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  • तेल-गैस की खोज के लिए 80,000 करोड़ का पैकेज… मोदी सरकार कर रही समुद्र मंथन की तैयारी….

    तेल-गैस की खोज के लिए 80,000 करोड़ का पैकेज… मोदी सरकार कर रही समुद्र मंथन की तैयारी….


    नई दिल्ली।
    ईरान-अमेरिका युद्ध (Iran-America War) से उपजे तेल और गैस संकट से भारत (India) ने सबक लिया है। मोदी सरकार (Modi government) तेल-गैस की खोज के लिए अब ‘समुद्र मंथन’ की तैयारी कर रही है। इसके तहत भारत सरकार का पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय डीपवॉटर यानी गहरे समुद्र में तेल और गैस की खोज को बढ़ावा देने के लिए 80,000 करोड़ रुपये का एक विशेष प्रोत्साहन पैकेज तैयार कर रहा है। इस पैकेज के तहत विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए खोजी कुओं की ड्रिलिंग लागत का आधा हिस्सा सरकार वहन करेगी।

    यह पहल ‘National Deepwater Exploration Mission’ यानी ‘समुद्र मंथन’ कार्यक्रम का हिस्सा है। खास बात यह है कि यह योजना पिछले दशक में की गई अन्य सुधारों से कहीं आगे जाती है, क्योंकि इसमें सीधे तौर पर एक्प्लोरेशन लागत की फाइनेंसिंग की जाएगी। पिछली नीतियां वैश्विक तेल कंपनियों से बड़ा निवेश नहीं जुटा पाई थीं।

    भारत ओपन एकरेज लाइसेंसिंग कार्यक्रम के तहत 18 डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर ब्लॉकों की नीलामी भी कर रहा है। बोली लगाने की आखिरी तारीख 17 सितंबर तक बढ़ा दी गई है, और सरकार को उम्मीद है कि तब तक प्रोत्साहन पैकेज को अंतिम रूप दे दिया जाएगा।


    कैसे काम करेगी योजना?

    प्रस्ताव के अनुसार, सरकार डीपवॉटर खोजी कुओं की ड्रिलिंग लागत का 50 प्रतिशत तक रिइम्बर्समेंट करेगी। हालांकि, यह प्रस्ताव अभी अन्य मंत्रालयों के साथ चर्चा के दौर में है और कैबिनेट के सामने पेश किए जाने से पहले इसमें बदलाव संभव है।

    हर कुएं के लिए वित्तीय सहायता की एक सीमा तय की जाएगी, ताकि लागत बढ़ने पर नियंत्रण रखा जा सके। सरकार 3D भूकंपीय सर्वेक्षणों के लिए भी आंशिक वित्तपोषण कर सकती है। इस सहायता का मुख्य उद्देश्य एक्स्प्लोरिंग के रिस्क को कम करना और ऐसी वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करना है, जिनके पास डीपवॉटर की विशेषज्ञता और उन्नत तकनीकें मौजूद हैं।


    इतनी अधिक लागत क्यों?

    उच्च लागत और भारत में खोज की मामूली सफलता दर लंबे समय से विदेशी कंपनियों को दूर रखती रही है। भूवैज्ञानिक जटिलताओं के आधार पर एक सिंगल डीपवॉटर कुएं की ड्रिलिंग में 1,000 से 1,200 करोड़ रुपये तक खर्च आ सकता है, जबकि अल्ट्रा-डीपवॉटर कुएं की लागत इससे कुछ सौ करोड़ अधिक होती है।


    किन कंपनियों को मिलेगा लाभ?

    ये प्रोत्साहन सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों की कंपनियों के लिए उपलब्ध होंगे। ओएनजीसी ने शनिवार को ‘समुद्र मंथन’ कार्यक्रम के तहत अपना पहला डीपवॉटर खोजी कुआं खोदना शुरू कर दिया है, जो इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


    विदेशी कंपनियां क्यों नहीं आ पाईं?

    भारत मौजूदा व्यवस्था में, कंपनियों को ब्लॉक मिलने के बाद न्यूनतम कार्य कार्यक्रम पूरा करना होता है, जिसमें भूकंपीय सर्वेक्षण और खोजी कुएं शामिल होते हैं। अगर भूकंपीय आंकड़े कमर्शियल एक्सप्लोरेशन की कम संभावना दिखाते हैं, तो कंपनियां अक्सर ड्रिलिंग नहीं करना चुनती हैं। कई बार वे जोखिम भरे कुएं में सैकड़ों करोड़ निवेश करने के बजाय ब्लॉक वापस कर देती हैं, क्योंकि नियमों का पालन न करने पर दंड का प्रावधान भी है।


    जोखिम कम करने की कोशिश

    यह प्रोत्साहन योजना पुरानी व्यवस्था से बड़ा बदलाव है, क्योंकि इसमें सरकार सीधे तौर पर खोज के जोखिम को कम करने में मदद करेगी। इसके अलावा, सरकार अन्वेषणकर्ताओं के लिए उपलब्ध भूवैज्ञानिक डेटा की गुणवत्ता में भी सुधार कर रही है। इसके लिए ऑफशोर 2D भूकंपीय डेटा अधिग्रहण में भारी निवेश किया गया है और अब पुराने डेटासेट को उन्नत तकनीकों से दोबारा प्रोसेस करने के लिए निजी कंपनियों को लाने की योजना है।

  • कूटनीतिक सफलता…. ईरान युद्ध के बीच होर्मुज से अब तक निकले तेल-गैस से भरे भारत के 9 जहाज

    कूटनीतिक सफलता…. ईरान युद्ध के बीच होर्मुज से अब तक निकले तेल-गैस से भरे भारत के 9 जहाज


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष (West Asia Crisis) के बीच ईरान (Iran) ने समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लगभग बंद कर दिया है। इससे खाड़ी देशों से गैस और तेल की आपूर्ति बाधित हो गई है। इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) में तेल की कीमतों में आग लगी है। लेकिन, भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जिन्होंने इस जोखिम भरे रास्ते से तेल और गैस से भरे सबसे अधिक जहाज सुरक्षित निकाले हैं। होर्मुज फारस और ओमान की खाड़ी के बीच एक संकरा समुद्री मार्ग है। ओमान और ईरान के बीच स्थित होर्मुज जलमार्ग एक जगह मात्र 33 किलोमीटर चौड़ा है। यह फारस की खाड़ी को शेष दुनिया से जोड़ता है।

    इस रास्ते से दुनिया का लगभग 20 फीसदी कच्चे तेल का नौवहन होता है। 28 फरवरी को अमेरिका-इस्राइल की ओर से हमला किए जाने के बाद ईरान ने इस मार्ग की नाकेबंदी कर दी है। कुछ तेल टैंकरों को ईरान ने निशाना भी बनाया है। लेकिन ईरान से अपने ऐतिहासिक संबंधों और मजबूत कूटनीति के जरिये भारत होर्मुज के रास्ते अब तक तेल और गैस से भरे 9 जहाज सुरक्षित निकाल लाने में सफल रहा है। इनमें से 8 जहाज भारतीय तट पर पहुंच गए हैं, जबकि एक पहुंचने वाला है।


    सबसे पहले जहाज पार कराया था

    पश्चिम एशिया में संघर्ष के बीच भारत ने सबसे पहले घरेलू लिक्विफाइड पेट्रोलिमय गैस (एलपीजी) से भरे दो जहाजों को होर्मुज पार कराया था। शिवालिक और नंदा देवी नामक इन दोनों टैंकरों को ईरान की नौसेना ने ही अपनी सुरक्षा में होर्मुज को पार कराा था। हालांकि, भारत ने भी अपने जहाजों की सुरक्षा के लिए क्षेत्र में पोत तैनात कर रखे हैं। शिवालिक और एमटी नंदा देवी 92,712 टन एलपीजी लेकर आए थे। शिवालिक 16 मार्च को गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह और नंदा देवी उसके अगले दिन 17 मार्च को गुजरात के ही कांडला बंदरगाह पहुंचा था।


    जग लाडकी से जगत वसंत तक, भारत पहुंचे कई जहाज

    जग लाडकी संयुक्त अरब अमीरात से 80,886 टन कच्चा तेल लेकर 18 मार्च को मुंद्रा बंदरगाह पहुंचा था। इसके बाद पाइन गैस और जग वसंत 92,612 टन एलपीजी लेकर 26 और 28 मार्च को भारत पहुंचे थे। 94,000 टन एलपीजी लेकर बीडब्ल्यू टीवाईआर और बीडब्ल्यू ईएलएम भी आए हैं। बीडब्ल्यू टीवाई 31 मार्च को मुंबई और बीडब्ल्यू ईएलएम 1 अप्रैल को मंगलोर बंदरगाह पहुंचा था। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में बताया कि लगभग 44,000 टन एलपीजी लेकर सी बर्ड 2 अप्रैल को मंगलोर बंदरगाह पहुंचा था। यह ईरान से एलपीजी लेकर आया है। सात साल में पहली बार भारत ने ईरान से गैस खरीदा है।


    ईरान के साथ भुगतान की समस्या नहीं कच्चे तेल की आपूर्ति पूरी तरह सुरक्षित

    केंद्र सरकार ने शनिवार को कहा कि ईरान से कच्चे तेल के आयात के लिए भुगतान संबंधी कोई समस्या नहीं है और रिफाइनरियां तेहरान के साथ दुनियाभर के विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं से तेल हासिल कर रही हैं। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में उन खबरों को खारिज किया, जिनमें दावा किया गया था कि ईरानी कच्चा तेल ले जा रहा एक तेल टैंकर अपने पहले से संकेतित गंतव्य भारत के बजाय चीन की ओर मुड़ गया है।

    मंत्रालय ने कहा कि ये दावे उद्योग के उस सामान्य अभ्यास की अनदेखी करते हैं, जहां परिचालन लचीलेपन के आधार पर यात्रा के दौरान कार्गो अपना गंतव्य बदल सकते हैं। यदि यह खेप भारत आती, तो लगभग सात वर्षों में ऐसी पहली खेप होती। मंत्रालय ने इन दावों को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया कि भुगतान बाधाओं के कारण कार्गो को गुजरात के वाडिनार के बजाय चीन की ओर मोड़ा गया था। मंत्रालय ने कहा कि ईरानी कच्चे तेल के आयात के लिए भुगतान की कोई बाधा नहीं है।

    मंत्रालय ने स्पष्ट किया, भारत 40 से अधिक देशों से कच्चे तेल का आयात करता है, और कंपनियों के पास विभिन्न स्रोतों और भौगोलिक क्षेत्रों से तेल प्राप्त करने का पूर्ण लचीलापन है। मंत्रालय के अनुसार, भारतीय रिफाइनरियों ने ईरान सहित अपनी कच्चे तेल की आवश्यकताओं को सुरक्षित कर लिया है। जहाजों पर नजर रखने वाली फर्म केपलर ने शुक्रवार को कहा था कि 2002 में निर्मित और 2025 में अमेरिका द्वारा प्रतिबंधित टैंकर पिंग शुन अब गुजरात के वाडिनार के बजाय चीन के डोंगयिंग को अपना गंतव्य बता रहा है।