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  • ट्रंप का दावा- अमेरिका के दबाव में ईरान, बातचीत सफल नहीं हुई तो फिर होगा एक्शन

    ट्रंप का दावा- अमेरिका के दबाव में ईरान, बातचीत सफल नहीं हुई तो फिर होगा एक्शन

    वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि ईरान बातचीत के दौरान लगातार बड़ी रियायतें दे रहा है और अमेरिका की लगभग हर मांग को स्वीकार कर रहा है। ट्रंप ने विश्वास जताया कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक प्रयास सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि परिस्थितियां बदलीं तो सैन्य कार्रवाई का विकल्प अब भी पूरी तरह खुला है।

    व्हाइट हाउस में नाटो महासचिव मार्क रूटे के साथ हुई बैठक के दौरान ट्रंप ने मीडिया से बातचीत में कहा कि ईरान के साथ वार्ता बेहद सकारात्मक माहौल में चल रही है। उन्होंने दावा किया कि तेहरान अब पहले की तुलना में कहीं अधिक लचीला रुख अपना रहा है और अमेरिका की शर्तों को स्वीकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ट्रंप के अनुसार वर्तमान हालात अमेरिका के पक्ष में हैं और बातचीत के नतीजे भी उत्साहजनक दिखाई दे रहे हैं।

    रिपब्लिकन सांसदों के साथ बैठक से पहले ट्रंप ने कहा कि अमेरिका मजबूत स्थिति में है और ईरान लगातार समझौते की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में स्थिति और स्पष्ट होगी, लेकिन फिलहाल वार्ता का माहौल बेहद सकारात्मक है। बैठक के बाद भी उन्होंने दोहराया कि ईरान अमेरिकी अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार कर रहा है और उसे यह समझ आ चुका है कि अंतरराष्ट्रीय दबावों को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

    हालांकि ट्रंप ने बातचीत के साथ-साथ सैन्य विकल्प को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया। उन्होंने संकेत दिया कि यदि अमेरिका की सुरक्षा या उसके हितों को कोई खतरा पैदा हुआ तो वाशिंगटन निर्णायक कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा। उनका कहना था कि अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर संभव विकल्प का उपयोग करने में सक्षम है।

    इस दौरान ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने साफ कहा कि ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा जिसके तहत ईरान अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी पर किसी प्रकार का शुल्क या नियंत्रण स्थापित कर सके। ट्रंप के अनुसार दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट पर किसी एक देश का दबदबा वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।

    नाटो महासचिव मार्क रूटे ने भी ट्रंप की ईरान नीति का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। रूटे के अनुसार यदि ईरान परमाणु क्षमता हासिल कर लेता है तो इसका खतरा केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों की सुरक्षा भी प्रभावित होगी।

    रूटे ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके। उन्होंने अमेरिका की रणनीति को वैश्विक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि वर्तमान प्रयास केवल क्षेत्रीय स्थिरता ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय शांति बनाए रखने के लिए भी जरूरी हैं।

    अमेरिका और ईरान के बीच जारी यह कूटनीतिक दौर आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि बातचीत का यह सिलसिला किसी स्थायी समझौते तक पहुंचता है या फिर तनाव एक बार फिर नए मोड़ पर पहुंचता है।

  • स्विट्जरलैंड बैठक टली, ईरान–अमेरिका के बीच नई बातचीत की तैयारी तेज

    स्विट्जरलैंड बैठक टली, ईरान–अमेरिका के बीच नई बातचीत की तैयारी तेज


    नई दिल्ली । मध्य-पूर्व की राजनीति में एक बार फिर बड़ी कूटनीतिक हलचल देखने को मिल रही है जहां ईरान और अमेरिका के बीच प्रस्तावित वार्ता फिलहाल टल गई है। स्विट्जरलैंड में होने वाली दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों की बैठक को स्थगित कर दिया गया है हालांकि ईरानी विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि बातचीत की प्रक्रिया अभी रुकी नहीं है और जल्द ही नई बैठक की योजना पर काम चल रहा है।

    ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई के अनुसार अगले चरण की बातचीत को लेकर मध्यस्थों के माध्यम से लगातार परामर्श जारी है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत के लिए नई तारीखों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया चल रही है और परिस्थितियों के अनुकूल होते ही इसकी आधिकारिक घोषणा की जाएगी।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान का कहना है कि प्रस्तावित समझौते की आगे की प्रक्रिया कुछ महत्वपूर्ण शर्तों पर निर्भर करती है। इनमें क्षेत्रीय संघर्षों का अंत सैन्य गतिविधियों में कमी और आर्थिक प्रतिबंधों से राहत जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं। इसके अलावा ईरान की ओर से यह भी कहा गया है कि तेल निर्यात और फ्रीज की गई संपत्तियों से जुड़े मामलों पर भी चर्चा आवश्यक है।

    बयान में यह भी संकेत दिया गया है कि हालिया बातचीत का उद्देश्य किसी अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर करना था लेकिन कुछ प्रक्रियात्मक बदलावों और हालिया राजनीतिक घटनाक्रम के चलते बैठक को फिलहाल आगे बढ़ाना पड़ा।

    ईरानी पक्ष का दावा है कि हाल के दिनों में क्षेत्रीय स्तर पर कुछ अहम समझौतों और दस्तावेजों पर हस्ताक्षर हुए हैं जिसके बाद मौजूदा बैठक की आवश्यकता पर दोबारा विचार किया गया है। हालांकि कूटनीतिक चैनल सक्रिय बने हुए हैं और बातचीत की संभावनाएं अभी भी पूरी तरह खुली हैं।

    इस बीच क्षेत्रीय तनाव भी चर्चा में बना हुआ है जहां ईरान और पश्चिमी देशों के बीच पिछले कुछ समय से स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। ऐसे में इस नई वार्ता को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें टिकी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह बातचीत आगे बढ़ती है तो यह न सिर्फ ईरान–अमेरिका संबंधों के लिए बल्कि पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र की स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

  • ईरान-अमेरिका बातचीत में नरमी के संकेत, लेकिन समझौता अभी अधर में; कुछ अहम मुद्दों पर जारी है गतिरोध

    ईरान-अमेरिका बातचीत में नरमी के संकेत, लेकिन समझौता अभी अधर में; कुछ अहम मुद्दों पर जारी है गतिरोध



    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक बातचीत में हल्की नरमी के संकेत जरूर दिख रहे हैं, लेकिन किसी अंतिम समझौते पर अभी सहमति नहीं बन पाई है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संकेत दिए हैं कि बातचीत में प्रगति हो रही है और जल्द कुछ सकारात्मक जानकारी सामने आ सकती है।

    वहीं ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी माना है कि पिछले एक सप्ताह में दोनों देशों के रुख में नजदीकी आई है, लेकिन अहम मुद्दों पर अभी भी मतभेद बने हुए हैं। उनका कहना है कि सिर्फ बातचीत में सुधार का मतलब यह नहीं है कि समझौता तय हो चुका है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी अपने प्रतिनिधियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसी भी समझौते में जल्दबाज़ी न की जाए और बातचीत को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाया जाए।

    ईरानी सरकारी मीडिया का दावा है कि समझौता अमेरिका की पाबंदियों की वजह से अभी अटका हुआ है, जबकि दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि एक-दो मुद्दों पर अब भी गंभीर मतभेद कायम हैं।

    ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने इस बातचीत का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि किसी ऐसे समझौते पर सहमति बने जिसमें क्षेत्रीय स्थिरता और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर स्पष्ट ढांचा तय हो।फिलहाल दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन अंतिम फैसला अभी दूर माना जा रहा है।

  • ईरान को ट्रंप-वेंस की कड़ी चेतावनी: डील नहीं तो सैन्य कार्रवाई, परमाणु हथियारों पर बढ़ा तनाव

    ईरान को ट्रंप-वेंस की कड़ी चेतावनी: डील नहीं तो सैन्य कार्रवाई, परमाणु हथियारों पर बढ़ा तनाव



    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने चेतावनी दी है कि यदि ईरान परमाणु समझौते पर सहमत नहीं होता है तो सैन्य कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

    वॉशिंगटन में मीडिया से बातचीत करते हुए जेडी वेंस ने कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम न सिर्फ पश्चिम एशिया बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। उनके अनुसार, अगर ईरान परमाणु हथियार विकसित करता है तो इससे वैश्विक स्तर पर हथियारों की नई होड़ शुरू हो सकती है।

    वेंस ने कहा कि अमेरिका ने ईरान के सामने एक सरल प्रस्ताव रखा है, जिसमें या तो बातचीत के जरिए समझौता किया जाए या फिर तनाव बढ़ने की स्थिति में परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा। उन्होंने दावा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान किसी भी हाल में परमाणु हथियार हासिल नहीं कर सकता।

    उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ईरान के साथ सद्भावना के आधार पर बातचीत करना चाहता है और बातचीत के जरिए समाधान की उम्मीद अभी भी बनी हुई है। वेंस के मुताबिक, कुछ संकेत ऐसे मिले हैं जिससे लगता है कि ईरान समझौते की दिशा में आगे बढ़ सकता है, लेकिन अंतिम स्थिति तभी साफ होगी जब किसी समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होंगे।

    जेडी वेंस ने ईरान की आंतरिक राजनीतिक स्थिति को जटिल बताते हुए कहा कि वहां कई शक्तिशाली गुट सक्रिय हैं, जिससे यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में ईरान की नीति क्या है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका ईरान के यूरेनियम भंडार को रूस भेजने जैसी किसी रिपोर्ट की पुष्टि नहीं करता।

    इस बीच पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बयान दिया है कि अमेरिका का लक्ष्य इस संघर्ष को जल्द खत्म करना है और ईरान को किसी भी स्थिति में परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा कि समाधान की दिशा में प्रयास तेज किए जा रहे हैं।

    गौरतलब है कि अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच लंबे समय से तनाव की स्थिति बनी हुई है। हाल के वर्षों में कई बार सैन्य टकराव और हमलों की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, हालांकि कुछ समय के लिए सीजफायर की स्थिति बनी थी। इसके बावजूद स्थायी समझौता अभी तक नहीं हो सका है और हालात फिर से तनावपूर्ण बने हुए हैं।

  • ईरान की 'शर्तों' पर भड़के ट्रंप: बोले-बिल्कुल मंजूर नहीं! जंग या समझौता? फैसला अब अमेरिका के हाथ

    ईरान की 'शर्तों' पर भड़के ट्रंप: बोले-बिल्कुल मंजूर नहीं! जंग या समझौता? फैसला अब अमेरिका के हाथ

    नई दिल्ली। मध्य पूर्व (Middle East) की धरती एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ी नजर आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान द्वारा भेजे गए कूटनीतिक प्रस्ताव को ‘कचरे के डिब्बे’ में डालते हुए उसे “पूरी तरह अस्वीकार्य” करार दिया है। इस एक बयान ने दुनिया भर के बाजारों और कूटनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।

    ट्रंप का ‘ट्रुथ सोशल’ धमाका: “मुझे यह बिल्कुल मंजूर नहीं!”
    सोमवार रात डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ईरान के प्रस्ताव की धज्जियां उड़ाते हुए लिखा। “मैंने ईरान के तथाकथित प्रतिनिधियों का जवाब पढ़ा है। मुझे यह जरा भी पसंद नहीं आया बिल्कुल भी मंजूर नहीं!”

    ट्रंप के इस कड़े तेवर के बाद उनके करीबी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी आग में घी डालने का काम किया है। उन्होंने संकेत दिया कि अब बातचीत का समय खत्म हो चुका है और ‘प्रोजेक्ट फ़्रीडम प्लस’ (सैन्य विकल्प) ही एकमात्र रास्ता बचा है।

    ईरान की ‘रेड लाइन’: वो शर्तें जिन पर भड़का अमेरिका
    लेबनानी नेटवर्क ‘अल-मयादीन’ के अनुसार, ईरान ने समझौते के बदले जो मांगें रखी हैं, वे अमेरिका के लिए किसी ‘सरेंडर’ से कम नहीं थीं:

    आर्थिक घेराबंदी का अंत: ईरान ने मांग की है कि उसके तेल निर्यात पर लगी रोक तुरंत हटाई जाए।

    फ्रीज फंड की रिहाई: विदेशों में जप्त ईरान की अरबों डॉलर की संपत्ति को तत्काल मुक्त किया जाए।

    होर्मुज पर कब्ज़ा: दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ पर ईरान का पूर्ण नियंत्रण हो।

    लेबनान युद्धविराम: ईरान ने इसे अपनी ‘रेड लाइन’ घोषित किया है।

    परमाणु दांव: क्या यह ईरान की चाल है?
    दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने पहली बार ‘लचीलापन’ दिखाते हुए 30 दिनों के भीतर परमाणु मुद्दे पर चर्चा करने की बात कही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्ध टालने या वक्त हासिल करने की एक सोची-झीली रणनीति हो सकती है।

    दूसरी ओर, अमेरिका की मांग बेहद सख्त है: “ईरान अपना 60% शुद्ध यूरेनियम सौंप दे, परमाणु प्लांट नष्ट करे और अगले 20 साल तक संवर्धन भूल जाए।”

    ईरान का पलटवार: “हम ट्रंप को खुश करने के लिए नहीं बैठे”
    तेहरान ने भी साफ कर दिया है कि वह दबाव में नहीं झुकेगा। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाघेई ने कहा कि ईरान ट्रंप को खुश करने के लिए अपनी नीतियां नहीं बनाता। सरकारी मीडिया ने तो यहां तक कह दिया कि ट्रंप की मांगें “बेतुकी” हैं और ईरान उनके आगे घुटने नहीं टेकेगा।

     युद्ध या कूटनीति?
    दुनिया के सामने अब तीन ही रास्ते बचे हैं:इजरायल के साथ मिलकर अमेरिका ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला करे। युद्ध के बिना ईरान का दम घोंटने के लिए समुद्र में उसकी घेराबंदी और सख्त की जाए। ट्रंप अपनी ‘आर्ट ऑफ द डील’ का इस्तेमाल कर ईरान से कोई ऐसी बड़ी रियायत छीन लें जो अब तक असंभव मानी जाती थी।अगर तनाव कम नहीं हुआ, तो वैश्विक तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिसका असर भारत समेत पूरी दुनिया की जेब पर पड़ेगा।

  • ट्रम्प का ईरान को बड़ा झटका, शांति प्रस्ताव खारिज; परमाणु शर्तों पर बढ़ा टकराव, होर्मुज में तनाव गहराया

    ट्रम्प का ईरान को बड़ा झटका, शांति प्रस्ताव खारिज; परमाणु शर्तों पर बढ़ा टकराव, होर्मुज में तनाव गहराया



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर तेज हो गया है, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के शांति प्रस्ताव को खारिज करते हुए कड़े रुख का संकेत दिया है। ट्रम्प ने साफ कहा कि ईरान की ओर से भेजा गया प्रस्ताव उन्हें स्वीकार नहीं है, जिससे क्षेत्र में कूटनीतिक हलचल और बढ़ गई है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका को नया प्रस्ताव भेजा था, जिसमें युद्धविराम, प्रतिबंधों में राहत और परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत की बात शामिल थी। इसके जवाब में अमेरिका ने शर्त रखी कि ईरान को उच्च संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) अमेरिका को सौंपना होगा और लंबे समय तक परमाणु संवर्धन रोकना होगा।

    इस पूरे विवाद की जड़ ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी है, जहां अमेरिका और पश्चिमी देश इसे सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं, जबकि ईरान इसे शांतिपूर्ण ऊर्जा जरूरतों से जोड़कर देखता है। इसी टकराव के कारण दोनों देशों के बीच बातचीत बार-बार रुकती और शुरू होती रही है।

    तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में हालात भी संवेदनशील बने हुए हैं, जहां वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। किसी भी टकराव का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

    रिपोर्ट्स के मुताबिक इस कूटनीतिक गतिरोध के साथ-साथ क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां और बयानबाजी भी तेज हो गई हैं, जिससे पश्चिम एशिया में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

    कुल मिलाकर यह स्थिति दिखाती है कि ईरान-अमेरिका संबंध एक बार फिर टकराव की दिशा में बढ़ रहे हैं, जहां बातचीत और दबाव की राजनीति दोनों साथ-साथ चल रही हैं और किसी भी फैसले का असर वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा सकता है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव फिर बढ़ा, इस्लामाबाद में नई बातचीत की तैयारी; न्यूक्लियर प्रोग्राम और होर्मुज स्ट्रेट बना बड़ा विवाद

    अमेरिका-ईरान तनाव फिर बढ़ा, इस्लामाबाद में नई बातचीत की तैयारी; न्यूक्लियर प्रोग्राम और होर्मुज स्ट्रेट बना बड़ा विवाद


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए अगले हफ्ते इस्लामाबाद में नई दौर की बातचीत हो सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक दोनों देश मध्यस्थों के जरिए एक 14-बिंदु ड्राफ्ट पर काम कर रहे हैं, जिसमें ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम, होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा और यूरेनियम भंडार जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि उन्हें ईरान के जवाब का इंतजार है और अगर प्रगति हुई तो समझौते की दिशा आगे बढ़ सकती है।

    हालांकि ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अपने न्यूक्लियर प्रोग्राम या हाईली एनरिच्ड यूरेनियम को रोकने के लिए किसी समझौते पर तैयार नहीं है। इससे दोनों देशों के बीच मतभेद और गहरे हो गए हैं।

    इसी बीच होर्मुज स्ट्रेट को लेकर तनाव भी बढ़ता जा रहा है। अमेरिका ने दावा किया है कि उसने 70 से ज्यादा जहाजों को ईरानी बंदरगाहों तक पहुंचने से रोका है, जबकि ईरान ने चेतावनी दी है कि किसी भी बाहरी दखल पर क्षेत्र में बड़ा संघर्ष शुरू हो सकता है।

    UAE ने भी दावा किया है कि ईरान ने उसके ऊपर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिन्हें एयर डिफेंस सिस्टम ने नष्ट कर दिया। वहीं, खाड़ी क्षेत्र में तनाव के चलते तेल और सोने की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है।

    रूस ने अमेरिका और बहरीन के संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए उसे वापस लेने की मांग की है, जबकि चीन और अन्य देशों की स्थिति इस पूरे मामले में अलग-अलग नजर आ रही है।

  • न्यूक्लियर डील से लेकर सीजफायर बातचीत तक, क्यों माने जाते हैं ईरान के सबसे भरोसेमंद कूटनीतिज्ञ

    न्यूक्लियर डील से लेकर सीजफायर बातचीत तक, क्यों माने जाते हैं ईरान के सबसे भरोसेमंद कूटनीतिज्ञ



    नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव और बातचीत के दौर में एक नाम लगातार सुर्खियों में है अब्बास अराघची। ईरान के विदेश मंत्री अराघची को इस वक्त दोनों देशों के बीच चल रही वार्ताओं का सबसे अहम चेहरा माना जा रहा है। उन्हें एक सख्त लेकिन संतुलित ‘डील मेकर’ के रूप में जाना जाता है, जो जटिल हालात में भी बातचीत को दिशा देने की क्षमता रखते हैं।

    अराघची का कूटनीतिक सफर लंबा और बेहद प्रभावशाली रहा है। उन्होंने 2015 में ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में हुए ऐतिहासिक ईरान परमाणु समझौते (JCPOA) की बातचीत में अहम भूमिका निभाई थी। उस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों और जर्मनी के साथ हुई इस डील में उनका रुख साफ, सख्त और रणनीतिक माना गया था।

    आज के दौर में जब ईरान और अमेरिका के रिश्ते बेहद नाजुक मोड़ पर हैं, अराघची की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। वे न सिर्फ बातचीत को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि ईरान के हितों को मजबूती से सामने भी रख रहे हैं। जानकार मानते हैं कि उनकी रणनीति ही तय करेगी कि यह वार्ता समझौते तक पहुंचेगी या फिर तनाव और बढ़ेगा।

    अराघची की पहचान एक ऐसे कूटनीतिज्ञ के रूप में है जो बैकडोर डिप्लोमेसी और खुले मंच—दोनों जगह समान दक्षता से काम करते हैं। यही वजह है कि उन्हें ईरान की विदेश नीति का ‘क्राइसिस मैनेजर’ भी कहा जाता है

  • अमेरिका-इजराइल का संयुक्त हमला, ईरान परमाणु विवाद में 742 मौतों के बाद सुरक्षा अलर्ट

    अमेरिका-इजराइल का संयुक्त हमला, ईरान परमाणु विवाद में 742 मौतों के बाद सुरक्षा अलर्ट



    नई दिल्ली। अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमलों के बीच ईरान में संकट गहराता जा रहा है। यह संघर्ष अब चौथे दिन में प्रवेश कर चुका है। अमेरिका के स्पेशल प्रतिनिधि स्टीव विटकॉफ ने स्पष्ट किया कि ईरान के साथ परमाणु समझौते की अंतिम कोशिश भी नाकाम रही। अमेरिका ने ईरान को प्रस्ताव दिया था कि वह अगले 10 साल तक यूरेनियम इनरिचमेंट पूरी तरह बंद कर दे, और बदले में अमेरिका न्यूक्लियर फ्यूल उपलब्ध कराने को तैयार था। हालांकि, ईरान ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। बातचीत टूटते ही अमेरिका और इजराइल ने मिलकर सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी।

    इस संघर्ष में अब तक ईरान में 742 लोगों की मौत हो चुकी है, जिनमें 176 बच्चे शामिल हैं। घायल हुए लोगों की संख्या 750 से अधिक है। इस हिंसा ने पूरे क्षेत्र में भय और असुरक्षा की स्थिति पैदा कर दी है। लेबनान के बेरूत में इजराइली सेना ने हिज्बुल्लाह से जुड़े अल-मनार टीवी स्टेशन की इमारत को निशाना बनाया, जिससे प्रसारण कुछ समय के लिए बाधित हुआ। हालांकि, हमले के बाद प्रसारण फिर से शुरू कर दिया गया।

    ईरान के मिनाब शहर में गर्ल्स स्कूल पर हुए हमले में मारी गई 165 लड़कियों का अंतिम संस्कार भी हुआ। इस दौरान हजारों लोग इकट्ठा हुए, और एक मां ने मंच से अमेरिका पर हमले का आरोप लगाया। भीड़ ने ‘अमेरिका मुर्दाबाद’, ‘इजराइल मुर्दाबाद’ और ‘नो सरेंडर’ जैसे नारे लगाए। ईरानी मीडिया ने हमले का आरोप इजराइल पर लगाया, जबकि इजराइली सेना ने इसे नकारा।

    इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कहा कि ईरान के खिलाफ युद्ध लंबा और अंतहीन नहीं होगा। उनका कहना है कि यह संघर्ष क्षेत्र में स्थायी शांति लाने का अवसर बन सकता है। उन्होंने पहले हुए अब्राहम अकॉर्ड्स का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका के साथ मिलकर अब और देशों के साथ शांति समझौते भी संभव हैं।

    अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने बताया कि राष्ट्रपति ट्रम्प अमेरिका को लंबी और अनिश्चित लड़ाई में नहीं फंसने देंगे। उन्होंने कहा कि ईरान पर हमला विशेष रणनीति के तहत किया गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ईरान के पास परमाणु हथियार न हों। ट्रम्प की अनुमति के बिना कोई युद्ध लंबे समय तक जारी नहीं रहेगा, जिससे अमेरिका को इराक और अफगानिस्तान जैसी लंबी लड़ाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

    सुरक्षा के मद्देनजर अमेरिका ने जॉर्डन, बहरीन और इराक से गैर-जरूरी सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर जाने की चेतावनी दी है। जॉर्डन और बहरीन में ईरान से ड्रोन और मिसाइल हमले का खतरा है, जबकि इराक में हिंसा और अपहरण का भी जोखिम बना हुआ है। अमेरिकी दूतावासों में केवल आवश्यक स्टाफ ही रहेंगे, और फ्लाइट्स रद्द होने के कारण नागरिकों को सुरक्षित निकासी का निर्देश दिया गया है।

    अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने मध्य-पूर्व की सुरक्षा स्थिति को गंभीर बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने शांति बहाल करने और संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए तुरंत कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। इस बीच अमेरिका और इजराइल की मिलीजुली कार्रवाई, ईरानी नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए नए संकट की घंटी साबित हो रही है।