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  • पुलित्जर पुरस्कार नहीं मिलने पर ट्रंप ने जताई नाराजगी, रूस जांच की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर साधा निशाना

    पुलित्जर पुरस्कार नहीं मिलने पर ट्रंप ने जताई नाराजगी, रूस जांच की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों पर साधा निशाना

    नई दिल्ली । अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नोबेल पुरस्कार के बाद अब पुलित्जर पुरस्कार नहीं मिलने पर भी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने दावा किया कि लेखन के क्षेत्र में उनके काम के लिए उन्हें पुलित्जर सम्मान मिलना चाहिए था। बुधवार को दक्षिण कैरोलिना में आयोजित एक रैली के दौरान उन्होंने यह बात कही। इस मौके पर ट्रंप ने रूस से जुड़े मामलों की जांच पर रिपोर्टिंग करने वाले उन पत्रकारों की भी आलोचना की, जिन्हें पुलित्जर पुरस्कार दिया गया था। उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर इस दावे को लेकर चर्चा शुरू हो गई और कई यूजर्स ने उनकी लेखन क्षमता पर सवाल उठाए।

    ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा कि उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके साथ ही उन्होंने लेखन के लिए पुलित्जर पुरस्कार पर भी अपना दावा जताया। उनका आरोप था कि रूस से जुड़े मामलों पर रिपोर्टिंग करने वाले जिन पत्रकारों को यह सम्मान दिया गया, उनकी रिपोर्टिंग गलत थी। ट्रंप के मुताबिक, ऐसे पत्रकारों को पुरस्कार नहीं मिलना चाहिए था।

    रूस से संबंधित जांच और उसकी मीडिया रिपोर्टिंग पहले भी अमेरिकी राजनीति में विवाद का विषय रही है। इस बार ट्रंप ने पुरस्कार विजेता पत्रकारों की रिपोर्टिंग पर सवाल उठाते हुए सम्मान के फैसले की आलोचना की। हालांकि, उनके बयान में रिपोर्टिंग की किन विशिष्ट खबरों या तथ्यों को गलत बताया गया, इसका विस्तृत विवरण नहीं दिया गया।

    ट्रंप अब तक 19 किताबें लिख चुके हैं। उनकी चर्चित पुस्तकों में ‘द आर्ट ऑफ द डील’ शामिल है। इस पुस्तक के जरिए वह कारोबारी दुनिया में अपनी पहचान और व्यावसायिक अनुभवों को सामने रख चुके हैं। पुलित्जर पुरस्कार के लिए अपना दावा पेश करते समय उन्होंने अपने लेखन का उल्लेख किया, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह किस पुस्तक या रचना के आधार पर इस सम्मान के हकदार होने की बात कर रहे थे।

    उनके बयान पर सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ यूजर्स ने ट्रंप की लेखन क्षमता को लेकर व्यंग्य किया। एक यूजर ने टिप्पणी की कि जो व्यक्ति बच्चों की किताब तक नहीं लिख सकता, वह पुलित्जर पुरस्कार पाने की उम्मीद कैसे कर सकता है। एक अन्य यूजर ने उनके अंग्रेजी लिखने और बोलने के तरीके पर तंज कसते हुए कहा कि उनके वाक्यों को समझने के लिए खोजी दल की जरूरत पड़ सकती है। ये प्रतिक्रियाएं सोशल मीडिया पर उनके दावे को लेकर होने वाली आलोचना का हिस्सा रहीं।

    पुलित्जर पुरस्कार को दुनिया के प्रतिष्ठित सम्मानों में गिना जाता है। यह मुख्य रूप से पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट काम के लिए दिया जाता है, लेकिन इसका दायरा केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं है। साहित्य, नाटक और संगीत के क्षेत्र में भी इस पुरस्कार के तहत सम्मान प्रदान किए जाते हैं। इसकी प्रतिष्ठा के कारण इसे कई बार पत्रकारिता के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार जैसी अहमियत वाला सम्मान भी कहा जाता है।

    ट्रंप की टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है, जब वह पहले भी नोबेल पुरस्कार नहीं मिलने को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। उन्होंने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में युद्ध रुकवाने का श्रेय लेते हुए नोबेल पुरस्कार के लिए अपनी दावेदारी का उल्लेख किया है। अब पुलित्जर पुरस्कार को लेकर दिए गए बयान में भी उन्होंने अपने काम को सम्मान के योग्य बताया और पूर्व में सम्मानित पत्रकारों की आलोचना की।

    हालांकि, किसी पुरस्कार के लिए पात्रता और चयन का फैसला संबंधित पुरस्कार संस्था के नियमों तथा निर्णायक प्रक्रिया के आधार पर होता है। ट्रंप के बयान से उनकी व्यक्तिगत अपेक्षा सामने आती है, जबकि रूस से जुड़ी रिपोर्टिंग और पुरस्कार विजेताओं के काम को लेकर उठाए गए उनके सवालों का आकलन संबंधित खबरों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना जरूरी है।

  • नोबेल साहित्य पुरस्कार 2026: रविंद्रनाथ टैगोर के बाद अमिताव घोष के नाम की चर्चा, आज होगा विजेता का ऐलान

    नोबेल साहित्य पुरस्कार 2026: रविंद्रनाथ टैगोर के बाद अमिताव घोष के नाम की चर्चा, आज होगा विजेता का ऐलान


    नई दिल्ली ।नोबेल पुरस्कार 2026 के तहत मेडिसिन, केमिस्ट्री और फिजिक्स के पुरस्कारों की घोषणा हो चुकी है। अब गुरुवार को साहित्य के नोबेल पुरस्कार का ऐलान किया जाएगा। पुरस्कार की घोषणा से पहले संभावित विजेताओं को लेकर चर्चा तेज है। इस बीच भारतीय लेखक अमिताव घोष का नाम भी संभावित विजेताओं में शामिल बताया जा रहा है। यदि उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिलता है, तो वह यह सम्मान पाने वाले दूसरे भारतीय होंगे।

    साहित्य के क्षेत्र में भारत की ओर से अब तक केवल रविंद्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिला है। टैगोर को 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। वह नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई भी थे। ऐसे में अमिताव घोष के नाम की चर्चा ने भारतीय साहित्य के संदर्भ में इस पुरस्कार को लेकर उत्सुकता बढ़ा दी है। हालांकि, अभी साहित्य के नोबेल पुरस्कार के विजेता के नाम की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

    अमिताव घोष की साहित्यिक रचनाओं में इतिहास, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे विषय प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। उनकी चर्चित किताबों में ‘सी ऑफ पॉपीज’ और ‘द ग्रेट डिरेंजमेंट’ शामिल हैं। ‘सी ऑफ पॉपीज’ वर्ष 2008 में इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार की शॉर्टलिस्ट में शामिल हुई थी। यह किताब उनकी आइबिस ट्रिलॉजी का पहला भाग है।

    ‘द ग्रेट डिरेंजमेंट’ में जलवायु परिवर्तन और इंसानों पर उसके प्रभाव से जुड़े विषयों को प्रमुखता से उठाया गया है। अमिताव घोष की किताबों में इतिहास और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के साथ बदलती दुनिया से संबंधित विषय भी दिखाई देते हैं। इसी साहित्यिक काम के कारण इस बार साहित्य के नोबेल पुरस्कार के संभावित नामों में उनका उल्लेख किया जा रहा है।

    2026 के नोबेल पुरस्कारों की घोषणा कई चरणों में की जा रही है। साहित्य के पुरस्कार की घोषणा गुरुवार को होने वाली है। इससे पहले संभावित विजेता के तौर पर कई नामों को लेकर अनुमान लगाए जा रहे हैं। बुकमेकरों की ओर से लगाए गए अनुमानों में अमिताव घोष का नाम भी शामिल है। हालांकि, विजेता का वास्तविक फैसला पुरस्कार की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा।

    यदि अमिताव घोष को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिलता है, तो 1913 में रविंद्रनाथ टैगोर के बाद साहित्य के क्षेत्र में यह भारत के लिए दूसरा नोबेल सम्मान होगा। टैगोर को यह पुरस्कार मिलने के बाद लंबे समय से किसी अन्य भारतीय लेखक को साहित्य का नोबेल नहीं मिला है। इसी वजह से घोष के नाम की चर्चा को खास महत्व मिल रहा है।

    नोबेल पुरस्कार से जुड़े विजेताओं को दिसंबर में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में सम्मानित किया जाएगा। पुरस्कार प्राप्त करने वालों को मेडल, डिप्लोमा और इनामी राशि प्रदान की जाएगी। इस पुरस्कार की राशि 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर बताई गई है, जो भारतीय मुद्रा में करीब 11.5 करोड़ रुपये के बराबर है। साहित्य के नोबेल पुरस्कार के विजेता की घोषणा होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि इस बार यह सम्मान किस लेखक को दिया जाता है।

  • बर्फ के नीचे छिपे मायावी न्यूट्रिनो से ब्रह्मांड के रहस्य खोलने वाले फ्रांसिस हाल्जन को भौतिकी का नोबेल

    बर्फ के नीचे छिपे मायावी न्यूट्रिनो से ब्रह्मांड के रहस्य खोलने वाले फ्रांसिस हाल्जन को भौतिकी का नोबेल

    नई दिल्ली: रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने 2026 का भौतिकी नोबेल पुरस्कार फ्रांसिस हाल्जन को देने का फैसला किया है। उन्हें यह सम्मान आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी में योगदान और खगोलीय मूल के हाई एनर्जी न्यूट्रिनो की खोज के लिए दिया गया है। हाल्जन ने दक्षिण ध्रुव की बर्फ का इस्तेमाल न्यूट्रिनो नामक बेहद मायावी कणों को पकड़ने और ट्रैक करने के लिए करने का दृष्टिकोण विकसित किया। उनके वैज्ञानिक नेतृत्व और विचारों ने ऐसी वेधशाला के निर्माण का रास्ता तैयार किया, जिसके जरिए दूर ब्रह्मांड से आने वाले अत्यधिक ऊर्जावान न्यूट्रिनो का अध्ययन संभव हुआ।

    आइसक्यूब ऑब्जर्वेटरी एक घन किलोमीटर बर्फ में लगाए गए प्रकाश सेंसरों का विशाल नेटवर्क है। जब कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु नाभिक से टकराता है तो प्रकाश की चमक पैदा होती है। साफ ग्लेशियर बर्फ में लगाए गए सेंसर इस चमक को दर्ज कर सकते हैं और उसके आधार पर न्यूट्रिनो के बारे में जानकारी हासिल की जाती है। दक्षिण ध्रुव की बर्फ इस प्रयोग के लिए कई फायदे देती है। यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से स्थिर है और यहां प्रयोग के दौरान कई तरह के व्यवधान कम होते हैं। इसी आधार पर न्यूट्रिनो का पता लगाने की यह तकनीक आगे विकसित होती गई।

    फ्रांसिस हाल्जन ने वर्ष 1988 में दक्षिण ध्रुव पर न्यूट्रिनो पकड़ने का अपना दृष्टिकोण पहली बार प्रस्तुत किया था। उनके विचार को दूसरे शोधकर्ताओं का समर्थन मिला और कुछ वर्षों के भीतर बर्फ में सेंसर लगाने के शुरुआती परीक्षण शुरू हुए। समय के साथ यह परियोजना बड़े वैज्ञानिक प्रयास में बदलती गई और आइसक्यूब दुनिया की सबसे बड़ी न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी बन गई। इसके जरिए वैज्ञानिक उन कणों का अध्ययन कर पा रहे हैं, जो ब्रह्मांड की अत्यंत ऊर्जावान घटनाओं और दूरस्थ स्रोतों से पृथ्वी तक पहुंचते हैं।

    न्यूट्रिनो को ब्रह्मांड के सबसे मायावी कणों में गिना जाता है, क्योंकि वे पदार्थ के साथ बहुत कम प्रतिक्रिया करते हैं और आसानी से उसके आर-पार गुजर सकते हैं। अन्य कणों की तुलना में न्यूट्रिनो अपनी दिशा बदले बिना और ऊर्जा खोए बिना पृथ्वी तक पहुंच सकते हैं। इसी वजह से वे ब्रह्मांड के उन हिस्सों और घटनाओं की जानकारी दे सकते हैं, जिन्हें दूसरे तरीकों से समझना मुश्किल होता है। वैज्ञानिक लंबे समय से जानते हैं कि ब्रह्मांड में प्राकृतिक स्रोत ऐसे कण पैदा करते हैं जिनकी ऊर्जा पृथ्वी की प्रयोगशालाओं में हासिल की जा सकने वाली ऊर्जा से लाखों गुना अधिक हो सकती है। इन स्रोतों की प्रकृति और उनके भीतर चलने वाली प्रक्रियाएं अब भी कई सवाल खड़े करती हैं।

    आइसक्यूब के जरिए हाई एनर्जी वाले खगोलीय न्यूट्रिनो की पुष्टि ने ब्रह्मांड के अध्ययन का नया क्षेत्र खोला है। ऐसे न्यूट्रिनो सुपरनोवा विस्फोट, ब्लैक होल के आसपास होने वाली प्रक्रियाओं और गामा रे बर्स्ट जैसी अत्यंत ऊर्जावान घटनाओं को समझने में मदद कर सकते हैं। न्यूट्रिनो खगोल विज्ञान के जरिए वैज्ञानिक दृश्य प्रकाश और अन्य तरंगों से अलग एक नए नजरिए से ब्रह्मांड को देख पा रहे हैं। दक्षिण ध्रुव की कठिन परिस्थितियों में इतनी विशाल ऑब्जर्वेटरी विकसित करने में हाल्जन के वैज्ञानिक नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यह सम्मान कण भौतिकी और खगोल भौतिकी के संगम में उनके योगदान को मान्यता देता है।