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  • बैतूल में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान छात्रा की तबीयत बिगड़ने के बाद तेज DJ और स्वास्थ्य जोखिम को लेकर सवाल उठे हैं।

    बैतूल में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान छात्रा की तबीयत बिगड़ने के बाद तेज DJ और स्वास्थ्य जोखिम को लेकर सवाल उठे हैं।

    मध्य प्रदेश: के बैतूल में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान 17 वर्षीय छात्रा की अचानक तबीयत बिगड़ने और मौत के बाद तेज DJ की आवाज को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। घटना शुक्रवार रात जेएच कॉलेज परिसर की बताई गई है। छात्रा प्रतीक्षा वर्मा जुलूस के दौरान अपनी छोटी बहन के साथ कॉलेज पहुंची थी। इसी दौरान उसे चक्कर आया और वह बेहोश हो गई। बाद में अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। परिजनों ने तेज DJ की आवाज को उसकी तबीयत बिगड़ने की वजह बताया है, हालांकि मौत की वास्तविक वजह पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

    तेज आवाज शरीर में तनाव की प्रतिक्रिया पैदा कर सकती है। अचानक बहुत अधिक शोर होने पर शरीर में एड्रिनेलिन और कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन बढ़ सकते हैं। इसके चलते कुछ समय के लिए रक्तचाप और हृदय गति बढ़ सकती है। जिन लोगों को पहले से हृदय संबंधी बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर या धड़कन से जुड़ी समस्या है, उनके लिए अत्यधिक शोर और तनाव परेशानी बढ़ाने वाला हो सकता है।

    तेज आवाज और हैवी बेस से पैदा होने वाले कंपन का असर व्यक्ति की शारीरिक स्थिति पर भी पड़ सकता है। कुछ परिस्थितियों में तनाव और अचानक बढ़ा रक्तचाप हृदय की धड़कन को प्रभावित कर सकता है। हालांकि केवल DJ की तेज आवाज को सीधे हार्ट अटैक या कार्डियक अरेस्ट का कारण मानना सही नहीं होगा। इसके लिए व्यक्ति की पहले से मौजूद स्वास्थ्य स्थिति और अन्य परिस्थितियों की भी जांच जरूरी होती है।

    बैतूल की घटना में सामने आई जानकारी के मुताबिक, प्रतीक्षा बीएससी प्रथम वर्ष की छात्रा थी और एसएससी जीडी की तैयारी भी कर रही थी। उसकी बहन वेदिका ने बताया कि कॉलेज परिसर में DJ काफी तेज बज रहा था। इसी दौरान प्रतीक्षा को चक्कर आया। उसे अलग बैठाया गया और बाद में जिला अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल पहुंचने पर उसकी कैरोटिड पल्स नहीं मिली और ECG में फ्लैट लाइन दर्ज हुई। शुरुआती स्थिति कार्डियक अरेस्ट जैसी बताई गई।

    पुलिस के अनुसार, छात्रा के बचपन से ही दिल संबंधी समस्या होने की जानकारी भी सामने आई है। ऐसे में यह पहलू जांच के लिए महत्वपूर्ण है। पुलिस DJ साउंड सिस्टम की तकनीकी जांच भी करा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आयोजन के दौरान ध्वनि का स्तर निर्धारित मानकों से अधिक था या नहीं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और जांच के बाद ही मौत की चिकित्सकीय वजह स्पष्ट हो सकेगी।

    तेज आवाज का जोखिम केवल पहले से हृदय रोग वाले लोगों तक सीमित नहीं माना जा सकता। लंबे समय तक अत्यधिक शोर तनाव, नींद और रक्तचाप पर असर डाल सकता है। भीड़, गर्मी, शारीरिक थकान और लगातार तेज आवाज जैसी परिस्थितियां किसी व्यक्ति की परेशानी बढ़ा सकती हैं।

    ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए देश में निर्धारित नियम लागू हैं। खुले स्थानों पर रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर और ध्वनि विस्तारक उपकरणों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। आयोजन के दौरान निर्धारित ध्वनि सीमा का पालन करना जरूरी है। अस्पताल, स्कूल और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास शोर को लेकर विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।

    DJ की आवाज कितनी तेज है, इसका अंदाजा लगाने के लिए डेसिबल मीटर जैसे उपकरणों का इस्तेमाल किया जा सकता है। बड़े आयोजनों में ध्वनि स्तर की निगरानी से अत्यधिक शोर को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। हृदय संबंधी समस्या वाले लोगों के लिए तेज DJ और भारी भीड़ से दूरी बनाए रखना अतिरिक्त सावधानी हो सकती है।

  • बॉम्बे हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला लाउडस्पीकर का उपयोग किसी धर्म में अनिवार्य नहीं

    बॉम्बे हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला लाउडस्पीकर का उपयोग किसी धर्म में अनिवार्य नहीं


    नई दिल्ली । बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि किसी भी धर्म में लाउडस्पीकर का उपयोग अनिवार्य नहीं है। कोर्ट का यह फैसला महाराष्ट्र के गोंडिया जिले की गौसिया मस्जिद द्वारा दायर याचिका के संदर्भ में आया। मस्जिद ने लाउडस्पीकर के उपयोग को पुनः बहाल करने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इसे खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट का मानना था कि धार्मिक पूजा के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल जरूरी नहीं है, और इसके बिना भी धार्मिक कार्य संपन्न किए जा सकते हैं।

    सुप्रीम कोर्ट के पहले के फैसले का संदर्भ

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी यह स्पष्ट किया था कि किसी भी धर्म में लाउडस्पीकर म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट या ढोल का इस्तेमाल करके शांति भंग करने का निर्देश नहीं दिया गया है। इसके बजाय, सभी धार्मिक गतिविधियां शांतिपूर्ण और बिना किसी व्यवधान के की जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह समझना जरूरी है कि धर्म की प्रामाणिकता लाउडस्पीकर जैसे उपकरणों पर निर्भर नहीं करती।

    याचिकाकर्ता से सबूत की मांग

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता गौसिया मस्जिद से यह प्रमाणित करने के लिए सबूत मांगे थे कि नमाज पढ़ने के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि यह साबित नहीं हो सकता तो लाउडस्पीकर का उपयोग अनुमति देने का कोई आधार नहीं हो सकता। याचिकाकर्ता इस मामले में कोई ठोस दस्तावेज पेश करने में असफल रहा जिससे अदालत ने इसके पक्ष में निर्णय नहीं दिया। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि इस तरह के मामलों में धार्मिक पूजा और ध्वनि प्रदूषण के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

    ध्वनि प्रदूषण और स्वास्थ्य पर असर

    कोर्ट ने ध्वनि प्रदूषण के मुद्दे पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उसने कहा कि लाउडस्पीकर से निकलने वाली ध्वनि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 का उल्लंघन कर सकती है और यह स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत में हर नागरिक को अपनी इच्छा से सुनने का अधिकार है और किसी को बिना उनकी अनुमति के जोर से आवाज सुनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसलिए यह जरूरी है कि हर व्यक्ति की शांति और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए, लाउडस्पीकर का उपयोग नियंत्रित किया जाए।

    समाज में शांति और सम्मान की आवश्यकता

    बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला समाज में शांति और सम्मान बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। जहां एक ओर धार्मिक स्वतंत्रता को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, वहीं दूसरी ओर किसी के अधिकारों का उल्लंघन किए बिना यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि किसी की पूजा-पाठ में व्यवधान न आए। यह फैसला इस बात को भी उजागर करता है कि धार्मिक अनुष्ठानों में लाउडस्पीकर का उपयोग अनिवार्य नहीं है और किसी भी धर्म का पालन शांति और सम्मान के साथ किया जाना चाहिए। अंतत यह फैसला उन स्थानों पर लाउडस्पीकर के उपयोग को लेकर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है जो न केवल धार्मिक स्वतंत्रता बल्कि समाज में शांति और समरसता के लिए भी एक अहम संदेश है।