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  • जी7 देश जारी करेंगे 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल और डीजल, अगले चार महीनों में होगी आपूर्ति

    जी7 देश जारी करेंगे 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल और डीजल, अगले चार महीनों में होगी आपूर्ति


    नई दिल्ली:
    जी7 और उसके साझेदार देश अपने इमरजेंसी भंडार से करीब 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल और डीजल जारी करेंगे। यह फैसला बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच लिया गया है। फ्रांस के राष्ट्रपति और जी7 के मौजूदा चेयरमैन इमैनुएल मैक्रों ने बताया कि जी7 ईंधन की कीमतों में कमी लाना चाहता है। इसके तहत अगले चार महीनों में इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की देखरेख में रणनीतिक भंडार से आपूर्ति जारी की जाएगी।

    यह फैसला ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका ने संकेत दिया है कि अगर यूरोपीय देशों ने अपने भंडार से और आपूर्ति जारी नहीं की, तो डीजल निर्यात पर भारी असर डालने वाला प्रतिबंध लगाया जा सकता है। ऐसा कदम यूरोप के लिए आपूर्ति के एक महत्वपूर्ण स्रोत को प्रभावित कर सकता है। यूरोपीय महाद्वीप डीजल उत्पादन में कमी को पूरा करने के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। जी7 देशों का यह कदम बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध कराने की दिशा में उठाया गया है।

    ईरान युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद आईईए ने मार्च में 400 मिलियन बैरल तेल जारी करने की योजना बनाई थी। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय देशों की आलोचना करते हुए कहा था कि उन्होंने इन बैरल को अपेक्षित तेजी से उपलब्ध नहीं कराया। जी7 के एक बयान से संकेत मिला है कि अब जारी किए जाने वाले 100 मिलियन बैरल में वे बैरल भी शामिल हो सकते हैं, जो मार्च में जारी किए गए स्टॉक के तहत अभी तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।

    मैक्रों ने कहा कि सभी देशों ने मिलकर उन अनुपातों के अनुसार रणनीतिक भंडार जारी करने का संकल्प लिया है जिनका उन्होंने उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि इसमें डीजल पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। साथ ही, सभी देश यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि निर्यात पर कोई रोक न लगे। इस कदम का उद्देश्य ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों में कमी लाने की कोशिश करना है। अगले चार महीनों के दौरान होने वाली आपूर्ति की निगरानी आईईए करेगा।

    हालांकि, जी7 और उसके साझेदार देशों की ओर से इमरजेंसी भंडार से तेल और डीजल जारी करने के फैसले के बाद भी कच्चे तेल की कीमत में कोई खास कमी नहीं आई। बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 102 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बंद हुआ। इस तरह करीब 100 मिलियन बैरल की प्रस्तावित आपूर्ति के बावजूद बाजार में कच्चे तेल की कीमत ऊंचे स्तर पर बनी रही। फैसला बढ़ती ईंधन कीमतों और डीजल की आपूर्ति को लेकर बने दबाव के बीच लिया गया है।

  • ईरान से जंग खत्म हुई तो 40 डॉलर तक गिर सकता है कच्चा तेल, अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट का दावा

    ईरान से जंग खत्म हुई तो 40 डॉलर तक गिर सकता है कच्चा तेल, अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट का दावा


    नई दिल्ली। ईरान के साथ सैन्य संघर्ष खत्म होने के बाद वैश्विक तेल बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट का अनुमान है कि युद्ध समाप्त होने पर कच्चे तेल की सप्लाई बढ़ेगी और कीमतें 40 डॉलर प्रति बैरल तक नीचे जा सकती हैं। उनके मुताबिक तेल सस्ता होने से अमेरिका में महंगाई का दबाव घटेगा और हाल में बढ़ी सरकारी बॉन्ड यील्ड में भी बड़ी गिरावट आ सकती है।

    बेसेंट ने शुक्रवार को ब्लूमबर्ग टीवी को दिए इंटरव्यू में कहा कि ईरान संघर्ष के समाधान के बाद बाजार में तेल की आपूर्ति काफी बढ़ सकती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि संघर्ष के दूसरे चरण में पहुंचने के बाद तेल की कीमतों में गिरावट देखने को मिलेगी।

    उन्होंने कहा कि उत्पादन बढ़ने की स्थिति में कच्चे तेल की कीमत 50 डॉलर और यहां तक कि 40 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। हालांकि, बेसेंट ने यह नहीं बताया कि ईरान के साथ जारी जंग कब समाप्त होगी। उनका यह बयान ऐसे वक्त आया है, जब अमेरिका-ईरान सैन्य टकराव का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर दिखाई दे रहा है।

    ब्रेंट क्रूड 95 डॉलर के पार

    शुक्रवार को ब्रेंट क्रूड 95 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा था। यह जुलाई के बाद के उच्चतम स्तर के करीब है। वहीं वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI करीब 91 डॉलर प्रति बैरल पर था। अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य हमलों के बाद पिछले कुछ सप्ताह में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है।

    तेल महंगा होने से अमेरिका में महंगाई को लेकर चिंता भी बढ़ी है। ऊर्जा की लागत बढ़ने का सीधा असर उपभोक्ता कीमतों पर पड़ सकता है। महंगाई की आशंकाओं के चलते अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड भी ऊपर गई है। इस सप्ताह 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड 2023 के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई।

    जंग खत्म होते ही महंगाई घटने की उम्मीद

    बेसेंट के मुताबिक तेल की कीमतों, महंगाई और ब्याज दरों के बीच संबंध अब साफ नजर आ रहा है। उनका मानना है कि ईरान के साथ संघर्ष खत्म होने पर तेल के दाम तेजी से नीचे आएंगे, जिससे महंगाई का दबाव भी कम हो सकता है।

    हालांकि, फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि तेल की कीमतों में यह संभावित गिरावट कब शुरू होगी। संघर्ष के तत्काल समाप्त होने के भी कोई स्पष्ट संकेत नहीं हैं। ऐसे में बाजार की नजर अब अमेरिका-ईरान तनाव और उससे जुड़े ऊर्जा आपूर्ति के हालात पर बनी हुई है।

  • क्रूड ऑयल में 2 फीसदी से ज्यादा तेजी ने बढ़ाई टेंशन, आने वाले दिनों में महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

    क्रूड ऑयल में 2 फीसदी से ज्यादा तेजी ने बढ़ाई टेंशन, आने वाले दिनों में महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

    नई दिल्ली । पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर आम लोगों की चिंता एक बार फिर बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज उछाल देखने को मिला है। 20 अगस्त को ब्रेंट क्रूड करीब 2.4 फीसदी की तेजी के साथ 93.78 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। यह 24 जुलाई के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। दूसरी तरफ अमेरिकी WTI क्रूड की कीमत में भी करीब 2.5 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। कच्चे तेल की इस तेजी ने भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए ईंधन की कीमतों को लेकर दबाव बढ़ा दिया है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत बढ़ने वाले हैं लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड लंबे समय तक महंगा बना रहा तो घरेलू कीमतों पर असर पड़ने की संभावना जरूर बढ़ सकती है।

    कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव माना जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में तनाव बढ़ने के साथ बाजार में तेल की आपूर्ति को लेकर आशंकाएं मजबूत हुई हैं। अमेरिका की ओर से ईरान के समर्थन वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की चेतावनी ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। तेल बाजार में किसी बड़े उत्पादक क्षेत्र से सप्लाई बाधित होने की आशंका पैदा होते ही कीमतों में तेजी देखने को मिलती है। यही स्थिति अभी दिखाई दे रही है।

    इस पूरे मामले में हॉर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व बेहद ज्यादा है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही होती है। अगर क्षेत्र में तनाव बढ़ता है और इस मार्ग से तेल की आवाजाही प्रभावित होती है तो वैश्विक बाजार में सप्लाई को लेकर दबाव और बढ़ सकता है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय क्रूड कीमतों पर पड़ सकता है।

    भारत के लिए यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होता है तो भारतीय तेल कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमत केवल कच्चे तेल के भाव से तय नहीं होती। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स डीलर कमीशन तेल कंपनियों की लागत और मार्जिन तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति जैसे कई कारक शामिल होते हैं। इसलिए क्रूड में तेजी आने के साथ ही अगले दिन पेट्रोल और डीजल महंगा हो जाए ऐसा जरूरी नहीं है।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है तो क्या होगा। ऐसी स्थिति में घरेलू ईंधन की कीमतों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखना तेल कंपनियों और नीति निर्माताओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अगर क्रूड की कीमतें और ऊपर जाती हैं तथा रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो आयात लागत पर दोहरा दबाव पड़ सकता है। इसका असर पेट्रोल और डीजल के साथ परिवहन लागत पर भी दिखाई दे सकता है।

    ईंधन महंगा होने का असर केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। डीजल की कीमत बढ़ने पर माल ढुलाई और परिवहन लागत बढ़ सकती है। इससे सब्जियों खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामान की कीमतों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है। उद्योगों की लागत बढ़ने से महंगाई पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि क्रूड की कीमतें कितने समय तक ऊंचे स्तर पर रहती हैं और सरकार तथा तेल कंपनियां घरेलू कीमतों को लेकर क्या फैसला करती हैं।

    फिलहाल सबसे बड़ी निगाह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा मध्य पूर्व से तेल की आपूर्ति पर बनी हुई है। अगर तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है तो कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है। लेकिन अगर आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ता है तो क्रूड में और तेजी संभव है। ऐसे में आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईंधन की कीमत निश्चित रूप से बढ़ने वाली है लेकिन महंगे क्रूड ने सस्ते पेट्रोल-डीजल की उम्मीदों के सामने जरूर एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।

  • US–Cuba टकराव: होर्मुज के बाद नई वैश्विक टेंशन, भारत पर क्यों बन सकता है दबाव?

    US–Cuba टकराव: होर्मुज के बाद नई वैश्विक टेंशन, भारत पर क्यों बन सकता है दबाव?




    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के मोड़ पर दिख रही है। United States और Cuba के बीच बढ़ता तनाव दुनिया के कई हिस्सों में नई अनिश्चितता पैदा कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान में अपने लक्ष्यों में पूरी तरह सफल न होने के बाद अमेरिकी नेतृत्व अब कैरेबियन क्षेत्र में अपनी रणनीति को आक्रामक रूप दे सकता है।

    क्यूबा पर अमेरिका का बढ़ता दबाव
    सूत्रों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका ने हाल ही में क्यूबा के खिलाफ कूटनीतिक और सैन्य दबाव बढ़ाने के संकेत दिए हैं। इसमें शामिल हैं—

    कैरेबियन सागर में नौसैनिक तैनाती

    आर्थिक प्रतिबंधों का विस्तार

    राजनीतिक दबाव की रणनीति

    United States की दक्षिणी कमांड (Southern Command) ने क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी की पुष्टि भी की है, जिससे तनाव और बढ़ गया है।

    कैरेबियन में सैन्य गतिविधि और वैश्विक चिंता
    अमेरिका की नौसेना द्वारा कैरेबियन क्षेत्र में युद्ध क्षमता का प्रदर्शन किया जा रहा है। इस क्षेत्र में किसी भी बड़े सैन्य तनाव का असर केवल क्षेत्रीय नहीं रहेगा, बल्कि यह वैश्विक समुद्री व्यापार को भी प्रभावित कर सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव बढ़ा तो शिपिंग रूट प्रभावित हो सकते हैं

    समुद्री बीमा की लागत बढ़ेगी

    वैश्विक सप्लाई चेन पर दबाव आएगा

    भारत पर क्यों पड़ सकता है अप्रत्यक्ष असर?
    भारत पहले से ही Strait of Hormuz जैसे रणनीतिक मार्गों में अस्थिरता से जूझ रहा है। अब अगर कैरेबियन क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो इसका असर मल्टी-रीजनल ट्रेड सिस्टम पर पड़ेगा।

    भारत पर संभावित असर—

    1. तेल और शिपिंग लागत में बढ़ोतरी
    वैश्विक अस्थिरता बढ़ने पर भारत के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है।

    2. समुद्री बीमा महंगा
    जोखिम बढ़ने से शिपिंग कंपनियां प्रीमियम बढ़ा सकती हैं।

    3. वैश्विक व्यापार पर असर
    लॉजिस्टिक्स बाधित होने से एक्सपोर्ट-इंपोर्ट पर असर पड़ सकता है।

    भारत की कूटनीतिक स्थिति
    भारत के संबंध दोनों देशों से अलग-अलग स्तर पर महत्वपूर्ण हैं।

    United States के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी मजबूत है

    वहीं Cuba के साथ भारत के ऐतिहासिक और गुटनिरपेक्ष संबंध रहे हैं

    ऐसे में भारत को हमेशा संतुलित कूटनीति अपनानी पड़ती है ताकि किसी भी पक्ष के साथ रिश्ते प्रभावित न हों।

    बड़ा सवाल: क्या अमेरिका का फोकस बदल रहा है?
    विश्लेषकों का मानना है कि अगर अमेरिका कैरेबियन में ज्यादा सैन्य संसाधन लगाता है, तो इसका असर उसके अन्य क्षेत्रों जैसे इंडो-पैसिफिक रणनीति पर भी पड़ सकता है। इससे वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव संभव है।

    United States और Cuba के बीच बढ़ता तनाव सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक व्यापार और रणनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है। भारत के लिए यह सीधा खतरा नहीं, लेकिन ऊर्जा, शिपिंग और कूटनीति के स्तर पर एक “अप्रत्यक्ष दबाव” जरूर बन सकता है।

  • होर्मुज पर नया गेमप्लान: ईरान-ओमान डील से बदल सकती है वैश्विक तेल राजनीति

    होर्मुज पर नया गेमप्लान: ईरान-ओमान डील से बदल सकती है वैश्विक तेल राजनीति



    नई दिल्ली। दुनिया के सबसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक Strait of Hormuz एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। ईरान ने इस अहम जलमार्ग की निगरानी और संचालन के लिए ओमान के साथ मिलकर नई व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के तहत जहाजों की आवाजाही पर निगरानी, सुरक्षा और संभावित “टोल सिस्टम” जैसी व्यवस्था लागू करने की बात सामने आ रही है, जिससे ईरान को आर्थिक लाभ और क्षेत्रीय नियंत्रण दोनों मजबूत करने का मौका मिल सकता है।

    ईरान का नया दांव: सुरक्षा के नाम पर कमाई का मॉडल
    रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान का कहना है कि वह इस जलमार्ग में एक स्थायी सुरक्षा ढांचा तैयार करना चाहता है, जिसमें अन्य तटीय देश भी शामिल हों। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघेई ने संकेत दिया है कि जहाजों की सुरक्षित आवाजाही के लिए साझा प्रोटोकॉल बनाया जा सकता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रस्ताव के पीछे सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक हित भी छिपे हैं। ईरान पहले से ही “पर्सियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी” जैसी व्यवस्था के जरिए जहाजों की निगरानी और शुल्क वसूली का मॉडल विकसित कर चुका है।

    दुनिया की ऊर्जा लाइफलाइन पर दबाव
    Strait of Hormuz से दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल का परिवहन होता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की बाधा या टोल व्यवस्था सीधे वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित कर सकती है।

    अगर ईरान की यह योजना लागू होती है, तो इससे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और बढ़ सकता है, क्योंकि कंपनियों को अतिरिक्त लागत का सामना करना पड़ सकता है। पहले भी तनाव के दौरान इस मार्ग पर अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय बाजार को हिला दिया था।

    ओमान की भूमिका क्यों अहम?
    ईरान ने पहले भी ओमान के सामने इस तरह की संयुक्त व्यवस्था का प्रस्ताव रखा था, लेकिन उस समय इसे ठुकरा दिया गया था। अब एक बार फिर ईरान ओमान के साथ साझेदारी की कोशिश कर रहा है।

    Oman इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत संतुलित और तटस्थ भूमिका निभाता है, इसलिए उसकी भागीदारी किसी भी नए मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक स्वीकार्य बना सकती है। हालांकि ओमान पहले ही संकेत दे चुका है कि वह किसी एक देश के नियंत्रण या एकतरफा टोल व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनेगा।

    ईरान का लक्ष्य: राजस्व + रणनीतिक नियंत्रण
    विश्लेषकों के अनुसार ईरान का यह कदम दो बड़े उद्देश्यों की ओर इशारा करता है

    युद्ध और प्रतिबंधों से प्रभावित अर्थव्यवस्था के लिए नया राजस्व स्रोत

    Strait of Hormuz पर रणनीतिक पकड़ मजबूत करना

    इससे ईरान भविष्य में वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बनाने की स्थिति में भी रह सकता है।
    भारत को कैसे मिल सकता है फायदा?
    भारत के लिए यह जलमार्ग बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके तेल आयात का बड़ा हिस्सा इसी रूट से आता है। अगर ईरान-ओमान के बीच कोई स्थिर और पारदर्शी व्यवस्था बनती है, तो इससे भारत को तीन बड़े फायदे मिल सकते हैं

    1. तेल आपूर्ति में स्थिरता
    अनिश्चितता कम होने से सप्लाई चेन ज्यादा सुरक्षित हो सकती है।

    2. कीमतों में उतार-चढ़ाव कम
    यदि टोल सिस्टम नियंत्रित और स्थिर रहा, तो अचानक तेल महंगा होने का जोखिम घट सकता है।

    3. रणनीतिक साझेदारी का लाभ
    Oman के साथ भारत के मजबूत रिश्ते इस पूरे सिस्टम में भारत के हितों को अप्रत्यक्ष रूप से मजबूत कर सकते हैं।

    Strait of Hormuz पर ईरान का नया प्रस्ताव सिर्फ एक सुरक्षा मॉडल नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति को प्रभावित करने वाला बड़ा कदम माना जा रहा है। अगर ओमान इस व्यवस्था का हिस्सा बनता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिए राहत और चुनौती—दोनों ला सकता है।

  • पेट्रोल-डीजल के रेट में तेज़ी जारी, महानगरों में नए दामों ने बढ़ाई महंगाई की मार

    पेट्रोल-डीजल के रेट में तेज़ी जारी, महानगरों में नए दामों ने बढ़ाई महंगाई की मार

    नई दिल्ली । देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे आम जनता पर महंगाई का दबाव और बढ़ गया है। मंगलवार को तेल कंपनियों ने ईंधन के दामों में करीब 90 पैसे प्रति लीटर तक की वृद्धि कर दी, जो पिछले कुछ दिनों में दूसरी बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है। इससे पहले भी कुछ ही दिनों के अंतराल में पेट्रोल और डीजल के रेट में तेज़ इजाफा देखा गया था, जिसके बाद लगातार हो रही इस बढ़ोतरी ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है।

    नई दरों के अनुसार राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत अब 98 रुपये प्रति लीटर के करीब पहुंच गई है, जबकि डीजल भी 91 रुपये प्रति लीटर से ऊपर हो गया है। पहले की तुलना में यह बढ़ोतरी लोगों के रोजमर्रा के बजट पर सीधा असर डाल रही है। लगातार बढ़ते दामों ने खासकर मध्यम वर्ग और दैनिक यात्रा करने वाले लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

    देश के अन्य बड़े शहरों में भी ईंधन की कीमतों में समान रूप से बढ़ोतरी देखने को मिली है। मुंबई में पेट्रोल का भाव अब 107 रुपये प्रति लीटर से अधिक हो गया है, जबकि डीजल भी महंगा होकर नए स्तर पर पहुंच गया है। कोलकाता में भी पेट्रोल की कीमतों ने नया रिकॉर्ड बनाया है और डीजल की कीमतें भी लगातार ऊपर जा रही हैं। वहीं चेन्नई में भी पेट्रोल और डीजल दोनों के दाम बढ़ने से वहां के उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ा है।

    ईंधन की कीमतों में इस लगातार बढ़ोतरी के पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में उतार-चढ़ाव को मुख्य कारण माना जा रहा है। साथ ही विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये की स्थिति भी कीमतों पर असर डाल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर अगर कच्चे तेल के दाम स्थिर नहीं होते, तो आने वाले समय में ईंधन और महंगा हो सकता है, जिससे घरेलू बाजार पर भी दबाव बढ़ेगा।

    पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर परिवहन लागत पर पड़ता है। ट्रक, बस और टैक्सी सेवाओं की लागत बढ़ने से धीरे-धीरे रोजमर्रा की वस्तुओं जैसे सब्जी, फल और किराना सामान की कीमतों में भी वृद्धि देखने को मिल सकती है। इसी कारण व्यापारिक और परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोग चिंता जता रहे हैं।

    विभिन्न संगठनों का मानना है कि ईंधन पर लगने वाले करों में राहत दी जानी चाहिए ताकि आम जनता को कुछ राहत मिल सके। लगातार बढ़ती कीमतों के बीच लोग सरकार से स्थिर नीति और नियंत्रण की मांग कर रहे हैं, जिससे महंगाई के दबाव को कम किया जा सके और आम जीवन पर इसका असर सीमित हो।

  • डॉलर के मुकाबले रुपया ऐतिहासिक दबाव में, 96.32 के निचले स्तर ने बढ़ाई आर्थिक चिंता

    डॉलर के मुकाबले रुपया ऐतिहासिक दबाव में, 96.32 के निचले स्तर ने बढ़ाई आर्थिक चिंता

    नई दिल्ली । भारतीय मुद्रा पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है और हाल ही में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे कमजोर स्तर 96.32 पर पहुंच गया है। यह गिरावट केवल एक दिन की नहीं है, बल्कि पिछले कई कारोबारी सत्रों से जारी कमजोरी का परिणाम है, जिसने देश की आर्थिक स्थिरता और वैश्विक बाजार में मुद्रा की स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और घरेलू आर्थिक प्रवाह के बीच बढ़ते असंतुलन ने रुपये को लगातार दबाव में रखा है, जिससे यह ऐतिहासिक रूप से कमजोर स्तर पर पहुंच गया है।

    इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर बढ़ता तनाव माना जा रहा है, खासकर पश्चिम एशिया में उत्पन्न भू-राजनीतिक अस्थिरता। इस तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है, जिसका सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर तेल का आयात करता है, और जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, वैसे-वैसे देश का आयात बिल भी बढ़ता है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बनता है और रुपये की कीमत कमजोर होती जाती है।

    इसके साथ ही अमेरिकी डॉलर की मजबूती ने भी स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। अमेरिका में आर्थिक आंकड़ों और ब्याज दरों को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण निवेशकों का रुझान सुरक्षित संपत्तियों की ओर बढ़ा है, जिससे डॉलर की मांग में इजाफा हुआ है। जब डॉलर मजबूत होता है, तो उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं दबाव में आ जाती हैं और भारतीय रुपया भी इसी प्रवृत्ति का शिकार हुआ है।

    विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली भी रुपये की कमजोरी का एक महत्वपूर्ण कारण बनकर उभरी है। निवेशकों द्वारा भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकालकर डॉलर में बदलने की प्रक्रिया ने विदेशी मुद्रा बाजार में अतिरिक्त दबाव पैदा किया है। इस पूंजी बहिर्वाह के कारण रुपये की मांग घटती है और उसकी कीमत और नीचे चली जाती है।

    इसके अलावा व्यापार घाटे में बढ़ोतरी ने भी स्थिति को और गंभीर बनाया है। आयात बढ़ने और निर्यात अपेक्षाकृत स्थिर रहने से विदेशी मुद्रा का संतुलन बिगड़ता है, जिससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। हालांकि केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रा में अत्यधिक गिरावट को रोकने के लिए समय-समय पर हस्तक्षेप किया जाता है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों की तीव्रता के कारण इसका प्रभाव सीमित रहा है।

    रुपये की इस कमजोरी का सीधा असर आम जनता पर महंगाई के रूप में दिखाई देता है। आयातित वस्तुएं जैसे पेट्रोल-डीजल, गैस और उर्वरक महंगे हो जाते हैं, जिससे परिवहन लागत बढ़ती है और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिलती है। इससे आम आदमी की क्रय शक्ति प्रभावित होती है और घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

    हालांकि इस गिरावट के कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। निर्यात आधारित उद्योगों जैसे सूचना प्रौद्योगिकी, फार्मा और इंजीनियरिंग सेक्टर को इससे लाभ मिल सकता है क्योंकि उनकी विदेशी आय रुपये में बदलने पर बढ़ जाती है। इसके अलावा विदेशी पर्यटकों के लिए भारत अपेक्षाकृत सस्ता गंतव्य बन जाता है, जिससे पर्यटन क्षेत्र को भी समर्थन मिलता है।

    कुल मिलाकर रुपये की मौजूदा स्थिति वैश्विक अनिश्चितताओं और आर्थिक दबावों का संयुक्त परिणाम है, जो आने वाले समय में बाजार की दिशा और आर्थिक नीतियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

  • ईरान युद्ध से भड़के तेल के दाम… जानें दुनिया में कहां मिल रहा सबसे सस्ता पेट्रोल-डीजल?

    ईरान युद्ध से भड़के तेल के दाम… जानें दुनिया में कहां मिल रहा सबसे सस्ता पेट्रोल-डीजल?


    नई दिल्ली।
    ईरान युद्ध (Iran war) से दुनिया भर में तेल के दाम (Oil prices) में उछाल देखने को मिल है। इस बीच पूरी दुनिया में 1 लीटर पेट्रोल की कीमत कहीं 2.25 रुपये है तो कहीं 394.95 रुपये। यानी पेट्रोल की कीमत कही भारत से 44 गुना सस्ता है तो कहीं करीब चार गुना महंगा। आइए जानें दुनिया में सबसे सस्ता और महंगा पेट्रोल और डीजल (Petrol Diesel Prices) कहां मिलता है?


    सबसे महंगा पेट्रोल बेचने वाले देश

    सबसे पहले बात दुनिया में सबसे महंगे पेट्रोल बेचने वाले टॉप-10 देशों की। इस लिस्ट में सबसे ऊपर हांगकांग का नाम है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत करीब 400 रुपये है। इसके बाद मलावी का नाम आता है। यहां पेट्रोल का रेट 364.27 रुपये प्रति लीटर है।

    इजरायल में पेट्रोल जहां, 269.19 रुपये लीटर है वहीं, डेनमार्क में 265.74 रुपये। नीदरलैंड में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 260.15 रुपये है। ग्रीस में 231.57 और अल्बानिया में 231.49 रुपये लीटर है। स्विट्जरलैंड में पेट्रोल की कीमत 231.12 और सिंगापुर में 230.02 रुपये लीटर है।


    दुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल बेचने वाले टॉप-10 देश

    दुनिया में सबसे सस्ता पेट्रोल लीबिया में है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 2.25 रुपये है। इसके बाद ईरान का नंबर है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 3.32 रुपये है। इसके बाद अंगोला में 31.08, कुवैत में 32.41, अल्जीरिया में 33.75 और तुर्कमेनिस्तान में 40.78 रुपये लीटर है।

    आठवें नंबर इजिप्ट है। यहां पेट्रोल की कीमत 42.78 रुपये है। नौवें पर कतर है, जहां पेट्रोल की कीमत 54.62 रुपये लीटर है। 10वें नंबर पर सऊदी अरब है। यहां एक लीटर पेट्रोल की कीमत 59.62 रुपये है।


    किस देश में सबसे सस्ता डीजल

    सबसे सस्ता डीजल वेनेजुएला में मिलता है। यहां 1 लीटर डीजल की कीमत महज 39 पैसे है। इसके बाद ईरान में 54 पैसे और लीबिया में 2.25 रुपये लीटर। अल्जीरिया में एक लीटर डीजल की कीमत 22.26 रुपये है।

    तुर्कमेनिस्तान में डीजल 27.19 रुपये प्रति लीटर है तो कुवैत में 35.50 रुपये। इजिप्ट में डीजल का रेट 36.36 रुपये लीटर है तो अंगोला में 41.44 रुपये लीटर। सऊदी अरब में एक लीटर डीजल की कीमत 45.37 रुपये और कतर में 53.32 रुपये।


    हांगकांग में 446 रुपये लीटर है डीजल

    दुनिया में सबसे महंगा डीजल हांगकांग में 446 रुपये लीटर है। एक लीटर डीजल की कीमत मलावी में 365, सिंगापुर में 310.49, डेनमार्क में 273.16, स्विट्जरलैंड में 262.09, नीदरलैंड में 257 रुपये लीटर है। इजरायल में जहां एक लीटर डीजल 255.60 रुपये है तो फिनलैंड में 255.59 रुपये।

  • होर्मुज स्ट्रेट संकट खत्म होने के करीब! अमेरिका-ईरान समझौते से भारत समेत दुनिया को मिल सकती है बड़ी राहत

    होर्मुज स्ट्रेट संकट खत्म होने के करीब! अमेरिका-ईरान समझौते से भारत समेत दुनिया को मिल सकती है बड़ी राहत


    नई दिल्ली। होरमुज़ जलसंधि में जारी तनाव अब कम होता नजर आ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच एक अहम समझौते पर सहमति बन गई है, जिसके बाद होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही धीरे-धीरे फिर से शुरू हो सकती है। इससे भारत  समेत दुनिया भर को तेल और गैस संकट से राहत मिलने की उम्मीद बढ़ गई है।

    रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को चरणबद्ध तरीके से हटाएगा, जबकि ईरान बदले में होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलेगा। माना जा रहा है कि आने वाले घंटों में वहां फंसे सैकड़ों जहाजों की आवाजाही शुरू हो सकती है।

    दुनिया भर में मचा था तेल और गैस संकट
    अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में पाबंदियां बढ़ा दी थीं। इसके कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी सप्लाई पर असर पड़ा। भारत समेत कई देशों में ऊर्जा संकट और महंगे ईंधन की चिंता बढ़ गई थी।होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और गैस की सप्लाई होती है।

    ट्रंप ने भी दिए समझौते के संकेत
    अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने भी हाल में संकेत दिए थे कि ईरान के साथ बातचीत सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है। उन्होंने कहा था कि दोनों देशों के बीच वार्ता अच्छी रही है और संघर्ष जल्द खत्म हो सकता है।

    फ्रांस ने भी की हस्तक्षेप की अपील
    इमैनुएल मैक्रों  ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन से बातचीत के बाद सभी पक्षों से बिना शर्त नाकेबंदी हटाने की अपील की। फ्रांस ने समुद्री सुरक्षा और जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए बहुराष्ट्रीय मिशन का भी सुझाव दिया है।

    परमाणु समझौते पर भी बन सकती है बात
    रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका और ईरान युद्ध खत्म करने के साथ-साथ परमाणु संवर्धन और प्रतिबंधों को लेकर भी समझौते के करीब पहुंच गए हैं। अगर यह डील पूरी होती है तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बड़ी राहत मिल सकती है।

  • होर्मुज में हाई अलर्ट: भारत का LNG जहाज दरवाजे पर, अमेरिका–ईरान तनातनी से वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर खतरा

    होर्मुज में हाई अलर्ट: भारत का LNG जहाज दरवाजे पर, अमेरिका–ईरान तनातनी से वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर खतरा


    नई दिल्ली। होर्मुज जलडमरूमध्य, जिसे दुनिया की ऊर्जा लाइफलाइन कहा जाता है, एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। इसी बीच भारत से रवाना LNG जहाज Umm Al Ashtan इस संवेदनशील समुद्री मार्ग के करीब पहुंच चुका है। यह जहाज गुजरात के दाहेज पोर्ट से निकला है और यूएई के Das Island की ओर बढ़ रहा है, जहां से इसे तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) लोड करनी है।

    हालात इसलिए ज्यादा गंभीर हैं क्योंकि यह वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की आपूर्ति होती है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव सीधे वैश्विक बाजारों और ऊर्जा कीमतों को प्रभावित कर सकता है।

    ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian ने अमेरिका पर निशाना साधते हुए कहा है कि संभावित नौसैनिक नाकेबंदी दरअसल सैन्य दबाव बढ़ाने की रणनीति है। उन्होंने साफ किया कि ईरान अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करेगा और किसी भी आक्रामक कदम का जवाब देने के लिए तैयार है।

    दूसरी ओर, Donald Trump ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए दावा किया है कि हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने ईरान की रक्षा क्षमता को काफी कमजोर कर दिया है। ट्रंप के अनुसार, ईरान की नौसेना और वायुसेना को भारी नुकसान पहुंचा है और उसका मिसाइल उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि ईरान अब बातचीत के लिए तैयार दिख रहा है।

    इस तनावपूर्ण माहौल में Umm Al Ashtan का होर्मुज के पास पहुंचना एक अहम संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह दर्शाता है कि यूएई के दास द्वीप से LNG उत्पादन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। यह द्वीप हर साल लगभग 6 मिलियन टन LNG उत्पादन करने की क्षमता रखता है, जो वैश्विक आपूर्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    हालांकि स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं कही जा सकती। Qatar जैसे बड़े LNG निर्यातक देशों के जहाज अभी भी सावधानी बरत रहे हैं। कई कार्गो शिप्स या तो इस क्षेत्र में रुके हुए हैं या वैकल्पिक रास्तों की तलाश कर रहे हैं।

    इसी बीच कुछ राहत भरी खबरें भी सामने आई हैं। हाल के दिनों में चीन और जापान जाने वाले कुछ जहाज इस मार्ग से सफलतापूर्वक गुजर चुके हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि आवाजाही पूरी तरह बंद नहीं हुई है, लेकिन जोखिम बरकरार है।होर्मुज में बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव शुरू हो चुका है और अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो यह महंगाई और सप्लाई चेन पर बड़ा असर डाल सकता है।

    भारत का LNG जहाज ऐसे समय इस हाई-रिस्क जोन में प्रवेश करने जा रहा है, जब मिडिल ईस्ट बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है।