के बड़े हिस्से का निस्तारण भी किया जा चुका है.


    सिर्फ सरकार नहीं, जनता की भी जिम्मेदारी

    बैठक के अंत में डॉ. अफरोज अहमद ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण सिर्फ सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है. इसके लिए आम लोगों की भागीदारी और जागरूकता सबसे अधिक जरूरी है. उन्होंने कहा कि यह केवल नैनीताल की खूबसूरती बचाने का सवाल नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से भी जुड़ा मुद्दा है.

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पहाड़ों के जलस्रोत सूख गए, झीलें प्रदूषित हो गईं और जंगलों को नुकसान पहुंचा तो आने वाले समय में पहाड़ों की पहचान और प्राकृतिक विरासत दोनों पर संकट गहरा सकता है. इसी वजह से NGT ने प्रशासन और समाज दोनों को मिलकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रभावी कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया है.

  • NGT का बड़ा आदेश: भोपाल में प्रदूषण रोकने के लिए 100 दिन की विंटर एक्शन प्लान तैयारी अनिवार्य

    NGT का बड़ा आदेश: भोपाल में प्रदूषण रोकने के लिए 100 दिन की विंटर एक्शन प्लान तैयारी अनिवार्य


    भोपाल । भोपाल की लगातार बिगड़ती हवा की गुणवत्ता को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल NGT ने मध्यप्रदेश सरकार और नगर निगम को सख्त निर्देश जारी किए हैं। एनजीटी ने कहा है कि राजधानी में सर्दियों के दौरान एयर क्वालिटी इंडेक्स कई बार 300 के पार पहुंच जाता है, जो गंभीर स्थिति का संकेत है। इसी को देखते हुए ठंड शुरू होने से पहले 100 दिन का विस्तृत विंटर एक्शन प्लान तैयार करने के आदेश दिए गए हैं।

    एनजीटी ने स्पष्ट कहा है कि अगर अभी से प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली सर्दियों में वायु प्रदूषण की स्थिति और भी भयावह हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, हवा में मौजूद पीएम 2.5 और धूल के महीन कण स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक हैं और ये हार्ट अटैक, स्ट्रोक, अस्थमा तथा अन्य श्वसन रोगों का बड़ा कारण बन रहे हैं।

    मामले में याचिकाकर्ता राशिद नूर खान ने बताया कि विशेषज्ञों ने खुले में कचरा, पत्तियां, बायोमास और फसल अवशेष जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है। साथ ही पारंपरिक अलाव को भी प्रदूषण का बड़ा कारण बताया गया है, जिसके विकल्प के रूप में एलपीजी और इलेक्ट्रिक हीटर को बढ़ावा देने की बात कही गई है।

    एनजीटी ने अपने निर्देशों में खुले में कचरा जलाने, लकड़ी और कोयले के तंदूरों के उपयोग तथा निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल पर सख्त नियंत्रण लगाने को कहा है। इसके अलावा होटल, ढाबों और रेस्तरां में लकड़ी-कोयले के उपयोग को सीमित करने की सिफारिश भी की गई है। ट्रिब्यूनल ने शहर में भारी वाहनों के प्रवेश को नियंत्रित करने, ट्रैफिक व्यवस्था सुधारने और लो-इमिशन जोन विकसित करने जैसे उपायों पर जोर दिया है।

    साथ ही ई-रिक्शा, साइकिल और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की भी बात कही गई है, ताकि निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो सके। निर्माण स्थलों पर उड़ने वाली धूल को रोकने के लिए ग्रीन नेट लगाना अनिवार्य करने, नियमों का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगाने और नागरिकों की शिकायतों के लिए हेल्पलाइन शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं।
    नगर निगम को नियमित सड़क सफाई, पानी का छिड़काव और डिवाइडरों की सफाई सुनिश्चित करने को कहा गया है। एनजीटी ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल योजना बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि हर कदम की निगरानी के लिए एक मॉनिटरिंग कमेटी गठित की जाएगी, जो लगातार कार्रवाई की समीक्षा करेगी।

  • राजधानी की हरियाली पर स्लो प्वाइजन हमला: पेड़ काटे नहीं जा रहे, जहर देकर सुखाए जा रहे भोपाल की ग्रीनरी खतरे में

    राजधानी की हरियाली पर स्लो प्वाइजन हमला: पेड़ काटे नहीं जा रहे, जहर देकर सुखाए जा रहे भोपाल की ग्रीनरी खतरे में


    भोपाल। राजधानी भोपाल की पहचान मानी जाने वाली हरियाली पर अब खुलकर बुरी नजर लग चुकी है। विकास के नाम पर पहले ही लाखों पेड़ काटे जा चुके हैं और अब पेड़ों को खत्म करने का एक नया और खतरनाक तरीका सामने आया है। पेड़ काटने के बजाय उन्हें स्लो प्वाइजन देकर सुखाया जा रहा है, ताकि कटाई की अनुमति लेने की जरूरत ही न पड़े।

    राजधानी के सबसे अधिक ग्रीन कवर वाले इलाकों में शामिल प्रोफेसर कॉलोनी में यह गंभीर मामला सामने आया है। यहां वर्षों पुराने हरे-भरे पेड़ों में छेद करके केमिकल भरा गया है और ऊपर से मिट्टी लगा दी गई है। इसका असर यह हो रहा है कि पेड़ खड़े-खड़े सूख रहे हैं। कई पेड़ पहले ही सूख चुके हैं, जो इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यह कोई पहला मामला नहीं है। अब बारी उन पेड़ों की है, जो अभी हरे हैं और लोगों को ऑक्सीजन व फल दोनों दे रहे हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह तरीका बेहद खतरनाक है, क्योंकि इससे न तो पेड़ काटने की अनुमति लेनी पड़ती है और न ही तत्काल कार्रवाई का शक होता है। धीरे-धीरे पेड़ सूख जाते हैं और फिर उन्हें काट दिया जाता है।

    एनजीटी की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में भोपाल में 6 लाख से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। वर्ष 2016 की तुलना में राजधानी का ग्रीन कवर तेजी से घटा है। मेट्रो प्रोजेक्ट, स्मार्ट सिटी, सड़क चौड़ीकरण, वीवीआईपी बंगलों के पुनर्विकास और खनन परियोजनाओं के कारण हजारों पेड़ों की बलि दी गई है। रिपोर्ट बताती है कि शहर का ग्रीन कवर 22 से 26 प्रतिशत तक घट चुका है, जिससे तापमान और प्रदूषण दोनों में इजाफा हुआ है।

    इस मामले पर महापौर मालती राय ने कहा है कि मामला संज्ञान में आया है और इसकी जांच कराई जाएगी। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और हरियाली को नष्ट नहीं होने दिया जाएगा। वहीं कांग्रेस ने भी इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।

    पर्यावरण विशेषज्ञ नूर राशिद खान का कहना है कि यह सीधा कानूनी अपराध है। हरे-भरे पेड़ों को जहर देकर मारना अपराध की श्रेणी में आता है। उन्होंने बताया कि यह इलाका रामसर साइट से भी जुड़ा हुआ है, जहां बिना अनुमति निर्माण और इस तरह की गतिविधियां पूरी तरह गैरकानूनी हैं।

    कांग्रेस प्रवक्ता भूपेंद्र गुप्ता ने सवाल उठाया कि नगर निगम आखिर क्या कर रहा है। जिन जगहों पर पेड़ों में सुराख कर जहर डाला गया है, वहां निगरानी करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो वह दिन दूर नहीं जब भोपाल में पेड़ सिर्फ नाम के रह जाएंगे। हरियाली बचेगी तभी शहर की हवा साफ रहेगी, वरना भोपाल भी सिंगरौली जैसी स्थिति की ओर बढ़ सकता है।

  • सीवेज प्रदूषण पर NGT सख्त, MP-UP-राजस्थान से जवाब तलब, इंदौर में मौतें और भोपाल में 'ई-कोलाई' का खतरा

    सीवेज प्रदूषण पर NGT सख्त, MP-UP-राजस्थान से जवाब तलब, इंदौर में मौतें और भोपाल में 'ई-कोलाई' का खतरा


    नई दिल्ली। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की प्रधान पीठ ने नई दिल्ली में बुधवार को इंदौर, भोपाल और राजस्थान के शहरों में पेयजल में सीवेज की मिलावट से जुड़ी गंभीर समस्याओं पर स्वतः संज्ञान लिया। NGT ने मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की राज्य सरकारों से जवाब तलब किया है। ट्रिब्यूनल ने इंदौर में गंदे पानी के कारण मौतों और भोपाल में पेयजल में ‘ई-कोलाई’ बैक्टीरिया मिलने के मामलों का हवाला दिया।
    मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इंदौर में गंदे पानी के सेवन से मौतें हुई हैं, जबकि भोपाल के कुछ इलाकों में ट्यूबवेल से रिसाव के कारण पेयजल में ई-कोलाई बैक्टीरिया पाया गया। वहीं, राजस्थान के उदयपुर, जोधपुर, कोटा, बांसवाड़ा, जयपुर और अजमेर जैसे शहरों में पुरानी और जर्जर पाइपलाइन प्रणाली के चलते सीवेज के पानी का पेयजल में मिलना जारी है। ग्रेटर नोएडा में भी सीवेज मिला पानी पीने से कई लोग बीमार पड़े, जिनमें बच्चे भी शामिल थे।
    एनजीटी ने इन घटनाओं को गंभीर पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य से जुड़ा मामला माना। पीठ ने संबंधित राज्य सरकारों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) से स्पष्ट जवाब तलब किया है। कहा गया है कि यह मामला पर्यावरणीय कानूनों का पालन सुनिश्चित करने, जिम्मेदारी तय करने और नागरिकों के सुरक्षित पेयजल के अधिकार की रक्षा के लिए विचाराधीन रहेगा।

    इसके अलावा, NGT ने मध्यप्रदेश में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई के मामलों को भी संज्ञान में लिया। रिपोर्ट के अनुसार, सड़क, रेलवे, राष्ट्रीय राजमार्ग और कोयला खदान परियोजनाओं के लिए 50 से 100 वर्ष पुराने लगभग 15 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं या काटे जाने का प्रस्ताव है। सिंगरौली, खंडवा, विदिशा, भोपाल और इंदौर में भारी संख्या में पेड़ों की कटाई से वायु गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

    पीठ ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य वन विभागों को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई तक शपथ पत्र के माध्यम से अपना जवाब दाखिल करें। अगली सुनवाई 9 मार्च 2026 को होगी।

  • छठ पूजा के बाद फिर जहरीली हुई यमुना, प्रदूषण बढ़ा लेकिन 2024 के मुकाबले 2025 में दिखी हल्की राहत

    छठ पूजा के बाद फिर जहरीली हुई यमुना, प्रदूषण बढ़ा लेकिन 2024 के मुकाबले 2025 में दिखी हल्की राहत


    नई दिल्ली। दिल्ली में यमुना नदी की हालत एक बार फिर चिंता का विषय बन गई है। ताज़ा जारी जल गुणवत्ता रिपोर्ट के अनुसार छठ पूजा के बाद यमुना का पानी लगातार और अधिक प्रदूषित होता चला गया है। अक्टूबर के बाद से नदी में गिरने वाले बिना शोधित सीवेज के संकेतक माने जाने वाले फीकल कोलीफॉर्म के स्तर में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है जिससे जनस्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा बढ़ गया है। हालांकि रिपोर्ट में एक राहत वाली बात भी सामने आई है कि मौजूदा आंकड़े पिछले वर्ष 2024 की तुलना में बेहतर हैं।
    रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2025 में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर करीब 8000 यूनिट प्रति 100 मिलीलीटर दर्ज किया गया था। नवंबर में यह आंकड़ा तीन गुना बढ़कर 24000 यूनिट तक पहुंच गया जबकि दिसंबर में स्थिति और बिगड़ते हुए यह 92000 यूनिट प्रति 100 मिलीलीटर हो गया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक फीकल कोलीफॉर्म की सुरक्षित सीमा 2500 यूनिट मानी जाती है और आदर्श स्तर सिर्फ 500 यूनिट होना चाहिए। ऐसे में मौजूदा आंकड़े यमुना के पानी की बेहद खराब गुणवत्ता को दर्शाते हैं।

    अक्टूबर में प्रदूषण अपेक्षाकृत कम रहने की बड़ी वजह छठ पूजा से पहले ऊपरी इलाकों के बैराजों से छोड़ा गया भारी मात्रा में ताज़ा पानी बताया गया है। 21 से 25 अक्टूबर के बीच यमुना में 6.68 लाख क्यूसेक से अधिक पानी छोड़ा गया जिससे नदी का प्रवाह बढ़ा और प्रदूषण कुछ हद तक बह गया। इसी कारण उस दौरान सफेद झाग लगभग गायब हो गया था और नदी अपेक्षाकृत साफ नजर आई।हालांकि नवंबर की शुरुआत में जैसे ही पानी का बहाव कम हुआ यमुना में बदबू और झाग दोबारा लौट आए। इसके साथ ही प्रदूषण के अन्य संकेतक भी चिंताजनक बने रहे। बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड BOD अक्टूबर में 25 mg/l था जो नवंबर में बढ़कर 33 mg/l पहुंच गया। दिसंबर में यह फिर 25 mg/l पर आ गया लेकिन यह अब भी सुरक्षित सीमा 3 mg/l से करीब आठ गुना अधिक है।जलीय जीवों के लिए जरूरी डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन DO का स्तर भी कई स्थानों पर बेहद कम पाया गया। नवंबर में DO का स्तर 0.5 से 8.5 mg/l के बीच रहा जिसमें दो स्थानों पर यह शून्य तक गिर गया। दिसंबर में भी कई जगहों पर ऑक्सीजन का स्तर जलीय जीवन के लिए आवश्यक 5 mg/l से काफी नीचे दर्ज किया गया।

    हालांकि रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दिसंबर 2024 में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 84 लाख यूनिट और नवंबर 2024 में 79 लाख यूनिट तक पहुंच गया था। इस तुलना में मौजूदा आंकड़े काफी कम हैं लेकिन विशेषज्ञ इस सुधार को लेकर संदेह जता रहे हैं। उनका कहना है कि साल के इस समय यमुना में पानी का प्रवाह बेहद कम होता है ऐसे में प्रदूषण में इतनी बड़ी और अचानक गिरावट व्यावहारिक नहीं लगती।यमुना कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जमीनी हकीकत और रिपोर्ट में दर्शाए गए आंकड़ों के बीच बड़ा अंतर है। नदी से अब भी तेज़ बदबू आती है और कई जगह झाग साफ दिखाई देता है। ऐसे में विशेषज्ञों ने प्रदूषण नियंत्रण समिति से डेटा संग्रह की पद्धति पर सवाल उठाए हैं और पारदर्शिता की मांग की है।

  • प्रदूषण से जूझते मध्य प्रदेश में विकास की भारी कीमत, 15 लाख पेड़ों की कटाई पर उठे गंभीर सवाल

    प्रदूषण से जूझते मध्य प्रदेश में विकास की भारी कीमत, 15 लाख पेड़ों की कटाई पर उठे गंभीर सवाल


    मध्य प्रदेश में एक ओर वायु प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है, वहीं दूसरी ओर विकास परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण एनजीटीद्वारा राज्य के आठ शहरों को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की श्रेणी में रखे जाने के बावजूद इन्हीं क्षेत्रों में लाखों पेड़ों को काटने की तैयारी ने पर्यावरण और जनस्वास्थ्य दोनों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार केवल इन आठ शहरों में ही करीब 6.50 लाख पेड़ों के कटने का प्रस्ताव है, जबकि पूरे प्रदेश में विभिन्न परियोजनाओं के चलते लगभग 15 लाख पेड़ संकट में हैं।

    जिन शहरों को एनजीटी और प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों ने सबसे अधिक प्रदूषित माना है, उनमें भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, सिंगरौली, सागर और देवास शामिल हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सीपीसीबीके अनुसार इन शहरों में पीएम-10 का औसत स्तर 130 से 190 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर और पीएम-2.5 का स्तर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया गया है, जो सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। इसके बावजूद इन्हीं इलाकों में सड़क, मेट्रो, कोयला, ऊर्जा और परिवहन से जुड़ी परियोजनाओं के लिए पुराने और परिपक्व पेड़ों को हटाने की योजनाएं आगे बढ़ाई जा रही हैं।

    सबसे बड़ा पर्यावरणीय खतरा सिंगरौली जिले में प्रस्तावित धिरौली कोल ब्लॉक परियोजना से जुड़ा माना जा रहा है। इस परियोजना के लिए करीब 1,397 हेक्टेयर वन भूमि आवंटित की गई है, जिसमें अधिकांश हिस्सा घने जंगल का है। जानकारी के अनुसार अब तक लगभग 35 हजार पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि करीब 5.70 लाख और पेड़ों के कटने की आशंका जताई जा रही है। सिंगरौली पहले से ही कोयला खनन और ताप विद्युत संयंत्रों के कारण गंभीर प्रदूषण झेल रहा है।राजधानी भोपाल में अयोध्या बायपास को फोरलेन से 10 लेन में तब्दील करने की योजना के तहत लगभग 7,800 पेड़ों को हटाने की अनुमति दी गई है। इसके अलावा कोलार बायपास और बंगरसिया से भोजपुर तक सड़क निर्माण कार्यों में भी बड़ी संख्या में पेड़ पहले ही काटे जा चुके हैं। इंदौर में रीगल चौराहे पर मेट्रो स्टेशन निर्माण के लिए 1,200 से अधिक पेड़ों पर संकट है, जबकि इंदौर-उज्जैन मार्ग के चौड़ीकरण में करीब 3,000 पेड़ प्रभावित होंगे।

    ग्वालियर में थाटीपुर रीडेंसिफिकेशन योजना और अन्य सड़क परियोजनाओं के चलते हजारों पुराने पेड़ हटाए जा चुके हैं या हटाने की प्रक्रिया में हैं। मंडला जिले में बसनिया डेम और उससे जुड़ी नहर व पावर परियोजनाओं से लगभग 2,100 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होगा, जहां करीब 5 लाख पेड़ों के कटने का अनुमान है। डिंडोरी में नर्मदा पर प्रस्तावित राघवपुर बांध और महू-खंडवा रेलवे लाइन परियोजना भी बड़े पैमाने पर वन कटाई का कारण बन रही हैं।पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण से जूझ रहे शहरों में हरित आवरण का इस तरह कम होना सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को और गहरा सकता है। वहीं सरकार का तर्क है कि इन परियोजनाओं के बदले बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाएगा, लेकिन विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि क्या नए पौधे दशकों पुराने पेड़ों की भरपाई कर पाएंगे।