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  • वैश्विक तेल बाजार में मांग सुधार के संकेत, आईईए ने कहा- खाड़ी क्षेत्र में स्थायी शांति से ही लौटेगी कच्चे तेल बाजार की स्थिरता

    वैश्विक तेल बाजार में मांग सुधार के संकेत, आईईए ने कहा- खाड़ी क्षेत्र में स्थायी शांति से ही लौटेगी कच्चे तेल बाजार की स्थिरता

    नई दिल्ली । अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने अपनी ताजा ऑयल मार्केट रिपोर्ट में वैश्विक कच्चे तेल की मांग में धीरे-धीरे सुधार के संकेत दिए हैं। एजेंसी का कहना है कि गर्मियों के दौरान यात्रा गतिविधियों में वृद्धि और पहले से दबे उपभोक्ता मांग के बाजार में लौटने से आने वाले महीनों में तेल की खपत बढ़ने की संभावना है। हालांकि एजेंसी ने यह भी स्पष्ट किया है कि कच्चे तेल के वैश्विक बाजार को पूरी तरह सामान्य स्थिति में लाने के लिए खाड़ी क्षेत्र में स्थायी शांति और समुद्री आपूर्ति मार्गों का निर्बाध संचालन अत्यंत आवश्यक होगा।

    रिपोर्ट के अनुसार मई में वैश्विक तेल मांग घटकर लगभग 9.79 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह गई थी, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में काफी कम थी। इसके बावजूद आईईए का अनुमान है कि अक्टूबर तक मांग में उल्लेखनीय सुधार होगा और यह फरवरी के बाद पहली बार पिछले वर्ष के स्तर से ऊपर पहुंच सकती है। एजेंसी का मानना है कि पर्यटन गतिविधियों और परिवहन क्षेत्र में बढ़ती ईंधन खपत इस सुधार की प्रमुख वजह बनेगी।

    आईईए ने वर्ष 2026 और 2027 के लिए भी तेल मांग का आकलन प्रस्तुत किया है। एजेंसी के अनुसार 2026 में वैश्विक तेल मांग में कुछ कमी देखने को मिल सकती है, जबकि उसके बाद 2027 में मांग दोबारा मजबूत वृद्धि दर्ज कर सकती है। इससे संकेत मिलता है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार मध्यम अवधि में फिर से संतुलन की ओर बढ़ सकता है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष के अंत तक वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति मांग से अधिक हो सकती है। हालांकि यह स्थिति काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि खाड़ी क्षेत्र से गुजरने वाले प्रमुख समुद्री मार्गों, विशेषकर होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल टैंकरों की आवाजाही कितनी तेजी से सामान्य होती है। यदि परिवहन पूरी तरह बहाल होता है तो तेल उत्पादक देश उत्पादन बढ़ाने के साथ वैश्विक बाजार में पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित कर सकेंगे।

    आईईए ने हाल के घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि खाड़ी क्षेत्र में फिर से बढ़ा तनाव यह दर्शाता है कि स्थायी शांति के बिना ऊर्जा बाजार में दीर्घकालिक स्थिरता संभव नहीं होगी। एजेंसी के अनुसार किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या आपूर्ति मार्गों में व्यवधान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों और आपूर्ति दोनों को प्रभावित कर सकता है।

    रिपोर्ट के मुताबिक जून के दौरान वैश्विक तेल भंडार में चार महीने बाद पहली बार वृद्धि दर्ज की गई। समुद्र में मौजूद भंडार बढ़ने से कुल स्टॉक में इजाफा हुआ, हालांकि कई देशों में भूमि आधारित भंडार में गिरावट भी देखने को मिली। विशेष रूप से कुछ प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सरकारी और वाणिज्यिक भंडार दोनों में कमी दर्ज की गई, जिससे बाजार की स्थिति मिश्रित बनी रही।

    आईईए ने यह भी बताया कि जून में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट दर्ज की गई थी, लेकिन हाल के तनावपूर्ण घटनाक्रमों के बाद कीमतों में फिर तेजी देखी गई। एजेंसी का मानना है कि भले ही कच्चे तेल की उपलब्धता बढ़ रही हो, लेकिन रिफाइनरियों का संचालन और पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है। ऐसे में आने वाले महीनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार की दिशा काफी हद तक भू-राजनीतिक परिस्थितियों, समुद्री आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा और प्रमुख उत्पादक देशों की उत्पादन रणनीति पर निर्भर करेगी।

  • Rosneft के Igor Sechin का अनुमान: भारत की तेज़ ग्रोथ और तेल खपत के चलते अगले दशक में वैश्विक ऊर्जा पर भारत का दबदबा

    Rosneft के Igor Sechin का अनुमान: भारत की तेज़ ग्रोथ और तेल खपत के चलते अगले दशक में वैश्विक ऊर्जा पर भारत का दबदबा

    नई दिल्ली । वैश्विक तेल बाजार में भारत की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है और विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में देश इस क्षेत्र में प्रमुख खिलाड़ी बन जाएगा। हाल ही में रूसी तेल कंपनी Rosneft के सीईओ इगोर सेचिन ने अपनी बात रखते हुए कहा कि साल 2035 तक वैश्विक तेल मांग में भारत का हिस्सा लगभग आधा होगा। उनका अनुमान है कि वैश्विक तेल की बढ़ती मांग में भारत की हिस्सेदारी सबसे अधिक रहेगी।

    इगोर सेचिन ने सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम में कहा कि भारत की तेल खपत अगले दशक में करीब आठ मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच जाएगी, जो 44 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। उनका कहना था कि जबकि वैश्विक मांग में कुल मिलाकर लगभग 5 प्रतिशत की वृद्धि होगी, भारत अकेले वैश्विक मांग में होने वाली वृद्धि का लगभग आधा हिस्सा संभालेगा। इससे स्पष्ट होता है कि भारत तेल बाजार में रणनीतिक महत्व रखता है।

    रूस और भारत के आर्थिक संबंधों पर बात करते हुए सेचिन ने बताया कि अप्रैल 2022 से रूस की तेल आपूर्ति से भारत और चीन को लगभग 40 अरब डॉलर का लाभ हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत और चीन के साथ रूस की साझेदारी ने स्थिर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद की है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं से रूस को अलग करना संभव नहीं है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की तेज़ आर्थिक वृद्धि और ऊर्जा की बढ़ती मांग ने देश को वैश्विक तेल बाजार में निर्णायक स्थिति दे दी है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत की रियल GDP ग्रोथ 7.7 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अनुमान से बेहतर रही। आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने भी भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया है।

    इगोर सेचिन ने होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) की संवेदनशीलता पर भी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि इस स्ट्रेट के जरिए तेल और गैस की आपूर्ति में व्यवधान आने से फर्टिलाइजर्स और फूड प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ सकती हैं। उनका कहना था कि इस प्रभाव के प्रति भारत सबसे अधिक संवेदनशील देशों में शामिल है, जबकि अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों पर भी इसका गहरा असर पड़ सकता है।

    रूस और भारत के बीच ऊर्जा साझेदारी से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक तेल के खेल में भारत की भूमिका आने वाले दशक में और मजबूत होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की बढ़ती मांग न केवल घरेलू ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि वैश्विक बाजार पर भी इसका असर होगा।