Tag: NuclearDeal

  • मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव ट्रंप का बड़ा दावा ईरान के पास समझौते के अलावा कोई विकल्प नहीं अमेरिका पूरी तरह तैयार

    मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव ट्रंप का बड़ा दावा ईरान के पास समझौते के अलावा कोई विकल्प नहीं अमेरिका पूरी तरह तैयार


    नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव गहराता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि ईरान के पास समझौते के अलावा अब कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने दावा किया कि अमेरिका किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है लेकिन उनकी पहली प्राथमिकता अब भी कूटनीतिक समाधान और बातचीत ही है। ट्रंप के इस बयान ने एक बार फिर मध्य पूर्व की सुरक्षा और वैश्विक राजनीति को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

    व्हाइट हाउस में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है और वाशिंगटन हर परिस्थिति के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो मौजूदा सैन्य अभियान को और तेज किया जा सकता है लेकिन अगर ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को छोड़ने पर सहमत हो जाता है तो बातचीत के जरिए समाधान निकालना सबसे बेहतर रास्ता होगा। उनके मुताबिक अमेरिका की नीति स्पष्ट है कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाएंगे।

    ट्रंप ने कहा कि फिलहाल दो रास्ते खुले हैं। पहला रास्ता सैन्य कार्रवाई का है जिसमें अमेरिका अपनी ताकत का इस्तेमाल कर सकता है जबकि दूसरा रास्ता बातचीत और समझौते का है। उन्होंने दावा किया कि ईरान पहले की तुलना में अब ज्यादा गंभीरता से वार्ता कर रहा है हालांकि उन्होंने यह भी माना कि किसी अंतिम समझौते की अभी कोई गारंटी नहीं है। उनके अनुसार हालात लगातार बदल रहे हैं और आने वाले समय में तस्वीर और साफ होगी।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि यदि ईरान ने परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में कोई कदम बढ़ाया तो अमेरिका पहले से कहीं अधिक कड़ी कार्रवाई करेगा। उन्होंने इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और उसके सहयोगी देशों की सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा बताया। ट्रंप का कहना था कि अमेरिका इस मामले में किसी भी तरह का जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं है।

    उन्होंने जानकारी दी कि उपराष्ट्रपति जेडी वेंस विदेश मंत्री मार्को रुबियो और प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी ईरानी प्रतिनिधियों के साथ लगातार संपर्क में हैं। ट्रंप के मुताबिक कूटनीतिक प्रयास जारी हैं और अमेरिका बातचीत के सभी विकल्प खुले रखना चाहता है। हालांकि उन्होंने यह भी दोहराया कि यदि वार्ता विफल होती है तो सैन्य विकल्प पूरी तरह तैयार रहेगा।

    अपने संबोधन में ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका की पिछली सैन्य कार्रवाइयों से ईरान की सैन्य क्षमता को बड़ा नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि ईरान के कई अहम सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया जिससे उसकी ताकत काफी कमजोर हुई है। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका के दबाव अभियान ने पूरे क्षेत्र का रणनीतिक संतुलन बदल दिया है और अब ईरान पहले जैसी स्थिति में नहीं है।

    रूस और चीन की संभावित भूमिका पर पूछे गए सवाल के जवाब में ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों ने फिलहाल किसी बड़े स्तर पर ईरान के समर्थन में हस्तक्षेप नहीं किया है। उन्होंने दावा किया कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने उन्हें भरोसा दिलाया है कि वे इस विवाद में सीधे तौर पर शामिल नहीं होंगे। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि ईरान के इन दोनों देशों के साथ लंबे समय से संबंध रहे हैं।

    ट्रंप ने अपने पिछले सैन्य अभियानों का बचाव करते हुए कहा कि इन्हीं कदमों की वजह से ईरान परमाणु हथियार हासिल करने में सफल नहीं हो पाया। उन्होंने यह भी दावा किया कि यदि अमेरिका ने समय रहते कार्रवाई नहीं की होती तो क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति कहीं अधिक गंभीर हो सकती थी। उनके अनुसार अमेरिका का उद्देश्य युद्ध नहीं बल्कि स्थायी शांति और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करना है।

    दूसरी ओर ईरान लगातार यह कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसका मकसद परमाणु हथियार बनाना नहीं है। इसके बावजूद अमेरिका और कई पश्चिमी देश लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता जताते रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच जारी बातचीत और संभावित समझौता पूरी दुनिया की नजरों का केंद्र बना रहेगा।

  • सऊदी परमाणु समझौते पर 24 घंटे में बदला अमेरिकी रुख, ट्रम्प ने इजराइल से रिश्तों की नई शर्त जोड़कर बढ़ाई अड़चन

    सऊदी परमाणु समझौते पर 24 घंटे में बदला अमेरिकी रुख, ट्रम्प ने इजराइल से रिश्तों की नई शर्त जोड़कर बढ़ाई अड़चन

    नई दिल्ली । अमेरिका और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से प्रस्तावित असैन्य परमाणु सहयोग समझौता एक बार फिर अनिश्चितता में घिर गया है। समझौते पर हस्ताक्षर होने के महज 24 घंटे के भीतर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसके लिए नई शर्त जोड़ दी। ट्रम्प ने स्पष्ट किया कि यह समझौता तभी आगे बढ़ेगा, जब सऊदी अरब अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होकर इजराइल के साथ अपने राजनयिक संबंध सामान्य करेगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि सऊदी अरब को अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति नहीं दी जाएगी।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब दोनों देशों के बीच लगभग दो दशक से परमाणु ऊर्जा सहयोग को लेकर बातचीत चल रही थी। हाल ही में हुए हस्ताक्षर समारोह के बाद माना जा रहा था कि समझौते का रास्ता साफ हो गया है, लेकिन ट्रम्प के नए बयान ने पूरी प्रक्रिया को फिर से जटिल बना दिया। अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी इस मुद्दे पर अलग-अलग संकेत सामने आए हैं, जिससे समझौते की दिशा को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार, वॉशिंगटन में आयोजित हस्ताक्षर समारोह में अमेरिकी ऊर्जा मंत्री की मौजूदगी में समझौते की घोषणा की गई थी। बाद में यह जानकारी सामने आई कि व्हाइट हाउस इस घोषणा के समय और प्रक्रिया से पूरी तरह संतुष्ट नहीं था। इसके बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से अपनी नई शर्तों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि उनकी नीति के अनुसार क्षेत्रीय रणनीतिक सहयोग और इजराइल के साथ संबंध सामान्य करना इस समझौते का अहम हिस्सा रहेगा।

    ट्रम्प की नई घोषणा ने सऊदी अरब को भी असमंजस में डाल दिया है। पहले तैयार किए गए मसौदे में कुछ सुरक्षा शर्तों के साथ सीमित परमाणु गतिविधियों की संभावना पर चर्चा हुई थी, लेकिन अब यूरेनियम संवर्धन की अनुमति को पूरी तरह खारिज कर दिया गया है। अमेरिका का मानना है कि संवर्धित यूरेनियम का उपयोग केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रहता और भविष्य में इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार कार्यक्रम के लिए भी किया जा सकता है। इसी कारण वॉशिंगटन इस तकनीक को लेकर बेहद सतर्क रुख अपनाता है।

    इस पूरे विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष अब्राहम अकॉर्ड्स है। वर्ष 2020 में अमेरिका की पहल पर शुरू हुए इस समझौते के तहत कई अरब देशों ने पहली बार इजराइल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित किए थे। अब अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब भी इस प्रक्रिया में शामिल हो। हालांकि सऊदी नेतृत्व लगातार यह कहता रहा है कि फिलिस्तीन मुद्दे पर ठोस प्रगति और स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य के रास्ते के बिना वह इजराइल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित नहीं करेगा। यही मतभेद अब परमाणु समझौते की सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था को केवल तेल आधारित मॉडल से बाहर निकालने की रणनीति पर काम कर रहा है। बढ़ती ऊर्जा मांग, बिजली उत्पादन में विविधता और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वह परमाणु ऊर्जा, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाना चाहता है। ऐसे में अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु सहयोग उसके दीर्घकालिक विकास कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि ट्रम्प की नई शर्तों के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि समझौते का भविष्य अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति और पश्चिम एशिया की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करेगा।

  • ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता निर्णायक मोड़ पर, स्विट्जरलैंड में शुरू होगी अंतिम दौर की बातचीत; मध्य पूर्व की नजरें टिकीं

    ईरान-अमेरिका परमाणु वार्ता निर्णायक मोड़ पर, स्विट्जरलैंड में शुरू होगी अंतिम दौर की बातचीत; मध्य पूर्व की नजरें टिकीं

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी परमाणु विवाद एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अहम मुद्दों पर अंतिम चरण की बातचीत शुक्रवार से स्विट्जरलैंड में शुरू होने जा रही है। इस बैठक को केवल द्विपक्षीय वार्ता के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे मध्य पूर्व की भविष्य की रणनीतिक और सुरक्षा परिस्थितियों को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रक्रिया माना जा रहा है।

    ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने संकेत दिया है कि आगामी दौर की बातचीत विशेष रूप से परमाणु मुद्दों पर केंद्रित होगी। उनके अनुसार, दोनों पक्ष कई चरणों की चर्चा के बाद अब ऐसे बिंदु पर पहुंचे हैं जहां प्रमुख मतभेदों को दूर करने और संभावित समझौते का रास्ता तैयार करने की कोशिश की जाएगी। इसी प्रक्रिया के तहत एक प्रस्तावित समझौता ढांचे और पारस्परिक समझ से जुड़े दस्तावेजों पर भी चर्चा आगे बढ़ाई जाएगी।

    परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच वर्षों से तनाव बना हुआ है। पश्चिमी देशों की चिंता यह रही है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम भविष्य में सैन्य क्षमता हासिल करने की दिशा में इस्तेमाल हो सकता है, जबकि ईरान लगातार दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण और ऊर्जा संबंधी जरूरतों के लिए है। यही विवाद दोनों देशों के बीच आर्थिक प्रतिबंधों, कूटनीतिक तनाव और क्षेत्रीय संघर्षों की बड़ी वजह बना हुआ है।

    स्विट्जरलैंड में होने वाली यह बैठक ऐसे समय में आयोजित हो रही है जब मध्य पूर्व पहले से ही कई सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। क्षेत्र में जारी संघर्षों, सीमा विवादों और विभिन्न गुटों की गतिविधियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंताओं को बढ़ाया है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी प्रकार की प्रगति को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    ईरानी विदेश मंत्री ने बातचीत से पहले क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी स्पष्ट रुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि लेबनान की स्थिति और क्षेत्रीय संतुलन भी ईरान की प्राथमिक चिंताओं में शामिल हैं। उनके अनुसार, क्षेत्र में किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई या तनाव बढ़ाने वाले कदमों का व्यापक असर पड़ सकता है और इससे कूटनीतिक प्रयासों को नुकसान पहुंच सकता है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यदि स्विट्जरलैंड वार्ता में सकारात्मक प्रगति होती है तो इससे दोनों देशों के बीच वर्षों से जमे अविश्वास को कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही आर्थिक प्रतिबंधों, व्यापारिक संबंधों और क्षेत्रीय सहयोग के नए अवसर भी खुल सकते हैं। हालांकि, बातचीत के सफल होने की राह आसान नहीं मानी जा रही क्योंकि कई जटिल मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच अब भी महत्वपूर्ण मतभेद मौजूद हैं।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस बैठक को लेकर काफी उत्सुकता है। यूरोपीय देशों सहित कई वैश्विक शक्तियां चाहती हैं कि कूटनीतिक समाधान के माध्यम से परमाणु विवाद का शांतिपूर्ण निपटारा हो। इससे न केवल क्षेत्रीय तनाव कम होगा बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    आने वाले दिनों में स्विट्जरलैंड में होने वाली यह वार्ता केवल एक कूटनीतिक बैठक नहीं बल्कि मध्य पूर्व की राजनीतिक दिशा तय करने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया साबित हो सकती है। दुनिया भर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या दोनों देश अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर किसी साझा समाधान तक पहुंच पाते हैं या फिर क्षेत्र में तनाव का दौर आगे भी जारी रहता है।

  • ट्रंप का बड़ा बयान: ‘पागलों के हाथ में एटम बम नहीं दे सकते’, ईरान को लेकर फिर सख्त रुख

    ट्रंप का बड़ा बयान: ‘पागलों के हाथ में एटम बम नहीं दे सकते’, ईरान को लेकर फिर सख्त रुख


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ईरान को लेकर बेहद सख्त और विवादित बयान दिया है। फ्लोरिडा में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका किसी भी हालत में ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा, क्योंकि यह पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि मिडिल ईस्ट को उन्होंने एक बड़े परमाणु संकट से बचाया है।

    ईरान को परमाणु हथियार से रोकने पर जोर

    ट्रंप ने कहा कि अगर अमेरिका ने समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया होता, तो ईरान के पास परमाणु हथियार होते और इसका असर इजराइल, यूरोप और पूरे मिडिल ईस्ट पर विनाशकारी हो सकता था। उनके मुताबिक, हम ऐसे लोगों के हाथ में परमाणु हथियार नहीं जाने दे सकते जिन्हें वह ‘पागल’ बता रहे हैं।

    उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान को बातचीत से पहले अपने एनरिच्ड यूरेनियम को सौंपना होगा, तभी किसी भी तरह की डिप्लोमैटिक प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

    ईरान के प्रस्ताव पर असहमति

    व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार, ईरान ने हाल ही में जो नया प्रस्ताव भेजा था, उसमें परमाणु कार्यक्रम का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। इसी बात से ट्रंप प्रशासन असंतुष्ट है। वहीं ईरान का कहना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को तुरंत खोलने पर ध्यान दिया जाना चाहिए, जबकि परमाणु मुद्दे पर बाद में बातचीत की जा सकती है।ट्रंप का रुख है कि दोनों मुद्दों को एक साथ हल किया जाना चाहिए, न कि अलग-अलग।

    सैन्य कार्रवाई पर भी सख्त संकेत

    ट्रंप ने यह भी कहा कि उन्हें ईरान के खिलाफ किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने ऐसे मांग करने वालों को “देशभक्त नहीं” बताया। यह बयान अमेरिकी राजनीतिक हलकों में नए विवाद को जन्म दे सकता है।

    मिडिल ईस्ट तनाव और वैश्विक असर

    अमेरिका ने दावा किया है कि ईरान से जुड़े तनाव के चलते होर्मुज जलमार्ग में जहाजों की आवाजाही करीब 90% तक कम हो गई है। पहले जहां रोजाना लगभग 130 जहाज गुजरते थे, अब यह संख्या 10 से भी कम रह गई है। इस स्थिति ने वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापार पर गंभीर असर डाला है।

    इसके अलावा अमेरिका ने चेतावनी दी है कि जो भी कंपनियां ईरान को इस क्षेत्र से गुजरने के लिए वित्तीय सहायता देंगी, उन पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, चाहे वह सहायता किसी चैरिटी के नाम पर ही क्यों न हो।

    स्थिति अभी भी तनावपूर्ण

    व्हाइट हाउस ने हालांकि यह भी संकेत दिया है कि ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष में कुछ हद तक कमी आई है, लेकिन अमेरिकी सेना अभी भी क्षेत्र में सक्रिय है। इसी बीच ट्रंप प्रशासन लगातार यह संदेश दे रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार किसी भी कीमत पर नहीं मिलने दिए जाएंगे।