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  • UPI पर MDR शुल्क को लेकर नया मॉडल तैयार, छोटे कारोबारियों को राहत देकर बड़े मर्चेंट्स से शुल्क लेने की तैयारी

    UPI पर MDR शुल्क को लेकर नया मॉडल तैयार, छोटे कारोबारियों को राहत देकर बड़े मर्चेंट्स से शुल्क लेने की तैयारी

    नई दिल्ली ।भारत में डिजिटल भुगतान के सबसे प्रमुख माध्यमों में शामिल UPI पर लंबे समय से शुल्क व्यवस्था को लेकर चर्चा होती रही है। मौजूदा व्यवस्था में आम तौर पर UPI लेनदेन पर सीधे मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR का बोझ नहीं पड़ता। इससे ग्राहकों के लिए भुगतान आसान और बिना अतिरिक्त शुल्क के बना हुआ है, लेकिन डिजिटल भुगतान से जुड़ी कंपनियों और बुनियादी ढांचे की लागत को लेकर वित्तीय दबाव की चर्चा लगातार सामने आती रही है।

    इसी चुनौती के बीच डेबिट कार्ड से जुड़े पुराने नियामकीय मॉडल को UPI के लिए संभावित आधार के तौर पर देखा जा रहा है। इस विचार के तहत शुल्क व्यवस्था ऐसी बनाई जा सकती है, जिसमें छोटे कारोबारियों को अतिरिक्त लागत से बचाया जाए और बड़े तथा संगठित कारोबारियों से सीमित शुल्क लिया जाए।

    डेबिट कार्ड से जुड़े नियमों में छोटे कारोबारियों के लिए MDR की ऊपरी सीमा कम रखी गई है। सालाना 20 लाख रुपये से कम कारोबार करने वाले छोटे मर्चेंट्स के लिए अधिकतम MDR 0.40 प्रतिशत तक सीमित रखने का प्रावधान बताया गया है। इसी तरह के सिद्धांत को UPI में अपनाने पर छोटे किराना दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे कारोबारियों को शुल्क से पूरी तरह राहत देने का विकल्प बन सकता है।

    दूसरी ओर बड़े शोरूम, मॉल, ई-कॉमर्स कंपनियों और संगठित रिटेल कारोबार को अलग श्रेणी में रखा जा सकता है। ऐसे कारोबारियों से उनकी भुगतान क्षमता और कारोबार के आकार के अनुसार मामूली MDR लेने का प्रस्ताव चर्चा में है। इसका उद्देश्य UPI के संचालन और भुगतान व्यवस्था की लागत को साझा करना हो सकता है, बिना छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त बोझ डाले।

    इस संभावित मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आम उपभोक्ताओं को सीधे शुल्क से बचाना है। बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में UPI के जरिए पैसे भेजने वाले ग्राहकों के लिए भुगतान मुफ्त रखने की कोशिश की जा सकती है। यानी शुल्क व्यवस्था लागू होने की स्थिति में भी इसका सीधा असर सामान्य व्यक्ति के प्रत्येक UPI भुगतान पर डालने से बचने का विकल्प रखा जा सकता है।

    UPI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ लेनदेन की संख्या और डिजिटल भुगतान प्रणाली को संचालित करने के लिए आवश्यक तकनीकी ढांचे की लागत भी बढ़ रही है। भुगतान कंपनियों को सर्वर, सुरक्षा, तकनीकी रखरखाव और अन्य व्यवस्थाओं पर लगातार खर्च करना पड़ता है। ऐसे में लंबे समय तक शून्य MDR व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार की ओर से प्रोत्साहन राशि की जरूरत पड़ती है।

    प्रस्तावित मॉडल का एक उद्देश्य इस वित्तीय दबाव को कम करना भी हो सकता है। यदि बड़े मर्चेंट्स से सीमित शुल्क लिया जाता है, तो भुगतान व्यवस्था से जुड़े पक्षों के लिए अतिरिक्त राजस्व का स्रोत बन सकता है। इससे तकनीकी ढांचे और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि डेबिट कार्ड से जुड़े नियमों को UPI पर उसी रूप में लागू करना तय नहीं है। UPI की मौजूदा संरचना, भुगतान प्रक्रिया और इसमें शामिल संस्थाओं को देखते हुए किसी भी शुल्क मॉडल के लिए अलग नियम और शर्तें तय करनी पड़ सकती हैं।

    फिलहाल चर्चा का केंद्र यही है कि डिजिटल भुगतान की लोकप्रियता और मुफ्त लेनदेन की सुविधा बरकरार रखते हुए व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए। यदि छोटे कारोबारियों और आम ग्राहकों को सुरक्षित रखते हुए बड़े मर्चेंट्स से सीमित शुल्क लेने का मॉडल तैयार होता है, तो UPI के विस्तार और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

  • UPI का दबदबा कायम, जुलाई में रिकॉर्ड 23.66 अरब ट्रांजैक्शन से डिजिटल पेमेंट ने पकड़ी नई रफ्तार

    UPI का दबदबा कायम, जुलाई में रिकॉर्ड 23.66 अरब ट्रांजैक्शन से डिजिटल पेमेंट ने पकड़ी नई रफ्तार


    नई दिल्ली। देश में डिजिटल भुगतान व्यवस्था लगातार मजबूत होती जा रही है और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई ने एक बार फिर शानदार प्रदर्शन दर्ज किया है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में यूपीआई के माध्यम से किए गए लेनदेन की संख्या में सालाना आधार पर 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान कुल 23.66 अरब यानी 2366 करोड़ से ज्यादा यूपीआई ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए। वहीं, इन डिजिटल लेनदेन का कुल मूल्य 19 प्रतिशत बढ़कर 29.88 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

    आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई महीने में हर दिन औसतन 76.3 करोड़ यूपीआई ट्रांजैक्शन किए गए। वहीं, प्रतिदिन औसतन 96,383 करोड़ रुपए का डिजिटल भुगतान यूपीआई प्लेटफॉर्म के जरिए हुआ। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में लोग तेजी से नकदी आधारित भुगतान से डिजिटल भुगतान की ओर बढ़ रहे हैं।

    इससे पहले जून 2026 में भी यूपीआई ने शानदार प्रदर्शन किया था। जून में यूपीआई के जरिए 22.72 अरब ट्रांजैक्शन हुए थे, जो पिछले साल की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक थे। इस दौरान कुल लेनदेन राशि 28.92 लाख करोड़ रुपए रही थी। जून में रोजाना औसतन 75.7 करोड़ यूपीआई ट्रांजैक्शन दर्ज किए गए थे।

    सरकार के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में यूपीआई भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत आधार बनकर उभरा है। वित्त वर्ष 2021-22 में यूपीआई के जरिए 4,595.61 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए थे, जिनका कुल मूल्य 84.16 लाख करोड़ रुपए था। इसके बाद वित्त वर्ष 2022-23 में लेनदेन की संख्या बढ़कर 8,371.44 करोड़ और कुल मूल्य 139.15 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया।

    वित्त वर्ष 2023-24 में यूपीआई ट्रांजैक्शन की संख्या 13,112.95 करोड़ रही, जबकि कुल लेनदेन मूल्य 199.95 लाख करोड़ रुपए दर्ज किया गया। वहीं, वित्त वर्ष 2024-25 में यूपीआई के जरिए 18,586.60 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए और इनका कुल मूल्य बढ़कर 260.56 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।

    डिजिटल भुगतान के इस विस्तार को भारत की वित्तीय समावेशन नीति की बड़ी सफलता माना जा रहा है। यूपीआई ने छोटे व्यापारियों, दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े कारोबारियों तक भुगतान प्रक्रिया को आसान बनाया है। मोबाइल फोन के जरिए कुछ सेकंड में होने वाले भुगतान ने देश में डिजिटल लेनदेन की संस्कृति को तेजी से बढ़ावा दिया है।

    वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने हाल ही में लोकसभा में बताया था कि एनपीसीआई इंटरनेशनल पेमेंट्स लिमिटेड (एनआईपीएल) भारत की डिजिटल भुगतान तकनीक को दुनिया के अन्य देशों तक पहुंचाने के लिए लगातार काम कर रही है। एनआईपीएल कई देशों के साथ साझेदारी कर भारतीय भुगतान प्रणाली के वैश्विक विस्तार को बढ़ावा दे रही है।

    इन अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों के चलते भारतीय नागरिक विदेशों में भी यूपीआई आधारित भुगतान कर पा रहे हैं। साथ ही, अन्य देशों को भी रियल टाइम डिजिटल भुगतान प्रणाली विकसित करने में मदद मिल रही है। वर्तमान में यूपीआई संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, फ्रांस, मॉरीशस और श्रीलंका समेत आठ से अधिक देशों में उपलब्ध है।

    तेजी से बढ़ते यूपीआई उपयोग से साफ है कि भारत डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में दुनिया के अग्रणी देशों में अपनी मजबूत स्थिति बना रहा है। आने वाले समय में यूपीआई के और अधिक देशों तक विस्तार की संभावना है, जिससे भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई गति मिलने की उम्मीद है।

  • डिजिटल भुगतान में आने वाली बड़ी क्रांति, बिना इंटरनेट के UPI पेमेंट की तैयारी, खराब नेटवर्क वाले क्षेत्रों में भी मिलेगा निर्बाध भुगतान

    डिजिटल भुगतान में आने वाली बड़ी क्रांति, बिना इंटरनेट के UPI पेमेंट की तैयारी, खराब नेटवर्क वाले क्षेत्रों में भी मिलेगा निर्बाध भुगतान

    नई दिल्ली । भारत की डिजिटल भुगतान व्यवस्था को और अधिक सुलभ एवं विश्वसनीय बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ऐसी नई तकनीक विकसित कर रहा है, जिसकी मदद से इंटरनेट उपलब्ध न होने पर भी UPI के माध्यम से भुगतान किया जा सकेगा। यह सुविधा विशेष रूप से उन परिस्थितियों में उपयोगी होगी, जहां नेटवर्क की समस्या के कारण डिजिटल लेनदेन प्रभावित होता है। प्रस्तावित तकनीक के लागू होने के बाद फ्लाइट, अंडरग्राउंड मेट्रो, दूरदराज के क्षेत्रों और कमजोर नेटवर्क वाले स्थानों पर भी UPI भुगतान करना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो जाएगा।

    नई व्यवस्था नियर फील्ड कम्युनिकेशन (NFC) तकनीक पर आधारित होगी। इस प्रणाली में उपयोगकर्ता को QR कोड स्कैन करने की आवश्यकता नहीं होगी। यदि स्मार्टफोन में NFC की सुविधा उपलब्ध है, तो केवल उसे भुगतान मशीन के पास टैप करने से लेनदेन पूरा किया जा सकेगा। इस प्रक्रिया के दौरान न तो ग्राहक के मोबाइल में सक्रिय इंटरनेट कनेक्शन आवश्यक होगा और न ही व्यापारी के भुगतान टर्मिनल को इंटरनेट से जुड़े रहने की जरूरत होगी। इससे भुगतान प्रक्रिया अधिक तेज, सरल और सुविधाजनक बनने की उम्मीद है।

    इस सुविधा के शुरुआती चरण में एक बार में अधिकतम 2,000 रुपये तक का भुगतान किया जा सकेगा। इसके लिए उपयोगकर्ताओं को इंटरनेट उपलब्ध होने के दौरान पहले अपने UPI Lite वॉलेट में राशि जोड़नी होगी। बाद में उसी बैलेंस का उपयोग ऑफलाइन भुगतान के लिए किया जा सकेगा। सीमित राशि वाले इन लेनदेन में बार-बार UPI पिन दर्ज करने की आवश्यकता भी कम हो सकती है, जिससे छोटी खरीदारी पहले से अधिक तेज गति से पूरी की जा सकेगी।

    इस नई तकनीक का सबसे बड़ा लाभ उन स्थानों पर मिलेगा, जहां इंटरनेट कनेक्टिविटी अस्थायी रूप से उपलब्ध नहीं होती। हवाई यात्रा के दौरान विमान में इंटरनेट की सीमित उपलब्धता या अंडरग्राउंड मेट्रो में नेटवर्क बाधित होने जैसी परिस्थितियों में भी यात्री आसानी से डिजिटल भुगतान कर सकेंगे। इसी तरह ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में, जहां मोबाइल नेटवर्क अक्सर कमजोर रहता है, वहां भी यह सुविधा डिजिटल भुगतान को अधिक भरोसेमंद बना सकती है।

    हालांकि इस तकनीक का लाभ उठाने के लिए केवल ग्राहकों के स्मार्टफोन में NFC सुविधा होना पर्याप्त नहीं होगा। व्यापारियों के पॉइंट ऑफ सेल (POS) टर्मिनलों को भी नए मानकों के अनुसार प्रमाणित किया जाएगा। इसके बाद बैंक और विभिन्न UPI एप्लीकेशन अपने प्लेटफॉर्म पर इस सुविधा को चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराएंगे। इससे पूरे डिजिटल भुगतान नेटवर्क को नए तकनीकी मानकों के अनुरूप तैयार किया जाएगा।

    फिलहाल यह सुविधा विकास और परीक्षण के चरण में है तथा आम उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध नहीं कराई गई है। इसकी आधिकारिक लॉन्च तिथि की भी अभी घोषणा नहीं हुई है। हालांकि तकनीक पर तेजी से काम जारी है और इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की तैयारी की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुविधा शुरू होने के बाद भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली और अधिक मजबूत होगी तथा नेटवर्क संबंधी समस्याओं के कारण होने वाले भुगतान विफल होने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। इससे डिजिटल लेनदेन का दायरा और बढ़ेगा तथा उपयोगकर्ताओं को हर परिस्थिति में सुरक्षित और सहज भुगतान का नया विकल्प मिलेगा।

  • भारत की आर्थिक प्रगति का नया आधार बनी डिजिटल अर्थव्यवस्था, विशेषज्ञों ने सुरक्षित और समावेशी डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम पर दिया जोर

    भारत की आर्थिक प्रगति का नया आधार बनी डिजिटल अर्थव्यवस्था, विशेषज्ञों ने सुरक्षित और समावेशी डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम पर दिया जोर

    नई दिल्ली । भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति की प्रमुख ताकत बनकर उभर रही है। डिजिटल भुगतान, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और नई तकनीकों के विस्तार ने न केवल वित्तीय सेवाओं की पहुंच को व्यापक बनाया है, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी अधिक पारदर्शी, तेज और प्रभावी बनाया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत की विकास यात्रा में डिजिटल इकोसिस्टम की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।

    राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित डिजिटल भुगतान विषयक एक विचार-विमर्श कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने डिजिटल परिवर्तन के कई पहलुओं पर अपने विचार साझा किए। उनका कहना था कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने वित्तीय समावेशन को नई दिशा दी है और देश के करोड़ों नागरिकों को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके माध्यम से सरकारी सेवाओं, वित्तीय लेनदेन और डिजिटल सुविधाओं तक लोगों की पहुंच पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हुई है।

    विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि डिजिटल अर्थव्यवस्था केवल तकनीक के विस्तार से मजबूत नहीं होगी। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण मानव संसाधन, मजबूत संस्थागत ढांचा, अनुसंधान, नवाचार और लगातार निवेश की आवश्यकता है। उनका मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी उभरती तकनीकों का प्रभावी उपयोग करने वाले देश भविष्य की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अधिक मजबूत स्थिति हासिल कर सकेंगे। इसलिए नई तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ कौशल विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।

    डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को लेकर विशेषज्ञों ने कहा कि इसकी सफलता का सबसे बड़ा आधार नागरिकों का भरोसा है। यदि डिजिटल सेवाओं में डेटा सुरक्षा, गोपनीयता, उपयोगकर्ता की सहमति और सभी के लिए समान पहुंच सुनिश्चित की जाती है, तभी डिजिटल परिवर्तन का वास्तविक लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंच सकेगा। उन्होंने तकनीकी विकास के साथ सामाजिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता बनाए रखने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

    डिजिटल भुगतान प्रणाली के भविष्य को लेकर भी कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए। विशेषज्ञों का मानना है कि अब तक डिजिटल भुगतान व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य व्यापक पहुंच और इंटरऑपरेबिलिटी रहा है, लेकिन आने वाले समय में इसकी मजबूती, बैकअप सिस्टम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित धोखाधड़ी पहचान प्रणाली को प्राथमिकता देनी होगी। इससे लेनदेन अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय बन सकेंगे।

    कार्यक्रम में सीमा पार डिजिटल भुगतान को आसान बनाने की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि इसके लिए एकीकृत डिजिटल अवसंरचना, समान तकनीकी मानक और स्पष्ट कानूनी व्यवस्था विकसित करना जरूरी होगा। इससे भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेगी तथा अंतरराष्ट्रीय लेनदेन भी सरल और सुरक्षित बनेंगे।

    साइबर सुरक्षा को डिजिटल अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया। विशेषज्ञों ने बढ़ते साइबर अपराध और डिजिटल धोखाधड़ी को देखते हुए मजबूत संस्थागत समन्वय, आधुनिक सुरक्षा तकनीकों और आम नागरिकों में जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया। उनका मानना है कि डिजिटल वित्तीय प्रणाली में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए सुरक्षा उपायों को लगातार मजबूत करना आवश्यक है।

    विशेषज्ञों के अनुसार भारत का डिजिटल इकोसिस्टम अब केवल भुगतान प्रणाली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास, नवाचार, रोजगार, उद्यमिता और सामाजिक समावेशन का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। यदि तकनीकी प्रगति के साथ सुरक्षा, भरोसा और समावेशिता को समान प्राथमिकता दी जाती है, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में और अधिक मजबूत स्थान हासिल कर सकता है।

  • भारत-सेशेल्स रिश्तों को नई मजबूती, रक्षा, डिजिटल पेमेंट, स्वास्थ्य, अंतरिक्ष और ब्लू इकोनॉमी समेत 19 क्षेत्रों में बढ़ा सहयोग

    भारत-सेशेल्स रिश्तों को नई मजबूती, रक्षा, डिजिटल पेमेंट, स्वास्थ्य, अंतरिक्ष और ब्लू इकोनॉमी समेत 19 क्षेत्रों में बढ़ा सहयोग


    नई दिल्ली।
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तीन दिवसीय सेशेल्स दौरा भारत और हिंद महासागर क्षेत्र में रणनीतिक सहयोग के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस यात्रा के दौरान भारत और सेशेल्स के बीच कुल 19 महत्वपूर्ण समझौतों और सहयोगी पहलों पर सहमति बनी, जिनका उद्देश्य रक्षा, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, कृषि, अंतरिक्ष, ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को नई दिशा देना है। इन समझौतों को दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक सहयोग का मजबूत आधार माना जा रहा है।

    दौरे के दौरान भारत ने सेशेल्स को एक फास्ट पेट्रोल वेसल, कई यूटिलिटी वाहन, लेजर रेडियल क्लास बोट्स और छह एम्बुलेंस भेंट कीं। इन पहलों का उद्देश्य समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना, मानवीय सहयोग बढ़ाना और हिंद महासागर क्षेत्र में दोनों देशों के बीच रक्षा साझेदारी को और प्रभावी बनाना है। साथ ही सेशेल्स कोस्ट गार्ड के जहाज की मरम्मत और डोर्नियर विमान के आधुनिकीकरण जैसे प्रोजेक्ट भी सहयोग के प्रमुख केंद्र रहे।

    आर्थिक और तकनीकी सहयोग को नई गति देने के लिए भारत और सेशेल्स के बीच यूपीआई आधारित डिजिटल भुगतान प्रणाली लागू करने पर सहमति बनी। इस दिशा में दोनों देशों के संबंधित वित्तीय संस्थानों के बीच समझौते किए गए, जिससे डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा मिलेगा और भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रणाली का अंतरराष्ट्रीय विस्तार भी मजबूत होगा। इसके साथ ही आर्थिक सहयोग और वित्तीय समावेशन को नई मजबूती मिलने की उम्मीद जताई गई है।

    स्वास्थ्य क्षेत्र में भी दोनों देशों ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। जन औषधि योजना के तहत सस्ती और गुणवत्तापूर्ण भारतीय दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। इसके अलावा नए राष्ट्रीय अस्पताल की शुरुआती तैयारियों और स्वास्थ्य सेवाओं के विकास से जुड़े समझौतों पर भी सहमति बनी, जिससे सेशेल्स की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने में भारत की भूमिका और प्रभाव बढ़ेगा।

    कृषि, शिक्षा और कौशल विकास के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने सहयोग का दायरा विस्तारित किया है। कृषि अनुसंधान, प्रशिक्षण और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त कार्ययोजना तैयार की गई है। वहीं प्रोफेशनल और टेक्निकल एजुकेशन सेंटर की स्थापना तथा विदेश सेवा से जुड़े प्रशिक्षण कार्यक्रमों के जरिए संस्थागत सहयोग को भी नई मजबूती मिलेगी। इन पहलों का उद्देश्य स्थानीय क्षमता निर्माण के साथ दीर्घकालिक विकास साझेदारी को मजबूत करना है।

    ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन और ब्लू इकोनॉमी जैसे भविष्य के क्षेत्रों में भी दोनों देशों ने मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई। ग्रीन हाइड्रोजन, आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे, समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों पर साझा प्रयासों पर जोर दिया गया। इसके साथ ही सेशेल्स ने आपदा-रोधी अवसंरचना से जुड़े वैश्विक गठबंधन की सदस्यता भी ग्रहण की, जिससे जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में सहयोग और मजबूत होगा।

    दौरे के दौरान अंतरिक्ष सहयोग, प्रत्यर्पण संधि, नाविकों के प्रशिक्षण, खाद्य सुरक्षा, विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता तथा बुनियादी ढांचे के विकास जैसे कई महत्वपूर्ण समझौते भी किए गए। भारत ने सेशेल्स को चावल और सीमेंट की आपूर्ति के साथ विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहयोग भी उपलब्ध कराया। इन पहलों से स्पष्ट है कि दोनों देश केवल कूटनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि व्यापक आर्थिक, रणनीतिक और विकासात्मक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। प्रधानमंत्री की इस यात्रा ने हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका को और मजबूत करने के साथ भारत-सेशेल्स संबंधों को नई ऊंचाई देने का मार्ग भी प्रशस्त किया।

  • कैशलेस भारत की नई उड़ान, यूपीआई बना दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल पेमेंट सिस्टम

    कैशलेस भारत की नई उड़ान, यूपीआई बना दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल पेमेंट सिस्टम

    नई दिल्ली। भारत में डिजिटल भुगतान का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण यूपीआई की लगातार बढ़ती रफ्तार है। अप्रैल महीने में यूपीआई ने एक बार फिर ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए नए रिकॉर्ड बना दिए हैं। इस दौरान कुल लेनदेन की संख्या लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 22 अरब से अधिक पहुंच गई, जबकि कुल लेनदेन मूल्य 29 लाख करोड़ रुपए से ऊपर दर्ज किया गया। यह आंकड़े देश में डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार और लोगों की बढ़ती डिजिटल निर्भरता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं।

    आज स्थिति यह है कि छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठानों तक, हर जगह यूपीआई भुगतान एक सामान्य प्रक्रिया बन चुका है। लोग नकद लेनदेन की बजाय मोबाइल के जरिए तुरंत भुगतान करना अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक मान रहे हैं। इस बदलाव ने न केवल भुगतान प्रणाली को सरल बनाया है, बल्कि लेनदेन की गति और पारदर्शिता को भी बढ़ाया है।

    अप्रैल के दौरान रोजाना होने वाले यूपीआई लेनदेन में भी लगातार वृद्धि देखी गई। हर दिन औसतन करोड़ों ट्रांजैक्शन इस माध्यम से पूरे किए गए, जो यह दिखाता है कि यह प्रणाली अब दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। चाहे किराने की दुकान हो, ऑनलाइन शॉपिंग हो या फिर सेवाओं का भुगतान, यूपीआई हर क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बना चुका है।

    इस वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा कारण इसकी सरल प्रक्रिया और तत्काल भुगतान सुविधा है। केवल मोबाइल नंबर या QR कोड के जरिए कुछ ही सेकंड में लेनदेन पूरा हो जाता है, जिससे समय की बचत होती है और कैश संभालने की परेशानी भी खत्म हो जाती है। इसके अलावा बैंकिंग सिस्टम से सीधा जुड़ाव इसे अधिक सुरक्षित बनाता है।

    पिछले कुछ वर्षों में यूपीआई ने जिस तेजी से विकास किया है, वह देश की डिजिटल प्रगति का एक महत्वपूर्ण संकेत है। जहां पहले डिजिटल भुगतान सीमित स्तर पर उपयोग होता था, वहीं अब यह प्रणाली देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनती जा रही है। इससे न केवल वित्तीय समावेशन बढ़ा है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा मिला है।

    अप्रैल के ये आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत तेजी से कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है और यूपीआई इस बदलाव का सबसे मजबूत आधार बन चुका है। आने वाले समय में इसके और विस्तार की संभावना है, जो देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को और मजबूत बनाएगा।

  • भीम ऐप में नया बायोमेट्रिक फीचर 5,000 तक के UPI पेमेंट अब फिंगरप्रिंट से

    भीम ऐप में नया बायोमेट्रिक फीचर 5,000 तक के UPI पेमेंट अब फिंगरप्रिंट से


    नई दिल्ली: 
    भीम ऐप में एक नया और अहम फीचर जोड़ा गया है, जिससे डिजिटल पेमेंट और भी आसान और तेज हो जाएगा। नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) की सहायक कंपनी एनबीएसएल ने यह बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन फीचर लॉन्च किया है

    इस फीचर के जरिए अब यूजर्स 5,000 रुपए तक के ट्रांजैक्शन को अपने फिंगरप्रिंट या फेस रिकग्निशन से कन्फर्म कर सकेंगे। इसका मतलब है कि छोटे पेमेंट के लिए हर बार UPI PIN डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी

    इस बदलाव से पेमेंट प्रक्रिया न सिर्फ तेज होगी बल्कि यूजर एक्सपीरियंस भी बेहतर होगा। अक्सर लोग पिन भूल जाते हैं या गलत पिन डाल देते हैं, जिससे ट्रांजैक्शन फेल हो जाता है। नया फीचर इस समस्या को काफी हद तक कम कर देगा

    बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन का इस्तेमाल करके यूजर्स अपने दोस्तों और परिवार को पैसे भेज सकते हैं, दुकानों पर क्यूआर कोड स्कैन कर सकते हैं और ऑनलाइन पेमेंट भी आसानी से कर सकते हैं

    कंपनी के अनुसार, यह फीचर सुरक्षा के लिहाज से भी बेहतर है क्योंकि फिंगरप्रिंट और फेस डेटा सीधे यूजर के डिवाइस में सुरक्षित रहता है। इससे पिन शेयर होने या उसके गलत इस्तेमाल का खतरा कम हो जाता है

    हालांकि, 5,000 रुपए से ज्यादा के ट्रांजैक्शन के लिए अभी भी UPI PIN की जरूरत होगी, जिससे बड़े पेमेंट के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बनी रहेगी

    फिलहाल यह सुविधा उन स्मार्टफोन्स पर उपलब्ध है जिनमें बायोमेट्रिक सपोर्ट यानी फिंगरप्रिंट या फेस रिकग्निशन की सुविधा मौजूद है, चाहे वह एंड्रॉइड हो या iOS डिवाइस