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  • एक्सरसाइज के बावजूद क्यों नहीं घट रहा फैट, विशेषज्ञों ने ओवरट्रेनिंग और हार्मोनल असंतुलन पर जताई चिंता

    एक्सरसाइज के बावजूद क्यों नहीं घट रहा फैट, विशेषज्ञों ने ओवरट्रेनिंग और हार्मोनल असंतुलन पर जताई चिंता

    नई दिल्ली ।नियमित रूप से कड़ा व्यायाम करने और खानपान पर ध्यान देने के बावजूद वजन नियंत्रित न होना एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, वजन घटाने के प्रयास में अक्सर लोग अत्यधिक पसीना बहाते हैं, लेकिन परिणाम उम्मीद के विपरीत मिलते हैं। इस स्थिति के पीछे केवल आहार ही मुख्य वजह नहीं होती, बल्कि शरीर को पर्याप्त आराम न देना, खराब नींद और जरूरत से ज्यादा वर्कआउट करना भी एक बड़ा कारण हो सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि व्यायाम के बाद मांसपेशियों की रिकवरी के लिए शरीर को पर्याप्त समय मिलना अत्यंत आवश्यक है। जब कोई व्यक्ति लगातार भारी वर्कआउट करता है और रात में गहरी नींद नहीं ले पाता, तो शरीर में अंदरूनी तनाव बढ़ने लगता है। यह स्थिति ऊर्जा स्तर, पाचन क्रिया और दैनिक कार्यक्षमता को प्रभावित करती है। अत्यधिक शारीरिक परिश्रम के कारण शरीर का मेटाबॉलिज्म सुस्त हो सकता है और हार्मोनल संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे फैट घटने के बजाय जमा होने लगता है।

    क्रॉनिक डिजीज विशेषज्ञों के मुताबिक, बिना किसी विश्राम दिवस के रोज कड़ा व्यायाम करने से शरीर में क्रॉनिक लो-ग्रेड इंफ्लेमेशन यानी अंदरूनी सूजन और तनाव उत्पन्न होता है। यह अंदरूनी तनाव हार्मोनल बैलेंस को प्रभावित करता है, जिससे विशेष रूप से पेट के आसपास फैट जमा होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इसके अलावा, ओवरट्रेनिंग के कारण महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमतिता जैसी समस्याएं भी देखने को मिल सकती हैं, जो कि शरीर द्वारा अत्यधिक थकान का स्पष्ट संकेत है।

    व्यायाम से शरीर पूरी तरह थक जाने के बाद भी यदि रात में नींद न आने की समस्या हो रही है, तो यह ओवरट्रेनिंग और एड्रिनल ग्लैंड पर पड़ रहे अत्यधिक दबाव को दर्शाता है। ऐसी स्थिति में शरीर थायरॉइड और चयापचय दर को धीमा कर देता है, जिससे वजन घटाने की प्रक्रिया पूरी तरह रुक जाती है। मध्य प्रदेश सहित देश भर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि फिटनेस के लिए हमेशा अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही कसरत करनी चाहिए।

    एक स्वस्थ जीवन शैली और प्रभावी वजन नियंत्रण के लिए केवल कठिन वर्कआउट ही पर्याप्त नहीं है। इसके साथ संतुलित आहार, समय पर पर्याप्त आराम और प्रतिदिन कम से कम सात से आठ घंटे की नींद लेना अनिवार्य है। शरीर को अत्यधिक थका देने के बजाय संयमित दिनचर्या अपनाकर ही टिकाऊ फिटनेस और सही वजन प्राप्त किया जा सकता है।

  • पेट की अंदरूनी चर्बी विसरल फैट बढ़ा सकती है मेटाबॉलिक बीमारियां जानिए बचाव के तरीके

    पेट की अंदरूनी चर्बी विसरल फैट बढ़ा सकती है मेटाबॉलिक बीमारियां जानिए बचाव के तरीके

    नई दिल्ली ।स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने पेट की गहराई में जमा होने वाली आंतरिक चर्बी यानी विसरल फैट को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। चिकित्सीय अध्ययनों के अनुसार यह चर्बी त्वचा के ठीक नीचे जमा होने वाले सामान्य फैट से पूरी तरह भिन्न होती है और शरीर के आंतरिक अंगों जैसे लिवर, आंत और अग्न्याशय के आसपास जमा होती है।

    चिकित्सकों के मुताबिक देखने में सामान्य या पतले नजर आने वाले व्यक्तियों में भी विसरल फैट की समस्या हो सकती है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को थिन आउटसाइड-फैट इनसाइड कहा जाता है। कमर का घेरा बढ़ना और पेट का बाहर निकलना इस समस्या का प्रमुख प्राथमिक संकेत हो सकता है।

    शोधकर्ताओं ने पाया है कि शरीर में विसरल फैट की अत्यधिक मात्रा इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देती है। इससे शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप ब्लड शुगर का स्तर अनियंत्रित होने लगता है और व्यक्ति टाइप-2 डायबिटीज का शिकार हो सकता है।

    इसके अतिरिक्त यह आंतरिक चर्बी शरीर में पुरानी सूजन और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का कारण बनती है। इससे हाई ब्लड प्रेशर, फैटी लिवर और कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने का जोखिम काफी हद तक बढ़ जाता है जो आगे चलकर गंभीर हृदय रोगों में बदल सकता है।

    असंतुलित खानपान, बहुत ज्यादा कैलोरी युक्त भोजन, मीठे पेय पदार्थों का अत्यधिक सेवन और शारीरिक गतिविधि की कमी को विसरल फैट बढ़ने का मुख्य कारण माना गया है। घंटों बैठकर काम करने की आधुनिक जीवनशैली के कारण दिल्ली और मध्य प्रदेश सहित देश भर के शहरी इलाकों में यह समस्या तेजी से बढ़ रही है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि इस समस्या से निपटने के लिए नियमित शारीरिक व्यायाम जैसे वॉक, साइकिलिंग और एरोबिक्स बेहद जरूरी हैं। साथ ही आहार में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों, फलों, हरी सब्जियों और साबुत अनाज को शामिल कर तथा मीठे पेय पदार्थों से परहेज रखकर इस जोखिम से बचा जा सकता है।

  • कुर्सी पर बैठे-बैठे गुजर रहा है पूरा दिन? सावधान! शरीर को अंदर से नुकसान पहुंचा सकती है ऐसी आदत

    कुर्सी पर बैठे-बैठे गुजर रहा है पूरा दिन? सावधान! शरीर को अंदर से नुकसान पहुंचा सकती है ऐसी आदत


    नई दिल्ली । अगर आपकी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा ऑफिस की कुर्सी या घर के सोफे पर बैठकर गुजरता है और दिनभर शरीर को पर्याप्त मेहनत नहीं मिलती तो अब सावधान होने का समय है। लंबे समय तक शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहना सिर्फ वजन बढ़ने की वजह नहीं बनता बल्कि धीरे-धीरे शरीर की कई जरूरी प्रणालियों पर असर डाल सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2022 में दुनिया भर के करीब 31 प्रतिशत वयस्क पर्याप्त शारीरिक गतिविधि नहीं कर रहे थे। विशेषज्ञों के मुताबिक पर्याप्त सक्रिय न रहने वाले लोगों में समय से पहले मृत्यु का जोखिम सक्रिय लोगों की तुलना में करीब 20 से 30 प्रतिशत तक अधिक पाया गया है। ऐसे में रोजाना कुछ समय शरीर को सक्रिय रखना स्वस्थ जीवनशैली का अहम हिस्सा बन जाता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ रहने के लिए हर किसी के लिए जिम जाना जरूरी नहीं है। रोजाना तेज कदमों से चलना, साइकिल चलाना, सीढ़ियों का इस्तेमाल करना और घर के सामान्य कामों में सक्रिय रहना भी शरीर के लिए फायदेमंद हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वयस्कों को सप्ताह में कम से कम 150 से 300 मिनट तक मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि करने की सलाह देता है। इसका मतलब है कि दिनभर लगातार बैठे रहने के बजाय काम के बीच छोटे ब्रेक लेकर कुछ देर चलना भी आपकी दिनचर्या को बेहतर बना सकता है।

    शारीरिक गतिविधि की कमी का असर सबसे पहले हृदय और मेटाबॉलिज्म पर दिखाई दे सकता है। नियमित व्यायाम शरीर को सक्रिय रखने के साथ हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम को कम करने में मदद करता है। वहीं लगातार बैठे रहने और शरीर को पर्याप्त गतिविधि न मिलने से लंबे समय में कई गैर-संचारी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए अगर काम की वजह से घंटों कुर्सी पर बैठना मजबूरी है तो बीच बीच में उठकर कुछ कदम चलना और शरीर को स्ट्रेच करना उपयोगी आदत हो सकती है।

    निष्क्रिय जीवनशैली का एक बड़ा खतरा टाइप-2 डायबिटीज से भी जुड़ा है। नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर को ग्लूकोज का बेहतर इस्तेमाल करने और वजन नियंत्रित रखने में मदद करती है। इसके विपरीत लंबे समय तक बैठे रहने वाली दिनचर्या वजन बढ़ने और मेटाबॉलिक समस्याओं की संभावना को बढ़ा सकती है। इसलिए डायबिटीज से बचाव के लिए केवल खानपान पर ध्यान देना ही पर्याप्त नहीं माना जाता बल्कि रोजाना की शारीरिक गतिविधि भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    दिनभर कम चलने फिरने का सीधा असर वजन पर भी पड़ सकता है। जब शरीर कम ऊर्जा खर्च करता है और खानपान से मिलने वाली कैलोरी अधिक रहती है तो धीरे धीरे वजन बढ़ने लगता है। बढ़ता वजन आगे चलकर हाई ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर में गड़बड़ी और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में संतुलित आहार के साथ रोजमर्रा की गतिविधियों को बढ़ाना जरूरी है।

    सबसे जरूरी बात यह है कि शारीरिक सक्रियता को किसी एक कठिन व्यायाम तक सीमित न समझें। छोटी दूरी के लिए पैदल जाना, लिफ्ट की जगह सीढ़ियां लेना, काम के बीच कुछ मिनट चलना और रोजाना वॉक की आदत बनाना शुरुआत के आसान तरीके हो सकते हैं। हालांकि किसी व्यक्ति को पहले से कोई बीमारी है या व्यायाम शुरू करने में परेशानी महसूस होती है तो डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। शरीर को सक्रिय रखना केवल फिट दिखने के लिए नहीं बल्कि लंबे समय तक स्वस्थ और बेहतर जीवन जीने के लिए भी जरूरी है।

  • वैश्विक हृदय रोग विशेषज्ञों का बड़ा खुलासा: पेट की चर्बी से बढ़ता है सीकेएम सिंड्रोम, गंभीर अंगों को सीधे नुकसान

    वैश्विक हृदय रोग विशेषज्ञों का बड़ा खुलासा: पेट की चर्बी से बढ़ता है सीकेएम सिंड्रोम, गंभीर अंगों को सीधे नुकसान

    नई दिल्ली। वैश्विक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन ने देश और दुनिया में तेजी से पैर पसार रहे मोटापे को लेकर अब तक की सबसे बड़ी और गंभीर चेतावनी जारी की है। हृदय रोग विशेषज्ञों के इस प्रतिष्ठित संगठन ने पहली बार एक विशेष गाइडलाइन जारी करते हुए स्पष्ट किया है कि मोटापा सिर्फ शरीर का वजन बढ़ने का सामान्य लक्षण या सुंदरता से जुड़ा मुद्दा नहीं है। यह असल में दिल, किडनी और मेटाबॉलिक तंत्र से जुड़ी कई जानलेवा और गंभीर बीमारियों की प्राथमिक जड़ है।

    चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, इंसानी शरीर में विशेष रूप से पेट के आसपास जमा होने वाली अतिरिक्त चर्बी यानी बेली फैट सीधे तौर पर आंतरिक अंगों को नुकसान पहुँचाना शुरू कर देता है। डॉक्टरों ने अपनी जांच और शोध में पाया है कि यह स्थिति शरीर के भीतर क्रोनिक इन्फ्लेमेशन यानी लगातार बनी रहने वाली सूजन को जन्म देती है। इसके साथ ही यह इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ाती है और रक्त वाहिकाओं को गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त करती है। इसी वजह से आगे चलकर मरीजों में डायबिटीज, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, हार्ट फेल्योर और किडनी खराब होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

    मध्य प्रदेश और देश के अन्य राज्यों में तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच यह चेतावनी भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत को वर्तमान में वैश्विक स्तर पर ‘डायबिटीज कैपिटल’ के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप के मामलों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। नई गाइडलाइन के मुताबिक, वजन बढ़ने की यह प्रक्रिया अक्सर उन बीमारियों का आधार तैयार करती है जो बाद में हृदय, वृक्क (किडनी) और शरीर के पूरे मेटाबॉलिज्म को एक साथ अपनी चपेट में ले लेती हैं। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में विशेषज्ञ अब इस घातक स्थिति को कार्डियोवैस्कुलर-किडनी-मेटाबॉलिक यानी ‘सीकेएम सिंड्रोम’ कह रहे हैं।

    इस शोध और गाइडलाइन में सबसे चौंकाने वाला तथ्य पेट की चर्बी को लेकर सामने आया है। डॉक्टरों का कहना है कि यदि किन्हीं दो व्यक्तियों का कुल वजन और बॉडी मास इंडेक्स बिल्कुल समान है, तब भी उनकी आंतरिक सेहत और जोखिम का स्तर पूरी तरह अलग हो सकता है। असली और सबसे बड़ा खतरा पेट के अंदरूनी अंगों के चारों ओर जमा होने वाले ‘विसरल फैट’ से होता है। यह छुपा हुआ विसरल फैट शरीर के भीतर लगातार ऐसे हानिकारक रसायनों का स्राव करता है, जो रक्त प्रवाह को बाधित करते हैं और इंसुलिन के सकारात्मक प्रभाव को पूरी तरह खत्म कर देते हैं।

    हृदय रोग विशेषज्ञों ने सचेत किया है कि खराब खान-पान, शारीरिक निष्क्रियता और तनाव के कारण कम उम्र में ही भारतीयों का दिल बूढ़ा हो रहा है। कार्डियक अरेस्ट और किडनी फेल्योर के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए अब मोटापे को एक प्राथमिक बीमारी मानकर इसका इलाज करना अनिवार्य हो गया है। चिकित्सा तंत्र ने आम जनता से अपील की है कि वे पेट के घेरे और विसरल फैट को नियंत्रित रखने के लिए नियमित व्यायाम और संतुलित आहार को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं ताकि सीकेएम सिंड्रोम जैसी जटिलताओं से समय रहते बचा जा सके।

  • वजन बढ़ा तो सपना अधूरा रह सकता है मोटापा कैसे कर रहा प्रेग्नेंसी प्लानिंग को प्रभावित

    वजन बढ़ा तो सपना अधूरा रह सकता है मोटापा कैसे कर रहा प्रेग्नेंसी प्लानिंग को प्रभावित


    नई दिल्ली । आज के दौर में मोटापा सिर्फ एक लाइफस्टाइल समस्या नहीं रह गया है बल्कि यह धीरे धीरे प्रजनन क्षमता पर गहरा असर डालने वाला बड़ा खतरा बनता जा रहा है। बदलती जीवनशैली गलत खानपान और शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण बढ़ता वजन अब उन कपल्स के लिए भी चिंता का विषय बन चुका है जो माता पिता बनने का सपना देख रहे हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार अधिक वजन महिलाओं और पुरुषों दोनों की फर्टिलिटी को प्रभावित करता है। यह असर शरीर के हार्मोनल संतुलन पर पड़ता है जिससे गर्भधारण की प्रक्रिया जटिल हो सकती है। कई मामलों में कंसीव करने में ज्यादा समय लगने लगता है और कभी कभी मेडिकल सहायता की जरूरत भी पड़ती है।

    महिलाओं की बात करें तो शरीर में अतिरिक्त चर्बी हार्मोन के संतुलन को बिगाड़ सकती है। इससे ओव्यूलेशन अनियमित हो जाता है या पूरी तरह रुक सकता है। यह स्थिति गर्भधारण की संभावना को सीधे तौर पर कम कर देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि मोटापा पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी PCOS से भी जुड़ा हुआ है जो महिलाओं में बांझपन की एक प्रमुख वजह माना जाता है। इसके अलावा जिन महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स अधिक होता है उनमें प्राकृतिक रूप से गर्भधारण में अधिक समय लग सकता है और IVF जैसे ट्रीटमेंट की सफलता दर भी कम हो सकती है।

    वहीं पुरुषों पर भी मोटापे का असर कम गंभीर नहीं है। अतिरिक्त वजन के कारण शरीर में टेस्टोस्टेरोन का स्तर घट सकता है जिससे स्पर्म काउंट कम हो जाता है। इसके साथ ही स्पर्म की गुणवत्ता और उनकी गति पर भी असर पड़ता है। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि गर्भधारण की संभावना कम हो जाती है। यदि इसके साथ खराब खानपान तनाव और शारीरिक निष्क्रियता जुड़ जाए तो समस्या और बढ़ सकती है।

    हालांकि राहत की बात यह है कि इस समस्या को पूरी तरह से नियंत्रित किया जा सकता है। डॉक्टरों के अनुसार यदि व्यक्ति अपने शरीर के वजन में सिर्फ पांच से दस प्रतिशत की कमी भी लाता है तो इससे फर्टिलिटी में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है। संतुलित आहार नियमित व्यायाम पर्याप्त नींद और तनाव को नियंत्रित करना इस दिशा में बेहद प्रभावी कदम साबित हो सकते हैं।

    स्वास्थ्य संस्थानों का भी मानना है कि गर्भधारण की योजना बनाने से पहले हेल्दी वजन बनाए रखना जरूरी है। इससे न सिर्फ कंसीव करने की संभावना बढ़ती है बल्कि मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। समय पर मेडिकल जांच और सही सलाह लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

    भारत में तेजी से बढ़ते मोटापे के मामलों को देखते हुए अब यह जरूरी हो गया है कि लोग इस समस्या को सिर्फ बाहरी रूप से न देखें बल्कि इसके अंदर छिपे स्वास्थ्य जोखिमों को भी समझें। प्रजनन क्षमता पर इसका प्रभाव एक गंभीर संकेत है जिसे नजरअंदाज करना भविष्य में बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है।

    इसलिए यदि आप माता पिता बनने की योजना बना रहे हैं तो अपने वजन पर ध्यान देना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। एक स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ परिवार की नींव रख सकता है और यही छोटी सी समझ आने वाले समय में बड़े बदलाव ला सकती है।

  • मोटापे और बीमारियों की बड़ी वजह बना तेल, ऐसे करें नियंत्रण..

    मोटापे और बीमारियों की बड़ी वजह बना तेल, ऐसे करें नियंत्रण..


    नई दिल्ली।आज के समय में बदलती जीवनशैली और असंतुलित खानपान ने सेहत से जुड़ी कई समस्याओं को तेजी से बढ़ा दिया है। इनमें सबसे बड़ी समस्या है भोजन में अधिक तेल का इस्तेमाल, जो धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाकर कई गंभीर बीमारियों की जड़ बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जरूरत से ज्यादा तेल का सेवन न केवल वजन बढ़ाता है, बल्कि यह हृदय रोग, डायबिटीज और अन्य मेटाबॉलिक समस्याओं का जोखिम भी बढ़ा देता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मोटापा केवल दिखने की समस्या नहीं है, बल्कि यह शरीर के अंदर कई बीमारियों की शुरुआत का संकेत भी है। जब खाने में तेल की मात्रा अधिक होती है, तो शरीर में अतिरिक्त कैलोरी जमा होने लगती है, जिससे वजन तेजी से बढ़ता है। धीरे-धीरे यह स्थिति शरीर के अंगों पर दबाव डालने लगती है और स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं पैदा होती हैं।

    विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करके इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। खाना बनाते समय तेल को मापकर इस्तेमाल करना, बिना जरूरत के तलने वाले भोजन से दूरी बनाना और हल्के पकाने के तरीकों को अपनाना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है।

    भाप में पकाए गए भोजन, ग्रिल्ड या कम तेल में बने व्यंजन न केवल शरीर के लिए हल्के होते हैं बल्कि इनमें पोषक तत्व भी बेहतर तरीके से सुरक्षित रहते हैं। इसके अलावा घर के खाने में संतुलन बनाए रखना और बार-बार तले हुए खाद्य पदार्थों से बचना लंबे समय तक शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि तेल का पूरी तरह त्याग करना जरूरी नहीं है, बल्कि इसका संतुलित उपयोग सबसे महत्वपूर्ण है। सही मात्रा में लिया गया तेल शरीर के लिए ऊर्जा का स्रोत भी होता है, लेकिन जब यह सीमा से अधिक हो जाता है तो यही सेहत के लिए खतरा बन जाता है।

  • आज ही बदलें जीवनशैली, स्वास्थ्य और इम्यूनिटी के लिए जरूरी कदम

    आज ही बदलें जीवनशैली, स्वास्थ्य और इम्यूनिटी के लिए जरूरी कदम


    नई दिल्ली।सर्दियों में ठंड और आलस के कारण लोग अक्सर लंबे समय तक बिस्तर या कुर्सी पर रहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आज की जीवनशैली में मस्तिष्क का इस्तेमाल तो बढ़ गया है लेकिन शारीरिक गतिविधियां कम हो गई हैं। यह असंतुलन धीरे-धीरे गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।आयुर्वेद में भी कम शारीरिक गतिविधि को स्वास्थ्य के लिए चेतावनी माना गया है। चरक संहिता में कहा गया है व्यायामात लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखम्। यानी व्यायाम से लंबी उम्र ताकत और खुशहाली मिलती है।

    कम गतिविधि से होने वाले प्रमुख स्वास्थ्य खतरे
    मोटापा और मधुमेहलंबे समय तक बैठे रहने से वसा का जमाव बढ़ता है और मेटाबॉलिज्म कमजोर होता है जिससे मोटापा और डायबिटीज़ की संभावना बढ़ जाती है।

    गठिया और जोड़ों में दर्द
    लगातार एक ही पोज़चर में रहने से हड्डियों और मांसपेशियों में जकड़न होती है जो जोड़ों के दर्द का कारण बनती है।

    हाई ब्लड प्रेशर और हृदय रोग
    चलने और व्यायाम से रक्त संचार और ऑक्सीजन वितरण बेहतर होता है। कम गतिविधि से ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है जिससे दिल से जुड़े रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है।

    मानसिक स्वास्थ्य पर असर
    डिप्रेशन चिंता और पाचन विकार की समस्या बढ़ सकती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमजोर हो जाती है।विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि रोज़ाना थोड़ी शारीरिक गतिविधि जैसे सुबह की वॉक हल्का व्यायाम या स्ट्रेचिंग को जीवनशैली में शामिल किया जाए। इससे न केवल बीमारियों का जोखिम कम होता है बल्कि मानसिक और शारीरिक संतुलन भी बना रहता है।