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  • गिरावट के बाद भारतीय शेयर बाजार में लौटी खरीदारी, सेंसेक्स 287 अंक चढ़ा और निफ्टी 0.48 प्रतिशत बढ़कर बंद हुआ

    गिरावट के बाद भारतीय शेयर बाजार में लौटी खरीदारी, सेंसेक्स 287 अंक चढ़ा और निफ्टी 0.48 प्रतिशत बढ़कर बंद हुआ

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार ने पिछले कारोबारी सत्र की गिरावट से उबरते हुए मंगलवार को मजबूती के साथ कारोबार समाप्त किया। वैश्विक बाजारों से मिले-जुले संकेतों के बीच कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और घरेलू स्तर पर फार्मा तथा पीएसयू बैंक शेयरों में खरीदारी ने प्रमुख सूचकांकों को सहारा दिया। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों हरे निशान में बंद हुए।

    30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 286.98 अंक यानी 0.37 प्रतिशत की बढ़त के साथ 77,656.09 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं एनएसई निफ्टी 50 में 116 अंकों यानी 0.48 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई और यह 24,335.55 के स्तर पर बंद हुआ। इससे पहले सोमवार के कारोबार में बाजार में कमजोरी देखने को मिली थी।

    मंगलवार को सेंसेक्स 77,369.11 के पिछले बंद स्तर की तुलना में 73.61 अंक नीचे 77,295.49 पर खुला। शुरुआती कमजोरी के बाद सूचकांक ने तेजी पकड़ी और दिन के दौरान 297.28 अंक की बढ़त के साथ 77,666.39 के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया।

    निफ्टी भी 24,219.05 के पिछले बंद स्तर के मुकाबले 43.29 अंक की गिरावट के साथ 24,175.75 पर खुला। कारोबार के दौरान खरीदारी बढ़ने से इसमें सुधार आया और सूचकांक 115.5 अंक की तेजी के साथ 24,334.55 के इंट्रा-डे उच्च स्तर तक पहुंचा।

    बाजार की तेजी में फार्मा, हेल्थकेयर और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका महत्वपूर्ण रही। निफ्टी हेल्थकेयर, निफ्टी फार्मा और निफ्टी पीएसयू बैंक में मजबूती दिखाई दी। इसके विपरीत निजी क्षेत्र के बैंक और मेटल से जुड़े शेयरों में दबाव देखने को मिला।

    व्यापक बाजार की बात करें तो निफ्टी मिडकैप में 0.54 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 0.10 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ बंद हुआ। इससे संकेत मिला कि निवेशकों की दिलचस्पी चुनिंदा बड़ी और मध्यम कंपनियों में बनी रही।

    निफ्टी 50 में अदाणी एंटरप्राइजेज, मैक्स हेल्थकेयर, अपोलो हॉस्पिटल्स, इंडिगो, अदाणी पोर्ट्स, श्रीराम फाइनेंस, इंफोसिस और इटरनल प्रमुख तेजी वाले शेयरों में रहे। दूसरी ओर एचडीएफसी लाइफ, सिप्ला और ओएनजीसी कमजोर प्रदर्शन करने वाले शेयरों में शामिल रहे।

    बाजार की धारणा को कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से भी समर्थन मिला। अमेरिका की ओर से ईरान पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों को लेकर बाजार की अपेक्षाओं के मुकाबले अपेक्षाकृत कम सख्ती रहने की धारणा बनी, जिससे तेल की कीमतों और बॉन्ड यील्ड में हालिया ऊंचाई से कुछ नरमी आई। ऊर्जा लागत में राहत ने घरेलू शेयर बाजार के लिए सकारात्मक माहौल बनाया।

    विशेषज्ञों के अनुसार, निवेशकों ने हेल्थकेयर और वित्तीय क्षेत्र जैसे अपेक्षाकृत रक्षात्मक तथा घरेलू मांग पर आधारित क्षेत्रों की ओर रुख किया। घरेलू बॉन्ड बाजार में स्थिरता के संकेतों ने भी बाजार धारणा को सहारा दिया। हालांकि, वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अनिश्चितता अभी बनी हुई है।

    बाजार participants अब महंगाई के आगामी आंकड़ों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के प्रमुख अधिकारियों की टिप्पणियों पर नजर रख रहे हैं। इन संकेतों से आगे ब्याज दरों की दिशा और वैश्विक निवेश धारणा को लेकर तस्वीर साफ होने की उम्मीद है।

    निकट अवधि में भारतीय शेयर बाजार में सावधानी बनी रह सकती है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, कच्चे तेल की कीमतों तथा वैश्विक बॉन्ड यील्ड में संभावित बदलाव बाजार की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे माहौल में मंगलवार की तेजी ने निवेशकों को राहत जरूर दी, लेकिन आगे के कारोबार में वैश्विक घटनाक्रम और आर्थिक आंकड़े महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

  • निफ्टी-सेंसेक्स की तेजी के बाद अगले हफ्ते निवेशकों की नजर कच्चे तेल और घरेलू आंकड़ों पर रहेगी

    निफ्टी-सेंसेक्स की तेजी के बाद अगले हफ्ते निवेशकों की नजर कच्चे तेल और घरेलू आंकड़ों पर रहेगी

    नई दिल्ली ।भारतीय शेयर बाजार के लिए 10 से 14 अगस्त के बीच आने वाला कारोबारी सप्ताह कई महत्वपूर्ण घटनाक्रमों के कारण अहम माना जा रहा है। वैश्विक स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, घरेलू महंगाई के आंकड़े और कंपनियों के पहली तिमाही के नतीजे निवेशकों के रुख को प्रभावित कर सकते हैं। बाजार की दिशा तय करने में इन सभी कारकों की भूमिका महत्वपूर्ण रहने की संभावना है।

    अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव पर निवेशकों की विशेष नजर रहेगी। फिलहाल दोनों देशों के बीच हमले रुके हुए हैं और इसी वजह से कच्चे तेल की कीमत करीब 83 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है। तेल की कीमतों में किसी भी बड़े बदलाव का असर भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर दिखाई दे सकता है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है।

    घरेलू मोर्चे पर खुदरा और थोक महंगाई के आंकड़े अगले सप्ताह जारी किए जाएंगे। महंगाई के आंकड़े अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के दबाव के साथ मांग और आपूर्ति की स्थिति का संकेत देते हैं। ऐसे में निवेशक इन आंकड़ों का विश्लेषण करके बाजार की आगे की दिशा को लेकर अपनी रणनीति तय कर सकते हैं।

    इसके अलावा कई सूचीबद्ध कंपनियों के पहली तिमाही के वित्तीय नतीजे भी बाजार की गतिविधियों को प्रभावित करेंगे। 10 से 14 अगस्त के बीच स्काईगोल्ड, बॉश, बॉम्बे डाइंग, डॉलर, डीबीएल, आईटीडीसी, वोडाफोन आइडिया, आइडियाफोर्ज, हिंदुस्तान कॉपर, लिंडे इंडिया, वीगार्ड, जी, बाटा इंडिया, ईपैक, ईपीएल, आईएफसीआई और जेएनके इंडिया समेत कई कंपनियों के नतीजे सामने आने हैं।

    बीते कारोबारी सप्ताह में भारतीय शेयर बाजार में कुल मिलाकर मजबूती देखने को मिली। निफ्टी 187.05 अंक यानी 0.77 प्रतिशत की बढ़त के साथ 24,570.65 पर बंद हुआ। वहीं सेंसेक्स में 404.53 अंक यानी 0.52 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई और यह 78,499.17 के स्तर पर बंद हुआ।

    बाजार में व्यापक तेजी का असर मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी दिखाई दिया। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 548.25 अंक यानी 0.87 प्रतिशत बढ़कर 63,463.55 पर पहुंच गया। निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में 528.15 अंक यानी 2.73 प्रतिशत की मजबूत तेजी दर्ज हुई और यह 19,867.80 पर बंद हुआ।

    सेक्टर आधारित प्रदर्शन की बात करें तो निफ्टी पीएसयू बैंक सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला सूचकांक रहा और इसमें 5.01 प्रतिशत की तेजी दर्ज हुई। निफ्टी इंडिया डिफेंस 4.30 प्रतिशत, निफ्टी मेटल 3.70 प्रतिशत, निफ्टी ऑटो 3.14 प्रतिशत और निफ्टी आईटी 2.73 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुए।

    इसी तरह निफ्टी इंडिया मैन्युफैक्चरिंग में 2.04 प्रतिशत, निफ्टी कमोडिटीज में 1.32 प्रतिशत, निफ्टी इंफ्रा में 1.01 प्रतिशत और निफ्टी एफएमसीजी में 0.64 प्रतिशत की मजबूती रही। दूसरी ओर निफ्टी मीडिया 3.94 प्रतिशत गिरा। निफ्टी रियल्टी में 1.72 प्रतिशत और निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज में 0.48 प्रतिशत की कमजोरी रही। निफ्टी प्राइवेट बैंक 0.47 प्रतिशत और निफ्टी हेल्थकेयर 0.28 प्रतिशत नीचे रहे।

    कुल मिलाकर अगले सप्ताह बाजार की निगाह घरेलू आर्थिक आंकड़ों और कंपनियों के प्रदर्शन के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर रहेगी। कच्चे तेल की कीमत, अमेरिका-ईरान तनाव और महंगाई के आंकड़ों में होने वाले बदलाव निवेशकों के लिए प्रमुख संकेतक रहेंगे। तिमाही नतीजों से कंपनियों के कारोबार और कमाई की तस्वीर भी स्पष्ट होगी, जिससे अलग-अलग शेयरों और क्षेत्रों में गतिविधियां बढ़ सकती हैं।

  • वैश्विक तेल बाजार में गिरावट का दबाव, अमेरिका-ईरान कूटनीति से क्रूड प्राइस में बड़ी नरमी दर्ज

    वैश्विक तेल बाजार में गिरावट का दबाव, अमेरिका-ईरान कूटनीति से क्रूड प्राइस में बड़ी नरमी दर्ज

    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच संभावित कूटनीतिक समझौते की उम्मीदों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव पैदा कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है और क्रूड छह सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गया है। बाजार में यह गिरावट उस समय देखने को मिली है जब होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल आपूर्ति सामान्य होने की संभावनाएं मजबूत हो रही हैं और भू-राजनीतिक तनाव में कुछ नरमी के संकेत मिले हैं। इस घटनाक्रम का सीधा असर वैश्विक ऊर्जा कीमतों पर पड़ा है, जिससे निवेशकों की धारणा में बदलाव देखा जा रहा है।

    वैश्विक बाजार में अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट क्रूड और अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड दोनों की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह गिरावट मुख्य रूप से उस जोखिम प्रीमियम में कमी के कारण हुई है, जो लंबे समय से मध्य पूर्व में तनाव की वजह से तेल कीमतों में शामिल था। जैसे ही कूटनीतिक समाधान की संभावना बढ़ी, बाजार ने भविष्य की आपूर्ति को अधिक स्थिर मानते हुए कीमतों में कटौती शुरू कर दी।

    अमेरिका और ईरान के बीच जारी बातचीत को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चा जारी है, जिसमें सीजफायर को आगे बढ़ाने और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने जैसे मुद्दे शामिल हैं। हालांकि दोनों पक्षों की ओर से अभी अंतिम सहमति की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन संवाद की प्रक्रिया जारी रहने से बाजार में सकारात्मक संकेत बने हैं। इसी उम्मीद के चलते तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका कम हुई है और कीमतों पर दबाव बढ़ गया है।

    ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यदि यह मार्ग पूरी तरह सुरक्षित और सुचारु रूप से कार्य करने लगे, तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों में और नरमी आ सकती है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि स्थिति पूरी तरह सामान्य होने में अभी समय लग सकता है क्योंकि कई तकनीकी और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां बनी हुई हैं।

    इस बीच भारत सहित कई देशों में ऊर्जा आपूर्ति को लेकर स्थिति सामान्य बनी हुई है। रिफाइनरियां पूरी क्षमता पर काम कर रही हैं और सरकार की ओर से पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के पर्याप्त भंडार बनाए रखने का दावा किया गया है। साथ ही आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाए रखने के लिए निगरानी और प्रवर्तन तंत्र को भी सक्रिय किया गया है, ताकि किसी भी प्रकार की कमी या असंतुलन की स्थिति न बने।

    विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतों की दिशा पूरी तरह अमेरिका-ईरान वार्ता के परिणाम और वैश्विक आपूर्ति स्थिरता पर निर्भर करेगी। यदि समझौते की दिशा में प्रगति होती है तो कीमतों में और गिरावट संभव है, जबकि किसी भी प्रकार की रुकावट या तनाव बढ़ने पर बाजार फिर से अस्थिर हो सकता है। फिलहाल बाजार कूटनीतिक संकेतों पर नजर बनाए हुए है और निवेशक सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।

  • अर्थव्यवस्था को बचाने की कवायद… जानें सोना और तेल के इस्तेमाल में कटौती की अपील का क्या है मकसद?

    अर्थव्यवस्था को बचाने की कवायद… जानें सोना और तेल के इस्तेमाल में कटौती की अपील का क्या है मकसद?


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में संघर्ष से वैश्विक आपूर्ति शृंखला (Global Supply Chain) में आई रुकावट और विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) सुरक्षित रखने के लिए सोने, पेट्रोल-डीजल और खाने के तेल के इस्तेमाल में कटौती की पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) की अपील पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, अपील का मुख्य मकसद डॉलर की मांग कम करना, रुपये को मजबूत करना और अर्थव्यवस्था को संभावित झटकों से बचाना है। विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ती आयात लागत और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव से दबाव लगातार बढ़ रहा है। भारत तेल का शुद्ध आयातक है और तेल की 89 फीसदी जरूरतें बाहरी स्रोतों से पूरी करता है और इसके लिए उसे अब ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है।


    6 अरब डॉलर का सोना हर माह खरीदता है भारत

    भारत सोने का उत्पादक नहीं है। पिछले वर्ष अकेले सोने पर करीब 72 अरब डॉलर खर्च किए गए। यानी, हर माह छह अरब डॉलर। उपभोक्ता आयात और एक आरक्षित संपत्ति के रूप में सोने की दोहरी भूमिका स्थिति को और जटिल बना देती है। आरबीआई तेजी से सोना जमा कर रहा है। एक साल में उसने लंदन से 168 टन सोना खरीदा है, जिससे मार्च तक उसके पास 880 टन सोना हो गया है। भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की 16% हिस्सेदारी है, जो पिछले वर्ष के 10% से अधिक है। हालांकि, घरेलू सोने की खरीद का आर्थिक असर अलग होता है।

    आरबीआई के रिजर्व प्रबंधन कार्यों के विपरीत आयातित सोने की उपभोक्ता मांग अर्थव्यवस्था में डॉलर के प्रवाह को सीधे तौर पर बढ़ा देती है। इसलिए, बड़े पैमाने पर सोने के आयात से चालू खाता घाटे पर दबाव बढ़ सकता है और डॉलर की मांग बढ़ सकती है। इससे समय के साथ रुपया कमजोर पड़ सकता है। जैसे-जैसे डॉलर बाहर जाता है, रुपया कमजोर होता जाता है, सोना और भी महंगा हो जाता है। इससे दुष्चक्र पैदा हो जाता है, जिसमें भारतीय उपभोक्ता सोने के लिए अधिक रुपये चुकाता है, क्योंकि सोने की पिछली खरीद ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया होता है।


    आयात में बढ़ोतरी से बढ़ रहा दबाव

    थिंक टैंक वैश्विक व्यापार अनुसंधान पहल (जीटीआरआई) ने पीएम की अपील का समर्थन करते हुए कहा कि सोने के आयात में हो रही भारी बढ़ोतरी विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डाल रही है और व्यापार असंतुलन को बढ़ा रही है। जीटीआरआई के अनुसार, भारत के गोल्ड बार का आयात 2022 में 36.5 अरब डॉलर था, जो 2025 में बढ़कर 58.9 अरब डॉलर हो गया। थिंक टैंक ने सरकार से आग्रह किया है कि विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रखने के लिए, भारत-यूएई मुक्त व्यापार समझौते के तहत कीमती धातुओं पर दी जाने वाली रियायतों की समीक्षा करे। हाल में सोने के आयात में हुई बढ़ोतरी में इसकी बड़ी भूमिका रही है। अमीरात से 2022 में जहां गोल्ड बार का आयात 2.9 अरब डॉलर था, वहीं 2025 में यह बढ़कर 16.5 अरब डॉलर हो गया।


    89% तेल का आयात करता है भारत

    तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भी डॉलर के बाहर जाने में वृद्धि के रूप में सामने आता है। हालांकि पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें स्थिर रखी गई हैं, पर इसकी भरपाई सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने की है। इन कंपनियों को खुदरा कीमत और आयात कीमत के बीच के अंतर का सामना करना पड़ा है और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में उछाल के कारण इन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी) को एविएशन टर्बाइन फ्यूल पर भी नुकसान हो रहा है, जिससे उन पर दबाव और बढ़ गया है। इसे देखते हुए कि सरकार ने ओएमसी को इन नुकसानों की भरपाई करने की कोई योजना नहीं होने का संकेत दिया है, कीमतों में बढ़ोतरी की उम्मीद है और कंपनियां खुद भी इस तरह के बदलाव के लिए जोर दे रही हैं। हालांकि, ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी कुछ ही दिनों में पूरी आपूर्ति शृंखला में फैल जाती है।


    खाद्य तेल : विकल्प सीमित थाली की बढ़ती जा रही लागत

    भारत खाने के तेल की जरूरतों के लिए आयात पर बहुत निर्भर है, खासकर इंडोनेशिया और मलयेशिया से पाम तेल तथा रूस और यूक्रेन से सूरजमुखी का तेल मंगाता है। पीएम मोदी ने कहा था कि यदि हर घर खाने के तेल का इस्तेमाल कम कर दे, तो राष्ट्रीय खजाने के साथ परिवार की सेहत भी सुधरेगी। सोने की खरीद टाला जा सकता है या सैद्धांतिक रूप से ईंधन की बचत की जा सकती है, लेकिन खाने के तेल के विकल्प सीमित हैं। यह रोजमर्रा की आवश्यक चीज है। रुपये की गिरावट से यह समस्या और भी बढ़ गई है। कमजोर रुपया आयातित तेल के हर लीटर की कीमत बढ़ा देता है और खाने के तेल की कीमतों में हुई यह बढ़ोतरी आपूर्ति शृंखला के जरिये तेजी से उपभोक्ता की थाली तक पहुंच जाती है। घरेलू स्तर पर उपलब्ध सरसों के तेल जैसे विकल्प मौजूद हैं, लेकिन इनका उत्पादन इतनी तेजी से नहीं बढ़ाया जा सकता कि ये आयात की जगह ले सकें।


    रासायनिक उर्वरक : बढ़ रहीं कीमतें, खाने-पीने की वस्तुओं पर असर

    प. एशिया आपूर्ति मार्गों में भारी रुकावट की वजह से आयात किए गए यूरिया की कीमत फरवरी में 508 डॉलर से बढ़कर 935 डॉलर प्रति टन हो गई है। इसी तरह, डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) की कीमत पिछले साल के 680 डॉलर से बढ़कर 925 डॉलर प्रति टन होने की उम्मीद है। अमोनिया की कीमतें भी 435 डॉलर से बढ़कर 850–900 डॉलर प्रति टन हो गई हैं, जो दोगुनी से भी अधिक हैं। यूरिया आयात का लगभग 75% हिस्सा खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के देशों से आता है।

    खाद के घरेलू उत्पादन को भी झटका लगा है। खाड़ी से एलएनजी की आपूर्ति में रुकावटों के कारण मार्च में यूरिया का उत्पादन 25 लाख टन की सामान्य मासिक दर के मुकाबले घटकर 15 लाख टन रह गया। जून में स्टॉक की पर्याप्त भरपाई नहीं हुई, तो खेती में इस्तेमाल चीजों की बढ़ी लागत का असर खाद्य वस्तुओं पर पड़ेगा।


    यूरिया आयात का 75% हिस्सा जीसीसी से आता है

    घरेलू यूरिया प्लांट फीडस्टॉक के तौर पर एलएनजी पर निर्भर रहते हैं, जिसका 60% से अधिक हिस्सा कतर, यूएई व ओमान से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आयात किया जाता है। इस मार्ग में बाधा ने उर्वरक आयात को प्रभावित किया। खरीफ मौसम के लिए 194 लाख टन यूरिया की जरूरत है, जबकि अप्रैल में स्टॉक केवल 55 लाख टन था।

  • कुवैत ने अप्रैल माह में नहीं किया तेल का निर्यात…. 35 साल में पहली बार हुआ ऐसा

    कुवैत ने अप्रैल माह में नहीं किया तेल का निर्यात…. 35 साल में पहली बार हुआ ऐसा


    दुबई।
    एक रिपोर्ट में दावा (Report Claim) किया गया है कि अप्रैल माह (April) में कुवैत (Kuwait) ने तेल (Crude oil) का निर्यात नहीं (Not Export ) किया है। तीन दशकों में पहली बार ऐसा हुआ है, जब कुवैत ने किसी माह में तेल निर्यात नहीं किया। इससे पहले खाड़ी युद्ध के समय ऐसा हुआ था। टैंकर ट्रैकर वेबसाइट ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है।

    दुनिया के बड़े तेल प्रोड्यूसर में से एक कुवैत ने 35 बरस में पहली बार ऐसा फैसला लिया है, जिससे पूरी दुनिया हैरान हर रह गई है. इस फैसले से दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों में और इजाफा देखने को मिल सकता है। TankerTrackers वेबसाइट के अनुसार, कुवैत ने अप्रैल के दौरान कच्चे तेल का निर्यात नहीं किया. यह तीन दशकों से भी ज़्यादा समय में पहली बार है जब इस खाड़ी उत्पादक देश ने शून्य मासिक कच्चे तेल के निर्यात का रिकॉर्ड बनाया है. X पर एक पोस्ट में, इस मॉनिटरिंग ग्रुप ने कहा कि ब्रेकिंग: अप्रैल 2026 के दौरान, कुवैत ने खाड़ी युद्ध I की समाप्ति के बाद पहली बार शून्य बैरल कच्चे तेल का निर्यात किया।


    1991 के बाद पहली बार

    अगर इस बात की पुष्टि हो जाती है, तो यह 1991 के खाड़ी युद्ध की समाप्ति के बाद कुवैत का पहला ऐसा महीना होगा जिसमें उसने कच्चे तेल का निर्यात नहीं किया है. TankerTrackers ने कहा कि जहां एक ओर कुवैत तेल का उत्पादन जारी रखे हुए है, वहीं दूसरी ओर कच्चे तेल का निर्यात पूरी तरह से रुक गया है. फर्म ने आगे कहा कि यह रुकावट क्षेत्रीय शिपिंग रूट्स को प्रभावित करने वाली स्थितियों से जुड़ी हुई प्रतीत होती है, जिसमें होर्मुज स्ट्रेट में मौजूद बाधाएं भी शामिल हैं. यह देश OPEC का एक प्रमुख उत्पादक बना हुआ है, और इसका तेल निर्यात ग्लोबल एनर्जी सप्लाई चेन में एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. इस देश का तेल विशेष रूप से एशिया और यूरोप में एक्सपोर्ट होता है।


    कतर ने ईरान से किया आग्रह

    इस बीच, शनिवार को कतर ने ईरान से आग्रह किया कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रावधानों का पालन करे, और पश्चिम एशिया में मौजूदा सुरक्षा स्थिति के मद्देनज़र क्षेत्र के हितों को प्राथमिकता दे. साथ ही तनाव को कम करने के प्रयासों का समर्थन करने की आवश्यकता पर भी जोरर दिया. X पर एक पोस्ट में इन विवरणों को साझा करते हुए, कतर के विदेश मंत्रालय ने बताया कि प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान बिन जसीम अल-थानी को इस्लामिक गणराज्य ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का फोन आया था. प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि नेविगेशन की आजादी एक स्थापित और गैर-समझौता योग्य सिद्धांत है, और होर्मुज स्ट्रेट को बंद करना या इसे सौदेबाजी के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना संकट को और बढ़ाएगा और इस क्षेत्र के देशों के अहम हितों को खतरे में डाल देगा।


    कतर की ईरान को सलाह

    बयान में कहा गया कि उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि ग्लोबल एनर्जी और फूड सप्लाई पर, साथ ही बाजार और सप्लाई चेन की स्थिरता पर इसके क्या संभावित नकारात्मक परिणाम हो सकते हैं. इसमें आगे कहा गया कि प्रधानमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रावधानों का पालन करने की जरूरत पर जोर दिया, और क्षेत्रीय व अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिरता को मजबूत करने में योगदान देने के लिए, तथा तनाव कम करने के प्रयासों का समर्थन करने के लिए क्षेत्र और वहां के लोगों के हितों को प्राथमिकता देने की बात कही।


    कच्चे तेल की कीमत

    शुक्रवार को इंटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतें करीब 3 फीसदी तक की गिरावट के साथ बंद हुई. आंकड़ों को देखें तो अमेरिकी क्रूड ऑयल डब्ल्यूटीआई के दाम करीब 3 फीसदी की गिरावट के साथ 101.94 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुए. जबकि खाड़ी देशों का कच्चा तेल अब भी काफी हाई बना हुआ है. आंकड़ों के अनुसार ब्रेंट क्रूड ऑयल के दाम 2 फीसदी की गिरावट के साथ 108.17 डॉलर प्रति बैरल पर बना हुआ है. जानकारों की मानें तो आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें अमेरिका और ईरान के फैसले तय करेंगे. क्या दोनों देश शांति की ओर बढ़ना चाहते हैं या नहीं।

  • ईरान युद्ध के कारण देश में तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित… जानें कैसे पूरी होगी जरूरतें?

    ईरान युद्ध के कारण देश में तेल और गैस की सप्लाई प्रभावित… जानें कैसे पूरी होगी जरूरतें?


    नई दिल्ली।
    वैश्विक ऊर्जा बाजार (Global Energy Market) में उथल-पुथल मची हुई है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध (America, Israel, and Iran War) ने मध्य पूर्व की ऊर्जा आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के लगभग बंद होने से तेल और गैस की सप्लाई चेन बाधित हो गई है, जिससे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर गहरा असर पड़ रहा है। इस तनाव के कारण भारत की 40% तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की सप्लाई अचानक ठप हो गई है। यह केवल एक अंतरराष्ट्रीय घटना नहीं है; इसका सीधा असर हमारी अर्थव्यवस्था, उद्योगों की रफ्तार और भविष्य में महंगाई की दर पर पड़ सकता है। सरकार एक्शन मोड में है और पेट्रोलियम मंत्रालय युद्ध स्तर पर ‘ऑप्टिमाइजेशन प्लान’ (गैस वितरण की नई योजना) तैयार कर रहा है। आइए इस संकट की गहराई, उद्योगों पर इसके प्रभाव और भारत के ‘प्लान बी’ का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।


    संकट के मुख्य कारण

    वर्तमान संकट की जड़ मध्य पूर्व में है। मार्च 2026 तक, ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमलों के जवाब में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावी रूप से ब्लॉक कर दिया, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा संभालता है। कतर ने अपनी तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) उत्पादन को अस्थायी रूप से रोक दिया है, जिससे यूरोप और भारत जैसे आयातकों पर दबाव बढ़ा है। भारत के लिए यह इसलिए गंभीर है क्योंकि उसकी लगभग 52% कच्चे तेल की आयात स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरती है। इसके परिणामस्वरूप, वैश्विक तेल कीमतें 83 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो फरवरी 2026 के 72 डॉलर से 15% ऊपर है। भारत में एलपीजी (कुकिंग गैस) की कीमतें 7% बढ़कर दिल्ली में 913 रुपये प्रति 14.2 किलोग्राम सिलेंडर हो गई हैं, जबकि कमर्शियल एलपीजी 1,883 रुपये तक पहुंच गई है।

    भारत की ऊर्जा आयात निर्भरता FY26 के पहले 10 महीनों में 88.6% तक पहुंच गई है, जो पिछले साल के 88.2% से अधिक है। घरेलू उत्पादन स्थिर रहने (23.5 मिलियन टन) के बावजूद मांग 1.6% बढ़कर 202.2 मिलियन टन हो गई है। एलएनजी आयात में भी 50% कटौती की संभावना है, क्योंकि पेट्रोनेट एलएनजी ने कतर से सप्लाई पर फोर्स मेजर घोषित कर दिया है।

    यह खबर आपके लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
    यह संकट सिर्फ बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं है। LNG का उपयोग सिर्फ कारखानों में नहीं होता, बल्कि यह शहरों में पाइप वाली गैस (PNG), वाहनों के ईंधन (CNG), बिजली उत्पादन और कृषि (उर्वरक) के लिए रीढ़ की हड्डी है। गैस की सप्लाई घटने से खुले बाजार में इसकी कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे परोक्ष रूप से परिवहन, माल ढुलाई और रोजमर्रा के उत्पादों की लागत बढ़ सकती है। इसलिए, इस संकट को समझना हर नागरिक के लिए आवश्यक है।


    किन उद्योगों पर गिरेगी गाज?

    सरकार के नए ‘ऑप्टिमाइजेशन प्लान’ के तहत गैस की राशनिंग तय है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि उपलब्ध गैस को प्राथमिकता के आधार पर बांटा जाएगा। गैर-प्राथमिकता वाले उद्योग (सबसे बड़ा खतरा): रिपोर्ट के अनुसार, गैर-प्राथमिकता वाले सेक्टरों को गैस सप्लाई में भारी कटौती का सामना करना पड़ सकता है। उन्हें तुरंत कोयला, नेफ्था या फर्नेस ऑयल जैसे वैकल्पिक ईंधनों की ओर रुख करना होगा।

    आम तौर पर सिरेमिक, कांच उद्योग, स्पंज आयरन और कुछ पेट्रोकेमिकल इकाइयों को गैर-प्राथमिकता की श्रेणी में रखा जाता है। इन उद्योगों में उत्पादन धीमा होने की आशंका है। फर्टिलाइजर सेक्टर प्राथमिकता वाला है, लेकिन कटौती संभव है: यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली 60% LNG अकेले कतर से आती है। हालांकि सरकार इसे ‘प्राथमिकता’ मानती है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि उर्वरक क्षेत्र की सप्लाई में भी हल्की कटौती से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।

    खेती और किसानों के लिए क्या है स्थिति?
    कृषि क्षेत्र और किसानों के लिए फिलहाल पैनिक (घबराने) का कोई कारण नहीं है। सरकार और उद्योग ने इसके लिए पहले से एक मजबूत ‘शॉक-एब्जॉर्बर’ तैयार रखा है। खरीफ की बुवाई जून में शुरू होगी। अभी मांग कम है, इसलिए उर्वरक कंपनियां अपने कारखानों का नियमित रखरखाव कर रही हैं। देश में उर्वरक का 17.7 मिलियन टन (MT) का सुरक्षित भंडार है, जो पिछले साल (लगभग 13 MT) की तुलना में 36.5% अधिक है। DAP और NPK की बहुतायत: इनका स्टॉक पिछले साल से 70-80% अधिक है। फॉस्फेटिक उर्वरकों के लिए भारत ने अपनी सप्लाई चेन को विविध किया है, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता न रहे।


    भारत कैसे करेगा अपनी जरूरतें पूरी?

    भारत हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा है। गैस की इस भारी कमी को पूरा करने के लिए ‘प्लान बी’ पर तेजी से काम हो रहा है। ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की ओर रुख: भारत अपनी 60% LNG पहले से ही पश्चिम एशिया के बाहर से मंगाता है। अब कतर की भरपाई के लिए ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों की कंपनियों से अतिरिक्त सप्लाई के लिए बातचीत तेज कर दी गई है।


    सामने खड़ी हैं 2 बड़ी चुनौतियां

    जहाजों का इंतजाम: अचानक नई जगह से गैस लाने के लिए विशेष क्रायोजेनिक LNG टैंकर (जहाज) रातों-रात जुटाना बेहद मुश्किल है।
    लिक्विफिकेशन क्षमता: जिन नए देशों से हम गैस मांग रहे हैं, उनके पास गैस को तरल में बदलने की अतिरिक्त क्षमता तुरंत उपलब्ध होनी चाहिए।