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  • UPI PIN डालते ही कैसे पहुंचते हैं दूसरे खाते में पैसे, जानें यूपीआई पेमेंट का पूरा तरीका..

    UPI PIN डालते ही कैसे पहुंचते हैं दूसरे खाते में पैसे, जानें यूपीआई पेमेंट का पूरा तरीका..

    नई दिल्ली । आज के डिजिटल दौर में पैसे भेजने और भुगतान करने के लिए यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। दुकानों पर खरीदारी करने, बिजली का बिल भरने, ऑनलाइन सामान खरीदने या किसी परिचित को रकम भेजने जैसे काम अब मोबाइल के जरिए कुछ ही सेकंड में पूरे हो जाते हैं। Google Pay, PhonePe, Paytm और BHIM जैसे ऐप के माध्यम से लोग सीधे अपने बैंक खाते से भुगतान कर सकते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यूपीआई पिन डालते ही एक खाते से पैसे कटकर दूसरे खाते में कैसे पहुंच जाते हैं? इसके पीछे बैंकिंग व्यवस्था और डिजिटल भुगतान नेटवर्क की एक निर्धारित प्रक्रिया काम करती है।

    यूपीआई एक डिजिटल भुगतान प्रणाली है, जिसे नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने विकसित किया है। इसकी मदद से दो बैंक खातों के बीच तुरंत धनराशि ट्रांसफर की जा सकती है। इस व्यवस्था में हर बार बैंक खाता संख्या या आईएफएससी कोड दर्ज करना जरूरी नहीं होता। उपयोगकर्ता यूपीआई आईडी, पंजीकृत मोबाइल नंबर या क्यूआर कोड के माध्यम से भी भुगतान कर सकते हैं। इससे लेनदेन की प्रक्रिया आसान और तेज हो जाती है।

    मान लीजिए कि आपको किसी दुकानदार को 500 रुपये देने हैं। इसके लिए आप अपने मोबाइल में यूपीआई ऐप खोलते हैं और दुकानदार का क्यूआर कोड स्कैन करते हैं। इसके बाद भुगतान की जाने वाली रकम दर्ज करके आगे बढ़ते हैं। लेनदेन को अधिकृत करने के लिए आपको अपना यूपीआई पिन डालना होता है। पिन दर्ज करने के बाद ऐप भुगतान का अनुरोध संबंधित बैंकिंग प्रणाली तक पहुंचाता है। इसके बाद यूपीआई नेटवर्क इस अनुरोध को लेनदेन में शामिल बैंकों के बीच आगे बढ़ाता है।

    सबसे पहले भुगतान करने वाले व्यक्ति का बैंक जरूरी जांच करता है। इसमें यूपीआई पिन का सत्यापन और खाते में उपलब्ध राशि की जांच शामिल होती है। यदि पिन सही है, खाते में पर्याप्त बैलेंस है और अन्य आवश्यक जांच पूरी हो जाती हैं, तो बैंक भुगतान को मंजूरी देकर खाते से 500 रुपये काट लेता है। यदि पिन गलत हो या खाते में पर्याप्त राशि उपलब्ध न हो, तो लेनदेन असफल हो सकता है।

    इसके बाद यूपीआई नेटवर्क प्राप्तकर्ता के बैंक तक भुगतान से जुड़ी जानकारी पहुंचाता है। प्राप्तकर्ता बैंक संबंधित खाते में निर्धारित रकम जमा कर देता है। इस तरह भुगतान करने वाले व्यक्ति के खाते से पैसे निकलकर दूसरे व्यक्ति के खाते में पहुंच जाते हैं। पूरी प्रक्रिया इलेक्ट्रॉनिक तरीके से होती है, इसलिए सामान्य परिस्थितियों में लेनदेन कुछ ही सेकंड में पूरा हो जाता है। हालांकि, ग्राहक के खाते में राशि दिखने और बैंकों के बीच लेनदेन का अंतिम निपटान होने की प्रक्रियाएं अलग-अलग हो सकती हैं।

    यूपीआई भुगतान में पिन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यह भुगतान करने वाले व्यक्ति की पहचान और लेनदेन को अधिकृत करने में मदद करता है। इसलिए अपना यूपीआई पिन किसी अन्य व्यक्ति के साथ साझा नहीं करना चाहिए। मोबाइल या यूपीआई ऐप तक किसी की पहुंच होने मात्र से वह सामान्य भुगतान पूरा नहीं कर सकता, लेकिन पिन साझा करने या धोखाधड़ी के कारण जोखिम बढ़ सकता है।

    सबसे जरूरी बात यह है कि यूपीआई पिन का इस्तेमाल पैसे भेजने या भुगतान करने के लिए किया जाता है, पैसे प्राप्त करने के लिए नहीं। यदि कोई व्यक्ति रकम भेजने के नाम पर आपसे पिन डालने को कहता है, तो सावधान रहें। अनजान भुगतान अनुरोधों को स्वीकार करने से पहले उनकी जांच करें और किसी भी स्थिति में अपना पिन या गोपनीय बैंकिंग जानकारी साझा न करें।

  • यूपीआई भुगतान पर एमडीआर शुल्क लगाने का फैसला दीपावली तक टला, दुकानदार फिर लगाएंगे क्यूआर कोड, ग्राहकों को मिलेगी राहत

    यूपीआई भुगतान पर एमडीआर शुल्क लगाने का फैसला दीपावली तक टला, दुकानदार फिर लगाएंगे क्यूआर कोड, ग्राहकों को मिलेगी राहत


    नई दिल्ली ।
    त्योहारी सीजन के बीच दुकानदारों को राहत मिली है। यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) शुल्क लागू करने का फैसला फिलहाल टाल दिया गया है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाली थी, लेकिन अब इसे दीपावली के बाद तक स्थगित कर दिया गया है। नई तारीख को लेकर आगे निर्णय लिया जाएगा। इस फैसले से छोटे और बड़े कारोबारियों ने राहत की सांस ली है।
    यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाए जाने की खबर सामने आने के बाद कई दुकानदारों की चिंता बढ़ गई थी। कारोबारियों को आशंका थी कि अतिरिक्त शुल्क लागू होने से उनके खर्च में बढ़ोतरी होगी और इसका असर कारोबार पर पड़ सकता है। इसी वजह से कुछ दुकानदार ग्राहकों से यूपीआई के जरिए भुगतान लेने से बचने लगे थे। कई दुकानों पर नकद भुगतान को प्राथमिकता दी जा रही थी, जबकि कुछ कारोबारियों ने अपनी दुकानों से यूपीआई क्यूआर कोड हटाने भी शुरू कर दिए थे।
    अब शुल्क लागू करने का फैसला स्थगित होने से दुकानदारों को राहत मिली है। कई कारोबारियों का कहना है कि वे दोबारा अपनी दुकानों पर क्यूआर कोड लगाएंगे, ताकि ग्राहक पहले की तरह डिजिटल माध्यम से भुगतान कर सकें। त्योहारी मौसम में खरीदारी बढ़ने के दौरान यूपीआई भुगतान की सुविधा कारोबारियों और ग्राहकों, दोनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ऐसे में प्रस्तावित शुल्क पर रोक से दुकानदार फिलहाल अपने कारोबार पर ध्यान दे सकेंगे।
    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क लगाए जाने की बात कही गई थी। हालांकि, अब इसकी समयसीमा आगे बढ़ा दी गई है। नई तारीख को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। कारोबारियों को आगे होने वाले फैसले का इंतजार है कि शुल्क व्यवस्था किस तारीख से लागू होगी या इस संबंध में क्या निर्णय लिया जाएगा।
    दिल्ली के लाजपत नगर में एक दुकानदार ने कहा कि यूपीआई लेनदेन को शुल्क-मुक्त रखने से कारोबारियों को काफी फायदा हुआ है। त्योहारों के दौरान ग्राहक बिना किसी झिझक के यूपीआई से भुगतान कर रहे हैं। इससे दुकानों पर ग्राहकों की आवाजाही बनी रहती है और कारोबार सामान्य रूप से चलता है। दुकानदार के मुताबिक, डिजिटल भुगतान की सुविधा ग्राहकों के लिए उपयोगी है और इससे खरीदारी के समय भुगतान करना आसान रहता है।
    दुकानदार ने इस फैसले को सकारात्मक बताया। हालांकि, उसने यह भी कहा कि आगे इस व्यवस्था को जारी रखने के संबंध में क्या निर्णय लिया जाता है, यह देखना होगा। शुल्क लगाने की नई तारीख तय होने के बाद ही स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
    कारोबारियों का कहना है कि यूपीआई देश में डिजिटल भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुका है। ऐसे में इस तरह के लेनदेन पर अतिरिक्त शुल्क लगाने से छोटे दुकानदारों और ग्राहकों पर आर्थिक असर पड़ सकता है। फिलहाल फैसला टलने से दुकानदारों को राहत मिली है। अब वे त्योहारी सीजन में ग्राहकों को डिजिटल भुगतान की सुविधा देने और अपने कारोबार पर ध्यान केंद्रित करने की तैयारी कर रहे हैं।
  • UPI पेमेंट पर MDR चार्ज लगाने की समय सीमा बढ़ी, 1 जनवरी 2027 तक टली व्यवस्था से व्यापारियों को मिलेगी राहत

    UPI पेमेंट पर MDR चार्ज लगाने की समय सीमा बढ़ी, 1 जनवरी 2027 तक टली व्यवस्था से व्यापारियों को मिलेगी राहत

    नई दिल्ली । त्योहारी सीजन के दौरान डिजिटल भुगतान करने वाले व्यापारियों के लिए राहत की खबर है। यूपीआई लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) शुल्क लागू करने की समय सीमा आगे बढ़ा दी गई है। पहले इस व्यवस्था को 15 अक्टूबर से लागू किए जाने की बात सामने आई थी, लेकिन अब इसकी समय सीमा बढ़ाकर 1 जनवरी 2027 कर दी गई है। इस फैसले से देशभर के छोटे-बड़े दुकानदारों और कारोबारियों को अतिरिक्त समय मिल गया है। त्योहारी खरीदारी के बीच व्यापारियों की चिंताओं और नई व्यवस्था को लागू करने की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया है।

    एमडीआर का पूरा नाम मर्चेंट डिस्काउंट रेट है। यह वह शुल्क होता है, जो किसी दुकानदार या कारोबारी से डिजिटल भुगतान स्वीकार करने के बदले लिया जाता है। आमतौर पर यह रकम भुगतान सेवाएं उपलब्ध कराने वाले बैंकों, फिनटेक कंपनियों या भुगतान व्यवस्था से जुड़ी संस्थाओं को मिलती है। यूपीआई के जरिए भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारियों के लिए इस तरह के शुल्क की समय सीमा और दरें कारोबार की लागत को प्रभावित कर सकती हैं। इसी वजह से एमडीआर लागू करने की तारीख को लेकर व्यापारियों के बीच चिंता बनी हुई थी।

    हाल ही में 2,000 रुपये से अधिक के डिजिटल लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर शुल्क तय किए जाने की बात सामने आई थी। इस व्यवस्था से भुगतान गेटवे और पेटीएम तथा मोबिक्विक जैसी कंपनियों को फायदा मिलने की उम्मीद जताई गई थी। शुल्क लागू होने की संभावित व्यवस्था को लेकर भुगतान सेवाओं से जुड़ी कंपनियों के राजस्व में बढ़ोतरी की संभावना भी चर्चा में रही। हालांकि, अब समय सीमा आगे बढ़ने के कारण व्यापारियों और संबंधित कंपनियों को नई व्यवस्था के लिए तैयारी करने का अधिक समय मिलेगा।

    समय सीमा बढ़ाने के पीछे व्यापारियों की ओर से उठाई गई चिंताओं को भी अहम माना गया है। कारोबारियों और मर्चेंट्स की मांग थी कि नई व्यवस्था को ठीक से समझने और लागू करने के लिए उन्हें कुछ और समय दिया जाए। त्योहारी सीजन को देखते हुए 15 अक्टूबर से इसे लागू करने के बजाय समय सीमा आगे बढ़ाने का फैसला लिया गया। इस दौरान दुकानदारों को अपने भुगतान से जुड़े कामकाज और व्यवस्था को समझने का अवसर मिलेगा। त्योहारी खरीदारी के समय डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल बढ़ने के बीच यह फैसला कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    समय सीमा बढ़ने से देशभर के लाखों छोटे-बड़े व्यापारियों को राहत मिलने की उम्मीद है। कई कारोबारी संभावित डिजिटल भुगतान शुल्क को लेकर चिंतित थे, क्योंकि इससे उनके कारोबार की लागत और मुनाफे पर असर पड़ सकता था। अब नई तारीख तक उन्हें इस व्यवस्था को समझने और उसके लिए तैयारी करने का अतिरिक्त समय मिलेगा। हालांकि, शुल्क लागू होने पर इसका वास्तविक असर कारोबार के आकार और भुगतान व्यवस्था के इस्तेमाल के तरीके पर निर्भर करेगा।

    इस फैसले का असर भुगतान सेवाएं देने वाली कंपनियों पर भी पड़ सकता है। जब पिछले महीने एमडीआर से जुड़ी व्यवस्था की घोषणा हुई थी, तब भुगतान गेटवे और फिनटेक कंपनियों के शेयरों में तेजी देखी गई थी। उस समय इन कंपनियों के राजस्व में बढ़ोतरी की उम्मीद जताई गई थी। अब शुल्क लागू करने की समय सीमा बढ़ने से इस व्यवस्था के प्रभाव को लेकर बाजार की उम्मीदों और व्यापारियों की तैयारियों के बीच अधिक समय मिल गया है। फिलहाल, एमडीआर से जुड़ी नई समय सीमा 1 जनवरी 2027 तय की गई है।

  • यूपीआई एमडीआर लागू करने की तारीख टली, दीपावली के तुरंत बाद चुनिंदा डिजिटल भुगतानों पर व्यापारियों से लिया जाएगा शुल्क

    यूपीआई एमडीआर लागू करने की तारीख टली, दीपावली के तुरंत बाद चुनिंदा डिजिटल भुगतानों पर व्यापारियों से लिया जाएगा शुल्क

    नई दिल्ली ।भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) ने प्रस्तावित यूपीआई मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) फ्रेमवर्क लागू करने का समय आगे बढ़ा दिया है। अब इसे दीपावली के तुरंत बाद लागू किया जाएगा। हालांकि, इसके लिए कोई निश्चित तारीख घोषित नहीं की गई है। एनपीसीआई ने मंगलवार, 13 अक्टूबर को जारी अधिसूचना में बताया कि यूपीआई और सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी ने त्योहारों के मौसम को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लिया है। लागू होने की तारीख की जानकारी अलग से दी जाएगी।

    यह निर्णय ऐसे समय में आया है, जब व्यापारी संगठनों, फिनटेक कंपनियों और भुगतान सेवाएं देने वाली कंपनियों ने फ्रेमवर्क लागू करने की तारीख आगे बढ़ाने की मांग की थी। इन संगठनों को आशंका थी कि त्योहारों के दौरान बिक्री अधिक रहने के बीच नए शुल्क की व्यवस्था लागू होने से कारोबार प्रभावित हो सकता है। इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए इसे दीपावली के बाद लागू करने का फैसला किया गया है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा पर्सन-टू-मर्चेंट (पी2एम) यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर की दर 0.4 प्रतिशत निर्धारित की गई है। यह दर पिछले महीने यूपीआई स्टीयरिंग कमेटी ने तय की थी। हालांकि, यह शुल्क सभी यूपीआई लेनदेन पर लागू नहीं होगा, बल्कि निर्धारित श्रेणी के व्यापारी भुगतानों तक सीमित रहेगा।

    एमडीआर वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया पूरी करने के बदले व्यापारियों से लिया जाता है। निर्धारित दर के हिसाब से 2,000 रुपये के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत की गणना करने पर 8 रुपये शुल्क बनता है। इसी तरह 10,000 रुपये के भुगतान पर यह राशि 40 रुपये होती है। यह गणना निर्धारित शुल्क दर के आधार पर है और वास्तविक लागू होने की शर्तें संबंधित व्यवस्था के अनुसार होंगी।

    सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि यूपीआई एमडीआर का भुगतान व्यापारियों को करना होगा। वे इस शुल्क को किसी भी तरीके से ग्राहकों पर नहीं डाल सकते। इसका अर्थ है कि निर्धारित व्यवस्था के तहत शुल्क की जिम्मेदारी व्यापारी की होगी और ग्राहकों से इसे अलग से वसूलने की अनुमति नहीं होगी।

    इस प्रस्ताव पर भुगतान क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच चर्चा भी हुई है। विश्व बैंक समूह के कार्यकारी निदेशक नीलकंठ मिश्रा ने इससे पहले कहा था कि यूपीआई लेनदेन पर एमडीआर की अनुमति देना एक अधिकार प्रदान करने वाले नियम की तरह होगा। उनका मानना था कि भुगतान क्षेत्र में मौजूद प्रतिस्पर्धा के कारण शुल्क में बड़े स्तर पर बढ़ोतरी की आशंका कम है।

    मिश्रा ने कहा था कि बाजार में ऐसी कंपनियां भी रही हैं, जो एमडीआर शुल्क नहीं ले पाने के बावजूद अपना कारोबार जारी रखने और बाजार में बने रहने में सफल रहीं। उनके बयान का मुख्य आधार भुगतान क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा थी। फिलहाल एनपीसीआई ने फ्रेमवर्क लागू करने के लिए दीपावली के बाद का समय तय किया है, जबकि इसकी सटीक तारीख और लागू होने से जुड़ी विस्तृत जानकारी की घोषणा अभी बाकी है।

  • व्यापारी संगठनों ने नए UPI MDR फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की मांग की, बिक्री प्रभावित होने की जताई आशंका

    व्यापारी संगठनों ने नए UPI MDR फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की मांग की, बिक्री प्रभावित होने की जताई आशंका


    नई दिल्ली ।
    व्यापारी संगठनों ने 15 अक्टूबर से लागू होने वाले नए यूपीआई एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट फ्रेमवर्क को त्योहारी सीजन तक टालने की अपील की है। संगठनों ने भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) से इस प्रस्ताव को त्योहारी सीजन और अगले साल की शुरुआत तक लागू नहीं करने का अनुरोध किया है। व्यापारियों का कहना है कि यदि बदलाव तय समय पर लागू किया गया तो त्योहारी सीजन के दौरान उनकी बिक्री पर असर पड़ सकता है।

    नए एमडीआर फ्रेमवर्क के तहत 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतान पर चुनिंदा व्यापारी श्रेणियों के लिए 5 रुपये का एक समान शुल्क लागू किया जाएगा। इसके अलावा 2,000 रुपये से अधिक के बड़े पर्सन-टू-मर्चेंट यानी पी2एम भुगतान पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाया जाएगा। इस शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये निर्धारित की गई है।

    प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर व्यापारी संगठनों की मुख्य चिंता त्योहारी सीजन में लेनदेन और बिक्री पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर है। संगठनों ने इसी वजह से नए फ्रेमवर्क को कुछ समय के लिए टालने की अपील की है। उनका आग्रह है कि इसे त्योहारी खरीदारी की अवधि समाप्त होने और अगले साल की शुरुआत तक लागू न किया जाए।

    एनपीसीआई के अनुमान के अनुसार, प्रस्तावित बदलाव का असर मर्चेंट ट्रांजैक्शन के केवल 4 प्रतिशत हिस्से पर पड़ेगा। संस्था के मुताबिक 95 प्रतिशत से अधिक पर्सन-टू-मर्चेंट यूपीआई भुगतान इस एमडीआर फ्रेमवर्क के दायरे से बाहर रहेंगे। वहीं, पीयर-टू-पीयर यानी पी2पी मर्चेंट मॉडल का इस्तेमाल करने वाले छोटे व्यापारियों को जीरो एमडीआर की सुविधा पहले की तरह मिलती रहेगी।

    आम यूपीआई उपयोगकर्ताओं के लिए मुफ्त यूपीआई इस्तेमाल को लेकर किसी मासिक कोटे या सीमा का प्रावधान नहीं किया गया है। उपयोगकर्ता तय मुफ्त फ्रेमवर्क के तहत लेनदेन जारी रख सकेंगे और उन पर एमडीआर शुल्क नहीं लगाया जाएगा। इस तरह प्रस्तावित बदलाव का सीधा दायरा मुख्य रूप से कुछ विशेष व्यापारी श्रेणियों और निर्धारित भुगतान लेनदेन तक सीमित रहेगा।

    नए फ्रेमवर्क में छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष फंड बनाने का भी प्रावधान है। इसके लिए कुल एमडीआर कलेक्शन का 5 प्रतिशत हिस्सा निर्धारित किया गया है। एमडीआर से मिलने वाली राशि को अलग-अलग कंपनियों के बीच वितरित किया जाएगा। इस राशि का इस्तेमाल यूपीआई के विस्तार, साइबर सुरक्षा और इनोवेशन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया जाएगा।

    इसके साथ ही एनपीसीआई ने बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा है कि व्यापारी एमडीआर शुल्क का बोझ ग्राहकों पर न डालें। ऐसे में नए फ्रेमवर्क में शुल्क व्यवस्था के साथ व्यापारियों और ग्राहकों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान रखे गए हैं। फिलहाल व्यापारी संगठन नए एमडीआर फ्रेमवर्क को लागू करने की तारीख आगे बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, ताकि त्योहारी अवधि के दौरान उनकी बिक्री पर संभावित असर से बचा जा सके।

  • यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर को लेकर बड़ी सफाई, 96 प्रतिशत से ज्यादा ट्रांजैक्शन पर नहीं पड़ेगा शुल्क का असर

    यूपीआई पेमेंट पर एमडीआर को लेकर बड़ी सफाई, 96 प्रतिशत से ज्यादा ट्रांजैक्शन पर नहीं पड़ेगा शुल्क का असर

    नई दिल्ली ।यू पीआई भुगतान को लेकर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर और उस पर लगने वाले जीएसटी को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच स्थिति स्पष्ट की गई है। नई व्यवस्था के तहत छोटे व्यापारियों और कम राशि वाले अधिकांश यूपीआई भुगतान पर एमडीआर का बोझ नहीं पड़ेगा।

    जानकारी के अनुसार, 2,000 रुपये तक के सभी व्यक्ति-से-व्यापारी यानी पी2एम यूपीआई ट्रांजैक्शन पर पहले की तरह शून्य एमडीआर लागू रहेगा। ऐसे भुगतान पर एमडीआर नहीं होने के कारण उससे संबंधित जीएसटी का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2,000 रुपये तक के भुगतान यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन वॉल्यूम का 96 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। इसका मतलब है कि यूपीआई के माध्यम से होने वाले अधिकांश व्यापारी भुगतान एमडीआर और उससे जुड़े जीएसटी दायित्व से बाहर रहेंगे।

    छोटे व्यापारियों के लिए एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान भी रखा गया है। जिन व्यापारियों की मासिक यूपीआई प्राप्तियां एक लाख रुपये तक हैं, उन्हें एमडीआर का भुगतान नहीं करना होगा। इसलिए इस श्रेणी के व्यापारियों पर एमडीआर के संबंध में जीएसटी लगने का सवाल भी नहीं उठता।

    एमडीआर का उद्देश्य यूपीआई भुगतान व्यवस्था से जुड़े विभिन्न भागीदारों के बीच भुगतान प्रक्रिया की लागत को पूरा करना है। इसमें बैंक, भुगतान सेवा प्रदाता और यूपीआई एप प्रदाता जैसे भागीदार शामिल होते हैं। एमडीआर सरकार या यूपीआई व्यवस्था संचालित करने वाली संस्था द्वारा लगाया जाने वाला कोई कर नहीं है।

    नई व्यवस्था में 2,000 रुपये से अधिक के पी2एम यूपीआई ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होगा। हालांकि, 75,000 रुपये या उससे अधिक के ट्रांजैक्शन के लिए एमडीआर की अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति ट्रांजैक्शन निर्धारित की गई है।

    कुछ आवश्यक और कम मार्जिन वाले क्षेत्रों के लिए अलग व्यवस्था रखी गई है। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे क्षेत्रों में 2,000 रुपये से अधिक के ट्रांजैक्शन पर पांच रुपये प्रति ट्रांजैक्शन का फ्लैट एमडीआर लागू होगा। इसका उद्देश्य इन क्षेत्रों में भुगतान लागत को सीमित और पूर्वानुमेय रखना है।

    एमडीआर पर जीएसटी को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है। यदि किसी व्यापारी को एमडीआर पर जीएसटी का भुगतान करना पड़ता है, तो वह अन्य इनपुट टैक्स की तरह इस राशि को अपनी जीएसटी देनदारी के विरुद्ध समायोजित कर सकता है। ऐसे में यह राशि सीधे तौर पर व्यापारी की अंतिम लागत नहीं बनती।

    दूसरी ओर, व्यक्ति-से-व्यक्ति यानी पी2पी यूपीआई भुगतान पहले की तरह पूरी तरह मुफ्त रहेंगे। इसमें भुगतान की राशि कितनी भी हो, पी2पी ट्रांजैक्शन पर एमडीआर लागू नहीं होगा।

    इस व्यवस्था का असर मुख्य रूप से 2,000 रुपये से अधिक के कुछ पी2एम भुगतान पर पड़ेगा। वहीं कम राशि वाले भुगतान और एक लाख रुपये तक की मासिक यूपीआई प्राप्ति वाले छोटे व्यापारी इससे बाहर रहेंगे।

    कुल मिलाकर, यूपीआई मर्चेंट ट्रांजैक्शन के बड़े हिस्से पर शून्य एमडीआर की व्यवस्था जारी रहेगी। 96 प्रतिशत से अधिक मर्चेंट ट्रांजैक्शन 2,000 रुपये तक के होने के कारण अधिकांश डिजिटल भुगतान इस शुल्क व्यवस्था के दायरे में नहीं आएंगे।

  • UPI पेमेंट पर चार्ज की तैयारी, 2000 रुपये तक कोई शुल्क नहीं, बड़े भुगतान पर दुकानदारों से वसूली संभव

    UPI पेमेंट पर चार्ज की तैयारी, 2000 रुपये तक कोई शुल्क नहीं, बड़े भुगतान पर दुकानदारों से वसूली संभव

    नई दिल्ली । UPI से भुगतान करने वाले लोगों के लिए शुल्क से जुड़ा नया बदलाव सामने आया है। 2000 रुपये तक के UPI भुगतान पर कोई चार्ज नहीं लगाया जाएगा, जबकि इससे अधिक राशि के भुगतान पर शुल्क लगाने का रास्ता साफ होने की बात सामने आई है। हालांकि, इस शुल्क का सीधा भुगतान ग्राहक को नहीं करना होगा। 2000 रुपये से अधिक के लेनदेन पर लगने वाले शुल्क की दर तय करने की जिम्मेदारी NPCI यानी नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया की होगी।

    अब तक UPI भुगतान को लेकर यह व्यवस्था थी कि किसी भी राशि के लेनदेन पर कोई चार्ज नहीं लिया जाता था। नई व्यवस्था में 2000 रुपये तक के भुगतान को शुल्क से बाहर रखा गया है। इससे ज्यादा राशि के भुगतान पर शुल्क की व्यवस्था लागू होने की संभावना है। ऐसे में बड़े मूल्य के UPI लेनदेन करने वाले दुकानदारों और कारोबारियों पर इसका असर पड़ सकता है।

    सामने आई जानकारी के अनुसार 2000 रुपये से अधिक के UPI भुगतान पर शुल्क कितना होगा, इसका अंतिम फैसला NPCI करेगा। इसकी दर 0.3 से 0.5 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान लगाया जा रहा है। हालांकि, यह अंतिम दर नहीं है और वास्तविक शुल्क NPCI के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगा।

    यदि शुल्क की दर 0.3 से 0.5 प्रतिशत के बीच रहती है, तो 5000 रुपये के भुगतान पर 15 से 25 रुपये तक का शुल्क बन सकता है। यह राशि ग्राहक से सीधे वसूल किए जाने की बात नहीं है। इसका भुगतान दुकानदार या संबंधित व्यापारी को करना होगा। यानी किसी दुकान पर 5000 रुपये का सामान खरीदने के लिए UPI से भुगतान करने वाले ग्राहक को अलग से 15 या 25 रुपये देने की जरूरत नहीं होगी।

    इस व्यवस्था में व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले UPI लेनदेन को अलग रखा गया है। यानी कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को पैसे भेजता है, तो राशि कितनी भी हो, उसके लिए चार्ज नहीं लगेगा। इस तरह व्यक्तिगत लेनदेन पर शुल्क का असर नहीं पड़ेगा।

    बदलाव का मुख्य असर व्यापारिक भुगतान पर पड़ने की संभावना है। दुकानदारों और कारोबारियों द्वारा ग्राहकों से सामान या सेवाओं के बदले UPI के जरिए प्राप्त की जाने वाली बड़ी रकम पर शुल्क लागू हो सकता है। हालांकि, इस शुल्क की अंतिम दर और लागू होने से जुड़ी विस्तृत व्यवस्था NPCI के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।

    UPI देश में डिजिटल भुगतान का प्रमुख माध्यम बन चुका है और छोटे से लेकर बड़े लेनदेन तक इसका इस्तेमाल किया जाता है। नई व्यवस्था में 2000 रुपये तक के भुगतान को बिना शुल्क जारी रखने की बात कही गई है। इससे रोजमर्रा की छोटी खरीदारी के लिए UPI इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों पर सीधे शुल्क का प्रभाव नहीं पड़ेगा।

    दूसरी ओर, 2000 रुपये से अधिक के भुगतान पर शुल्क की संभावित व्यवस्था कारोबारियों के लिए नई लागत पैदा कर सकती है। हालांकि, व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले लेनदेन पर किसी राशि की सीमा के आधार पर शुल्क नहीं लगाया जाएगा।

    फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बिंदु NPCI द्वारा तय की जाने वाली शुल्क दर है। 2000 रुपये से अधिक के UPI भुगतान पर कितना प्रतिशत शुल्क लगेगा और यह व्यवस्था किस तरह लागू होगी, इसकी तस्वीर अंतिम निर्णय के बाद साफ होगी। फिलहाल 2000 रुपये तक के भुगतान को शुल्क से मुक्त रखने की व्यवस्था बताई गई है।

  • UPI पर MDR शुल्क को लेकर नया मॉडल तैयार, छोटे कारोबारियों को राहत देकर बड़े मर्चेंट्स से शुल्क लेने की तैयारी

    UPI पर MDR शुल्क को लेकर नया मॉडल तैयार, छोटे कारोबारियों को राहत देकर बड़े मर्चेंट्स से शुल्क लेने की तैयारी

    नई दिल्ली ।भारत में डिजिटल भुगतान के सबसे प्रमुख माध्यमों में शामिल UPI पर लंबे समय से शुल्क व्यवस्था को लेकर चर्चा होती रही है। मौजूदा व्यवस्था में आम तौर पर UPI लेनदेन पर सीधे मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR का बोझ नहीं पड़ता। इससे ग्राहकों के लिए भुगतान आसान और बिना अतिरिक्त शुल्क के बना हुआ है, लेकिन डिजिटल भुगतान से जुड़ी कंपनियों और बुनियादी ढांचे की लागत को लेकर वित्तीय दबाव की चर्चा लगातार सामने आती रही है।

    इसी चुनौती के बीच डेबिट कार्ड से जुड़े पुराने नियामकीय मॉडल को UPI के लिए संभावित आधार के तौर पर देखा जा रहा है। इस विचार के तहत शुल्क व्यवस्था ऐसी बनाई जा सकती है, जिसमें छोटे कारोबारियों को अतिरिक्त लागत से बचाया जाए और बड़े तथा संगठित कारोबारियों से सीमित शुल्क लिया जाए।

    डेबिट कार्ड से जुड़े नियमों में छोटे कारोबारियों के लिए MDR की ऊपरी सीमा कम रखी गई है। सालाना 20 लाख रुपये से कम कारोबार करने वाले छोटे मर्चेंट्स के लिए अधिकतम MDR 0.40 प्रतिशत तक सीमित रखने का प्रावधान बताया गया है। इसी तरह के सिद्धांत को UPI में अपनाने पर छोटे किराना दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे कारोबारियों को शुल्क से पूरी तरह राहत देने का विकल्प बन सकता है।

    दूसरी ओर बड़े शोरूम, मॉल, ई-कॉमर्स कंपनियों और संगठित रिटेल कारोबार को अलग श्रेणी में रखा जा सकता है। ऐसे कारोबारियों से उनकी भुगतान क्षमता और कारोबार के आकार के अनुसार मामूली MDR लेने का प्रस्ताव चर्चा में है। इसका उद्देश्य UPI के संचालन और भुगतान व्यवस्था की लागत को साझा करना हो सकता है, बिना छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त बोझ डाले।

    इस संभावित मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आम उपभोक्ताओं को सीधे शुल्क से बचाना है। बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में UPI के जरिए पैसे भेजने वाले ग्राहकों के लिए भुगतान मुफ्त रखने की कोशिश की जा सकती है। यानी शुल्क व्यवस्था लागू होने की स्थिति में भी इसका सीधा असर सामान्य व्यक्ति के प्रत्येक UPI भुगतान पर डालने से बचने का विकल्प रखा जा सकता है।

    UPI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ लेनदेन की संख्या और डिजिटल भुगतान प्रणाली को संचालित करने के लिए आवश्यक तकनीकी ढांचे की लागत भी बढ़ रही है। भुगतान कंपनियों को सर्वर, सुरक्षा, तकनीकी रखरखाव और अन्य व्यवस्थाओं पर लगातार खर्च करना पड़ता है। ऐसे में लंबे समय तक शून्य MDR व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार की ओर से प्रोत्साहन राशि की जरूरत पड़ती है।

    प्रस्तावित मॉडल का एक उद्देश्य इस वित्तीय दबाव को कम करना भी हो सकता है। यदि बड़े मर्चेंट्स से सीमित शुल्क लिया जाता है, तो भुगतान व्यवस्था से जुड़े पक्षों के लिए अतिरिक्त राजस्व का स्रोत बन सकता है। इससे तकनीकी ढांचे और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि डेबिट कार्ड से जुड़े नियमों को UPI पर उसी रूप में लागू करना तय नहीं है। UPI की मौजूदा संरचना, भुगतान प्रक्रिया और इसमें शामिल संस्थाओं को देखते हुए किसी भी शुल्क मॉडल के लिए अलग नियम और शर्तें तय करनी पड़ सकती हैं।

    फिलहाल चर्चा का केंद्र यही है कि डिजिटल भुगतान की लोकप्रियता और मुफ्त लेनदेन की सुविधा बरकरार रखते हुए व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए। यदि छोटे कारोबारियों और आम ग्राहकों को सुरक्षित रखते हुए बड़े मर्चेंट्स से सीमित शुल्क लेने का मॉडल तैयार होता है, तो UPI के विस्तार और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

  • UPI का दबदबा कायम, जुलाई में रिकॉर्ड 23.66 अरब ट्रांजैक्शन से डिजिटल पेमेंट ने पकड़ी नई रफ्तार

    UPI का दबदबा कायम, जुलाई में रिकॉर्ड 23.66 अरब ट्रांजैक्शन से डिजिटल पेमेंट ने पकड़ी नई रफ्तार


    नई दिल्ली। देश में डिजिटल भुगतान व्यवस्था लगातार मजबूत होती जा रही है और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई ने एक बार फिर शानदार प्रदर्शन दर्ज किया है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में यूपीआई के माध्यम से किए गए लेनदेन की संख्या में सालाना आधार पर 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान कुल 23.66 अरब यानी 2366 करोड़ से ज्यादा यूपीआई ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए। वहीं, इन डिजिटल लेनदेन का कुल मूल्य 19 प्रतिशत बढ़कर 29.88 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

    आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई महीने में हर दिन औसतन 76.3 करोड़ यूपीआई ट्रांजैक्शन किए गए। वहीं, प्रतिदिन औसतन 96,383 करोड़ रुपए का डिजिटल भुगतान यूपीआई प्लेटफॉर्म के जरिए हुआ। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में लोग तेजी से नकदी आधारित भुगतान से डिजिटल भुगतान की ओर बढ़ रहे हैं।

    इससे पहले जून 2026 में भी यूपीआई ने शानदार प्रदर्शन किया था। जून में यूपीआई के जरिए 22.72 अरब ट्रांजैक्शन हुए थे, जो पिछले साल की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक थे। इस दौरान कुल लेनदेन राशि 28.92 लाख करोड़ रुपए रही थी। जून में रोजाना औसतन 75.7 करोड़ यूपीआई ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए थे।

    सरकार के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में यूपीआई भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत आधार बनकर उभरा है। वित्त वर्ष 2021-22 में यूपीआई के जरिए 4,595.61 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए थे, जिनका कुल मूल्य 84.16 लाख करोड़ रुपए था। इसके बाद वित्त वर्ष 2022-23 में लेनदेन की संख्या बढ़कर 8,371.44 करोड़ और कुल मूल्य 139.15 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया।

    वित्त वर्ष 2023-24 में यूपीआई ट्रांजैक्शन की संख्या 13,112.95 करोड़ रही, जबकि कुल लेनदेन मूल्य 199.95 लाख करोड़ रुपए दर्ज किया गया। वहीं, वित्त वर्ष 2024-25 में यूपीआई के जरिए 18,586.60 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए और इनका कुल मूल्य बढ़कर 260.56 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

    डिजिटल भुगतान के इस विस्तार को भारत की वित्तीय समावेशन नीति की बड़ी सफलता माना जा रहा है। यूपीआई ने छोटे व्यापारियों, दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े कारोबारियों तक भुगतान प्रक्रिया को आसान बनाया है। मोबाइल फोन के जरिए कुछ सेकंड में होने वाले भुगतान ने देश में डिजिटल लेनदेन की संस्कृति को तेजी से बढ़ावा दिया है।

    वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने हाल ही में लोकसभा में बताया था कि एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (एनआईपीएल) भारत की डिजिटल भुगतान तकनीक को दुनिया के अन्य देशों तक पहुंचाने के लिए लगातार काम कर रही है। एनआईपीएल कई देशों के साथ साझेदारी कर भारतीय भुगतान प्रणाली के वैश्विक विस्तार को बढ़ावा दे रही है।

    इन अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के चलते भारतीय नागरिक विदेशों में भी यूपीआई आधारित भुगतान कर पा रहे हैं। साथ ही, अन्य देशों को भी रियल टाइम डिजिटल भुगतान प्रणाली विकसित करने में मदद मिल रही है। वर्तमान में यूपीआई संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, फ्रांस, मॉरीशस और श्रीलंका समेत आठ से अधिक देशों में उपलब्ध है।

    तेजी से बढ़ते यूपीआई उपयोग से साफ है कि भारत डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में अपनी मजबूत स्थिति बना रहा है। आने वाले समय में यूपीआई के और अधिक देशों तक विस्तार की संभावना है, जिससे भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई गति मिलने की उम्मीद है।

  • डिजिटल भुगतान में आने वाली बड़ी क्रांति, बिना इंटरनेट के UPI पेमेंट की तैयारी, खराब नेटवर्क वाले क्षेत्रों में भी मिलेगा निर्बाध भुगतान

    डिजिटल भुगतान में आने वाली बड़ी क्रांति, बिना इंटरनेट के UPI पेमेंट की तैयारी, खराब नेटवर्क वाले क्षेत्रों में भी मिलेगा निर्बाध भुगतान

    नई दिल्ली । भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था को और अधिक सुलभ एवं विश्वसनीय बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ऐसी नई तकनीक विकसित कर रहा है, जिसकी मदद से इंटरनेट उपलब्ध न होने पर भी UPI के माध्यम से भुगतान किया जा सकेगा। यह सुविधा विशेष रूप से उन परिस्थितियों में उपयोगी होगी, जहां नेटवर्क की समस्या के कारण डिजिटल लेनदेन प्रभावित होता है। प्रस्तावित तकनीक के लागू होने के बाद फ्लाइट, अंडरग्राउंड मेट्रो, दूरदराज के क्षेत्रों और कमजोर नेटवर्क वाले स्थानों पर भी UPI भुगतान करना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो जाएगा।

    नई व्यवस्था नियर फील्ड कम्युनिकेशन (NFC) तकनीक पर आधारित होगी। इस प्रणाली में उपयोगकर्ता को QR कोड स्कैन करने की आवश्यकता नहीं होगी। यदि स्मार्टफोन में NFC की सुविधा उपलब्ध है, तो केवल उसे भुगतान मशीन के पास टैप करने से लेनदेन पूरा किया जा सकेगा। इस प्रक्रिया के दौरान न तो ग्राहक के मोबाइल में सक्रिय इंटरनेट कनेक्शन आवश्यक होगा और न ही व्यापारी के भुगतान टर्मिनल को इंटरनेट से जुड़े रहने की जरूरत होगी। इससे भुगतान प्रक्रिया अधिक तेज, सरल और सुविधाजनक बनने की उम्मीद है।

    इस सुविधा के शुरुआती चरण में एक बार में अधिकतम 2,000 रुपये तक का भुगतान किया जा सकेगा। इसके लिए उपयोगकर्ताओं को इंटरनेट उपलब्ध होने के दौरान पहले अपने UPI Lite वॉलेट में राशि जोड़नी होगी। बाद में उसी बैलेंस का उपयोग ऑफलाइन भुगतान के लिए किया जा सकेगा। सीमित राशि वाले इन लेनदेन में बार-बार UPI पिन दर्ज करने की आवश्यकता भी कम हो सकती है, जिससे छोटी खरीदारी पहले से अधिक तेज गति से पूरी की जा सकेगी।

    इस नई तकनीक का सबसे बड़ा लाभ उन स्थानों पर मिलेगा, जहां इंटरनेट कनेक्टिविटी अस्थायी रूप से उपलब्ध नहीं होती। हवाई यात्रा के दौरान विमान में इंटरनेट की सीमित उपलब्धता या अंडरग्राउंड मेट्रो में नेटवर्क बाधित होने जैसी परिस्थितियों में भी यात्री आसानी से डिजिटल भुगतान कर सकेंगे। इसी तरह ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में, जहां मोबाइल नेटवर्क अक्सर कमजोर रहता है, वहां भी यह सुविधा डिजिटल भुगतान को अधिक भरोसेमंद बना सकती है।

    हालांकि इस तकनीक का लाभ उठाने के लिए केवल ग्राहकों के स्मार्टफोन में NFC सुविधा होना पर्याप्त नहीं होगा। व्यापारियों के पॉइंट ऑफ सेल (POS) टर्मिनलों को भी नए मानकों के अनुसार प्रमाणित किया जाएगा। इसके बाद बैंक और विभिन्न UPI एप्लीकेशन अपने प्लेटफॉर्म पर इस सुविधा को चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराएंगे। इससे पूरे डिजिटल भुगतान नेटवर्क को नए तकनीकी मानकों के अनुरूप तैयार किया जाएगा।

    फिलहाल यह सुविधा विकास और परीक्षण के चरण में है तथा आम उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध नहीं कराई गई है। इसकी आधिकारिक लॉन्च तिथि की भी अभी घोषणा नहीं हुई है। हालांकि तकनीक पर तेजी से काम जारी है और इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की तैयारी की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुविधा शुरू होने के बाद भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली और अधिक मजबूत होगी तथा नेटवर्क संबंधी समस्याओं के कारण होने वाले भुगतान विफल होने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। इससे डिजिटल लेनदेन का दायरा और बढ़ेगा तथा उपयोगकर्ताओं को हर परिस्थिति में सुरक्षित और सहज भुगतान का नया विकल्प मिलेगा।