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  • World Vegan Day 2026: क्या है वीगन डाइट, दूध-दही से दूरी के बावजूद सेहत को मिल सकते हैं ये फायदे…

    World Vegan Day 2026: क्या है वीगन डाइट, दूध-दही से दूरी के बावजूद सेहत को मिल सकते हैं ये फायदे…

    नई दिल्ली । हर साल 1 नवंबर को विश्व वीगन दिवस यानी World Vegan Day मनाया जाता है। इसका उद्देश्य पशुओं की सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और स्वस्थ जीवनशैली के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। पिछले कुछ वर्षों में पूरी तरह पौधों पर आधारित भोजन का चलन बढ़ा है। हालांकि, वीगन डाइट को लेकर अब भी कई लोगों के मन में सवाल हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि वीगन भोजन सामान्य शाकाहारी खानपान से कैसे अलग है और इसमें दूध, दही तथा पनीर जैसे खाद्य पदार्थों के बिना शरीर को जरूरी पोषण कैसे मिल सकता है।

    वीगन डाइट पूरी तरह पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थों पर आधारित होती है। इसमें मांस, मछली, अंडे और दूध से बने उत्पादों का सेवन नहीं किया जाता। सामान्य शाकाहारी भोजन में मांस और मछली से परहेज किया जाता है, लेकिन दूध, दही, घी, मक्खन और पनीर जैसे डेयरी उत्पाद शामिल हो सकते हैं। इसके विपरीत, वीगन आहार अपनाने वाले लोग इन सभी पशु-आधारित खाद्य पदार्थों से दूरी रखते हैं। इसमें शहद का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता, क्योंकि यह मधुमक्खियों से प्राप्त होता है। वीगन जीवनशैली अपनाने वाले कुछ लोग कपड़ों और अन्य वस्तुओं में चमड़े, ऊन तथा रेशम से बने उत्पादों से भी परहेज करते हैं।

    वीगन डाइट में खाने के कई विकल्प उपलब्ध हैं। गेहूं, चावल, ओट्स, बाजरा और मक्का जैसे अनाज इसका हिस्सा हो सकते हैं। इसके अलावा अरहर, मूंग, मसूर, चना और राजमा जैसी दालें शरीर को प्रोटीन देने में मदद करती हैं। सेब, केला, संतरा और पपीता जैसे फल तथा पालक, ब्रोकोली और अन्य मौसमी सब्जियां भी इस आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। बादाम, अखरोट, काजू, मूंगफली और विभिन्न बीजों से भी पोषक तत्व प्राप्त किए जा सकते हैं।

    प्रोटीन की जरूरत पूरी करने के लिए सोयाबीन, टोफू, दालें, चना और बीन्स उपयोगी विकल्प हैं। दूध की जगह सोया मिल्क, बादाम मिल्क और ओट्स मिल्क जैसे पौधों से बने पेय इस्तेमाल किए जा सकते हैं। सामान्य पनीर के स्थान पर टोफू का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। हालांकि, सभी विकल्पों की पोषण संबंधी गुणवत्ता समान नहीं होती। इसलिए खाद्य पदार्थ चुनते समय उनमें मौजूद प्रोटीन, कैल्शियम और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा पर ध्यान देना जरूरी है।

    संतुलित तरीके से अपनाई गई वीगन डाइट सेहत के लिए कई तरह से लाभकारी हो सकती है। फल, सब्जियों, दालों और साबुत अनाज में फाइबर की अच्छी मात्रा होती है, जो पाचन को बेहतर रखने और कब्ज की समस्या कम करने में मदद कर सकती है। फाइबर से भरपूर भोजन खाने के बाद पेट लंबे समय तक भरा महसूस हो सकता है, जिससे वजन नियंत्रित रखने में सहायता मिल सकती है।

    पौधों पर आधारित संतुलित आहार हृदय स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी हो सकता है। इसमें संतृप्त वसा कम रखने और साबुत अनाज, फल तथा सब्जियों को प्राथमिकता देने से खराब कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल के स्तर को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा, फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर नियंत्रण में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, ये फायदे इस बात पर निर्भर करते हैं कि भोजन कितना संतुलित है और उसमें तले हुए, अधिक चीनी वाले तथा अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ कितनी मात्रा में शामिल हैं।

    वीगन डाइट अपनाते समय कुछ पोषक तत्वों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। दूध और डेयरी उत्पाद नहीं लेने के कारण कैल्शियम तथा विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विटामिन बी12 भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी कमी से शरीर में गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसके अलावा आयरन, जिंक, ओमेगा-3 फैटी एसिड और पर्याप्त प्रोटीन का सेवन सुनिश्चित करना जरूरी है।

    इन जरूरतों को पूरा करने के लिए फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ, दालें, बीन्स, नट्स और बीजों को नियमित भोजन में शामिल किया जा सकता है। विटामिन बी12 के लिए फोर्टिफाइड उत्पाद या चिकित्सकीय सलाह के अनुसार सप्लीमेंट की जरूरत पड़ सकती है। गर्भवती महिलाओं, बच्चों और किसी विशेष स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे लोगों को आहार में बड़ा बदलाव करने से पहले योग्य पोषण विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। इस तरह सही योजना और पोषक तत्वों पर ध्यान देकर वीगन डाइट को संतुलित जीवनशैली का हिस्सा बनाया जा सकता है।

  • शरद पूर्णिमा पर बनाएं ब्राउन राइस की हेल्दी खीर, स्वाद के साथ पोषण का रखें ध्यान..

    शरद पूर्णिमा पर बनाएं ब्राउन राइस की हेल्दी खीर, स्वाद के साथ पोषण का रखें ध्यान..

    नई दिल्ली । शरद पूर्णिमा का त्योहार चांदनी रात, पूजा-पाठ और पारंपरिक पकवानों के लिए खास माना जाता है। इस अवसर पर कई घरों में दूध और चावल से बनी खीर तैयार की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात खीर को चांदनी में रखने और अगले दिन उसका सेवन करने की परंपरा है। अगर आप इस बार पारंपरिक खीर में कुछ बदलाव करना चाहते हैं, तो ब्राउन राइस से बनी खीर एक विकल्प हो सकती है। इसे दूध, मेवे, इलायची और केसर के साथ तैयार किया जा सकता है। हालांकि, इसे हेल्दी बनाने के लिए मिठास और मात्रा का ध्यान रखना भी जरूरी है।

    हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन चंद्रमा पूर्ण अवस्था में दिखाई देता है और कई घरों में मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस रात चंद्रमा की रोशनी में रखी खीर का सेवन शुभ माना जाता है। इसी परंपरा के कारण इस पर्व को खीर पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। दूध, चावल और मेवों से तैयार खीर त्योहार की परंपरा और पारिवारिक उत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    इस बार खीर को अलग अंदाज में बनाने के लिए सफेद चावल की जगह ब्राउन राइस का इस्तेमाल किया जा सकता है। ब्राउन राइस में फाइबर और कुछ जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं। वहीं, दूध से प्रोटीन और कैल्शियम मिलता है। बादाम और पिस्ता जैसे मेवे खीर में स्वाद और पोषक तत्व जोड़ते हैं। मिठास के लिए ब्राउन शुगर का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन ध्यान रखें कि इसमें भी चीनी होती है। इसलिए इसे शुगर-फ्री विकल्प नहीं समझना चाहिए और इसकी मात्रा सीमित रखनी चाहिए।

    ब्राउन राइस की खीर बनाने के लिए ब्राउन राइस, अपनी पसंद के अनुसार फुल क्रीम या अन्य दूध, थोड़ी ब्राउन शुगर, इलायची पाउडर, कटे हुए बादाम और पिस्ता तथा केसर की जरूरत होगी। सामग्री की मात्रा खीर बनाने वाले लोगों की संख्या के अनुसार तय की जा सकती है।

    खीर बनाने के लिए सबसे पहले ब्राउन राइस को अच्छी तरह धो लें और लगभग 30 मिनट तक पानी में भिगोकर रखें। इससे चावल को पकने में मदद मिलेगी। इसके बाद एक भारी तले वाले बर्तन में दूध गर्म करें। दूध में उबाल आने पर भीगे हुए चावल डाल दें। अब इसे धीमी आंच पर पकने दें और बीच-बीच में चलाते रहें, ताकि चावल बर्तन के तले में न चिपके।

    जब चावल अच्छी तरह नरम हो जाएं और दूध गाढ़ा होने लगे, तो खीर को आंच से उतार लें। इसे थोड़ा ठंडा होने दें और फिर स्वाद के अनुसार ब्राउन शुगर मिलाएं। अंत में इलायची पाउडर, केसर और कटे हुए बादाम-पिस्ता डालकर अच्छी तरह मिला दें। इस तरह ब्राउन राइस की खीर तैयार हो जाएगी। चावल के प्रकार और पकाने के तरीके के अनुसार इसे तैयार होने में अधिक समय लग सकता है, इसलिए चावल के पूरी तरह नरम होने तक पकाना जरूरी है।

    खीर को संतुलित आहार का हिस्सा बनाने के लिए अतिरिक्त चीनी डालने से बचें और ब्राउन शुगर भी सीमित मात्रा में इस्तेमाल करें। मेवे स्वाद बढ़ाते हैं, लेकिन उनकी मात्रा भी अपनी जरूरत के अनुसार रखें। यदि आप मधुमेह या किसी अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्या के कारण मीठे का सेवन सीमित करते हैं, तो खीर की मात्रा और मिठास का विशेष ध्यान रखें।

    शरद पूर्णिमा पर खीर को चांदनी में रखने की परंपरा निभाते समय खाद्य सुरक्षा को नजरअंदाज न करें। दूध से बनी खीर को पूरी रात खुले में या कमरे के तापमान पर छोड़ने से उसमें बैक्टीरिया पनपने का खतरा बढ़ सकता है। खीर को ढककर रखें और लंबे समय तक बाहर न छोड़ें। सुरक्षित रखने के लिए इसे उचित समय पर फ्रिज में रखें। इस तरह त्योहार की परंपरा निभाने के साथ स्वाद और सेहत, दोनों का ध्यान रखा जा सकता है।

  • हेल्दी डाइट के नाम पर इन पोषण संबंधी धारणाओं पर आंख मूंदकर भरोसा न करें, गलत तरीके से अपनाने पर फायदे की जगह नुकसान हो सकता है

    हेल्दी डाइट के नाम पर इन पोषण संबंधी धारणाओं पर आंख मूंदकर भरोसा न करें, गलत तरीके से अपनाने पर फायदे की जगह नुकसान हो सकता है


    नई दिल्ली । शरीर को दिनभर अच्छे तरीके से काम करते रहने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो हमें भोजन से प्राप्त होती है। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को ऐसा भोजन करने की सलाह देते हैं, जो न सिर्फ शरीर को ताकत दे, बल्कि पोषक तत्वों से भी भरपूर हो।

    आहार को लेकर अक्सर हमारे मन में कई सारे सवाल रहते हैं। सुबह खाली पेट क्या पीना चाहिए, कौन-सा फल कब खाना चाहिए, कार्बोहाइड्रेट पूरी तरह छोड़ देना चाहिए या रात में खाना खाने से मोटापा बढ़ेगा? स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि स्वस्थ आहार के चार आधार हैं, पर्याप्तता, संतुलन, सीमित मात्रा और विविधता। यानी सिर्फ एक चीज को डाइट में जोड़ लेना या किसी एक खाद्य पदार्थ को पूरी तरह हटा देना स्वस्थ खानपान की गारंटी नहीं है।

    एक और बड़ा भ्रम यह भी है कि जो चीज प्राकृतिक हैं, वह हर व्यक्ति के लिए सुरक्षित और फायदेमंद भी होगी। ऐसे में हेल्दी डाइट के नाम पर अपनाई जा रही कुछ धारणाओं को समझना जरूरी है, ताकि फायदे की जगह नुकसान से बचा जा सके।

    शरीर के पोषण का रखें ध्यान

    लोगों को सही खानपान और संतुलित आहार के महत्व के बारे में जागरूक करने के उद्देश्य से हर साल 1 से 7 सितंबर तक राष्ट्रीय पोषण सप्ताह मनाया जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि अच्छा स्वास्थ्य केवल भरपेट खाने से नहीं, बल्कि शरीर को नियमित रूप से सही पोषक तत्व जैसे विटामिन्स, प्रोटीन और खनिज मिलने से बनता है।

    हमारे समाज में खान-पान को लेकर कई तरह की धारणाएं और मिथक प्रचलित हैं, जिनका लोग बिना पूरी जानकारी के पालन करते हैं। इनमें कार्बोहाइड्रेट, फलों और सप्लीमेंट्स से जुड़ी धारणाएं प्रमुख हैं।

    मिथ: कार्बोहाइड्रेट का मतलब वजन बढ़ाने वाली चीज

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि कार्बोहाइड्रेट वाली चीजें सेहत के लिए आवश्यक हैं और इन्हें पूरी तरह वजन बढ़ाने वाला पोषक तत्व मानना सही नहीं है। कार्बोहाइड्रेट शरीर के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। समस्या कार्बोहाइड्रेट की मौजूदगी से ज्यादा उसके स्रोत से जुड़ी होती है।

    साबुत अनाज, दालें, फल और सब्जियों से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट शरीर को स्वस्थ रखने और काम करने की ऊर्जा देते हैं। वहीं अत्यधिक प्रोसेस्ड और मीठे खाद्य पदार्थों से मिलने वाला कार्बोहाइड्रेट लंबे समय में वजन और ब्लड शुगर लेवल बढ़ाने वाला हो सकता है।

    मिथ: फल जितना ज्यादा खाएंगे, उतना ज्यादा फायदा

    फलों को हेल्दी डाइट का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, लेकिन इन्हें भी संतुलित मात्रा में ही खाना चाहिए। ज्यादा मात्रा में फलों के सेवन से भी नुकसान हो सकते हैं। 10 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को रोजाना कम से कम 400 ग्राम फल और सब्जियां खाने की सलाह दी जाती है। इससे अधिक मात्रा में कुछ फल वजन बढ़ने, शुगर और पाचन संबंधी दिक्कतें बढ़ाने वाले हो सकते हैं।

    मिथ: सप्लीमेंट्स से पूरी हो जाएगी पोषक तत्वों की कमी

    अच्छी सेहत पाने के लिए खुद से सप्लीमेंट लेना शुरू कर देना नुकसानदायक हो सकता है। सप्लीमेंट की जरूरत शरीर में पोषक तत्वों की कमी और चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर तय की जाती है। खुद से कोई सप्लीमेंट शुरू करना कई बार फायदे से ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है। पोषक तत्वों से भरपूर संतुलित आहार का सेवन शरीर की जरूरतें पूरी करने का अधिक सुरक्षित तरीका माना जाता है।

  • पैरों में लगातार क्रैंप और कमजोरी शरीर में पोटैशियम की कमी का संकेत हो सकती है, जानिए लक्षणों से जांच और खानपान का सही तरीका

    पैरों में लगातार क्रैंप और कमजोरी शरीर में पोटैशियम की कमी का संकेत हो सकती है, जानिए लक्षणों से जांच और खानपान का सही तरीका

    नई दिल्ली । मांसपेशियों में बार-बार ऐंठन, पैरों में कमजोरी और बिना ज्यादा मेहनत के थकान महसूस होना आम समस्या लग सकती है, लेकिन कुछ मामलों में इसके पीछे शरीर में पोटैशियम का असंतुलन भी जिम्मेदार हो सकता है। पोटैशियम शरीर के लिए आवश्यक इलेक्ट्रोलाइट है, जो नसों के सामान्य कामकाज, मांसपेशियों के संकुचन और शरीर में तरल पदार्थों के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि केवल लक्षणों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति में पोटैशियम की कमी है।

    पोटैशियम का स्तर शरीर में एक निश्चित सीमा के भीतर रहना जरूरी होता है। इसकी मात्रा बहुत कम होने के साथ-साथ बहुत अधिक होना भी स्वास्थ्य के लिए परेशानी पैदा कर सकता है। इसलिए किसी भी तरह के सप्लीमेंट का इस्तेमाल बिना चिकित्सकीय सलाह के करना उचित नहीं माना जाता। खासकर ऐसे लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए जिन्हें पहले से कोई बीमारी है या जो नियमित रूप से कुछ दवाएं लेते हैं।

    पोटैशियम की कमी होने पर कुछ लोगों में मांसपेशियों की कमजोरी और ऐंठन दिखाई दे सकती है। पैरों में अचानक तेज क्रैंप पड़ना, सामान्य गतिविधियों के दौरान मांसपेशियों में कमजोरी महसूस होना या शरीर में असामान्य थकान जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। लेकिन इन समस्याओं के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं। लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहना, अत्यधिक व्यायाम, शरीर में पानी की कमी या दूसरे इलेक्ट्रोलाइट्स का असंतुलन भी मांसपेशियों में ऐंठन पैदा कर सकता है।

    लगातार कमजोरी को भी केवल पोटैशियम की कमी से जोड़ना सही नहीं है। पर्याप्त नींद न मिलना, तनाव, खून की कमी, पोषण संबंधी कमियां और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याएं थकान का कारण बन सकती हैं। इसलिए यदि कमजोरी लगातार बनी हुई है, बढ़ रही है या रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगे हैं तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    गर्मी के मौसम में लंबे समय तक पसीना आने या बहुत अधिक शारीरिक मेहनत करने पर शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन प्रभावित हो सकता है। ऐसे समय में अत्यधिक कमजोरी, चक्कर, मांसपेशियों में ऐंठन या अस्वस्थ महसूस होने पर इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पर्याप्त तरल पदार्थ और संतुलित भोजन सामान्य परिस्थितियों में शरीर की जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं, लेकिन लगातार समस्या होने पर कारण की जांच जरूरी है।

    पोटैशियम की कमी का पता लगाने के लिए डॉक्टर जरूरत के अनुसार रक्त जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। जांच के परिणामों के आधार पर आहार में बदलाव या उपचार की जरूरत तय की जाती है। पोटैशियम युक्त खाद्य पदार्थ संतुलित आहार का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति को कितनी मात्रा की जरूरत है, यह उसकी उम्र, स्वास्थ्य और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

    केला पोटैशियम का एक जाना-पहचाना स्रोत है, लेकिन केवल केले को पोटैशियम की कमी का इलाज मानना सही नहीं है। संतुलित भोजन में विभिन्न पोषक तत्वों और खनिजों का पर्याप्त सेवन जरूरी है। यदि जांच में कमी सामने आती है तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार आहार और जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट की व्यवस्था की जा सकती है।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मांसपेशियों में ऐंठन या कमजोरी होने पर खुद से पोटैशियम की गोलियां लेना शुरू न करें। शरीर में पोटैशियम का अत्यधिक बढ़ जाना भी गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। इसलिए बार-बार होने वाले क्रैंप, लगातार कमजोरी या अन्य असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना ही सुरक्षित तरीका है।

  • आंगनवाड़ी केंद्रों पर बच्चों और माताओं को पोषण आहार उपलब्ध कराने बदली व्यवस्था, स्व-सहायता समूहों से तैयार हो रहा टेक होम राशन

    आंगनवाड़ी केंद्रों पर बच्चों और माताओं को पोषण आहार उपलब्ध कराने बदली व्यवस्था, स्व-सहायता समूहों से तैयार हो रहा टेक होम राशन

    मध्यप्रदेश: में बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं तक पूरक पोषण आहार की पहुंच को मजबूत करने के लिए राज्य सरकार ने टेक होम राशन व्यवस्था में बदलाव किया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में महिला एवं बाल विकास विभाग ने अगस्त के पहले सप्ताह से नई व्यवस्था लागू की है। इसके तहत स्थानीय स्व-सहायता समूहों के माध्यम से तैयार किया गया टेक होम राशन पात्र हितग्राहियों तक पहुंचाया जा रहा है। सरकार का जोर पोषण व्यवस्था को स्थानीय स्तर पर अधिक प्रभावी बनाने के साथ महिलाओं और बच्चों को नियमित पोषण सहायता उपलब्ध कराने पर है।

    पूरक पोषण कार्यक्रम के तहत पात्र हितग्राहियों को वर्ष में कम से कम 300 दिन पूरक पोषण सेवाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान है। तीन से छह वर्ष तक के बच्चों को आंगनवाड़ी केंद्रों पर प्रतिदिन नाश्ता और गर्म पका भोजन दिया जा रहा है। वहीं छह माह से तीन वर्ष तक के बच्चों और गर्भवती तथा धात्री माताओं के लिए मंगलवार को गर्म पका भोजन और शेष दिनों में टेक होम राशन उपलब्ध कराया जाता है। नई व्यवस्था के तहत प्रदेश के आंगनवाड़ी केंद्रों पर स्थानीय स्व-सहायता समूहों द्वारा तैयार टेक होम राशन का वितरण शुरू किया गया है।

    इस बदलाव से पोषण आहार की उपलब्धता को स्थानीय स्तर पर मजबूत करने के साथ स्व-सहायता समूहों की भागीदारी भी बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। स्थानीय समूहों के माध्यम से तैयार होने वाले राशन से आंगनवाड़ी सेवाओं से जुड़े हितग्राहियों को निर्धारित पोषण सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाया जा रहा है। छह से 60 माह के अति गंभीर कुपोषित बच्चों और छह से 72 माह के अति कम वजन वाले बच्चों के लिए अतिरिक्त पोषण आहार के रूप में भी स्थानीय स्तर पर तैयार टेक होम राशन उपलब्ध कराया जा रहा है।

    बच्चों की पोषण स्थिति की नियमित निगरानी के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों पर उनका वजन और लंबाई या ऊंचाई मापी जाती है। इन आंकड़ों को पोषण ट्रैकर पर दर्ज किया जाता है, जिससे बच्चों की पोषण स्थिति पर नजर रखी जा सके। चिन्हित बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण, पोषण परामर्श और आवश्यक देखभाल के साथ जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य विभाग तथा पोषण पुनर्वास केंद्रों से समन्वय कर रेफरल की कार्रवाई की जाती है।

    हर महीने आयोजित दस दिवसीय शारीरिक माप दिवसों में जन्म से छह वर्ष तक के बच्चों की स्क्रीनिंग और स्वास्थ्य जांच की जाती है। कुपोषण की स्थिति वाले चिन्हित बच्चों का आवश्यक कार्यक्रमों के तहत पंजीयन कर स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ा जाता है। मैदानी अमले द्वारा गृहभेंट के माध्यम से बच्चों की स्थिति का फॉलोअप करने के साथ परिवारों को पोषण और स्वास्थ्य संबंधी परामर्श भी दिया जाता है।

    विशेष जनजातीय क्षेत्रों में भी बच्चों और माताओं तक पोषण सेवाओं की पहुंच बढ़ाने पर ध्यान दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री जनजातीय न्याय महाअभियान के अंतर्गत जनजातीय कार्य मंत्रालय के सहयोग से 681 नवीन आंगनवाड़ी केंद्रों का संचालन शुरू किया गया है। सहरिया, बैगा और भारिया जैसे विशेष जनजातीय समूहों के क्षेत्रों में आंगनवाड़ी सेवाओं, पूरक पोषण आहार और बच्चों की वृद्धि तथा पोषण स्थिति की निगरानी को प्राथमिकता दी जा रही है।

    स्वास्थ्य विभाग के साथ समन्वय से नियमित स्क्रीनिंग, स्वास्थ्य जांच, रेफरल और फॉलोअप की व्यवस्था को भी मजबूत किया जा रहा है। नई टेक होम राशन व्यवस्था के जरिए पोषण सेवाओं को अधिक स्थानीय और सतत बनाने की कोशिश की गई है। अगस्त के पहले सप्ताह से शुरू हुई यह व्यवस्था बच्चों और माताओं तक पूरक पोषण आहार की पहुंच मजबूत करने के साथ स्व-सहायता समूहों की भूमिका बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

  • सावन में नॉनवेज क्यों छोड़ते हैं लोग, जानिए धार्मिक मान्यता के साथ मानसून और खाद्य सुरक्षा से जुड़े प्रमुख कारण

    सावन में नॉनवेज क्यों छोड़ते हैं लोग, जानिए धार्मिक मान्यता के साथ मानसून और खाद्य सुरक्षा से जुड़े प्रमुख कारण

    नई दिल्ली ।सावन का महीना शुरू होते ही देश के कई हिस्सों में लोग खानपान में बदलाव करते हैं। बहुत से परिवारों में इस दौरान मांस, मछली, चिकन और अंडे से दूरी बनाई जाती है। कुछ लोग प्याज और लहसुन का सेवन भी छोड़ देते हैं। आमतौर पर इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसके पीछे जीवनशैली, संयम, जीवदया और मानसून के दौरान खाद्य सुरक्षा जैसे पहलुओं को भी समझा जा सकता है।

    हिंदू परंपरा में सावन भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु व्रत रखते हैं, पूजा करते हैं और ध्यान तथा धार्मिक गतिविधियों में समय देते हैं। धार्मिक दृष्टि से साधना के समय भोजन में सादगी और संयम को महत्व दिया जाता है। इसी सोच के तहत कई लोग मांसाहार छोड़कर हल्का और सात्त्विक भोजन अपनाते हैं।

    सात्त्विक भोजन की अवधारणा ताजे, पौष्टिक और अपेक्षाकृत हल्के भोजन से जुड़ी है। इसका उद्देश्य केवल खानपान को बदलना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर नियंत्रण और मन को शांत रखने की साधना से भी जोड़ा जाता है। हालांकि धार्मिक ग्रंथों में सावन के दौरान हर व्यक्ति के लिए मांसाहार पूरी तरह प्रतिबंधित होने का सीधा निर्देश नहीं मिलता। यह परंपरा धार्मिक आचार, स्थानीय मान्यताओं और लंबे समय से चली आ रही जीवनशैली का हिस्सा बनी है।

    सावन चातुर्मास की अवधि में भी आता है। परंपरागत रूप से यह समय तप, व्रत, दान और आत्मसंयम के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। वर्षा ऋतु में साधु-संतों द्वारा यात्राएं सीमित करने की परंपरा भी रही है। इसे मौसम की कठिन परिस्थितियों के साथ-साथ छोटे जीवों को अनजाने में नुकसान से बचाने की भावना से भी जोड़ा जाता है।

    बारिश के मौसम में वातावरण में नमी बढ़ जाती है और कई प्रकार के सूक्ष्मजीवों की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। मांस, मछली, चिकन और अंडे जैसे खाद्य पदार्थ जल्दी खराब होने वाले होते हैं। इनके सुरक्षित भंडारण और उचित तापमान पर रखे जाने की जरूरत होती है। कच्चे मांस को गलत तरीके से रखने या संभालने पर उसमें मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीव दूसरे खाद्य पदार्थों तक भी पहुंच सकते हैं।

    मानसून में जलभराव, दूषित पानी, अस्वच्छ बाजार और बिजली आपूर्ति में बाधा जैसी परिस्थितियां खाद्य पदार्थों की स्वच्छता को प्रभावित कर सकती हैं। पुराने समय में रेफ्रिजरेशन और सुरक्षित परिवहन की सुविधाएं सीमित थीं। ऐसे वातावरण में जल्दी खराब होने वाले भोजन से दूरी बनाना व्यावहारिक सावधानी भी रही होगी।

    हालांकि विज्ञान यह नहीं कहता कि सावन के महीने में मांसाहार अपने आप हानिकारक हो जाता है। बीमारी का जोखिम मुख्य रूप से भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता, भंडारण और पकाने की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। यदि मांस या मछली ताजा हो, उचित तापमान पर रखी गई हो और पूरी तरह पकाई जाए तो संक्रमण का खतरा कम किया जा सकता है।

    इसी तरह यह दावा भी सही नहीं है कि सावन में हर व्यक्ति की पाचन शक्ति निश्चित रूप से कमजोर हो जाती है। उमस, कम शारीरिक गतिविधि, अनियमित खानपान और बहुत अधिक तला या मसालेदार भोजन कुछ लोगों में अपच और भारीपन बढ़ा सकता है, लेकिन इसका प्रभाव व्यक्ति की स्थिति और खानपान पर निर्भर करता है।

    इसलिए सावन में नॉनवेज खाना या छोड़ना व्यक्तिगत आस्था, पारिवारिक परंपरा और स्वास्थ्य संबंधी प्राथमिकताओं पर निर्भर कर सकता है। धार्मिक दृष्टि से इसे संयम और जीवदया का माध्यम माना जाता है, जबकि स्वास्थ्य की दृष्टि से मानसून में भोजन की स्वच्छता और सुरक्षित रखरखाव पर विशेष ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है।

    सावन की इस परंपरा को केवल डर या बीमारी से जोड़कर देखने के बजाय इसके व्यापक भाव को समझना जरूरी है। इसमें कुछ समय के लिए स्वाद और इच्छाओं पर नियंत्रण, सादगी अपनाने, प्रकृति के प्रति संवेदनशील रहने और भोजन को लेकर सावधानी बरतने की भावना शामिल है।

  • अतिरिक्त चीनी से सेहत को नुकसान का खतरा, पैक्ड जूस और सॉस में छिपी शुगर के प्रति विशेषज्ञों ने किया आगाह

    अतिरिक्त चीनी से सेहत को नुकसान का खतरा, पैक्ड जूस और सॉस में छिपी शुगर के प्रति विशेषज्ञों ने किया आगाह

    नई दिल्ली ।उत्तम स्वास्थ्य और बेहतर जीवन शैली बनाए रखने के लिए सही खानपान को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ रहने के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि किन चीजों के सेवन से बचा जाना चाहिए। जिन खाद्य पदार्थों को सेहत के लिए सबसे अधिक हानिकारक माना जाता है, उनमें अतिरिक्त चीनी प्रमुख है। अत्यधिक मात्रा में चीनी का सेवन मोटापे, मधुमेह और शरीर में अंदरूनी सूजन जैसी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है।

    आमतौर पर लोग चीनी छोड़ने का अर्थ केवल चाय, कॉफी या मिठाइयों का त्याग करना समझते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल इन चीजों को बंद कर देना ही पर्याप्त नहीं है। रसोई में उपयोग होने वाली और बाजार में मिलने वाली कई अन्य सामान्य चीजों में भी चीनी की भारी मात्रा छिपी हो सकती है। सॉस, टोमैटो केचप, डिब्बाबंद ड्रिंक्स और फ्लेवर्ड दही जैसे पदार्थों में शर्करा की अदृश्य मौजूदगी होती है, जो रोजमर्रा के खानपान में मिठास बढ़ा देती है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हर मीठी वस्तु का स्वाद मिठाई जैसा तेज होना आवश्यक नहीं है। कई ऐसे प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ हैं जिनका स्वाद नमकीन या सामान्य लगता है, लेकिन उनमें एडेड शुगर मिलाई जाती है। इसलिए, यदि कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से चीनी का सेवन बंद भी कर देता है, तब भी इन प्रसंस्कृत पदार्थों के माध्यम से चीनी शरीर में पहुंचती रहती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि दैनिक कुल कैलोरी में एडेड शुगर का हिस्सा 10 प्रतिशत से कम होना चाहिए।

    आहार विशेषज्ञों के मुताबिक एक सामान्य वयस्क के लिए प्रतिदिन 2,000 कैलोरी की डाइट में चीनी की मात्रा लगभग 50 ग्राम यानी 6 से 9 चम्मच से अधिक नहीं होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, महज एक टेबलस्पून टोमैटो केचप में लगभग 4 ग्राम एडेड शुगर हो सकती है। सैंडविच, बर्गर या नाश्ते के साथ नियमित रूप से सॉस का उपयोग करने की आदत कुल चीनी की खपत को चुपचाप बढ़ा देती है। इसी तरह, पैकेज्ड फ्रूट जूस को भी पूरी तरह से स्वास्थ्यवर्धक मानना एक भूल हो सकती है।

    पैकेज्ड जूस में प्राकृतिक फाइबर की कमी होती है और उन्हें संरक्षित रखने के लिए अतिरिक्त चीनी मिलाई जाती है। मध्य प्रदेश सहित देश भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सुझाव है कि बाजार से कोई भी पैकेज्ड खाद्य पदार्थ खरीदते समय केवल कैलोरी ही नहीं, बल्कि उसमें मौजूद एडेड शुगर की मात्रा की जांच अवश्य करनी चाहिए। स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के बजाय प्राकृतिक और ताजा आहार को प्राथमिकता देना ही सबसे बेहतर विकल्प है।

  • एंटी एजिंग के लिए महंगे प्रोडक्ट्स नहीं, ये हेल्दी फूड्स बनाए रखेंगे त्वचा की चमक और खूबसूरती

    एंटी एजिंग के लिए महंगे प्रोडक्ट्स नहीं, ये हेल्दी फूड्स बनाए रखेंगे त्वचा की चमक और खूबसूरती

    नई दिल्ली । बढ़ती उम्र के साथ त्वचा पर झुर्रियां, रूखापन और चमक कम होने जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। हालांकि सही खान-पान और संतुलित डाइट के जरिए उम्र बढ़ने के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है। एंटी-एजिंग डाइट में ऐसे खाद्य पदार्थ शामिल किए जाते हैं, जिनमें एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन, मिनरल्स और जरूरी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं। ये तत्व शरीर में बनने वाले फ्री रेडिकल्स से लड़ने में मदद करते हैं और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं।

    फ्री रेडिकल्स शरीर में बनने वाले ऐसे हानिकारक तत्व होते हैं, जो प्रदूषण, तनाव और खराब जीवनशैली के कारण बढ़ सकते हैं। इनकी वजह से कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है और चेहरे पर उम्र के निशान दिखाई देने लगते हैं। ऐसे में डाइट में कुछ खास सुपरफूड्स को शामिल करके त्वचा की प्राकृतिक चमक और सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    टमाटर एंटी-एजिंग डाइट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसमें लाइकोपीन नामक तत्व पाया जाता है, जो त्वचा को सूरज की हानिकारक किरणों से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद कर सकता है। इसके अलावा गाजर और कद्दू में मौजूद बीटा-कैरोटीन शरीर में जाकर विटामिन ए में बदलता है, जो त्वचा की मरम्मत प्रक्रिया के लिए जरूरी माना जाता है।

    हरी पत्तेदार सब्जियां भी त्वचा की सेहत के लिए फायदेमंद होती हैं। पालक, मेथी, ब्रोकली और अन्य हरी सब्जियों में विटामिन सी और विटामिन ई जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं। वहीं संतरा, नींबू, आंवला और कीवी जैसे खट्टे फल विटामिन सी के अच्छे स्रोत होते हैं। विटामिन सी शरीर में कोलेजन बनाने में मदद करता है, जिससे त्वचा की लचक बनी रह सकती है।

    ड्राई फ्रूट्स और सीड्स जैसे बादाम, अखरोट, अलसी और चिया सीड्स भी एंटी-एजिंग डाइट का हिस्सा बनाए जा सकते हैं। इनमें ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन ई, जिंक और अन्य पोषक तत्व होते हैं, जो त्वचा की नमी बनाए रखने और उसे स्वस्थ रखने में मदद कर सकते हैं। नियमित रूप से सीमित मात्रा में इनका सेवन त्वचा के लिए लाभकारी माना जाता है।

    ग्रीन टी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट तत्व कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाले फ्री रेडिकल्स से बचाने में मदद कर सकते हैं। इसमें मौजूद पॉलीफेनॉल त्वचा पर प्रदूषण और पर्यावरणीय प्रभावों के कारण होने वाले नुकसान को कम करने में सहायक हो सकते हैं। इसके अलावा पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी त्वचा के लिए बेहद जरूरी है। शरीर में पानी की कमी होने पर त्वचा बेजान और रूखी दिखाई दे सकती है।

    एवोकाडो में मौजूद हेल्दी फैट्स, विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट त्वचा को पोषण देने में मदद करते हैं। ब्लूबेरी में पाए जाने वाले एंथोसायनिन और विटामिन सी त्वचा को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में सहायक हो सकते हैं। वहीं हल्दी में मौजूद करक्यूमिन अपने एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के लिए जानी जाती है, जो त्वचा की सूजन और दाग-धब्बों को कम करने में मदद कर सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, केवल किसी एक फूड को खाने से उम्र का असर पूरी तरह नहीं रुकता, बल्कि संतुलित आहार, पर्याप्त पानी, अच्छी नींद और स्वस्थ जीवनशैली के साथ इन सुपरफूड्स को डाइट में शामिल करने से त्वचा को लंबे समय तक स्वस्थ और चमकदार बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

  • प्रेग्नेंसी के दौरान हाई बीपी से बचना है तो आज से शुरू करें ये 6 हेल्दी फूड्स स्वस्थ मां और स्वस्थ शिशु की मजबूत नींव

    प्रेग्नेंसी के दौरान हाई बीपी से बचना है तो आज से शुरू करें ये 6 हेल्दी फूड्स स्वस्थ मां और स्वस्थ शिशु की मजबूत नींव


    नई दिल्ली। गर्भावस्था हर महिला के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील दौर होता है। इस दौरान शरीर में कई हार्मोनल और शारीरिक बदलाव होते हैं जिनका असर स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। इन्हीं बदलावों के बीच हाई ब्लड प्रेशर यानी उच्च रक्तचाप एक ऐसी समस्या है जिसे हल्के में लेना मां और गर्भ में पल रहे शिशु दोनों के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है। यदि समय रहते इसे नियंत्रित न किया जाए तो प्री-एक्लेम्पसिया समय से पहले प्रसव और अन्य जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। अच्छी बात यह है कि संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाकर ब्लड प्रेशर को काफी हद तक नियंत्रित रखा जा सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार गर्भावस्था के दौरान ऐसी चीजों का सेवन करना चाहिए जो शरीर को जरूरी पोषक तत्व देने के साथ रक्तचाप को भी संतुलित रखने में मदद करें। पोटैशियम से भरपूर फल जैसे केला संतरा और तरबूज इस दौरान बेहद लाभकारी माने जाते हैं। पोटैशियम शरीर में सोडियम के प्रभाव को कम करता है जिससे ब्लड प्रेशर नियंत्रित रखने में सहायता मिलती है। इन फलों का नियमित सेवन शरीर को ऊर्जा देने के साथ हाइड्रेट भी रखता है।

    हरी पत्तेदार सब्जियां भी गर्भवती महिलाओं की डाइट का महत्वपूर्ण हिस्सा होनी चाहिए। पालक मेथी सरसों और अन्य हरी सब्जियों में मैग्नीशियम आयरन और फोलेट जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ये रक्त संचार को बेहतर बनाते हैं और हाई ब्लड प्रेशर के खतरे को कम करने में मदद करते हैं। साथ ही शिशु के विकास के लिए भी ये पोषक तत्व बेहद जरूरी होते हैं।

    दूध दही और पनीर जैसे कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थ भी गर्भावस्था में बहुत फायदेमंद माने जाते हैं। पर्याप्त कैल्शियम शरीर की हड्डियों को मजबूत रखने के साथ रक्तचाप को संतुलित रखने में भी मदद करता है। यदि डॉक्टर की सलाह हो तो कैल्शियम सप्लीमेंट भी लिया जा सकता है लेकिन बिना सलाह के किसी भी सप्लीमेंट का सेवन नहीं करना चाहिए।

    प्रोटीन से भरपूर आहार भी इस समय बेहद जरूरी है। दालें राजमा चना सोयाबीन अंडा और यदि डॉक्टर अनुमति दें तो मछली जैसे प्रोटीन स्रोत शरीर को ताकत देने के साथ ब्लड प्रेशर को संतुलित रखने में मदद करते हैं। प्रोटीन शिशु के स्वस्थ विकास के लिए भी आवश्यक पोषक तत्वों में शामिल है।

    साबुत अनाज जैसे ओट्स ब्राउन राइस जौ और मल्टीग्रेन आटा भी गर्भवती महिलाओं के लिए अच्छे विकल्प हैं। इनमें मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को स्वस्थ रखते हैं और रक्त शर्करा तथा रक्तचाप दोनों को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं। इससे शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा भी मिलती है।

    नट्स और बीज जैसे बादाम अखरोट अलसी और चिया सीड्स में हेल्दी फैट्स ओमेगा थ्री फैटी एसिड और मैग्नीशियम पाया जाता है। इनका सीमित मात्रा में सेवन हृदय को स्वस्थ रखने और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। हालांकि इनका सेवन भी संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए।

    इसके अलावा गर्भावस्था में ज्यादा नमक तली हुई चीजें पैकेज्ड फूड और अत्यधिक मीठे खाद्य पदार्थों से दूरी बनानी चाहिए। पर्याप्त पानी पीना नियमित हल्की शारीरिक गतिविधि करना और समय-समय पर डॉक्टर से ब्लड प्रेशर की जांच कराना भी बेहद जरूरी है।

    ध्यान रखें कि केवल खानपान के भरोसे हाई ब्लड प्रेशर का इलाज नहीं किया जा सकता। यदि डॉक्टर दवा लेने की सलाह दें तो उसे नियमित रूप से लेना चाहिए। सही डाइट स्वस्थ जीवनशैली और चिकित्सकीय निगरानी के साथ गर्भावस्था को सुरक्षित और स्वस्थ बनाया जा सकता है।

  • बिना चिकित्सीय परामर्श के फिश ऑयल कैप्सूल का सेवन दे सकता है बीमारियों को न्योता, जानें इसके सही फायदे और नुकसान

    बिना चिकित्सीय परामर्श के फिश ऑयल कैप्सूल का सेवन दे सकता है बीमारियों को न्योता, जानें इसके सही फायदे और नुकसान


    नई दिल्ली ।
    आधुनिक जीवनशैली और बदलती खानपान की आदतों के बीच शारीरिक फिटनेस बनाए रखने के लिए सप्लीमेंट्स का चलन तेजी से बढ़ा है। विशेषकर जिम जाने वाले युवाओं और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के बीच ओमेगा-3 युक्त फिश ऑयल कैप्सूल का उपयोग काफी लोकप्रिय हो रहा है। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बिना डॉक्टरी परामर्श और सही खुराक की जानकारी के इसका नियमित सेवन फायदे के बजाय शरीर को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

    फिश ऑयल में मुख्य रूप से ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन ए, विटामिन डी और कई आवश्यक तत्व पाए जाते हैं, जिन्हें हमारा शरीर प्राकृतिक रूप से निर्मित नहीं कर पाता। संतुलित मात्रा में इसका सेवन करने से हृदय स्वास्थ्य में सुधार होता है और रक्त में हानिकारक वसा का स्तर कम करने में मदद मिलती है। इसके अलावा, यह यकृत में जमा अतिरिक्त वसा को नियंत्रित करने और जोड़ों की अकड़न व सूजन से राहत दिलाने में भी मददगार साबित होता है।

    दूसरी ओर, विशेषज्ञ इसके अत्यधिक या अनियंत्रित सेवन को लेकर आगाह करते हैं। आवश्यकता से अधिक खुराक लेने पर शरीर में ओमेगा-3 का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे पाचन तंत्र से जुड़ी समस्याएं जैसे गैस, अपच और पेट दर्द हो सकता है। इसके अलावा, जो लोग पहले से रक्त को पतला करने वाली दवाइयों का सेवन कर रहे हैं, उनके लिए बिना सलाह के इसे लेना घातक हो सकता है, क्योंकि इसमें मौजूद गुण रक्त के थक्के जमने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।

    स्वास्थ्य सलाहकारों के अनुसार, जिन लोगों की दैनिक खुराक में पहले से ही प्राकृतिक रूप से ये पोषक तत्व मौजूद हैं, उन्हें अतिरिक्त सप्लीमेंट की आवश्यकता नहीं होती। अत्यधिक मात्रा में सेवन से शरीर में अन्य आवश्यक विटामिनों की कमी होने का जोखिम भी बना रहता है। जिन व्यक्तियों को समुद्री खाद्य पदार्थों से एलर्जी की शिकायत है, उन्हें ऐसे कैप्सूल के प्रयोग से पूरी तरह बचना चाहिए।

    मध्य प्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों को सप्लीमेंट्स के सुरक्षित उपयोग के प्रति जागरूक किया जा रहा है। चिकित्सकों का सुझाव है कि किसी भी प्रकार के आहार पूरक को दैनिक दिनचर्या में शामिल करने से पहले योग्य डॉक्टर से परामर्श अवश्य लेना चाहिए और इसे हमेशा भोजन के बाद ही निर्धारित मात्रा में ग्रहण करना चाहिए।